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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

प्रथम अध्याय : राशि भेद १९
ज्ञात कर, भाव स्पष्ट करके और ग्रहों तथा भावों के बल निकालकर फल
कहे। ॥ ३ *॥
शिरोवक्त्रोरोहृज्जठरकटिवस्तिप्रजनन-
स्थलान्यूरूबान्वोर्युगलमिति जंघे पदयुगम् ।
विलग्नात्कालाङ्गान्यलिक्षषकूलीरान्तिममिदं
भसन्धिविख्याता सकलभवनान्तानपि परे ॥ ४ ॥
समस्त जन्मकुंडली को 'कालपुरुष, का स्वरूप मानकर प्रथम भाव¹
से सिर का, दूसरे भाव से चेहरे का, तीसरे से छाती का, चौथे से हृदय का,
पांचवें से पेट का, छठे से कमर का, सातवें से वस्ति² का, आठवें से गुप्त
इन्द्रियों का, नवें से जांघों का, दसवें से दोनो घुटनों का, ग्यारहवें से
पिंडलियों का, बारहवें से दोनों पैरों का विचार करना चाहिये। जिस भाव
में शुभ ग्रह हों, जिस भाव को शुभ ग्रह देखते हों, जिस भाव का स्वामी
बलवान् हो—उस भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग पुष्ट और सुन्दर
होता है। भावेश निर्बल होने से या भाव के क्रूर दृष्ट, क्रूर युत होने से, उस
भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग कृश या रोगयुक्त होता है।
कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियों के अन्तिम भाग (अंश) को राशि-
संधि कहते हैं। अन्य मत से किसी भी राशि का अंतिम भाग—जहां
अग्रिम राशि शुरू होती हो—राशिसन्धि कहलाता है ॥ ४ ॥
अरण्ये केदारे शयनभवने श्वभ्रसलिले
गिरौ पाथः सस्यान्वितभुवि विशां धाम्नि सुषिरे ।
१. भाव, स्थान, घर सब का एक ही अर्थ है।
२. नाभि से लिंग मूल तक एक रेखा खींची जावे और उसे दो भागों
में विभाजित किया जावे तो नीचे का आधा हिस्सा वस्ति कहलाता है।

२० फलदीपिका
जनाधीशस्थाने सजलविपिने धाम्नि विचरत्
कुलाले कीलाले वसतिरुदिता मेषभवनात् ॥ ५ ॥
मेष आदि १२ राशियों के रहने के स्थान क्रमशः बताते हैं (१) जंगल,
(२) जलपूर्ण खेत, (३) शयन (सोने) का कमरा, (४) जलपूर्ण
दरार, (५) पर्वत, (६) जल और अन्न से पूर्ण भूमि, (७) वैश्य का
घर, (८) छिद्र, (९) जनाधीश (राजा या अधिकारी का स्थान,
(१०) जलपूर्ण जंगल, (११) कुम्हारों की जगह, (१२) जल ।
जन्मकुंडली या प्रश्न में जिस राशि से निर्णय किया जावे—उस
राशि के उपर्युक्त वर्णित स्थान से फलादेश में सहायता लेनी चाहिये ॥ ५ ॥
भौमः शुक्रबुधेन्दुसूर्यशशिजाः शुक्रारजीवार्कजाः
मन्दौ देवगुरुः क्रमेण कथिता मेषादिराशीश्वराः ।
सूर्यादुच्चगृहाः क्रियो वृषमृगस्त्रीकर्कमोनास्तुला
दिक्त्र्यंशैर्मनुयुक्तितिथीषुभनखांशैस्तेऽस्तनीचाः क्रमात् ॥६॥
मेष और वृश्चिक इन दो राशियों का स्वामी मंगल होता है, वृष
और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्या का बुध, धनु और मीन का वृहस्पति,
मकर और कुंभ राशियों का शनि । सिंह का सूर्य तथा कर्क का चन्द्रमा
स्वामी है ।
अब नीचे के चक्र में किस ग्रह की कौन-सी उच्च राशि है और उस
समस्त उच्च राशि में भी, किस अंश पर परम उच्च होता है यह बताया
जाता है । इसी प्रकार ग्रहों की नीच राशि तथा उस नीच राशि में भी परम
नीच अंश बताया जाता है ।
| ग्रह | उच्च राशि | परमोच्च अंश | नीच राशि | परम नीच अंश |
| सूर्य | मेष | १० | तुला | १० |
| चन्द्र | वृष | ३ | वृश्चिक | ३ |
| मंगल | मकर | २८ | कर्क | २८ |

