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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

२८४ फलदीपिका
(२) यदि यह दोनों (नवम और पंचम के मालिक) समान
बली हों तो पूर्वजन्म और पुनर्जन्म एक ही जाति में था और होगा
(३) पूर्व जन्म का हाल नवमेश के वर्ण, गुण आदि जो विविध
ग्रहों के प्रथम अध्याय में बताये गये हैं उनके अनुसार बताना चाहिये,
तथा पुनर्जन्म का विवरण पंचमेश के वर्ण, गुण आदि के अनुसार
कहना चाहिये । ग्रहों के स्वरूप, जाति, प्रकृति, स्वभाव आदि पहिले
संज्ञाध्याय में बता चुके हैं। ।।२७।।
२१ श्लोक से २९ श्लोक तक पूर्व जन्म और पुनर्जन्म का हाल
जानने के सिद्धान्त दिये गये है । व्यावहारिक दृष्टि से इनकी उपयो-
गिता कुछ नहीं है । शास्त्रीय दृष्टि से यह दिलचस्प प्रकरण है ।
कर्म विपाक नामक एक ग्रंथ में पूर्व जन्म का विशेष विवरण जानने
के लिये विस्तार पूर्वक फला देश दिया गया है । परन्तु यह कहा नहीं
जा सकता कि कहाँ तक वह ठीक है क्यों कि इसका निश्चय करने
का कोई साधन नहीं कि कहाँ तक यह फल ठीक बैठते हैं ।।२९।।

पन्द्रहवां अध्याय
भावचिन्ता
भावाः सर्वे शुभपतियुता वीक्षिता वा शुभेशै-
स्तत्तद्भावाः सकलफलदाः पापदृग्योगहीनाः ।
पापाः सर्वे भवनपतयश्चेदिहाहुस्तथैव
खेटैः सर्वैः शुभफलमिदं नीचमूढारिहीनैः ॥१॥
तत्तद्भावात् त्रिकोणे स्वसुखमदनभे चास्पदे सौम्ययुक्ते ।
पापानां दृष्टिहीने भवनपसहिते पापखेटैरयुक्ते ।
भावानां पुष्टिमाहुः सकलशुभकरीमन्यथा चेत्प्रणाशं
मिश्रं मिश्रैर्ग्रहेन्द्रैः सकलमपि तथा मूर्तिभावादिकानाम् ॥
नाशस्थानगतो¹ दिवाकरकरैर्लुप्तस्तु यद्भावपो²
नीचारातिगृहं³ गतो⁴ यदि भवेत्सौम्यैरयुक्तेक्षितः⁵ ।
तद्भावस्य विनाशं वितनुते तादृग्विधोऽन्योऽस्ति चेत्
तद्भावोऽपि फलप्रदो न हि शुभश्चेन्ना

२८६ फलदीपिका
तद्भावनाशं कथयन्ति तज्ज्ञाः
शुभेक्षितस्तद्भवनस्य सौख्यम् ॥५॥
भावाधीशो च भावे सति बलरहिते च ग्रहे कारकाख्ये
पापान्तःस्थे च पापैःररिभिरपि समेतेक्षिते नान्यखेटैः ।
पापैस्तद्बन्धुमृत्युव्ययभवनगतैस्तत्त्रिकोणस्थितैर्वा
वाच्या तद्भावहानिः स्फुटमिह भवति द्वित्रिसंवादभावात् ॥
तत्तद्भावपराभवेश्वरखरद्रेष्काणपा दुर्बला
भावार्थ्यष्टमकामगा निजदशायां भावनाशप्रदाः ।
पापा भावगृहात् त्रिशत्रुभवगाः केन्द्रत्रिकोणो शुभाः
'वीर्याढ्याः खलु भावनाथसुहृदो भावस्य सिद्धिप्रदाः ॥७॥
(i) भाव का शुभाशुभ विचार इस पन्द्रहवें अध्याय में बताया
गया है। किसी भाव का विचार करना हो तो सर्वप्रथम निम्नलिखित
सिद्धांत लागू करने चाहिए। जिन भावों में शुभग्रह बैठे होते हैं,
जो भाव शुभग्रह से दृष्ट होते हैं वह उत्तम फल देते हैं।
जो भाव अपने स्वामी के सहित होता है वह शुभ फल देता
है। यदि कोई भाव अपने स्वामी से दृष्ट हो तो भी शुभ
फल देगा। यहाँ पूर्ण दृष्टि का पूर्ण फल, तीन चौथाई दृष्टि का
तीन चौथाई फल, आधी दृष्टि का आधा फल और चौथाई
दृष्टि का चौथाई फल समझना चाहिए। एक टीकाकार ने यह भी
अर्थ किया है कि शुभ भवनों के स्वामी भी किसी भाव को देखें तो
उस भाव की समृद्धि करेंगे किन्तु हमारे विचार से यहां "शुभ" शब्द
का अर्थ नैसर्गिक शुभता है--भावाधिप होने के कारण शुभता नहीं।
उदाहरण के लिए नवमेश, दशमेश, शनि भावाधिप होने के कारण शुभ
हुआ, किन्तु नैसर्गिक क्रूर है। तुला लग्न वाले को नैसर्गिक रूप से

