फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
दसवां अध्याय : कलत्रभाव २२३
पुरुष की कुंडली में यह देखिये कि (१) सप्तम भाव में कौन
सी राशि है (२) सप्तमेश किस राशि में है (३) शुक्र किस राशि में
है। इन तीनों राशियों में से किसी राशि की दिशा में विवाह होगा।
अर्थात् उस दिशा में रहने वाली लड़की से विवाह होगा। लग्नेश जिस
राशि या नवांश में हो-उससे त्रिकोणराशि में जब गोचर वश शुक्र वा
सप्तमेश आता है तब विवाह होता है ॥१२॥
(१) जो ग्रह लग्न से सप्तम हो (२) जो ग्रह सप्तम भाव को
देखता हो (३) सप्तमेश-इन तीनों की जब दशा* हो और लग्नेश
गोचर वश सप्तम स्थान में आवे तब विवाह का योग होता है ॥१३॥
जिस राशि में सप्तमेश हो उस राशि का स्वामी तथा जिस नवांश
में सप्तमेश हो उसका स्वामी-इन दोनों में तथा शुक्र और चन्द्र इन दोनों
में कौन बलवान् है? जब इस बलवान् ग्रह को दशा (या अन्तर्दशा हो)
और सप्तमेश जिस राशि या नवांश में है-उससे त्रिकोण राशि में गोचर
वश बृहस्पति आवे तो विवाह का योग होता है ॥१४॥
यदि सातवें घर का स्वामी नीच राशि में, शत्रु राशि में, अस्त या
पाप ग्रह से दृष्ट हो और सप्तम भाव में पाप ग्रह हो या सप्तम
भाव को पाप ग्रह देखते हों तो कलत्र (स्त्री) हानि होती है, ऐसा
विद्वानों का मत है । ॥ १५ ॥
दशा से महादशा तथा अन्तर्दशा दोनों समझना।
ग्यारहवाँ अध्याय
स्त्री जातक
यद्यत्पुंप्रसवे क्षमं तदखिलं स्त्रीणां प्रिये वा वदे-
न्माङ्गल्यं निधनात् सुतांश्च नवमाल्लग्नात्तनोश्चारुताम् ।
भर्तारं सुभगत्वमस्तभवनात्सङ्गं सतीत्वं सुखात्
सन्तस्तेषु शुभप्रदास्त्वशुभदाः क्रूरास्तदीशं विना ॥१॥
‘ उदयहिमकरौ द्वौ युग्मगौ सौम्यदृष्टौ
सुतनयपतिभूषासंपदुत्कृष्टशीला ।
अशुभसहितदृष्टौ चोजगौ पुंस्वभावा
कुटिलमतिरवश्या भर्तु रुग्रा दरिद्रा ॥२॥
सद्राश्यंशयुते मदे द्युतियशोविद्यार्थवांस्तत्पति-
र्व्यत्यस्ते कुतनुर्जडश्च कितवो निःस्वो वियोगस्तयोः ।
आग्नेयैर्मदनस्थितैश्च विधवा मिश्रैः पुनर्भू र्भवेत्
क्रूरेष्वायुषि भर्तृ हन्त्र्यपि धने सन्तः स्वयं स्त्रीमृतिः ॥३॥
सुतस्थेऽलिस्त्रीगोहरिषु हिमगौ चाल्पतनया ।
यमाराकार्क्षांशे मदनसदने साम्यभगा ।
सुखे पापैर्युक्ते भवति कुलटा मन्दकुजयो-
र्गृहेऽंशे लग्नेन्दू भृगुरपि च पुंश्चल्यभिहिता ॥४॥
शुभक्षेत्रांशेऽस्ते सुभगजघना मङ्गलवती
विधाः सत्संबन्धेऽप्युदयसुखयोः साध्व्यतिगुणा ।
ग्यारहवाँ अध्याय : स्त्री जातक २२५
त्रिकोणे सौम्याश्चेत्सुखसुतसंपद्गुणवती
बलोनाः क्रूराश्चेद्यदि भवति वन्ध्या मृतसुता ॥५॥
चन्द्रे भौमगृहे कुजादिकथितत्रिंशांशकेषु क्रमात्
दुष्टा दास्यसती सुशीलविभवा मायाविनी दूषणी ।
शुक्रर्क्षे बहुदूषणान्यपतिगा पूज्या सुधीर्विश्रुता
ज्ञर्क्षे च्छद्मवती नपुंसकसमा साध्वी गुणाढ्योत्सुका ॥६॥
स्वच्छन्दा भर्तृघातिन्यतिमहितगुणा शिल्पिनो साधुवृत्ता
चान्द्रे जैवे गुणाढ्या विरतिरतिगुणा ज्ञातशिल्पातिसाध्वी ।
मान्दे दास्यन्यसक्ताश्रितपतिरसती निष्प्रजार्थार्कभे स्याद्
दुर्भार्या हीनवृत्ता धरणिरतिवधूः पुंविचेष्टान्यसक्ता ॥७॥
शशिलग्नसमायुक्तैः फलं त्रिंशांशकैरिदम् ।
बलाबलविकल्पेन तयोरेवं विचिन्तयेत् ॥८॥
ज्येष्ठभ्रातरमम्बिकां च पितरं भर्तुः कनिष्ठं क्रमात्
ज्येष्ठा ह्यासुरशूर्पजाश्च वनिता घ्नन्तीति तज्ज्ञा विदुः ।
चित्रार्द्राभुजगस्वराट्च्छतभिषङ् मूलाग्नितिष्योद्भवा
वन्ध्या वा विधवाथवा मृतसुता त्यक्ता प्रियेणाधना ॥९॥
चन्द्रास्तोदयभाग्यपाः सह शुभैः सुस्थानगा भास्वराः
पूज्या बन्धुषु पुण्यकर्मकुशला सौन्दर्यभाग्यान्विता ।
भर्तुः प्रीतिकरी सुपुत्रसहिता कल्याणशीला सती
तावद्भाति सुमङ्गली च सुतनुर्यावच्छुभाख्येऽष्टमे ॥१०॥
शीतज्योतिषि योषितोऽनुपचयस्थाने कुजेनेक्षिते
जातं गर्भफलप्रदं खलु रजः स्यादन्यथा निष्फलम् ।
२२६ फलदीपिका
दृष्टेऽस्मिन् गुरुणा निजोपचयगे कुर्यान्निषेकं पुमान्
अत्याज्ये समये शुभाधिकयुते पर्वादिकालोद्भिते ॥११॥
जिन योगों का फल पुरुषों की कुंडली में बताया गया है उनके फल
स्त्रियों की कुंडली में भी बताने चाहियें। जहां राजयोग आदि का फल
स्त्री की कुंडली में भी घटित होने की संभावना न हो (क्योंकि जो
स्त्रियाँ स्वयं नौकरी या व्यापार नहीं करतीं वे उच्चाधिकारिणी कैसे हो
सकती हैं ?) वहां वे योग उन स्त्रियों के पति में घटित होंगे। इसी प्रकार
जहां एक पुरुष के अनेक विवाह का योग हो—वैसा ही योग स्त्री की
कुंडली में हो किन्तु स्त्री ऐसे समाज की हो जहां अनेक विवाह की
संभावना न हो तो वे योग भी स्त्रियों की कुंडली में घटित नहीं होंगे।
स्त्री की कुंडली में अष्टम स्थान से मांगल्य (सधवापन) नवम से पुत्र
(सन्तान) और लग्न से शरीर सौन्दर्य का विचार करे। पति तथा
सुभगत्व का विचार सातवें घर से और संग (अन्य लोगों से समागम) तथा
सतीत्व का विचार चतुर्थ से। यदि शुभ ग्रह इन गृहों में होंगे तो शुभ फल
करेंगे-अशुभ ग्रह बैठे होंगे तो अशुभ फल करेंगे—किन्तु अशुभ (क्रूर)
ग्रह भी यदि वहां स्वराशि का होगा तो अच्छा ही फल करेगा—अनिष्ट
फल नहीं करेगा ॥१॥
यदि स्त्री की कुंडली में लग्न और चन्द्रमा दोनों सम राशि में
हों और सौम्य ग्रहों से दृष्ट हों तो वह अच्छे पुत्र, पति वाली, सुशीला
आभूषण सम्पत्ति से युक्त होती है। किन्तु लग्न और चन्द्रमा दोनों
विषम राशि में, अशुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों तो कुटिल बुद्धि की,
पति से उग्र (क्रोध पूर्ण) व्यवहार करने वाली, मर्दाना, काबू में न रहने
वाली दरिद्र होती है ॥२॥
यदि सप्तम* में सत् (उत्तम-शुभग्रहों की, शुभयुत, शुभ दृष्टि)
- सप्तम भाव मध्य पर कौनसी राशि कौन सा नवांश है, यह
देखना चाहिये।
ग्यारहवां अध्याय : स्त्री जातक २२७
गशि और सत् (अच्छा, शुभग्रह का, शुभयुक्त शुभदृष्ट) नवांश
हो तो उस स्त्री को सौन्दर्य, यश, विद्या, तथा धन से युक्त पति
मिलेगा। यदि इसका उलटा हो अर्थात् सप्तम भाव मध्य पर अशुभ
राशि, अशुभ नवांश हो तो कुतनु (कुत्सित शरीर वाला) मूर्ख, चालाक,
निर्धन पति होगा और उनका (पति पत्नी) का वियोग भी होगा
(एक साथ न रहें या मृत्यु के कारण)। यदि सप्तम में मंगल हो
तो विधवा हो, यदि शुभ और पाप दोनों प्रकार के ग्रह सप्तम में हों
तो पुनर्विवाह करे। यदि अष्टम में क्रूर ग्रह हों तो पति की आयु का
हरण करती हैं अर्थात् पति अल्पायु होता है किन्तु यदि द्वितीय भाव में
(लग्न से दूसरे) अशुभ ग्रह हों तो स्त्री की स्वयं की मृत्यु हो जाती है।
हमारा अनुभव है कि वर और कन्या यदि दोनों की कुंडली में
मंगल, शनि, राहु, केतु, सूर्य का दोष बराबर हो तो दोनों कुंडलियों एक
दूसरे के दोष को काट देती हैं ॥३॥
यदि पंचम भाव में वृष, सिंह, कन्या या वृश्चिक राशि हो और
उसमें चन्द्रमा हो तो उस स्त्री के थोड़ी संतान हों। सप्तम भाव मध्य
मंगल या शनि की राशि या मंगल या शनि के नवांश में हो तो उसकी
योनि में रोग हो। यदि चतुर्थ स्थान में पाप ग्रह हों तो कुलटा हो,
यदि लग्न, चन्द्र और शुक्र मंगल या शनि के राशि और अंश में हों तो
पुंश्चली (व्यभिचारिणी) हो ॥४॥
यदि सप्तम भाव मध्य शुभ ग्रह की राशि और नवांश में हो तो
सुन्दर जघन (कमर के नीचे जांघों के बीच का भाग जघन कहलाता है)
वाली, मंगल वती (पति सुख सम्पन्न) होती है। यदि लग्न चतुर्थ
और चन्द्रमा का शुभ ग्रहों से सम्बन्ध हो तो सच्चरित्रा, अनेक गुणों
से युक्त हो, यदि त्रिकोणों में (पांचवे तथा नवम घर में) सौम्यग्रह
हों, तो सुखी, पुत्रवती, गुणवती, सम्पत्ति-शालिनी हो । यदि उपर्युक्त
घरों में निर्बल क्रूर ग्रह हों तो बाँझ हो या उसकी सन्तति अल्पायु
हो ॥ ५ ॥
२२८ फलदीपिका
यह देखिये कि लग्न और चन्द्रमा दोनों में कौन बलवान् है ।
जो बलवान् हो वह यदि ।
(१) मेष या वृश्चिक राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
दुष्टा, यदि शनि के त्रिंशांश में हो तो दासी, गुरु के त्रिंशांश में हो तो
सुशीला और धनी, बुध के त्रिंशांश में हो तो मायाविनी और शुक्र
के त्रिंशांश में हो तो चरित्र दोष से युक्त होता है।
(२) वृष या तुला राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
तो बहुत दूषण (चरित्र दोष) से युक्त, शनि के त्रिंशांश में हो तो अन्य
पति से समागम करने वाली (अन्य के पति से या स्वयं दूसरा विवाह
करें), गुरु के त्रिंशांश में हो तो पूज्या (आदरणीया), बुध के त्रिंशांश
में हो तो विदुषी ओर शुक्र के त्रिंशांश में हो प्रसिद्ध-ख्याति वाली हो ।
(३) यदि मिथुन या कन्या की राशि में हो और मंगल के
त्रिंशांश में हो तो कपटिनी, शुक्र के त्रिंशांश में हो तो नपुंसक के
समान, गुरु के त्रिंशांश में हो तो साध्वी, बुध के त्रिंशांश में हो तो
गुणवती और शुक्र के त्रिंशांश में हो तो विलास के लिये उत्सुक रहे ।
(४) यदि कर्क राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो तो
स्वच्छन्दा, शनि के त्रिंशांश में पति घातिनी, गुरु के त्रिंशांश में विशिष्ट
गुणों से युक्त, बुध के त्रिंशांश में शिल्पकला में कुशल और शुक्र के
त्रिंशांश में उत्तम आचरण वाली होती है ।
(५) यदि धनु या मीन राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में हो
तो गुणवती, शनि के त्रिंशांश में हो तो संभोग की कम इच्छा
रखने वाली, गुरु के त्रिंशांश में हो तो गुणशालिनी, बुध के त्रिंशांश में
हो तो कला कुशल और शुक्र के त्रिंशांश में हो तो सच्चरित्रा होती है ।
(६) यदि मकर या कुंभ राशि में हो और मंगल के त्रिंशांश में
हो तो दासी, शनि के त्रिंशांश में हो तो अन्य पुरुष में आसक्त, गुरु के
त्रिंशांश में हो तो पति को अपने अधीन रखने वाली, बुध के त्रिंशांश
ग्यारहवां अध्याय : स्त्रीजातक २२९
में हो तो असती और शुक्र के त्रिंशांश में हो निस्सन्तान ओर दरिद्रा
होती है ।
(७) यदि सिंह राशि में हो ओर मंगल के त्रिंशांश में हो तो
दुष्ट भार्या, शनि के त्रिंशांश में हो तो आचरण हीन, गुह के त्रिंशांश
में हो तो राजा या जमींदार की पत्नी, यदि बुध के त्रिंशांश में हो
तो मर्दाना (स्त्रियोचित चेष्टा के विरुद्ध) और शुक्र के त्रिंशांश में
हो तो अन्य पुरुष में आसक्त होती है । ॥ ६-८ ॥
नीचे कुछ नक्षत्रों में उत्पन्न कन्या किन-किन के लिए अनिष्ट
होती हैं यह बताया जाता है : ज्येष्ठा में उत्पन्न कन्या पति के बड़े
भाई की मृत्यु करे, आश्लेषा में उत्पन्न सास के लिये घातक, मूल में
उत्पन्न ससुर के लिये अनिष्ट और विशाखा में उत्पन्न देवर के लिये
घातक ।
जो कन्याएँ चित्रा, आर्द्रा, आश्लेषा, शतभिषा ज्येष्ठा, मूल, कृत्तिका
या पुष्य नक्षत्र में उत्पन्न होती हैं वे वंध्या, विधवा, मृतसुता (जिसके बच्चे
मर जावें), स्वामी से परित्यक्ता (पति छोड़ दे) या निर्धना होती
हैं ॥ ९ ॥*
यदि लग्नेश, सप्तमेश, नवमेश और जिस राशि में चन्द्रमा है
उस का स्वामी शुभग्रहों के उत्तम स्थानों में स्थित हों ओर अस्त न हों
तो स्त्री भाग्यशालिनी, सुन्दरी, बंधुओं में पूज्य और पुण्य कर्म करने
में कुशल होती है । वह अपने पति का प्रिय करने वाली, कल्याण-
शीला, सच्चरित्रा, सत्पुत्रवती होती है । अष्टम भाव पर जितने अधिक
शुभ ग्रहों की दृष्टि होगी उतने ही अधिक काल तक वह सुमंगली
(सधवा) रहेगी ॥ १० ॥
*हमारे विचार से नक्षत्र में उत्पन्न होने का, फल का, जन्म कुंडली
के अन्य ग्रहों के फल से तारतम्य कर किसी परिणाम पर पहुँचना
उचित है।
२३० फलदीपिका।
स्त्री का मासिक धर्म जब प्रारंभ हो (प्रथम बार ही नहीं-कभी-
भी, तब यदि चन्द्रमा गोचर वश जन्म कुंडली में अनुपचय (पहले,
दूसरे, चौथे, पांचवे, सातवें, आठवे, नवें बारहवें स्थान में हो और
मंगल से देखा जाता हो तो उस महीने उसको गर्भ रह सकता है ।
यदि चन्द्रमा ऐसे स्थान में नहीं है तो उसे उस महीने में गर्भ नहीं
रहेगा ।
यदि चन्द्रमा पुरुष की जन्म कुंडली में उपचय स्थान (३, ६,
१०, ११) में हो और उसे गुरु देखता ही उस समय गर्भाधान करे ।
गर्भाधान त्याज्य समय बचाकर करना चाहिये । धर्मशास्त्र में यह
बताया गया है कि कौन-कौन से समय त्याज्य है—यथा एकादशी,
अमावास्या पूर्णिमा, माता, पिता का श्राद्ध दिन आदि । ऐसे लग्न में
—जिस पर शुभ दृष्टि अधिक हो और जब चन्द्रमा पर भी शुभग्रहों
की दृष्टि अधिक हो गर्भाधान करना श्रेयस्कर है ॥ ११ ॥
बारहवां अध्याय
पुत्रभाव फल
सुस्था विलग्नशशिनोः सुतभेशजीवाः
सुस्थाननाथशुभदृष्टियुते सुतर्क्षे ।
लग्नात्मपौ यदि युतौ च मिथः सुदृष्टौ
क्षेत्रे परस्परगतौ यदि पुत्रसिद्धिः ॥१॥
यदि लग्न से पांचवे भाव का स्वामी, चन्द्रमा से पांचवे स्थान का
स्वामी और बृहस्पति अच्छे स्थानों में बैठे हों और पंचम भाव पर
पंचमेश की तथा शुभ-ग्रहों की दृष्टि हो तथा चतुर्थ, नवम, आदि के
शुभ ग्रह स्वामियों की दृष्टि हो और छठे, आठवे, बारहवे घर के
स्वामी की दृष्टि पाँचवे घर पर न हो और लग्नेश, पंचमेश एक साथ
बैठे हों या एक दूसरे के घर में बैठ हों या लग्नेश, पंचमेश में परस्पर
मित्र दृष्टि हो तो पुत्रसिद्धि होती है । अर्थात् यह सब योग पुत्रकारक
हैं । ।। १ ।।
लग्नामरेड्यशशिनां सुतभेषु पापै
र्युक्तेक्षितेष्वथ शुभैरयुतेक्षितेषु ।
पापोभयेषु सुतभेषु सुतेश्वरेषु
दुस्थानगेषु न भवन्ति सुताः कथंचित् ॥२॥
अब नीचे वह योग दिये जाते हैं जिनके कारण सन्तान नहीं होती
या होकर नष्ट हो जाती है । अर्थात् निम्नलिखित योग सन्तान के
बाधाकारक हैं ।
२३२ फलदीपिका
(i) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पंचम स्थान पाप-ग्रहों से
युक्त या दृष्ट हों और उन स्थानों में न शुभ-ग्रह बैठे हों न उनको
शुभ-ग्रह देखते हों ।
(ii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थानों के स्वामी
दुःस्थान में पड़े हो । छठा, आठवाँ और बारहवाँ घर दुःस्थान
कहलाता है ।
(iii) लग्न, चन्द्रमा और बृहस्पति से पाँचवें स्थान पाप-ग्रहों के
बीच में पड़े हों ।* ॥ २ ॥
पापे स्वर्शगते सुते तनयभाक् तस्मिन् सपापे पुनः
पुत्राः स्युर्बहुलाः शुभस्वभवने सोग्रे सुते पुत्रहा ।
संज्ञां चाल्पसुतर्क्षमित्यलिवृषस्त्रीसिंहभानां विदुः
तद्राशौ सुतभावगेऽल्पसुतवान् कालान्तरेऽसाविति ॥३॥
यदि कोई पाप-ग्रह पंचम स्थान का स्वामी होकर उसी स्थान में
हो तो पुत्र हो लेकिन यदि कोई शुभ-ग्रह स्वराशि का स्वामी होकर
पंचम में हो और साथ ही पंचम में पाप-ग्रह हो तो सन्तान नष्ट
करेगा । कहने का तात्पर्य यह है कि पाप-ग्रह यदि स्वराशि का हो
तो अपने स्थान को नहीं बिगाड़ता, किन्तु यदि दूसरे घर में बैठा हो
तो जिस घर में बैठता है उसको बिगाड़ता है ।
वृष, सिंह, कन्या और वृश्चिक अल्प सुत (कम सन्तान वाली) राशि
कहलाती है । यदि यह राशियाँ पंचम में हों तो थोड़ी सन्तति होगी
और वह भी बहुत समय के बाद ॥३॥
*नोट—जिस राशि के दूसरे और बारहवें घर में पाप-ग्रह हों वह
राशि पाप-ग्रहों के बीच में समझी जाती है ।
बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २३३
सूर्ये चाल्पसुतर्क्षगे निधनगे मन्दे कुजे लग्नगे
लग्नाष्टव्ययगैः शनीड्यरुधिरैश्चाल्पात्मजर्क्षे सुते ।
चन्द्रे' लाभगते गुरुस्थितसुतस्थाने सपापे भवे-
ल्लग्नेऽनेकखगान्विते तनयभाक्कालान्तरे यत्नतः ॥४॥
इस श्लोक में तीन पृथक्-पृथक् योग बताये गये हैं । इन तीनों
योगों में से यदि कोई भी योग हो तो जातक के बहुत काल के बाद
(जवानी बीत जाने पर) और बहुत यत्न करने पर पुत्र होता है :
(क) पंचम में अल्पसुत राशि हो और उसमें सूर्य हो, शनि
आठवें घर में हो और मंगल लग्न में हो ।
(ख) शनि लग्न में हो, बृहस्पति अष्टम में हो और मंगल बारहवें
घर में तथा पाँचवें घर में अल्पसुत राशि हो ।
(ग) चन्द्रमा ग्यारहवें हो, बृहस्पति से पाँचवें घर में पापग्रह हो
और लग्न में कई ग्रह हों ।* ॥४॥
सूर्ये नान्ययुते सुतर्क्षसहिते चन्द्रस्य गेहे स्थिते
भौमे वा भृगुजेऽपि वा सति सुतप्राप्ति द्वितीयस्त्रियाम् ।
मन्दे वा बहुपुत्रवाञ्छ्छशिनि वा सौम्येऽपि वाल्पात्मजो
देवेड्ये' बहुदारिका शशिगृहे तद्वत्सुताधिष्ठिते ॥५॥
(क) यदि सूर्य अकेला ही कर्क राशि में स्थित होकर पाँचवें घर
में हो ।
या (ख) मंगल अकेला कर्क राशि में पंचम में हो ।
या (ग) कक राशि का शुक्र अकेला पंचम में हो ।
तो दूसरा विवाह करने पर पुत्र प्राप्ति होती है। यदि कर्क राशि
- वृष, सिंह, कन्या, और वृश्चिक अल्पसुत राशि है ।
२३४ फलदीपिका
में स्थित होकर शनि अकेला पंचम में हो तो बहुत पुत्र होंगे। यदि
कर्क राशि का बुध अकेला पंचम में हो तो थोड़े पुत्र हों। यदि स्वराशि
का चन्द्रमा पंचम स्थान में हो और चन्द्रमा के साथ दूसरा कोई
ग्रह न हो तो भी थोडे पुत्र हों। किन्तु यदि एकाकी (अकेला) बृहस्पति
अपनी उच्च राशि में स्थित होकर पंचम में हो तो जातक के बहुत
सी कन्या होती हैं ॥५॥
सुखास्तदशमस्थितैरशुभकाव्यशीतांशुभि-
र्व्ययाष्टतनयोदयेष्वशुभगेषु वंशक्षयः ।
मदे कविविदौ मतौ गुरुरसद्भिरंबुस्थितैः
सुते शशिनि नैधनव्ययतनुस्थपापैरपि ॥६॥
नीचे चार योग दिये जाते हैं। इन चारों में से कोई भी योग
हो तो जातक का वंश आगे नहीं चलता।
(i) चतुर्थ में अशुभ ग्रह हों, सातवें शुक्र हो और दसवें घर में
चन्द्रमा हो।
(ii) पहले, पांचवें, आठवें और बारहवें घर में अशुभ ग्रह हों।
(iii) सातवें घर में बुध और शुक्र हो, बृहस्पति पाँचवे हो
और क्रूर-ग्रह चौथे घर में हो।
(iv) चन्द्रमा पांचवें हो और पहले, आठवें तथा बारहवें घर में
पापग्रह हों ॥६॥
पापे लग्ने लग्नपे पुत्रसंस्थे
धीशे वीर्ये वेश्मनोन्दावपुत्रः ।
ओजर्क्षेऽंशे पुत्रगे सूर्यदृष्टे
चन्द्रे पुत्रक्लेशभाक् स्यादसूनुः ॥७॥
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३५
नीचे दो योग दिये जाते हैं। यदि इन दोनों में से कोई योग
हो तो जातक के पुत्र न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो।
(i) पाप-ग्रह लग्न में हो, लग्नेश पंचम में हो, पंचमेश तीसरे
घर में हो और चन्द्रमा चौथे घर में। इस योग से पुत्र नहीं होता।
(ii) चन्द्रमा ओज राशि और ओज अंश में स्थित होकर पांचवे
घर में हो और सूर्य से देखा जाता हो। यह योग होने से या तो पुत्र
न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो।¹ ॥७॥
मान्दं सुतर्क्षं यदि वाऽथबौधं
मान्द्यर्कपुत्रान्वितवीक्षितं चेत् ।
दत्तात्मजः स्यादुदयास्तनाथ-
संबन्धहीनो विबलः सुतेशः ॥८॥
नीचे दो योग दिये जाते हैं। इन दोनों योगों में से यदि कोई
योग हो तो जातक के औरस पुत्र नहीं होते किन्तु वह लड़का गोद
लेता है। अपने शरीर से, अपनी भार्या में जो पुत्र होता है वह औरस
कहलाता है।
(i) यदि पंचम भाव पर मिथुन, कन्या, मकर या कुम्भराशि हो
और मान्दि² या शनि वहां बैठे हों या पंचम को देखते हों।
(ii) यदि पंचमेश निर्बल हो और लग्नेश तथा सप्तमेश से कोई
सम्बन्ध न करे ॥८॥
नीचारिमूढोपगते सुतेशे
रिःफारिरन्ध्राधिपसंयुते वा ।
१. मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ ओज राशि कहलाती हैं।
२. मान्दि को गुलिक भी कहते हैं।
२३६ फलदीपिका
सुतस्य नाशः कथितोऽत्र तज्ज्ञैः
शुभैरदृष्टे सुतभे सुतेशे ॥६॥
यदि पांचवें घर का मालिक नीच राशि में हो, शत्रु राशि में हो,
या अस्त हो, या षष्ठेश, व्ययेश अथवा अष्टमेश के साथ हो तो सन्तान
नष्ट होती है। किन्तु यदि पंचमेश और पंचमभाव को शुभ-ग्रह देखें
तो सन्तान नष्ट नहीं होगी ॥९॥
सुतनाथजीवकुजभास्करेषु वै
पुरुषांशकेषु च गतेषु कुत्रचित् ।
मुनयो वदन्ति बहुपुत्रतां सदा
सुतनाथवीर्यवशतः सुपुत्रताम् ॥१०॥
यदि पांचवे घर का स्वामी, बृहस्पति, मंगल और सूर्य यह चाहे
कहीं भी हों किन्तु पुरुष नवांश में हो तो मुनियों का मत हैं कि ऐसे
व्यक्ति के बहुत पुत्र होते हैं। यदि पंचमेश बली होगा तो सुपुत्र होंगे;
यदि पंचमेश निर्बल होगा तो कुपुत्र होंगे। * ॥१०॥
पुंराश्यंशेऽधीशवरे पुंग्रहेन्द्रै-
र्युक्ते दृष्टे पुंग्रहे पुंप्रसूतिः ।
स्त्रीराश्यंशे स्त्रीग्रहैर्युक्तदृष्टे
स्त्रीणां जन्म स्यात्सुतर्क्षे सुतेशे ॥११॥
किसी व्यक्ति के कन्या विशेष होंगी या पुत्र विशेष इसका सिद्धांत
इस श्लोक में बताया गया है। यदि पंचम भाव पुरुष राशि, पुरुष अंश
** मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ पुरुष राशि या पुरुष
नवांश कहलाते हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर तथा मीन
स्त्रीराशि या स्त्री नवांश हैं।
बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २३७
में स्थित हो और पंचम में पुरुष-ग्रह बैठे हों या पंचम को पुरुषग्रह
देखते हों और पंचमेश भी पुरुष राशि, पुरुष अंश में स्थित हो तथा
पुरुष-ग्रहों द्वारा देखा जाता हो या पुरुषग्रहों के साथ हो तो पुत्र होंगे।
किन्तु यदि पंचम भाव में स्त्री राशि, स्त्री नवांश हो, पंचम में स्त्री
ग्रह बैठे हों या स्त्री ग्रह पंचम को देखते हों और पंचमेश स्त्री-राशि,
स्त्री-नवांश में स्थित हो, स्त्री-ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो कन्यायें
होंगी। प्रायः सब बातें किसी कुण्डली में पूर्ण रूप से घटित नहीं होतीं
इसलिये मिला-जुला प्रभाव होता है। ॥ ११ ॥
बलयुक्तौ स्वगृहांशेष्वर्कसितावुपचयर्क्षगौ पुंसाम् ।
स्त्रीणां वा कुजचन्द्रौ यदा तदा संभवति गर्भः ॥१२॥
यदि पुरुष की कुण्डली में सूर्य और शुक्र अपने गृह और अपने
अंश में बलवान् होकर उपचय स्थानों में जा रहे हों और स्त्री की
कुण्डली में मंगल और चन्द्रमा अपने घर और अंश में बलवान् होकर
उपचय स्थान में जा रहे हों तो गर्भ रहता है ॥ १२ ॥
अशत्रु नीचारिनवांशकैः सुते
सुतेशयुक्तैरपि तैस्तथाविधैः ।
सुतर्क्षगैर्वा गुरुभादिनांशकात्सुते
फलैः पुत्रमितिर्विचिन्त्यते ॥१३॥
इस श्लोक में यह देखना बताया गया है कि कितने पुत्र होंगे।
लग्न से १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ स्थान अपचय स्थान कहलाता
लग्न से ३, ६, १०, ११ उपचय स्थान कहलाता है।
२३८ फलदीपिका
यह देखिये कि कौन से ग्रह पांचवें घर में बैठे हैं या पांचवे घर के
स्वामी के साथ बैठे हैं और उनमें से कितने ऐसे हैं जो मित्र, नीच
और शत्रु नवांश में है। इसी प्रकार यह विचारिये कि बृहस्पति से
पंचम स्थान में कौन-कौन से ग्रह हैं--वे तथा बृहस्पति से पंचम स्थान
का स्वामी मित्र नवांश में है या नहीं। यह भी देखना चाहिये कि
सूर्य जिस नवांश में है उससे पंचम में जो ग्रह है या उससे पंचम का
जो स्वामी है यह सब मित्र नवांश में हैं या नहीं ॥१३॥
जीवेन्दुक्षितिजस्फुटैक्यभवने युग्मे च युग्मांशके
स्त्रीणां क्षेत्रबलं वदन्ति सुतदं मिश्रे प्रयासात्फलम्
भास्वच्छुक्रगुरुस्फुटैक्यभवनेप्योजांशकेऽप्योजभे
पुंसां बीजबलं सुतप्रदमिमं मिश्रे तु मिश्रं वदेत् ॥१४॥
इस श्लोक में यह बताया गया है कि किसी पुरुष की जन्मकुण्डली
देखकर यह कैसे बताना कि इस पुरुष के वीर्य में सन्तान उत्पन्न करने
की ताक़त है या नहीं और किसी स्त्री की जन्मकुण्डली देखकर यह
कैसे बताना कि इसमें सन्तान उत्पन्न करने की ताक़त है या नहीं।
पहले पुरुष की कुण्डली का विचार किया गया है।
पुरुष की कुण्डली में सूर्य-स्पष्ट, शुक्र-स्पष्ट और वृहस्पति-स्पष्ट
अर्थात् सूर्य, वृहस्पति, शुक्र इन तीनों ग्रहों की राशि, अंश, कला,
विकला जोड़ लीजिए। इनके जोड़ने पर यदि ऊनी राशि, ऊना नवांश
आवे तो समझिये कि इस पुरुष के वीर्य में पुत्र उत्पन्न करने की पूर्ण
क्षमता है। यदि राशि और नवांश इनमें से एक ऊना, एक पूरा आवे
तो मिलाजुला फल समझिये और यदि सम राशि, सम नवांश आवे तो
समझिये कि इस पुरुष में पुत्रोत्पत्ति की क्षमता नहीं है।
यदि स्त्री की कुण्डली का विचार करना हो तो उसकी कुण्डली
का चन्द्र स्पष्ट, मंगल-स्पष्ट और बृहस्पति-स्पष्ट (अर्थात् इन
बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३९
तीनों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़िये) जो जोड़ आवे
वह यदि सम राशि, सम नवांश में हो तो उस स्त्री में सन्तान उत्पन्न
करने की पूर्ण क्षमता समझनी चाहिए। राशि और नवांश इन दोनों
में एक सम, एक विषम आवे तो आधी क्षमता और दोनों विषम आवें
तो पूर्ण अक्षमता समझनी चाहिये ॥१४॥
पञ्चाघ्नाच्छशिनः स्फुटादिषुहतं भानुस्फुटं शोधये-
न्नीत्वा तत्र तिथिं सिते शुभतिथौ पुत्रोऽस्त्ययत्नादपि ।
कृष्णे नास्ति सुतस्तिथेर्बलवशाद्ब्रूयाद्द्वयोः पक्षयोः
दर्शे च्छिद्रतिथौ च विष्टिकरणे न स्यात् स्थिराख्ये सुतः ॥ १५ ॥
अब एक दूसरा प्रकार बताते हैं । सूर्य-स्पष्ट को पांच से गुणा
कीजिये और चन्द्र-स्पष्ट को भी पांच से गुणा कीजिए फिर चन्द्र-स्पष्ट
को जो पांच से गुणा किया है उसमें से सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को
घटाइये । यह सन्तान तिथि स्फुट हुआ । हमने “सुगम ज्योतिष
प्रवेशिका” के पृष्ठ ३८ और ३९ पर यह समझाया है कि सूर्य और
चन्द्र के कितने अंश के फ़ासले पर कौन-सी तिथि होती है । तिथि का
आधा भाग करण कहलाता है । इस कारण सूर्य और चन्द्र का कितना
फ़ासला है यह ज्ञात होने पर करण भी निकाला जा सकता है ।
ऊपर बताया गया है कि सूर्य-स्पष्ट × ५ के गुणनफल को चन्द्र-
स्पष्ट × ५ के गुणनफल में से घटाइये जो उत्तर आवे उससे यह निकालिये
कि कौन सी तिथि निकलती है और कौन सा करण आता है । ऊपर
लिखे प्रकार से यदि शुक्लपक्ष की शुभ तिथि आवे तो बिना यत्न के
भी पुत्र प्राप्ति होती है । यदि कृष्ण पक्ष की तिथि आवे तो संतान
की सम्भावना कम रहती है । कृष्णपक्ष की तिथि हो या शुक्लपक्ष की
तिथि—शुभ है या नहीं—उसका बलाबल देखकर फल कहना चाहिये ।
यदि अमावस्या तिथि आवे या छिद्र तिथि आवे तो सन्तान सुख में
२४० फलदीपिका
बाधा होगी। इसी प्रकार यह भी देखना चाहिये कि करण कौन सा
आता है। यदि विष्टि, चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या शकुन करण
आवे तो भी सन्तान सुख में बाधा उत्पन्न होती है।
ऊपर बताया गया है कि अमावास्या या छिद्र तिथि आवे तो
शुभ फल नहीं समझना। छिद्र तिथि किसे कहते हैं? चतुर्थी, षष्ठी,
अष्टमी, नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी छिद्र तिथियां कहलाती
हैं ॥१५॥
सन्तान दोष परिहार
विष्टिः स्थिरं वा करणां यदि स्यात्
कृष्णं यजेत् पौरुषसूक्तमन्त्रैः ।
षष्ठ्यां गुहाराधनमत्र कार्यं
यजेच्चतुर्थ्यां किल नागराजम् ॥१६॥
रामायणस्य श्रवणं नवम्यां
यद्यष्टमी चेच्छ्रवणव्रतं च ।
चतुर्दशी चेद्यदि रुद्रपूजा
स्याद्द्वादशी चेत्स्मृतमन्नदानम् ॥१७॥
तृप्तिं पितॄणामिह पञ्चदश्यां
कृष्णे दशम्याः परतोऽतियत्नात् ।
पक्षत्रिभागेष्वपि नागराजं
स्कन्दं च सेवेत हरिं क्रमेण ॥१८॥
पिछले श्लोक में यह बताया गया है कि उपर्युक्त प्रकार से
तिथि और करण निकालने से यदि अनिष्ट तिथि और अनिष्ट करण
बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २४१
आवे तो सन्तान सुख में बाधा होगी अब इन श्लोकों में उस दोष की
शान्ति का उपाय बताते हैं।
यदि उपर्युक्त प्रकार से विष्टि,* चतुष्पाद, नागव, किंस्तुघ्न या
शकुन करण आवे तो भगवान् कृष्ण का पुरुषसूक्त मन्त्रों से पूजन
करे। यदि षष्ठी तिथि आवे तो भगवान् कार्तिक स्वामी का पूजन
करना चाहिये। चतुर्थी तिथि आवे तो नागराज (सर्पों के देवता) का
पूजन करना चाहिये। नवमी तिथि हो तो रामायण का श्रवण करे
और अष्टमी तिथि हो तो श्रवण व्रत करे। यदि चतुर्दशी आवे तो
भगवान् रुद्र की पूजा करे और द्वादशी हो तो उसकी शान्ति के लिये
अन्नदान श्रेयस्कर है। ओर अमावास्या या पूर्णिमा हो तो पितरों की
तृप्ति करे। यदि कृष्णपक्ष की दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी,
चतुर्दशी या अमावास्या हो तो और भी विशेष यत्न पूर्वक शान्ति
की आवश्यकता है।
एक प्रकार से सारे कृष्ण पक्ष को ही अशुभ माना है। और
लिखते हैं कि यदि कृष्णपक्ष की पड़वा से पंचमी तक कोई तिथि आवे
तो नागराज (सर्पों के देवता) की सेवा करे। यदि कृष्णपक्ष की षष्ठी
से दशमी तक कोई तिथि आवे तो भगवान् स्कन्द (कार्तिक स्वामी)
की आराधना करे और यदि कृष्णपक्ष की एकादशी से अमावास्या तक
कोई तिथि हो तो हरि का भजन-पूजन करे ॥१६, १७, १८॥
पुत्रेशो रिपुनोचगोऽस्तमयगो रिःफाष्टमारिस्थित
स्तद्वत्पुत्रगृहस्थितोऽपि यदि वा दुःस्थानपस्तद्वशात् ।
पुत्राभावनिदानमेव कथयेत् तत्खेचराक्रान्तभ-
प्रोक्तैर्दैवतभूरुहैरपि मृगैः सन्तानहेतुं वदेत् ॥१९॥
*विष्टिकरण को भद्रा भी कहते हैं।
२४२ फलदीपिका
यदि जन्मकुण्डली में पांचवें घर का स्वामी शत्रु राशि का हो,
नीच राशि का हो या अस्त हो और लग्न से छठे, आठवें या बारहवें
पड़ा हो तो सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है। इसी प्रकार कोई ग्रह
नीचराशि का, शत्रुराशि का या अस्त होकर पंचम में बैठा हो या छठे
आठवें, बारहवें घर का मालिक होकर पांचवें घर में बैठ जावे तो भी
पुत्र का अभाव या पुत्र कष्ट करता है।
ऊपर कहे हुए जितने योग अधिक हों उतनी ही अधिक बाधा
समझनी चाहिये। बाधाकारक ग्रह जिस राशि में बैठा हो उसके
अनुसार यह निर्णय करना चाहिये कि किस देवता, वृक्ष या जीव के
कारण बाधा हो रही है और उसकी शान्ति का उपाय करना
चाहिये।
द्रोहाच्छंभुसुपर्णयोर्नहि सुतः शापात्पितॄणांरवे
रिन्दोर्मातृसुवासिनीभगवतीकोपान्मनोदोषतः ।
स्वग्रामस्थितदेवतागुहरिपुज्यात्युत्थदोषात्कुजे
शापाद्बालकृताद्विलालवधतः श्रीविष्णु कोपाद्बुधे ॥२०॥
पारंपर्यसुरप्रियद्विजगुरुद्रोहात्फलाढ्यद्रुम-
च्छेदाद्देवगुरौ तथा सति भृगौ पुष्पद्रुमच्छेदनात् ।
साध्वीगोकुलजातदोषवशतो यक्ष्यादिकामेन वा
मन्देऽश्वत्थवधाद्रुषा पितृपतेः प्रेतैः पिशाचादिभिः ॥२१॥
स्वर्भानौ सुतगे सुतेशसहिते सर्पस्य शापात्तथा
केतौ ब्राह्मणशापतश्च गुलिके प्रेतोत्थशापं वदेत् ।
शुक्रेन्दू गुलिकान्वितौ यदि वधूगोहत्तिमाहुः सुते
जीवो वाथ शिखी समान्दिरिह चेद्भू देवहत्याऽसुतः ॥२२॥