प्रथम अध्याय : राशि भेद २१
ग्रह उच्चराशि परमोच्चअंश नीच राशि परम नीच अंश
बुध कन्या १५' मीन १५
बृहस्पति कर्क ५ मकर ५
शुक्र मीन २७ कन्या २७
शनि तुला २० मेष २०
उदाहरण के लिये बृहस्पति कर्क राशि के ५वें अंश पर परमोच्च
कहलाता है और ऊपर से ऊपर के शिखर पर पहुंचकर नीचे चलना
शुरू करता है; जब मकर के ५ अंश पर रहता है तो परम नीच (नीचा)
हो जाता है। फिर ऊंचा जाना शुरू करता है ॥ ६ ॥
सिंहोक्षाजवधूहयाङ्गवणिनः कुंभस्त्रिकोणा रवेः
ज्ञेन्दोस्तूच्चलवान्खषोड्वनशरैर्दिग्भूतकृत्यंशकैः ।
चापाद्यर्धवधूनृयुग्घटतुला मत्स्याश्च कीटोऽलिभं
त्वाप्याः कर्किमृगापरार्द्धशफराः शेषाश्चतुष्पादकाः ॥७॥
कुछ ग्रहों की जो स्वराशि या उच्च राशि बताई गई हैं वे उनकी मूल
त्रिकोण राशि भी होती है। फिर यह कैसे मालूम पड़े कि उस राशि में
स्वराशि या अपनी राशि कितने अंशों तक है और मूल त्रिकोण कहां से
कहां तक ? या उच्च राशि कौन-सा भाग है ? मूल त्रिकोण कौन-सा
भाग ? यह नीचे चक्र में स्पष्ट किया जाता है।
ग्रह राशि मूल त्रिकोण अपनी राशि
सूर्य सिंह ०°—२०° शेष स्वराशि
चन्द्रमा वृष ३°—३०° प्रथम ३ अंश-उच्च
मंगल मेष ०°—१२° शेष स्वराशि
'टिप्पणी—कन्या में ०° से १५° तक बुध का उच्च भाग १६°–२०° तक
मूल त्रिकोण और २०°—३०° तक स्वराशि होती है।

२२ फलदापका
ग्रह राशि मूलत्रिकोण अपनीराशि
बुध कन्या १५°-२०° २०°-३०° स्वराशि
वृहस्पति धनु ०-१०° शेष स्वराशि
शुक्र तुला ०-५° शेष स्वराशि
शनि कुंभ ०°-२०° शेष स्वराशि
अब राशियों को मनुष्य, कीट (कीड़ा) जल, तथा चतुष्पाद इन चार
भागों में विभाजित करते हैं ।
मनुष्य चतुष्पाद कीट जलचर
मिथुन मेष वृश्चिक कर्क
कन्या वृष मकर (उत्तरार्द्ध)
तुला मीन
धनु (पूर्वार्ध) सिंह
धनु (उत्तरार्द्ध)
कुंभ मकर (पूर्वार्द्ध)
गोकर्क्यश्व्यजनक्रभान्यथ नृयुङ्मीनौ परे राशय-
स्ते पृष्ठोभयकोदयाः समिथुनः पृष्ठोदयाश्चैन्दवाः ।
सौराः शेषगृहाः क्रमेण कथिता रात्रिद्युसंज्ञाः क्रमा-
दूर्ध्वाधःसमवक्रभानि तु पुनस्तीक्ष्णांशुमुक्ताद् गृहात् ॥८॥
अब कौन-सी राशि अपने आगे की ओर से उदय होती है, कौन-सी
पीछे की ओर से और कौन-सी दोनों ओर से यह बताते हैं ।
मेष पृष्ठोदय कर्क पृष्ठोदय
वृष पृष्ठोदय सिंह शीर्षोदय
*मिथुन उभयोदय कन्या शीर्षोदय
शीर्षोदय—सिर या आगे की ओर से उदय होने वाली ।
*१. बृहज्जातक के मतानुसार मिथुन शीर्षोदय है ।

१. अध्याय १-७: संज्ञा, ग्रह-गुण, राशि-भेद, कारकत्व एवं विविध योग विचार

प्रथम अध्याय : राशि भेद २३
तुला शीर्षोदय मकर पृष्ठोदय
वृश्चिक शीर्षोदय कुंभ शीर्षोदय
धनु पृष्ठोदय मीन उभयोदय
बहुत से विचारों में शीर्षोदय राशियां उत्तम मानी गई हैं; पृष्ठोदय
क्रूर। शीर्षोदय राशि में स्थित ग्रह प्रारंभ में ही अपना फल दिखाता है।
पृष्ठोदय में स्थित अंत में । उभयोदय में स्थित मध्य में ।
अब राशियों को (१) दिन में बली तथा (२) रात्रि में बली इन
भागों में बांटते हैं।*
दिवा बली—५, ६, ७, ८, ११, १२
रात्रि बली—१, २, ३, ४, ९, १०
दिवा बली राशियों पर सूर्य का विशेष अधिकार है । रात्रि बली
राशियों पर चन्द्रमा का ।
सूर्य जिस राशि को पार कर चुका है उससे गिनना प्रारंभ कीजिये—
इनकी क्रमशः ऊर्ध्व, अधः सम, वक्र, यह संज्ञा है। उदाहरण के लिये सूर्य
कन्या को पारकर तुला में आया तो कन्या से सिंह तक क्रमशः गिनिये।
ऊर्ध्व, अधः, सम, वक्र, ऊर्ध्व, अधः सम, वक्र, ऊर्ध्व, अधः सम, वक्र ।
यह भिन्न-भिन्न राशियों की क्रमशः संज्ञा हुई ।। ८ ।।
मेषादाह चरं स्थिराख्यमुभयं द्वारं बहिर्गर्भभं
धातुर्मूलमितीह जीव उदितं क्रूरं च सौम्यं विदुः ।
मेषाद्याः कथितास्त्रिकोणसहिताः प्रागादिनाथाः क्रमा-
दोजर्क्षं समभं पुमांश्च युवतिर्वामाङ्गमस्तादिकम् ॥ ९ ॥
पृष्ठोदय—पीछे की ओर से उदय होने वाली ।
उभयोदय—दोनों ओर से उदय होने वाली ।
*५ का अर्थ सिंह, ६ का कन्या इस प्रकार समझना चाहिये ।

२४ फलदीपिका
अब राशियों के कुछ अन्य लक्षण बतलाते हैं--
मेष चर द्वार धातु क्रूर विषम पूर्व
वृष स्थिर बहिः मूल सौम्य सम दक्षिण
मिथुन उभय गर्भ जीव क्रूर विषम पश्चिम
कर्क चर द्वार धातु सौम्य सम उत्तर
सिंह स्थिर बहिः मूल क्रूर विषम पूर्व
कन्या उभय गर्भ जीव सौम्य सम दक्षिण
तुला चर द्वार धातु क्रूर विषम पश्चिम
वृश्चिक स्थिर बहिः मूल सौम्य सम उत्तर
धन उभय गर्भ जीव क्रूर विषम पूर्व
मकर चर द्वार धातु सौम्य सम दक्षिण
कुंभ स्थिर बहिः मूल क्रूर विषम पश्चिम
मीन उभय गर्भ जीव सौम्य सम उत्तर
चर का अर्थ है जिसमें कार्य जल्दी हो। यात्रा करे तो जल्दी वापिस
आवे। स्थिर लग्न में कार्य करने से स्थायी होता है। स्थिर लग्न में मकान
में प्रवेश करे तो बहुत वर्षों तक रहे। 'उभय' का पहिला आधा भाग
'स्थिर' का प्रभाव दिखाता है; अन्तिम आधा भाग 'चर' का प्रभाव दिखाता
है। मिला-जुला प्रभाव दिखाने के कारण इसे उभय (दोनों) कहते हैं।
'द्वार' का अर्थ है दरवाजे पर। 'बहिः' का अर्थ है बाहर। 'गर्भ' का अर्थ
है अन्दर। 'धातु' का अर्थ है सोना, चांदी, लोहा आदि। 'मूल' का वृक्ष,
फल, अन्न, खेती आदि। 'जीव' का अर्थ है प्राणी—पुत्र, पौत्र आदि।
मान लीजिये ग्रह के लक्षण से प्रतीत होता है कि 'लाभ' होगा? किसका
लाभ? जिस राशि में ग्रह है उसके लक्षण से बतलाइये कि किस प्रकार
के लाभ या हानि की संभावना है। धातु की, या मूल की या मनुष्य की।
क्रूर राशि में क्रूर ग्रह और भी क्रूर हो जाता है। सौम्य राशि में क्रूर ग्रह
कम क्रूरता दिखाता है। इस प्रकार ग्रह की तथा राशि की क्रूरता तथा
सौम्यता निश्चय कर परिणामतः कितनी क्रूरता या सौम्यता होगी यह

'शुचि'!
श with u-matra: शु!
च with i-matra: चि!
मरणारुचि or मरणाशुचि?
Look at the letter after ण:
It has a tall loop like श: 'शु' with an 'i-matra' over the next letter 'चि'!
Wait: अशौच/शुचि?
"अशुचि" (impurity)!
मरण + अशुचि = मरणाशुचि!
Death and impurity/mourning (aśauci/sūtaka)!
8th house represents death (मरण) and impurity from death (अशुचि)!
YES! "मरणाशुचिविघ्नदासान्"!!
Look at the letters:
म-र-णा-शु-चि-वि-घ्न-दा-सा-न् ।
It is definitely 'मरणाशुचिविघ्नदासान्'!!
What an incredible catch!

Wait, let's re-examine line 23:
माङ्गल्यरन्ध्रमलिनाधिपराभवायुः
Wait, between 'मलिना' and 'पराभवायुः':
What is that letter?
ध with i-matra: धि!
Is it 'मलिनाधिपराभवायुः' or 'मलिनाधिपराभवायुः'?
Let's read:
मा (mā)
ङ्गल्य (ṅgalya)
रन्ध्र (randhra)

२६ फलदीपिका
आचार्यदैवतपितॄन् शुभपूर्वभाग्य-
पूजातपःसुकृतपौत्रजपार्यवंशान् ॥१४॥
व्यापारास्पदमानकर्मजयसत्कीर्तिं क्रतुं जीवनं
व्योमाचारगुणप्रवृत्तिमनन्याज्ञां च मेषूरणम् ।
लाभायागमनाप्तिसिद्धिविभवान् प्राप्तिं भवं श्लाघ्यतां
ज्येष्ठभ्रातरमन्यकर्णसरसान् सन्तोषमाकर्णनम् ॥१५॥
दुःखांघ्रिवामनयनक्षयसूचकान्त्य-
दारिद्र्यपापशयनव्ययरिःफबन्धान् ।
भावाह्वया निगदिताः क्रमशोऽथ लीन-
स्थानं त्रिषड्व्ययपराभवराशिनाम ