फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
ग्यारहवां अध्याय : स्त्री जातक २२७
गशि और सत् (अच्छा, शुभग्रह का, शुभयुक्त शुभदृष्ट) नवांश
हो तो उस स्त्री को सौन्दर्य, यश, विद्या, तथा धन से युक्त पति
मिलेगा। यदि इसका उलटा हो अर्थात् सप्तम भाव मध्य पर अशुभ
राशि, अशुभ नवांश हो तो कुतनु (कुत्सित शरीर वाला) मूर्ख, चालाक,
निर्धन पति होगा और उनका (पति पत्नी) का वियोग भी होगा
(एक साथ न रहें या मृत्यु के कारण)। यदि सप्तम में मंगल हो
तो विधवा हो, यदि शुभ और पाप दोनों प्रकार के ग्रह सप्तम में हों
तो पुनर्विवाह करे। यदि अष्टम में क्रूर ग्रह हों तो पति की आयु का
हरण करती हैं अर्थात् पति अल्पायु होता है किन्तु यदि द्वितीय भाव में
(लग्न से दूसरे) अशुभ ग्रह हों तो स्त्री की स्वयं की मृत्यु हो जाती है।
हमारा अनुभव है कि वर और कन्या यदि दोनों की कुंडली में
मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य का दोष बराबर हो तो दोनों कुंडलियों एक
दूसरे के दोष को काट देती हैं ॥३॥
यदि पंचम भाव में वृष, सिंह, कन्या या वृश्चिक राशि हो और
उसमें चन्द्रमा हो तो उस स्त्री के थोड़ी संतान हों। सप्तम भाव मध्य
मंगल या शनि की राशि या मंगल या शनि के नवांश में हो तो उसकी
योनि में रोग हो। यदि चतुर्थ स्थान में पाप ग्रह हों तो कुलटा हो,
यदि लग्न, चन्द्र और शुक्र मंगल या शनि के राशि और अंश में हों तो
पुंश्चली (व्यभिचारिणी) हो ॥४॥
यदि सप्तम भाव मध्य शुभ ग्रह की राशि और नवांश में हो तो
सुन्दर जघन (कमर के नीचे जांघों के बीच का भाग जघन कहलाता है)
वाली, मंगल वती (पति सुख सम्पन्न) होती है। यदि लग्न चतुर्थ
और चन्द्रमा का शुभ ग्रहों से सम्बन्ध हो तो सच्चरित्रा, अनेक गुणों
से युक्त हो, यदि त्रिकोणों में (पांचवे तथा नवम घर में) सौम्यग्रह
हों, तो सुखी, पुत्रवती, गुणवती, सम्पत्ति-शालिनी हो । यदि उपर्युक्त
घरों में निर्बल क्रूर ग्रह हों तो बाँझ हो या उसकी सन्तति अल्पायु
हो ॥ ५ ॥
२२८ फलदीपिका
यह देखिये कि लग्न और चन्द्रमा दोनों में कौन बलवान् है ।
जो बलवान् हो वह यदि ।
(१) मेष या वृश्चिक राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
दुष्टा, यदि शनि के त्रिंशांश में हो तो दासी, गुरु के त्रिंशांश में हो तो
सुशीला और धनी, बुध के त्रिंशांश में हो तो मायाविनी और शुक्र
के त्रिंशांश में हो तो चरित्र दोष से युक्त होता है।
(२) वृष या तुला राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
तो बहुत दूषण (चरित्र दोष) से युक्त, शनि के त्रिंशांश में हो तो अन्य
पति से समागम करने वाली (अन्य के पति से या स्वयं दूसरा विवाह
करें), गुरु के त्रिंशांश में हो तो पूज्या (आदरणीया), बुध के त्रिंशांश
में हो तो विदुषी ओर शुक्र के त्रिंशांश में हो प्रसिद्ध-ख्याति वाली हो ।
(३) यदि मिथुन या कन्या की राशि में हो और मंगल के
त्रिंशांश में हो तो कपटिनी, शुक्र के त्रिंशांश में हो तो नपुंसक के
समान, गुरु के त्रिंशांश में हो तो साध्वी, बुध के त्रिंशांश में हो तो
गुणवती और शुक्र के त्रिंशांश में हो तो विलास के लिये उत्सुक रहे ।
(४) यदि कर्क राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो तो
स्वच्छन्दा, शनि के त्रिंशांश में पति घातिनी, गुरु के त्रिंशांश में विशिष्ट
गुणों से युक्त, बुध के त्रिंशांश में शिल्पकला में कुशल और शुक्र के
त्रिंशांश में उत्तम आचरण वाली होती है ।
(५) यदि धनु या मीन राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
तो गुणवती, शनि के त्रिंशांश में हो तो संभोग की कम इच्छा
रखने वाली, गुरु के त्रिंशांश में हो तो गुणशालिनी, बुध के त्रिंशांश में
हो तो कला कुशल और शुक्र के त्रिंशांश में हो तो सच्चरित्रा होती है ।
(६) यदि मकर या कुंभ राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में
हो तो दासी, शनि के त्रिंशांश में हो तो अन्य पुरुष में आसक्त, गुरु के
त्रिंशांश में हो तो पति को अपने अधीन रखने वाली, बुध के त्रिंशांश
ग्यारहवां अध्याय : स्त्रीजातक २२९
में हो तो असती और शुक्र के त्रिंशांश में हो निस्सन्तान ओर दरिद्रा
होती है ।
(७) यदि सिंह राशि में हो ओर मंगल के त्रिंशांश में हो तो
दुष्ट भार्या, शनि के त्रिंशांश में हो तो आचरण हीन, गुह के त्रिंशांश
में हो तो राजा या जमींदार की पत्नी, यदि बुध के त्रिंशांश में हो
तो मर्दाना (स्त्रियोचित चेष्टा के विरुद्ध) और शुक्र के त्रिंशांश में
हो तो अन्य पुरुष में आसक्त होती है । ॥ ६-८ ॥
नीचे कुछ नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या किन-किन के लिए अनिष्ट
होती हैं यह बताया जाता है : ज्येष्ठा में उत्पन्न कन्या पति के बड़े
भाई की मृत्यु करे, आश्लेषा में उत्पन्न सास के लिये घातक, मूल में
उत्पन्न ससुर के लिये अनिष्ट और विशाखा में उत्पन्न देवर के लिये
घातक ।
जो कन्याएँ चित्रा, आर्द्रा, आश्लेषा, शतभिषा ज्येष्ठा, मूल, कृत्तिका
या पुष्य नक्षत्र में उत्पन्न होती हैं वे वंध्या, विधवा, मृतसुता (जिसके बच्चे
मर जावें), स्वामी से परित्यक्ता (पति छोड़ दे) या निर्धना होती
हैं ॥ ९ ॥*
यदि लग्नेश, सप्तमेश, नवमेश और जिस राशि में चन्द्रमा है
उस का स्वामी शुभग्रहों के उत्तम स्थानों में स्थित हों ओर अस्त न हों
तो स्त्री भाग्यशालिनी, सुन्दरी, बंधुओं में पूज्य और पुण्य कर्म करने
में कुशल होती है । वह अपने पति का प्रिय करने वाली, कल्याण-
शीला, सच्चरित्रा, सत्पुत्रवती होती है । अष्टम भाव पर जितने अधिक
शुभ ग्रहों की दृष्टि होगी उतने ही अधिक काल तक वह सुमंगली
(सधवा) रहेगी ॥ १० ॥
*हमारे विचार से नक्षत्र में उत्पन्न होने का, फल का, जन्म कुंडली
के अन्य ग्रहों के फल से तारतम्य कर किसी परिणाम पर पहुँचना
उचित है।
२३० फलदीपिका।
स्त्री का मासिक धर्म जब प्रारंभ हो (प्रथम बार ही नहीं-कभी-
भी, तब यदि चन्द्रमा गोचर वश जन्म कुंडली में अनुपचय (पहले,
दूसरे, चौथे, पांचवे, सातवें, आठवे, नवें बारहवें स्थान में हो और
मंगल से देखा जाता हो तो उस महीने उसको गर्भ रह सकता है ।
यदि चन्द्रमा ऐसे स्थान में नहीं है तो उसे उस महीने में गर्भ नहीं
रहेगा ।
यदि चन्द्रमा पुरुष की जन्म कुंडली में उपचय स्थान (३, ६,
१०, ११) में हो और उसे गुरु देखता ही उस समय गर्भाधान करे ।
गर्भाधान त्याज्य समय बचाकर करना चाहिये । धर्मशास्त्र में यह
बताया गया है कि कौन-कौन से समय त्याज्य है—यथा एकादशी,
अमावास्या पूर्णिमा, माता, पिता का श्राद्ध दिन आदि । ऐसे लग्न में
—जिस पर शुभ दृष्टि अधिक हो और जब चन्द्रमा पर भी शुभग्रहों
की दृष्टि अधिक हो गर्भाधान करना श्रेयस्कर है ॥ ११ ॥
बारहवां अध्याय
पुत्रभाव फल
सुस्था विलग्नशशिनोः सुतभेशजीवाः
सुस्थाननाथशुभदृष्टियुते सुतर्क्षे ।
लग्नात्मपौ यदि युतौ च मिथः सुदृष्टौ
क्षेत्रे परस्परगतौ यदि पुत्रसिद्धिः ॥१॥
यदि लग्न से पांचवे भाव का स्वामी, चन्द्रमा से पांचवे स्थान का
स्वामी और बृहस्पति अच्छे स्थानों में बैठे हों और पंचम भाव पर
पंचमेश की तथा शुभ-ग्रहों की दृष्टि हो तथा चतुर्थ, नवम, आदि के
शुभ ग्रह स्वामियों की दृष्टि हो और छठे, आठवे, बारहवे घर के
स्वामी की दृष्टि पाँचवे घर पर न हो और लग्नेश, पंचमेश एक साथ
बैठे हों या एक दूसरे के घर में बैठ हों या लग्नेश, पंचमेश में परस्पर
मित्र दृष्टि हो तो पुत्रसिद्धि होती है । अर्थात् यह सब योग पुत्रकारक
हैं । ।। १ ।।
लग्नामरेड्यशशिनां सुतभेषु पापै
र्युक्तेक्षितेष्वथ शुभैरयुतेक्षितेषु ।
पापोभयेषु सुतभेषु सुतेश्वरेषु
दुस्थानगेषु न भवन्ति सुताः कथंचित् ॥२॥
अब नीचे वह योग दिये जाते हैं जिनके कारण सन्तान नहीं होती
या होकर नष्ट हो जाती है । अर्थात् निम्नलिखित योग सन्तान के
बाधाकारक हैं ।
२३२ फलदीपिका
(i) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पंचम स्थान पाप-ग्रहों से
युक्त या दृष्ट हों और उन स्थानों में न शुभ-ग्रह बैठे हों न उनको
शुभ-ग्रह देखते हों ।
(ii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थानों के स्वामी
दुःस्थान में पड़े हो । छठा, आठवाँ और बारहवाँ घर दुःस्थान
कहलाता है ।
(iii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थान पाप-ग्रहों के
बीच में पड़े हों ।* ॥ २ ॥
पापे स्वर्शगते सुते तनयभाक् तस्मिन् सपापे पुनः
पुत्राः स्युर्बहुलाः शुभस्वभवने सोग्रे सुते पुत्रहा ।
संज्ञां चाल्पसुतर्क्षमित्यलिवृषस्त्रीसिंहभानां विदुः
तद्राशौ सुतभावगेऽल्पसुतवान् कालान्तरेऽसाविति ॥३॥
यदि कोई पाप-ग्रह पंचम स्थान का स्वामी होकर उसी स्थान में
हो तो पुत्र हो लेकिन यदि कोई शुभ-ग्रह स्वराशि का स्वामी होकर
पंचम में हो और साथ ही पंचम में पाप-ग्रह हो तो सन्तान नष्ट
करेगा । कहने का तात्पर्य यह है कि पाप-ग्रह यदि स्वराशि का हो
तो अपने स्थान को नहीं बिगाड़ता, किन्तु यदि दूसरे घर में बैठा हो
तो जिस घर में बैठता है उसको बिगाड़ता है ।
वृष, सिंह, कन्या और वृश्चिक अल्प सुत (कम सन्तान वाली) राशि
कहलाती है । यदि यह राशियाँ पंचम में हों तो थोड़ी सन्तति होगी
और वह भी बहुत समय के बाद ॥३॥
*नोट—जिस राशि के दूसरे और बारहवें घर में पाप-ग्रह हों वह
राशि पाप-ग्रहों के बीच में समझी जाती है ।
बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २३३
सूर्ये चाल्पसुतर्क्षगे निधनगे मन्दे कुजे लग्नगे
लग्नाष्टव्ययगैः शनीड्यरुधिरैश्चाल्पात्मजर्क्षे सुते ।
चन्द्रे' लाभगते गुरुस्थितसुतस्थाने सपापे भवे-
ल्लग्नेऽनेकखगान्विते तनयभाक्कालान्तरे यत्नतः ॥४॥
इस श्लोक में तीन पृथक्-पृथक् योग बताये गये हैं । इन तीनों
योगों में से यदि कोई भी योग हो तो जातक के बहुत काल के बाद
(जवानी बीत जाने पर) और बहुत यत्न करने पर पुत्र होता है :
(क) पंचम में अल्पसुत राशि हो और उसमें सूर्य हो, शनि
आठवें घर में हो और मंगल लग्न में हो ।
(ख) शनि लग्न में हो, बृहस्पति अष्टम में हो और मंगल बारहवें
घर में तथा पाँचवें घर में अल्पसुत राशि हो ।
(ग) चन्द्रमा ग्यारहवें हो, बृहस्पति से पाँचवें घर में पापग्रह हो
और लग्न में कई ग्रह हों ।* ॥४॥
सूर्ये नान्ययुते सुतर्क्षसहिते चन्द्रस्य गेहे स्थिते
भौमे वा भृगुजेऽपि वा सति सुतप्राप्ति द्वितीयस्त्रियाम् ।
मन्दे वा बहुपुत्रवाञ्छ्छशिनि वा सौम्येऽपि वाल्पात्मजो
देवेड्ये' बहुदारिका शशिगृहे तद्वत्सुताधिष्ठिते ॥५॥
(क) यदि सूर्य अकेला ही कर्क राशि में स्थित होकर पाँचवें घर
में हो ।
या (ख) मंगल अकेला कर्क राशि में पंचम में हो ।
या (ग) कक राशि का शुक्र अकेला पंचम में हो ।
तो दूसरा विवाह करने पर पुत्र प्राप्ति होती है। यदि कर्क राशि
- वृष, सिंह, कन्या, और वृश्चिक अल्पसुत राशि है ।
२३४ फलदीपिका
में स्थित होकर शनि अकेला पंचम में हो तो बहुत पुत्र होंगे। यदि
कर्क राशि का बुध अकेला पंचम में हो तो थोड़े पुत्र हों। यदि स्वराशि
का चन्द्रमा पंचम स्थान में हो और चन्द्रमा के साथ दूसरा कोई
ग्रह न हो तो भी थोडे पुत्र हों। किन्तु यदि एकाकी (अकेला) बृहस्पति
अपनी उच्च राशि में स्थित होकर पंचम में हो तो जातक के बहुत
सी कन्या होती हैं ॥५॥
सुखास्तदशमस्थितैरशुभकाव्यशीतांशुभि-
र्व्ययाष्टतनयोदयेष्वशुभगेषु वंशक्षयः ।
मदे कविविदौ मतौ गुरुरसद्भिरंबुस्थितैः
सुते शशिनि नैधनव्ययतनुस्थपापैरपि ॥६॥
नीचे चार योग दिये जाते हैं। इन चारों में से कोई भी योग
हो तो जातक का वंश आगे नहीं चलता।
(i) चतुर्थ में अशुभ ग्रह हों, सातवें शुक्र हो और दसवें घर में
चन्द्रमा हो।
(ii) पहले, पांचवें, आठवें और बारहवें घर में अशुभ ग्रह हों।
(iii) सातवें घर में बुध और शुक्र हो, बृहस्पति पाँचवे हो
और क्रूर-ग्रह चौथे घर में हो।
(iv) चन्द्रमा पांचवें हो और पहले, आठवें तथा बारहवें घर में
पापग्रह हों ॥६॥
पापे लग्ने लग्नपे पुत्रसंस्थे
धीशे वीर्ये वेश्मनोन्दावपुत्रः ।
ओजर्क्षेऽंशे पुत्रगे सूर्यदृष्टे
चन्द्रे पुत्रक्लेशभाक् स्यादसूनुः ॥७॥
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३५
नीचे दो योग दिये जाते हैं। यदि इन दोनों में से कोई योग
हो तो जातक के पुत्र न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो।
(i) पाप-ग्रह लग्न में हो, लग्नेश पंचम में हो, पंचमेश तीसरे
घर में हो और चन्द्रमा चौथे घर में। इस योग से पुत्र नहीं होता।
(ii) चन्द्रमा ओज राशि और ओज अंश में स्थित होकर पांचवे
घर में हो और सूर्य से देखा जाता हो। यह योग होने से या तो पुत्र
न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो।¹ ॥७॥
मान्दं सुतर्क्षं यदि वाऽथबौधं
मान्द्यर्कपुत्रान्वितवीक्षितं चेत् ।
दत्तात्मजः स्यादुदयास्तनाथ-
संबन्धहीनो विबलः सुतेशः ॥८॥
नीचे दो योग दिये जाते हैं। इन दोनों योगों में से यदि कोई
योग हो तो जातक के औरस पुत्र नहीं होते किन्तु वह लड़का गोद
लेता है। अपने शरीर से, अपनी भार्या में जो पुत्र होता है वह औरस
कहलाता है।
(i) यदि पंचम भाव पर मिथुन, कन्या, मकर या कुम्भराशि हो
और मान्दि² या शनि वहां बैठे हों या पंचम को देखते हों।
(ii) यदि पंचमेश निर्बल हो और लग्नेश तथा सप्तमेश से कोई
सम्बन्ध न करे ॥८॥
नीचारिमूढोपगते सुतेशे
रिःफारिरन्ध्राधिपसंयुते वा ।
१. मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ ओज राशि कहलाती हैं।
२. मान्दि को गुलिक भी कहते हैं।
२३६ फलदीपिका
सुतस्य नाशः कथितोऽत्र तज्ज्ञैः
शुभैरदृष्टे सुतभे सुतेशे ॥६॥
यदि पांचवें घर का मालिक नीच राशि में हो, शत्रु राशि में हो,
या अस्त हो, या षष्ठेश, व्ययेश अथवा अष्टमेश के साथ हो तो सन्तान
नष्ट होती है। किन्तु यदि पंचमेश और पंचमभाव को शुभ-ग्रह देखें
तो सन्तान नष्ट नहीं होगी ॥९॥
सुतनाथजीवकुजभास्करेषु वै
पुरुषांशकेषु च गतेषु कुत्रचित् ।
मुनयो वदन्ति बहुपुत्रतां सदा
सुतनाथवीर्यवशतः सुपुत्रताम् ॥१०॥
यदि पांचवे घर का स्वामी, बृहस्पति, मंगल और सूर्य यह चाहे
कहीं भी हों किन्तु पुरुष नवांश में हो तो मुनियों का मत हैं कि ऐसे
व्यक्ति के बहुत पुत्र होते हैं। यदि पंचमेश बली होगा तो सुपुत्र होंगे;
यदि पंचमेश निर्बल होगा तो कुपुत्र होंगे। * ॥१०॥
पुंराश्यंशेऽधीशवरे पुंग्रहेन्द्रै-
र्युक्ते दृष्टे पुंग्रहे पुंप्रसूतिः ।
स्त्रीराश्यंशे स्त्रीग्रहैर्युक्तदृष्टे
स्त्रीणां जन्म स्यात्सुतर्क्षे सुतेशे ॥११॥
किसी व्यक्ति के कन्या विशेष होंगी या पुत्र विशेष इसका सिद्धांत
इस श्लोक में बताया गया है। यदि पंचम भाव पुरुष राशि, पुरुष अंश
** मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ पुरुष राशि या पुरुष
नवांश कहलाते हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर तथा मीन
स्त्रीराशि या स्त्री नवांश हैं।
बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २३७
में स्थित हो और पंचम में पुरुष-ग्रह बैठे हों या पंचम को पुरुषग्रह
देखते हों और पंचमेश भी पुरुष राशि, पुरुष अंश में स्थित हो तथा
पुरुष-ग्रहों द्वारा देखा जाता हो या पुरुषग्रहों के साथ हो तो पुत्र होंगे।
किन्तु यदि पंचम भाव में स्त्री राशि, स्त्री नवांश हो, पंचम में स्त्री
ग्रह बैठे हों या स्त्री ग्रह पंचम को देखते हों और पंचमेश स्त्री-राशि,
स्त्री-नवांश में स्थित हो, स्त्री-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो कन्यायें
होंगी। प्रायः सब बातें किसी कुण्डली में पूर्ण रूप से घटित नहीं होतीं
इसलिये मिला-जुला प्रभाव होता है। ॥ ११ ॥
बलयुक्तौ स्वगृहांशेष्वर्कसितावुपचयर्क्षगौ पुंसाम् ।
स्त्रीणां वा कुजचन्द्रौ यदा तदा संभवति गर्भः ॥१२॥
यदि पुरुष की कुण्डली में सूर्य और शुक्र अपने गृह और अपने
अंश में बलवान् होकर उपचय स्थानों में जा रहे हों और स्त्री की
कुण्डली में मंगल और चन्द्रमा अपने घर और अंश में बलवान् होकर
उपचय स्थान में जा रहे हों तो गर्भ रहता है ॥ १२ ॥
अशत्रु नीचारिनवांशकैः सुते
सुतेशयुक्तैरपि तैस्तथाविधैः ।
सुतर्क्षगैर्वा गुरुभादिनांशकात्सुते
फलैः पुत्रमितिर्विचिन्त्यते ॥१३॥
इस श्लोक में यह देखना बताया गया है कि कितने पुत्र होंगे।
लग्न से १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ स्थान अपचय स्थान कहलाता
लग्न से ३, ६, १०, ११ उपचय स्थान कहलाता है।
२३८ फलदीपिका
यह देखिये कि कौन से ग्रह पांचवें घर में बैठे हैं या पांचवे घर के
स्वामी के साथ बैठे हैं और उनमें से कितने ऐसे हैं जो मित्र, नीच
और शत्रु नवांश में है। इसी प्रकार यह विचारिये कि बृहस्पति से
पंचम स्थान में कौन-कौन से ग्रह हैं--वे तथा बृहस्पति से पंचम स्थान
का स्वामी मित्र नवांश में है या नहीं। यह भी देखना चाहिये कि
सूर्य जिस नवांश में है उससे पंचम में जो ग्रह है या उससे पंचम का
जो स्वामी है यह सब मित्र नवांश में हैं या नहीं ॥१३॥
जीवेन्दुक्षितिजस्फुटैक्यभवने युग्मे च युग्मांशके
स्त्रीणां क्षेत्रबलं वदन्ति सुतदं मिश्रे प्रयासात्फलम्
भास्वच्छुक्रगुरुस्फुटैक्यभवनेप्योजांशकेऽप्योजभे
पुंसां बीजबलं सुतप्रदमिमं मिश्रे तु मिश्रं वदेत् ॥१४॥
इस श्लोक में यह बताया गया है कि किसी पुरुष की जन्मकुण्डली
देखकर यह कैसे बताना कि इस पुरुष के वीर्य में सन्तान उत्पन्न करने
की ताक़त है या नहीं और किसी स्त्री की जन्मकुण्डली देखकर यह
कैसे बताना कि इसमें सन्तान उत्पन्न करने की ताक़त है या नहीं।
पहले पुरुष की कुण्डली का विचार किया गया है।
पुरुष की कुण्डली में सूर्य-स्पष्ट, शुक्र-स्पष्ट और वृहस्पति-स्पष्ट
अर्थात् सूर्य, वृहस्पति, शुक्र इन तीनों ग्रहों की राशि, अंश, कला,
विकला जोड़ लीजिए। इनके जोड़ने पर यदि ऊनी राशि, ऊना नवांश
आवे तो समझिये कि इस पुरुष के वीर्य में पुत्र उत्पन्न करने की पूर्ण
क्षमता है। यदि राशि और नवांश इनमें से एक ऊना, एक पूरा आवे
तो मिलाजुला फल समझिये और यदि सम राशि, सम नवांश आवे तो
समझिये कि इस पुरुष में पुत्रोत्पत्ति की क्षमता नहीं है।
यदि स्त्री की कुण्डली का विचार करना हो तो उसकी कुण्डली
का चन्द्र स्पष्ट, मंगल-स्पष्ट और बृहस्पति-स्पष्ट (अर्थात् इन
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३९
तीनों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़िये) जो जोड़ आवे
वह यदि सम राशि, सम नवांश में हो तो उस स्त्री में सन्तान उत्पन्न
करने की पूर्ण क्षमता समझनी चाहिए। राशि और नवांश इन दोनों
में एक सम, एक विषम आवे तो आधी क्षमता और दोनों विषम आवें
तो पूर्ण अक्षमता समझनी चाहिये ॥१४॥
पञ्चाघ्नाच्छशिनः स्फुटादिषुहतं भानुस्फुटं शोधये-
न्नीत्वा तत्र तिथिं सिते शुभतिथौ पुत्रोऽस्त्ययत्नादपि ।
कृष्णे नास्ति सुतस्तिथेर्बलवशाद्ब्रूयाद्द्वयोः पक्षयोः
दर्शे च्छिद्रतिथौ च विष्टिकरणे न स्यात् स्थिराख्ये सुतः ॥ १५ ॥
अब एक दूसरा प्रकार बताते हैं । सूर्य-स्पष्ट को पांच से गुणा
कीजिये और चन्द्र-स्पष्ट को भी पांच से गुणा कीजिए फिर चन्द्र-स्पष्ट
को जो पांच से गुणा किया है उसमें से सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को
घटाइये । यह सन्तान तिथि स्फुट हुआ । हमने “सुगम ज्योतिष
प्रवेशिका” के पृष्ठ ३८ और ३९ पर यह समझाया है कि सूर्य और
चन्द्र के कितने अंश के फ़ासले पर कौन-सी तिथि होती है । तिथि का
आधा भाग करण कहलाता है । इस कारण सूर्य और चन्द्र का कितना
फ़ासला है यह ज्ञात होने पर करण भी निकाला जा सकता है ।
ऊपर बताया गया है कि सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को चन्द्र-
स्पष्ट × ५ के गुणनफल में से घटाइये जो उत्तर आवे उससे यह निकालिये
कि कौन सी तिथि निकलती है और कौन सा करण आता है । ऊपर
लिखे प्रकार से यदि शुक्लपक्ष की शुभ तिथि आवे तो बिना यत्न के
भी पुत्र प्राप्ति होती है । यदि कृष्ण पक्ष की तिथि आवे तो संतान
की सम्भावना कम रहती है । कृष्णपक्ष की तिथि हो या शुक्लपक्ष की
तिथि—शुभ है या नहीं—उसका बलाबल देखकर फल कहना चाहिये ।
यदि अमावस्या तिथि आवे या छिद्र तिथि आवे तो सन्तान सुख में
२४० फलदीपिका
बाधा होगी। इसी प्रकार यह भी देखना चाहिये कि करण कौन सा
आता है। यदि विष्टि, चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या शकुन करण
आवे तो भी सन्तान सुख में बाधा उत्पन्न होती है।
ऊपर बताया गया है कि अमावास्या या छिद्र तिथि आवे तो
शुभ फल नहीं समझना। छिद्र तिथि किसे कहते हैं? चतुर्थी, षष्ठी,
अष्टमी, नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी छिद्र तिथियां कहलाती
हैं ॥१५॥
सन्तान दोष परिहार
विष्टिः स्थिरं वा करणां यदि स्यात्
कृष्णं यजेत् पौरुषसूक्तमन्त्रैः ।
षष्ठ्यां गुहाराधनमत्र कार्यं
यजेच्चतुर्थ्यां किल नागराजम् ॥१६॥
रामायणस्य श्रवणं नवम्यां
यद्यष्टमी चेच्छ्रवणव्रतं च ।
चतुर्दशी चेद्यदि रुद्रपूजा
स्याद्द्वादशी चेत्स्मृतमन्नदानम् ॥१७॥
तृप्तिं पितॄणामिह पञ्चदश्यां
कृष्णे दशम्याः परतोऽतियत्नात् ।
पक्षत्रिभागेष्वपि नागराजं
स्कन्दं च सेवेत हरिं क्रमेण ॥१८॥
पिछले श्लोक में यह बताया गया है कि उपर्युक्त प्रकार से
तिथि और करण निकालने से यदि अनिष्ट तिथि और अनिष्ट करण
बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २४१
आवे तो सन्तान सुख में बाधा होगी अब इन श्लोकों में उस दोष की
शान्ति का उपाय बताते हैं।
यदि उपर्युक्त प्रकार से विष्टि,* चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या
शकुन करण आवे तो भगवान् कृष्ण का पुरुषसूक्त मन्त्रों से पूजन
करे। यदि षष्ठी तिथि आवे तो भगवान् कार्तिक स्वामी का पूजन
करना चाहिये। चतुर्थी तिथि आवे तो नागराज (सर्पों के देवता) का
पूजन करना चाहिये। नवमी तिथि हो तो रामायण का श्रवण करे
और अष्टमी तिथि हो तो श्रवण व्रत करे। यदि चतुर्दशी आवे तो
भगवान् रुद्र की पूजा करे और द्वादशी हो तो उसकी शान्ति के लिये
अन्नदान श्रेयस्कर है। ओर अमावास्या या पूर्णिमा हो तो पितरों की
तृप्ति करे। यदि कृष्णपक्ष की दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी,
चतुर्दशी या अमावास्या हो तो और भी विशेष यत्न पूर्वक शान्ति
की आवश्यकता है।
एक प्रकार से सारे कृष्ण पक्ष को ही अशुभ माना है। और
लिखते हैं कि यदि कृष्णपक्ष की पड़वा से पंचमी तक कोई तिथि आवे
तो नागराज (सर्पों के देवता) की सेवा करे। यदि कृष्णपक्ष की षष्ठी
से दशमी तक कोई तिथि आवे तो भगवान् स्कन्द (कार्तिक स्वामी)
की आराधना करे और यदि कृष्णपक्ष की एकादशी से अमावास्या तक
कोई तिथि हो तो हरि का भजन-पूजन करे ॥१६, १७, १८॥
पुत्रेशो रिपुनोचगोऽस्तमयगो रिःफाष्टमारिस्थित
स्तद्वत्पुत्रगृहस्थितोऽपि यदि वा दुःस्थानपस्तद्वशात् ।
पुत्राभावनिदानमेव कथयेत् तत्खेचराक्रान्तभ-
प्रोक्तैर्दैवतभूरुहैरपि मृगैः सन्तानहेतुं वदेत् ॥१९॥
*विष्टिकरण को भद्रा भी कहते हैं।
२४२ फलदीपिका
यदि जन्मकुण्डली में पांचवें घर का स्वामी शत्रु राशि का हो,
नीच राशि का हो या अस्त हो और लग्न से छठे, आठवें या बारहवें
पड़ा हो तो सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है। इसी प्रकार कोई ग्रह
नीचराशि का, शत्रुराशि का या अस्त होकर पंचम में बैठा हो या छठे
आठवें, बारहवें घर का मालिक होकर पांचवें घर में बैठ जावे तो भी
पुत्र का अभाव या पुत्र कष्ट करता है।
ऊपर कहे हुए जितने योग अधिक हों उतनी ही अधिक बाधा
समझनी चाहिये। बाधाकारक ग्रह जिस राशि में बैठा हो उसके
अनुसार यह निर्णय करना चाहिये कि किस देवता, वृक्ष या जीव के
कारण बाधा हो रही है और उसकी शान्ति का उपाय करना
चाहिये।
द्रोहाच्छंभुसुपर्णयोर्नहि सुतः शापात्पितॄणांरवे
रिन्दोर्मातृसुवासिनीभगवतीकोपान्मनोदोषतः ।
स्वग्रामस्थितदेवतागुहरिपुज्यात्युत्थदोषात्कुजे
शापाद्बालकृताद्विलालवधतः श्रीविष्णु कोपाद्बुधे ॥२०॥
पारंपर्यसुरप्रियद्विजगुरुद्रोहात्फलाढ्यद्रुम-
च्छेदाद्देवगुरौ तथा सति भृगौ पुष्पद्रुमच्छेदनात् ।
साध्वीगोकुलजातदोषवशतो यक्ष्यादिकामेन वा
मन्देऽश्वत्थवधाद्रुषा पितृपतेः प्रेतैः पिशाचादिभिः ॥२१॥
स्वर्भानौ सुतगे सुतेशसहिते सर्पस्य शापात्तथा
केतौ ब्राह्मणशापतश्च गुलिके प्रेतोत्थशापं वदेत् ।
शुक्रेन्दू गुलिकान्वितौ यदि वधूगोहत्तिमाहुः सुते
जीवो वाथ शिखी समान्दिरिह चेद्भू देवहत्याऽसुतः ॥२२॥
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४३
यदि सन्तान बाधाकारक ग्रह सूर्य है तो समझना चाहिये कि
भगवान् शम्भु और गरुड़ से द्रोह करने के कारण या पितरों के शाप का
फल है। यदि सन्तान प्रतिबन्धक ग्रह चन्द्रमा है तो माता या किसी
अन्य सधवा स्त्री के चित्त को दुःख पहुँचाने के कारण या भगवती का
शाप सन्तान में बाधा हैं। यदि सन्तान प्रतिबन्धक ग्रह मंगल हो तो
ग्रामदेवता, भगवान् कार्तिक स्वामी के प्रति अवज्ञा से या शत्रुओं
अथवा भाईबन्धुओं के शाप से सन्तान कष्ट है। यदि बुध सन्तान में
बाधा डाल रहा है तो समझिये कि बिल्ली को मारने के कारण या
मछलियों के या अन्य प्राणियों के अण्डों को नष्ट करने के कारण या
कम उम्र के बालक-बालिकाओं के शाप से या भगवान् विष्णु के कोप से
सन्तान नहीं हो रही है।
यदि जन्म कुण्डली में बृहस्पति बिगड़ा हुआ है और उसके कारण
सन्तान नहीं हो रही है तो इस व्यक्ति ने इस जन्म में या पूर्व जन्म
में फलदार वृक्षों को कटाया है या अपने कुलगुरु या कुल पुरोहित से
द्रोह किया है। यदि शुक्र के कारण सन्तान नहीं हो रही है तो
समझिये कि इस व्यक्ति ने पुष्प के वृक्षों को कटवाया है या गौ के
प्रति कोई पाप किया है अथवा किसी साध्वी स्त्री के शाप से ऐसा
हुआ है। प्रायः ऐसी स्थिति में यक्षिणी का शाप समझना चाहिये।
यदि जन्म-कुण्डली में शनि बिगड़ा हुआ है तो समझिये कि इसने
पीपल के पेड़ कटवाये और पिशाच, प्रेत तथा यमराज के शाप से
ऐसा हुआ है। मृतआत्मा को प्रेत कहते हैं।
यदि राहु पंचम में हो या पंचमेश को दूषित करता हो और उसके
कारण सन्तान में बाधा हो रही हो तो समझिये कि सर्प के शाप से
ऐसा हुआ है। यदि केतु के कारण यह दोष हो तो उसमें हेतु ब्राह्मण
का शाप समझना चाहिये। यदि मान्दि पंचम में हो या पंचमेश के
साथ हो और इस कारण अपुत्रता हो तो समझिये कि किसी प्रेत के
२४४ फलदीपिका
शाप के कारण ऐसा है । यदि शुक्र और चन्द्रमा दोनों मान्दि के साथ
हों तो यह समझना चाहिये कि इस व्यक्ति ने किसी गाय या युवती
स्त्री की पूर्वजन्म में हत्या की है । किन्तु यदि केतु या बृहस्पति,
मान्दि के साथ पंचम में हों तो समझिये कि इसने पूर्व जन्म में किसी
ब्राह्मण की हत्या की है ॥२०, २१, २२॥
एवं हि जन्मसमये बहुपूर्वजन्म-
कर्मार्जितं दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः ।
तत्तद्ग्रहोक्तजपदानशुभक्रिया-
भिस्तद्दोषशान्तिमिह शंसतु पुत्रसिद्ध्यै ॥२३॥
' इस प्रकार जन्म-कुण्डली के ग्रहों से यह पता चलता है कि
पिछले अनेक जन्मों में इसने क्या-क्या पाप किये जिसके कारण सन्तान
हीनता है। पुत्रोत्पत्ति के लिये यह आवश्यक है कि जो-जो ग्रह
बाधाकारक हो उस-उस ग्रह के लिए जो-जो जप, दान और शुभ-क्रिया
बतायी है वह-वह करे । दोष शान्ति होने से पुत्रोत्पत्ति हो सकती
है ॥२३॥
सेतुस्नानं कीर्तनं सत्कथायाः
पूजां शंभोः श्रीपतेः सद्व्रतानि ।
दानं श्राद्धं कर्जनागप्रतिष्ठां
कुर्यादेतैः प्राप्नुयात्सन्ततिं सः ॥२४॥
ऊपर के श्लोक में उल्लेख आया है कि विविध शुभ क्रिया करे ।
इस श्लोक में यह बताते हैं कि कौन-कौन सी शुभ-क्रिया करने से
सन्तान प्रतिबन्धक दोष की शान्ति होकर पुत्र प्राप्ति हो सकती है :
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २४५
सेतुस्नान (समुद्र-स्नान), सत्कथाओं का कीर्तन, शम्भु पूजा,
भगवान् विष्णु के व्रत, दान, श्राद्ध, नाग-प्रतिष्ठा (सर्प देवता की
मूर्ति की प्रतिष्ठा) आदि को करने से सन्तान प्राप्ति हो सकती
है ॥२४॥
लग्नास्तपुत्रपतिजीवदशापहारे
पुत्रेशकस्य सुतगस्य च पुत्रसिद्धिः ।
पुत्रेशराशिमथवा यमकण्टकक्षं
जीवेगते तनयसिद्धिरथांशभे वा ॥२५॥
निम्नलिखित ग्रहों में से किसी एक की महादशा, या, अन्तर्दशा
हो तो पुत्रोत्पत्ति होती है : (क) लग्नेश (ख) सप्तमेश (ग) पंचमेश
(घ) बृहस्पति (ण) जो ग्रह पांचवे घर को देखता है ।
पंचमेश या यम-कंटक जिस राशि या नवांश में है उससे त्रिकोण
में जब गोचरवश बृहस्पति आता है तब भी पुत्रोत्पत्ति हो सकती
है ॥२५॥
लग्नाधीशः पुत्रनाथेन योगं
स्वोच्चे स्वर्क्षे चारगत्या समेति ।
पुत्रप्राप्तिः स्यात्तदा लग्ननाथः
पुत्रक्षं वायाति धीशाप्तभं वा ॥२६॥
लग्नेश जब गोचरवश (i) पंचमेश से योग करे (ii) अपनी
उच्चराशि में आवे (iii) अपनी स्वराशि में आवे तब पुत्रप्राप्ति हो
सकती है । यदि लग्नेश गोचरवश पंचम में आवे था पंचमेश जहां
स्थित है उस राशि में आवे तो भी सन्तान प्राप्ति के लिये अनुकूल
अवसर होता है । ॥ २६ ॥
२४६ फलदीपिका
विलग्नकामात्मजनायकानां योगात्समानाय्य दशां महाख्याम् ।
सुतस्थतद्वीक्षकतत्पतीनां दशापहारेषु सुतोद्भवः स्यात् ॥२७॥
पुत्र प्राप्ति कब होगी यह समय निकालने के लिये एक अन्य
प्रकार और बताते हैं । नीचे लिखे तीनों को जोड़िये--
(क) लग्नेश की राशि, अंश, कला, विकला ।
(ख) सप्तमेश की राशि, अंश, कला, बिकला ।
(ग) पंचमेश की राशि, अंश, कला, विकला ।
इनको जोड़ने से जो राशि, अंश, कला, विकला आवे वह किस
नक्षत्र के अन्तर्गत पड़ती है यह निकालिये । * इस नक्षत्र के स्वामी
को जब महादशा हो और निम्नलिखित में से किमी की अन्तर्दशा
हो तो पुत्रोत्पत्ति होती है ।
(i) पंचम भाव में जो ग्रह हो ।
(ii) जो ग्रह पंचम को देखता हो ।
(iii) पंचमेश ।
सुतपतिगुर्वोरथवा तद्युक्तराश्यंशकाधिपानां वा ।
बलसहितस्य दशायामपहारे वा सु