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २८७
बृहस्पति शुभ हुआ, यद्यपि तृतीय और छठे का मालिक होने के कारण
उसे शुभ नहीं कहेंगे । हमारे विचार से ग्रन्थकार का मत नैसर्गिक
शुभ और पाप का भेद बताना है। यदि पापग्रह किसी भवन का
स्वामी है और उस भवन में बैठा है तो उस भाव को बनायेगा,
बिगाड़ेगा नहीं । इसी प्रकार पापग्रह यदि अपने भाव को (जिस
राशि का वह स्वामी है) पूर्ण दृष्टि से देखे तो उस भाव की वृद्धि ही
करेगा । किन्तु ऊपर की पंक्तियों में जो शुभ फल उत्पन्न करने का
सिद्धान्त बताया गया है, वह तभी ठीक बैठता है, जब ग्रह नीच, अस्त
या शत्रुक्षेत्री न हो । यदि इन तीनों दोषों में से एक, दो, या तीनों
दोषों से युक्त हो तो शुभता प्रदान करने की शक्ति कम हो जाती है
या नहीं रहती है । ॥१॥
(ii) जिस भाव का विचार करना हो, उस भाव को थोड़ीं देर
के लिए लग्न मान लीजिए और फिर विचार कीजिए कि उस
विचारणीय भाव से प्रथम, द्वितीय, चंतुर्थ पंचम, सप्तम, नवम और
दशम में उस विचारणीय भाव का स्वामी और शुभग्रह हैं या नहीं ।
यदि इन स्थानों में शुभग्रह हैं तो उस भाव की समृद्धि होगी । यह
भी देखना चाहिए कि विचारणीय भाव से १, २, ४, ५, ७, ९, १०
पर पापग्रहों की दृष्टि तो नहीं हैं या पापग्रह बैठे तो नहीं हैं। यदि
इन निर्दिष्ट स्थानों में केवल शुभग्रह बैठे होंगे और विचारणीय
भाव का स्वामी बैठा होगा तो पूर्ण शुभ फल; यदि इन स्थानों
में पापग्रह बैठे होंगे तो पूर्ण अशुभ फल । यदि कुछ शुभग्रह,
कुछ पापग्रह मिले जुले बैठे होंगे तो मिला जुला फल होगा—कुछ
अच्छा, कुछ ख़राब । प्रत्येक भाव का विचार करने के लिए उससे भिन्न
भिन्न स्थानों पर शुभ या पाप कैसे ग्रह बैठे हैं इसका विचार कर
अन्तिम परिणाम पर पहुँचना चाहिए । ॥२॥
(iii) यदि किसी भाव का स्वामी (१) अष्टम स्थान में गया हो

२८८ फलदीपिका
या (२) सूर्य की किरणों से अस्त हो या (३) नीच राशि में हो
या (४) शत्रु क्षेत्र में गया हो और शुभग्रहों से युक्त या दृष्ट न
हो तो उस भाव का नाश होता है अर्थात् उस भाव सम्बन्धी सुख की
प्राप्ति नहीं होती प्रत्युत दुःख की प्राप्ति होती है। बहुत से लोगों
के मत से विचारणीय भाव से अष्टम में जाने से ही नहीं, लग्न से
अष्टम में जाने से भी ग्रह जिस भाव का स्वामी है उस भाव को
बिगाड़ेगा। यदि कोई शुभग्रह भी नीचक्षेत्री या शत्रुक्षेत्री या अस्तंगत
होकर किसी भाव में बैठ जाय और वहाँ पर शुभग्रह से युक्त या वीक्षित न
हो तो जिस भाव का वह स्वामी है उस भाव को बिगाड़ेगा। यदि क्रूर ग्रह
[कुंडली: १ भाव में १२ रा.; ३ भाव में २ शु. श.; ४ भाव में ३ बु. सू. चं.; ५ भाव में ४ मं; ७ भाव में ६. के.; ९ भाव में ८ बृ.] नीच, अस्तंगत या शत्रुक्षेत्री होकर
किसी भाव में बैठा हो और शुभग्रह से
युत या वीक्षित न हो तो जहाँ बैठा है
उसे और भी बिगाड़ेग। उदाहरण
के लिए साथ की कुंडली में मंगल
नीच राशि का होकर पंचम में है।
यदि यह बृहस्पति से दृष्ट नहीं
होता तो और भी अधिक पंचम भाव
को बिगाड़ता । बृहस्पति से दृष्ट है, इस कारण मंगल की क्रूरता कुछ
कम हो गई है, फिर भी नीचस्थ मंगल ने इस जातक के दो ज्येष्ठ
पुत्रों का नाश किया और इसके स्वयं के पेट में जलोदर का महारोग
किया । ॥३॥
(iv) जिस भाव का विचार करना हो उस भाव से छठे,
आठवें, बारहवें यदि पापग्रह हों तो उस भाव का नाश करते हैं।
उदाहरण के लिए आपको सप्तम भाव का विचार करना है तो
सप्तम से छठा बारहवाँ, सप्तम से आठवाँ द्वितीय तथा सप्तम से
बारहवाँ छठा, इन तीनों भावों में यदि पापग्रह हों तो सप्तम भाव
की हानि करेंगे। जिस भाव से विचार करना हो उस विचारणीय

पन्द्रहवां अध्याय : भावचिन्ता २८९
भाव से छठे, आठवें, बारहवें यदि शुभग्रह हों तो उस विचारणीय
भाव को विशेष पुष्ट करने में समर्थ नहीं होते। मान लीजिए सप्तम
भाव का विचार करना है और
उस भाव से छठे, आठवें या बारहवें
किसी भाव में बृहस्पति है तो वह
सप्तम भाव को बलवान बनाने में
उतना समर्थ नहीं होगा। क्यों ?
क्योंकि उन स्थानों में बैठकर वह
सप्तम को पूर्ण दृष्टि से नहीं देख
सकेगा। यद्यपि लग्न से बारहवें घर
में बैठकर सातवें भाव को तीन चरण दृष्टि से बृहस्पति देखता है, किन्तु
सप्तम से छठे स्थान (शत्रुस्थान) में स्थित होने के कारण वह सातवें
भाव के दृष्टिकोण से अच्छे स्थान में नहीं है। ॥४॥
(v) जिस भाव का विचार करना हो, उस भाव का स्वामी
यदि लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में बैठा हो तो उस भाव
को बिगाड़ता है। यह साधारण नियम है। उदाहरण के लिए यदि
लग्नेश अष्टम में हो तो शरीर-पक्ष निर्बल या रोगग्रस्त रहेगा। यदि
सप्तम का स्वामी अष्टम में हो तो स्त्रीसुख में कमी करेगा। किन्तु
इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं। जिसके लिए देखिये अध्याय ६,
श्लोक ५७। जिस भाव का विचार कर रहे हों उस भाव में यदि
त्रिक* का स्वामी बैठा हो तो भी जिस भाव में बैठा है उस भाव को
बिगाड़ता है। उदाहरण के लिए यदि अष्टमेश दशम में बैठा हो तो
दशम स्थान को बिगाड़ेगा। यहाँ भी एक बात ध्यान में रखनी चाहिए

  • त्रिक लग्न से छठे, आठवें, बारहवें भाव को कहते हैं।

२९० फलदीपिका
कि यदि त्रिक का स्वामी होने के साथ-साथ वह ग्रह लग्न का भी
स्वामी हो तो दोष पैदा नहीं करता।
ऊपर दो स्थितियाँ बताईं। विचारणीय भाव का स्वामी दुःस्थान
में बैठे वह भी खराब और दुःस्थान का स्वामी विचारणीय भाव में
बैठे वह भी खराब, किन्तु इन दोनों नियमों का एक अपवाद है कि
जिस भाव का विचार कर रहे हैं उस पर शुभग्रहों की दृष्टि हो
तो उस भाव सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है। ॥ ५ ॥
(vi) किसी भाव सम्बन्धी सुख प्राप्ति का अभाव या उस भाव
सम्बन्धी दुःख प्राप्ति किन परिस्थितियों में होती है ? यह नीचे
बताते हैं :-
. (१) यदि भाव, भावेश और भावकारक निर्बल हों (२) यदि
भाव, भावेश, और भावकारक पापग्रहों के मध्य में हों या पापग्रह
किंवा शत्रुग्रहों से युत या वीक्षित हों और शुभ ग्रहों से युत वीक्षित
न हों (३) विचारणीय भाव से ४, ५, ८, ९ तथा १२वें स्थानों में
पापग्रह हों।
ऊपर यह बताया गया है कि भाव, भावेश और भावकारक इन
तीनों का विचार करके किसी नतीजे पर पहुँचना चाहिए । अगर
ऊपर दिये हुए दो-तीन अनिष्ट योग हों तो निश्चय ही भाव-हानि
होती है । उदाहरण के लिए, स्त्री पक्ष का विचार करना है, सप्तम
भाव भी बलहीन हो, सप्तम भाव का स्वामी भी पापग्रहों के बीच में
हो और सप्तम भाव के कारक शुक्र से चौथे, आठवें पापग्रह हों तो
निश्चय ही जातक की प्रथम स्त्री की मृत्यु होगी। कहने का तात्पर्य
यह है कि कई लक्षण मिलने पर पूरा योग घटित होगा। * ॥६॥

  • नीचे बारहों भावों के स्थिर कारक दिये जाते हैं ।
    (१) सूर्य, (२) बृहस्पति, (३) मंगल, (४) चन्द्र और बुध,
    (५) बृहस्पति, (६) शनि और मंगल, (७) शुक्र, (८) शनि,

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९१
(vii) जिस भाव का विचार करना हो उसका नाश कौन-कौन
से ग्रह करते हैं और उस भाव को पुष्ट कौन-कौन से करते हैं—
यह बताते हैं।
भाव को नाश करने वाले निम्नलिखित हैं :-
(१) विचारणीय भाव से अष्टम भाव का स्वामी। (२)
विचारणीय भाव से २२वें द्रेष्काण का स्वामी। (३) विचारणीय भाव
से छठे, सातवें, आठवें भाव के स्वामी—यदि ये दुर्बल हों।
यह सब ग्रह अपनी-अपनी दशा में अन्तर्दशा में विचारणीय भाव
सम्बन्धी हानि करेंगे।
अब यह बताते हैं कि किसी भाव की पुष्टि किस-किस ग्रह की
दशा में होगी।
(१) विचारणीय भाव से यदि तीसरे, छठे, ग्यारहवें, पापग्रह
बैठे हों तो वह अपनी-अपनी दशा में विचरणीय भाव-सम्बन्धी सुख
उत्पन्न करेंगे।
(२) विचारणीय भाव से प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम
और दशम स्थान में यदि शुभग्रह बैठे हों तो वह विचारणीय भाव
सम्बन्धी वृद्धि करेंगे।
(३) जिस भाव का विचार करना हो उस भाव के स्वामी के
जो शत्रु हैं—वे अपनी दशा—अन्तर्दशा में विचारणीय भाव को
बिगाड़ेंगे और जो मित्र हैं—वे यदि बलवान् हों तो विचारणीय भाव
को पुष्टि प्रदान करेंगे। इस अन्तिम सिद्धान्त का एक उदाहरण दिया
जाता है।
(९) सूर्य, बृहस्पति, (१०) सूर्य, बुध, बृहस्पति, शनि, (११)
बृहस्पति, (१२) शनि। प्रथम भाव का कारक सूर्य। धनभाव का
कारक बृहस्पति इत्यादि।

२९२ फलदीपिका

उदाहरण केलिए साथ की कुंडली
में लग्न भाव का विचार करना है
तो शनि सूर्य का शत्रु है—इस कारण
शनि की दशा-अन्तर्दशा में शरीर-कष्ट
होगा । और बृहस्पति सूर्य का
मित्र है इस कारण बृहस्पति की दशा
अन्तर्दशा में शरीर का सुख होगा ।
।।७।।

राश्तोर्जन्मविलग्नयोर्धृ'तिपतिर्मृ'त्युस्थतद्वीक्षकौ
मन्दः क्रूरदृगाणपो गुलिकपस्तैर्यु'क्तराश्यंशपा ।
राहुश्चैष सुदुर्बलः, स जनने भावानभीष्टस्थितः
पापालोकितसंयुतो निजदशायां भावनाशावहाः ॥८॥

निम्नलिखित ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा में भाव का नाश करते
हैं। (१) जन्मलग्न से तीसरे भाव का स्वामी (२) जन्म राशि से
तृतीय भवन का स्वामी (३) जो ग्रह अष्टम में बैठा हो (४) जो
ग्रह अष्टम को देखता है (५) शनि (६) २२वें द्रेष्काण का स्वामी
(७) जिस घर में मान्दि हो उसका स्वामी (८) ऊपर जो सात
ग्रह बताये गये हैं वह जिन राशि और अंशों में हों उनके स्वामी
(९) दुर्बल राहु यदि वह लग्न से ८वें या १२वें घर में बैठा
हो या पाप-ग्रह से युत या दृष्ट हो । इस श्लोक में यह नहीं बताया
गया कि किस भाव का नाश करता है। किन्तु पिछले श्लोकों में
यह बताया जा चुका है कि पाप-ग्रह जहां बैठते हैं जिसको देखते हैं
जिसके बगल में बैठते हैं उन भावों को नष्ट करते हैं। यही सिद्धांत
इस श्लोक में भी लगाने चाहियें।

पन्द्रहवां अध्याय : भावचिन्ता २९३
भावस्योदयपाश्रितस्य कुशलं यद्भावपेनोदय-
स्वामी तिष्ठति संयुतोऽपि कलयेत्तद्भावजातं फलम् ।
दुःस्थाने विपरीतमेतदुदितं भावेश्वरे दुर्बले
दोषोऽतीव भवेद्बलेन सहिते दोषाल्पता जल्पिता ॥६॥
जिस भाव में लग्नेश बैठा हो उसकी समृद्धि होती है। लग्नेश
जिस भाव के स्वामी के साथ बैठा हो उस भाव के स्वामी के फल को
बढ़ाता है। ऊपर यह बताया गया है कि लग्नेश जिस स्थान में
बैठता है उस स्थान के फल को बढ़ाता है। इसका तात्पर्य यह है कि
उस स्थान का शुभफल बढ़ावेगा। यदि किसी भाव का स्वामी दुःस्थान
में हो तो इसका उलटा फल होता है। यदि दुःस्थान में पड़ा हुआ
ग्रह निर्बल हो तो बहुत अनिष्ट फल करेगा। किन्तु यदि बलवान्
हो तो उतना खराब नहीं जावेगा ॥ ९ ॥
यद्भावेष्वशुभोऽपि वोदयपतिस्तद्भाववृद्धिं दिशे-
द्दुःस्थानाधिपतिः स चेद्यदि तनोः प्राबल्यमन्यस्य न ।
अत्रोदाहरणं कुजे सुतगते सिंहे झषे वा स्थिते
पुत्राप्तिं शुभवीक्षिते झटिति तत्प्राप्तिं वदन्त्युत्तमाः ॥१०॥
इस श्लोक में यह बताया गया है कि लग्नेश स्वयं चाहे शुभ-
ग्रह हो चाहे पाप-ग्रह हो वह जहाँ बैठ जाता है उस स्थान की वृद्धि
ही करता है। ज्योतिष शास्त्र का यह माना हुआ नियम है कि
६, ८, १२, यह दुःस्थान हैं। अब शंका यह होती है कि लग्न का
स्वामी होना तो शुभ होता है किन्तु यदि कोई ग्रह लग्न के साथ
साथ छठे वा आठवें घर का भी स्वामी हो तो वह कैसा फल करेगा।
इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं कि लग्न का स्वामी होने

२९४ फलदीपिका
के कारण जो शुभता है वही मुख्य रहेगी । अर्थात् मान लीजिये
वृश्चिक लग्न है और मंगल लग्न और छठे घर का मालिक हुआ।
या मेष लग्न हो तो मंगल लग्न और आठवें घर का मालिक हुआ ।
अब यदि मंगल पंचम में बैठा हो तो वह षष्ठेश अथवा अष्टमेश होने
के कारण सन्तान कष्ट करेगा या लग्नेश पंचम में बैठा है इस कारण
सन्तान सम्बन्धी शुभफल दिखावेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि
यदि मंगल लग्नेश षष्ठंश अथवा लग्नेश-अष्टमेश होकर पाँचवें घर में
बैठा हो और शुभ-ग्रह से देखा जाता हो तो शीघ्र ही पुत्र-प्राप्ति
करावेगा ।
द्विस्थानाधिपतित्वमस्ति यदि चेन्मुख्यं त्रिकोणर्क्षजं
तस्यार्द्धं स्वगृहेऽथ पूर्वमुभयोर्यत्तद्दशादौ वदेत् ।
पश्चाद्भावमिहापरार्द्धसमये युग्मे गृहे युग्मजं
त्वोजस्थे सति चौजंभावजफलं शंसन्ति केचिज्जनाः ॥११॥
यदि कोई ग्रह दो घरों का मालिक है तो वह अधिक फल
उस घर का दिखायेगा जो उसकी मूल त्रिकोण राशि है । किस
ग्रह की कौनसी मूल त्रिकोण राशि है यह पहले बताया जा चुका
है । (देखिये पृष्ठ २१) उदाहरण के लिये सिंह लग्न की कुण्डली में
बृहस्पति ५वें और ८वें घर का मालिक है । पंचम घर शुभ है,
अष्टम घर अशुभ है ऐसी स्थिति में बृहस्पति की मूल-त्रिकोण राशि
पंचम में होने से मुख्य फल पंचमेश होने का करेगा और अष्टमेश
होने का फल उसका आधा करेगा । अर्थात् यदि पंचमेश होने का
१६ आने शुभ फल तो अष्टमेश होने का ८ आने अशुभ फल । ऐसे
ग्रह की दशा में दोनों भावों के स्वामी होने का शुभ या अशुभ फल
होगा । अर्थात् प्रस्तुत उदाहरण में बृहस्पति पंचमेश और अष्टमेश

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९५
दोनों स्वामित्व का फल दिखावेगा । यहाँ यह भी निर्णय करते हैं
कि पहले किस राशि के स्वामित्व का फल दिखावेगा । इसके उत्तर
में कहते हैं कि लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आवे उस राशि
के स्वामित्व का प्रभाव पहले होगा और जो राशि बाद में होगी
उसका प्रभाव बाद में होगा । परन्तु मन्त्रेश्वर महाराज स्वयं लिखते
हैं कि कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि यदि विचारणीय ग्रह ऊनी
राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों में जो ऊनी राशि है उसका
फल पहले दिखावेगा और अपनी दूसरी राशि का फल बाद में ।
किन्तु यदि ग्रह किसी सम राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों
में जो समराशि है उसके स्वामित्व का फल पहले दिखावेगा और ऊनी
राशि का फल बाद में दिखावेगा । ॥११॥
यद्भावेशस्याधिशत्रुग्रहो वा
यो वा खेटो बिन्दुशून्यर्क्षयुक्तः
तत्तत्पाके मूर्तिभावादिकानां
नाशं ब्रूयाद्दैववित्प्राज्ञिकाय ॥१२॥
इस श्लोक में यह बताते हैं कि किन ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा में
किन-किन भावों का नाश होगा । इस सम्बन्ध में दो बातें बताते हैं ।
(क) जो भावेश का अधिशत्रु ग्रह हो उस अधि-शत्रु ग्रह की दशा-
अन्तर्दशा में भाव का नाश होगा । (ख) जिस ग्रह की अपने अष्टक
वर्ग में जिस भाव में शून्य-शुभ बिन्दु हो अर्थात् कोई शुभ बिन्दु न
हो उस भाव को भी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में बिगाड़ता है ।
इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये शनि की महादशा है और
शनि के अष्टक वर्ग में पंचम भाव में कोई शुभ बिन्दु नहीं है तो
शनि की दशा-अन्तर्दशा में पंचमभाव सम्बन्धी कष्ट होगा । (ग)

२९६ फलदीपिका
एक अन्य टीकाकार के मत से मान लीजिये सिंह लग्न है और सूर्य के
अष्टकवर्ग में मीन में कोई शुभ बिन्दु नहीं है तो मीन राशि में जो
ग्रह बैठे हों उनकी दशा-अन्तर्दशा में शरीर सम्बन्धी कष्ट होगा।
इनके मत से जिस भाव का विचार करना है उस विचारणीय भावेश
के अष्टक वर्ग में जिस राशि में कोई शुभ बिन्दु न हो उस राशि
में बैठा हुआ ग्रह अपनी दशा अन्तर्दशा में विचारणीय भाव का नाश
करेगा। ॥१२॥
स्वोच्चे सुहृत्क्षेत्रगतो ग्रहेन्द्रः
षड्भिर्बलैर्मुख्यबलान्वितोऽपि ।
सन्धौ स्थितः सन्नफलप्रदः स्यात्
एवं विचिन्त्यात्र वदेद्विपाके ॥१३॥
भावेषु भावस्फुटतुल्यभाग-
स्तद्भावजं पूर्णफलं विधत्ते ।
सन्धौ फलं नास्ति तदन्तराले
चिन्त्योऽनुपातः खलु खेचराणाम् ॥१४॥
चाहे कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में हो, चाहे वह मित्र के
क्षेत्र में हो चाहे वह पूर्ण षड्बल से सम्पन्न हो किन्तु यदि वह ग्रह
भाव-सन्धि में हो तो वह फल देने में असमर्थ हो जाता है। फलादेश
करते समय इसका विचार कर लेना चाहिये। ॥१३॥
जो ग्रह भावमध्य में होते हैं वह उस भाव सम्बन्धी पूर्णफल
दिखाते हैं और जो ग्रह भावसन्धि में होते हैं वह शून्य फल दिखाते हैं
अर्थात् कुछ फल नहीं दिखाते हैं। यदि भाव-मध्य और भाव सन्धि के
बीच में हो तो जितना ही भाव मध्य के पास होंगे उतना ही उस

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९७
भाव सम्बन्धी अधिक फल दिखावेंगे और ग्रह जितना भाव मध्य से
दूर होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी कम फल दिखावेगा । यदि
सूक्ष्म विचार करना हो तो त्रैराशिक से यह गणित कर लीजिये कि
कितना फल दिखावेगा ॥ १४ ॥
सूर्यादात्मपितृप्रभाव्निरुजां शक्तिं श्रियं चिन्तयेत्
चेतोबुद्धिनृपप्रसादजननीसंपत्करश्चन्द्रमाः ।
सत्वं रोगगुणानुजावनिरिपुज्ञातीन्धरासूनुना
विद्याबन्धुविवेकमातुलसुहृद्वाक्कर्मकृद्बोधनः ॥१५॥
प्रज्ञावित्तशरीरपुष्टितनयज्ञानानि वागीश्वरात्
पत्नीवाहनभूषणानि मदनव्यापारसौख्यं भृगोः ।
आयुर्जीवनमृत्युकारणविपद्भृत्यांश्च मन्दाद्वदेत्
सर्पेणैव पितामहं तु शिखिना मातामहं चिन्तयेत् ॥१६॥
सूर्य से आत्मा, पिता, प्रभाव, स्वास्थ्य, शक्ति (ताक़त), और
लक्ष्मी का विचार करना चाहिये। चन्द्रमा से मन, बुद्धि राजा की
कृपा, माता और सम्पत्ति का विचार करिये । मंगल से सत्व
(ताकत, हिम्मत) रोग, गुण, छोटे भाई, पृथ्वी, शत्रु और ज्ञाति
(चचेरे भाई आदि) का विचार करना चाहिये । विद्या, बन्धु,
विवेक, मामा, मित्र, वाणी और कार्यक्षमता का विचार बुध से
करे । ॥१५॥
संस्कृत में शब्द आया है कि कर्म का विचार बुध से करे । क्या
बुध कर्म करने वाला है ? इसका क्या आशय है ? बुध स्नायुमंडल
का स्वामी है । स्नायुमंडल पुष्ट होने से मनुष्य कर्मशील होता है,
कर्म में प्रवृत्त होता है। काम काज में व्यस्त रहता है । स्नायुमंडल

२९८ फलदीपिका
कमजोर होने से काम करने की प्रवृत्ति संकुचित होती है। कार्य करने
की शक्ति कम होने से कार्य करने की रुचि भी कम होती है।
दशम स्थान—दसवें घर को कर्म स्थान कहते हैं। कर्म या कार्य का
दशम स्थान से सम्बन्ध होने के कारण ही—दशम स्थान के कारक
ग्रहों में बुध भी एक कारक माना गया है। ॥१५॥
प्रज्ञा, धन, शरीर पुष्टि, पुत्र और ज्ञान का विचार बृहस्पति
से करे। पत्नी, सवारी, आभूषण, स्त्री-पुरुष प्रेम सम्बन्ध और सुख
का कारक शुक्र है। आयु, जीवन (जीविका), मृत्यु का कारण,
विपत्ति और नौकरी का विचार शनि से करना चाहिये। राहु से
बाबा का और केतु से नाना का विचार किया जाता है। ॥१६॥
द्युमणिरमरमन्त्री भूसुतः सोम सौम्यौ
गुरुरिनतनयारौ भार्गवो भानुपुत्रः ।
दिनकरदिविजेड्यौ जीवभानुज्ञमन्दाः
सुरगुरुरिनसूनुः कारकाः स्युर्विलग्नात् ॥१७॥
जब किसी बात का विचार किया जाता है तो प्रायः ज्योतिषी
भाव और भावेश को देखते हैं। परन्तु जितनी मुख्यता भाव और
भावेश की है उतनी ही कारक ग्रह की भी है। उदाहरण के लिये
किसी का सप्तम और सप्तमेश तो बिगड़ा है किन्तु शुक्र बड़ा बलवान्
है तो शुक्र के कारण स्त्री सुख प्राप्त होगा। अथवा मान लीजिये कि
सप्तम और सप्तमेश तो अच्छे हैं और शुक्र बिगड़ा है तो शुक्र के
बिगड़ने के कारण उतना स्त्री सुख नहीं होगा जितना होना चाहिये।
किन वस्तुओं का कौन सा ग्रह कारक होता है यह पिछले श्लोकों में
बताया गया है। अब उसी बात को भावों के दृष्टिकोण से बताते हैं कि
किस भाव का कौन सा ग्रह या कौन से ग्रह कारक होते हैं। जन्म

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९९
कुण्डली में बारह भाव होते हैं । बारहों भावों के क्रमशः निम्नलिखित
कारक हैं : (१) सूर्य (२) बृहस्पति (३) मंगल (४) चन्द्र और
बुध (५) बृहस्पति (६) मंगल और शनि (७) शुक्र (८) शनि
(९) बृहस्पति और सूर्य (१०) सूर्य, बुध, बृहस्पति और शनि
(११) बृहस्पति और (१२) शनि । ॥ १७ ॥
सुहृदरिपरकीयस्वर्क्षतुङ्गस्थितानां
फलमनुपरिचिन्त्यं लग्नदेहादिभावैः ।
समुपचयविपत्ती सौम्यपापेषु सत्यः
कथयति विपरीतं रिःफषष्ठाष्टमेषु ॥१८॥
किसी ग्रह का फल देखना हो तो यह देखिये कि वह लग्न आदि
द्वादश भावों में से किस भाव में है और मित्र राशि में है, या स्वराशि
में है, या उच्च राशि में या शत्रु राशि में । सत्याचार्य के मत से जिस
घर में सौम्यग्रह बैठते हैं उस घर की वृद्धि करते हैं और जिस घर में
पाप-ग्रह बैठते हैं उस घर का नाश करते हैं लेकिन छठे, आठवें, बारहवें
में इससे उलटा समझना चाहिये । ॥ १८ ॥
पापग्रहाः षष्ठमृतिव्ययस्था-
स्तद्भाववृद्धिं कलयन्ति दोषैः ।
शुभास्तु तद्भावलयं हि
तस्माच्छत्र्वादि भावोत्फलप्रणाशः ॥१९॥
पापग्रह यदि लग्न से छठे, ८वें या १२वें हो तो उन भावों के उन
दुष्ट फल को बढ़ाते हैं । शुभ ग्रह इन भावों में हों तो उस भाव के

३०० फलदीपिका
प्रभाव को लय (नाश) करते हैं। इस कारण इन भावों में शुभ-ग्रह के
होने से इन भावों के दुष्ट फल का नाश होता है। यद्यपि मन्त्रेश्वर
महाराज के मत से त्रिक स्थान का शुभग्रह त्रिक स्थान के दोष को
अवश्य कम करता है परन्तु त्रिक स्थान में बैठने से ग्रह स्वयं दूषित
हो जाता है और अपनी दशा-अन्तर्दशा में पूर्ण शुभ फल देने में असमर्थ
होता है। ॥ १९ ॥
भावस्य यस्यैव फलं विचिन्त्यं
भावं च तं लग्नमिति प्रकल्प्य ।
तस्माद्वदेद्द्वादशभावजानि
फलानि तद्रूपधनादिकानि ॥२०॥
इस श्लोक में एक नयी बात बताते हैं। जिस भाव का विचार
करना हो उसको लग्न मान कर एक नयी कुण्डली बना लीजिये और
फिर इसी प्रकार विचार कीजिये जैसे कि जन्म-कुण्डली में विचार
किया जाता है। उदाहरण लिये आपको अपने पुत्र की स्त्री का विचार
करना है तो आपके जन्म-लग्न से पंचम को (क्योंकि पुत्र का विचार
पंचम से किया जाता है) पुत्र स्थान मानकर उस पंचम से सप्तम से
पुत्र वधू का विचार कीजिये। अथवा दूसरा उदाहरण लीजिये।
आपको अपनी पत्नी के धन का विचार करना है तो सप्तम से
दूसरा अर्थात् अपने अष्टम से अपनी स्त्री के धन का विचार कीजिये।
पत्नी के छोटे भाई का विचार करना है तो अपने सप्तम (पत्नी) से
तृतीय—(छोटा) भाई अर्थात् अपने जन्म लग्न से नवम स्थान से पत्नी के
छोटे भाई का विचार कीजिये। इस प्रकार किसी भी भाव को लग्न
मान कर उससे द्वादश भावों का विचार किया जा सकता है। यह
ऊपर के उदाहरण से स्पष्ट है। ॥ २० ॥

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०१
एवं हि तत्कारकतो विचिन्त्यं
पितुश्च मातुश्च सहोदरस्य ।
तन्मातुलस्यापि सुतस्य पत्यु-
र्भृत्यस्य सूर्यादिखगस्थितर्क्षात् ॥२१॥
एक अन्य प्रकार और बताते हैं । यदि पिता का विचार करना है
तो सूर्य जिस भाव में है उसको लग्न मान कर सूर्य से द्वितीय से पिता
का धन, सूर्य से तृतीय से पिता का छोटा भ्राता आदि पिता के बारहौं
भावों का विचार कीजिये । माता का विचार करना है तो चन्द्र-स्थित
राशि को लग्न मान कर। भाई का विचार करना है तो मंगल-स्थित
राशि को लग्न मान कर, मामा का विचार करना हो तो बुध-स्थित
राशि को लग्न मान कर, पुत्र का विचार बृहस्पति वाली राशि को लग्न
मान कर, स्त्री का विचार शुक्र-स्थित राशि को लग्न मान कर और
नौकर का विचार शनि-स्थित राशि को लग्न मान कर उनके
बारहों भावों का विचार करना चाहिये । ॥ २१ ॥
सूर्यस्थितर्क्षाज्जनकस्वरूपं
वृद्धिं द्वितीयेन तु तत्प्रकाशम् ।
[

३०२ फलदीपिका
पुण्यं शुभं तत्पितरं शुभेन
व्यापारमस्यैव हि कर्मभावात् ।
लाभं ह्युपान्त्यात् क्षयमन्त्य-
भावाच्चन्द्रादिकानां फलमेवमाहुः ॥२४॥
सूर्य जिस राशि में है उससे पिता के स्वरूप का विचार करिये।
सूर्य-स्थित राशि से दूसरे भाव से पिता के धन और ख्याति का विचार
करिये। सूर्य जिस राशि में है उससे तीसरे से पिता के भाई और गुणों
का विचार करे। पिता के सुख और पिता की माता का विचार सूर्य-
स्थित राशि हो उससे चौथे घर से करना चाहिये । ॥ २२ ॥
सूर्य-स्थित राशि से पंचम से पिता की बुद्धि और प्रसाद (प्रसन्नता)
का विचार करे। सूर्य-स्थित राशि से छठे से पिता के दोष, शत्रु और
रोग का विचार करे। सूर्य-स्थित, राशि से सप्तम से पिता के मदन-
व्यापार (स्त्री-पुरुष प्रेम) का, और सूर्य-स्थित राशि से अष्टम से पिता
के दुःख, आयु तथा मृत्यु का विचार करे। ॥ २३ ॥
सूर्य-स्थित राशि अर्थात् सूर्य जिस राशि में हो उससे नवम से
पिता का पुण्य, पिता का शुभ, पिता के पिता का विचार करना चाहिये।
और सूर्य स्थित राशि से दशम से पिता के व्यापार का विचार करना
चाहिये। सूर्य-स्थित राशि से एकादश से पिता के लाभ का और सूर्य-
स्थित राशि से द्वादश से पिता के क्षय (व्यय) का विचार करना
चाहिये। जैसे सूर्य स्थित राशि से विविध भावों से पिता के विविध
भावों का विचार किया जाता है वैसे ही चन्द्रस्थित राशि को लग्न
मान कर मातृ सम्बन्धी विविध भावों का, मंगल-स्थित राशि को
लग्न मान कर भ्रातृ सम्बन्धी विविध भावों का विचार करना
चाहिये। इसी प्रकार बुध आदि ग्रहों से उनसे सम्बन्धित रिश्तेदारों
के बारहवों भाव का विचार करे । ॥ २४ ॥

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०३
तत्तद्भावात्कारकादेवमूह्यं
तत्तन्मातृभ्रातृपित्रात्मजाद्यम् ।
तस्मिन् भावे कारके भावनाथे
वीर्योपेते तस्य भावस्य सौख्यम् ॥२५॥
इसलिये पिता, माता, भ्राता, मातुल, पुत्र, स्त्री, भृत्य आदि का
विचार करना हो तो उपर्युक्त प्रकार से भाव, भावेश तथा कारक
तीनों का विचार करना चाहिये । यदि भाव, भावेश और कारक तीनों
बलवान् हों तो उस भाव सम्बन्धी सुख होगा । ॥ २५ ॥
धर्मे सूर्यः शीतगुर्बन्धुभावे
शौर्ये भौमः पञ्चमे देवमन्त्री ।
कामे शुक्रश्चाष्टमे भानुपुत्रः
कुर्यात्तस्य क्लेशमित्याहुरन्ये ॥२६॥
नवम में सूर्य, चौथे में चन्द्रमा, तृतीय में मंगल, पंचम में
बृहस्पति, सप्तम में शुक्र, और अष्टम में शनि उस भाव सम्बन्धी क्लेश
करते हैं ऐसा अन्य लोग कहते हैं । ॥ २६ ॥
लग्नेश्वरो यद्भवनेशयुक्तो
यद्भावगस्तस्य फलं ददाति ।
भावे तदीशे बलभाजि तेन
भावेन सौख्यं व्यसनं बलोने ॥२७॥
लग्नेश किस भावेश के साथ रहता है उस भावेश का या जिस
भाव में रहता है उस भाव का फल देता है। यदि भाव और उसका
स्वामी बलवान् हो तो उस भाव सम्बन्धी सुख होता है । यदि बलहीन
हो तो उस भाव सम्बन्धी कष्ट होता है । ॥ २७ ॥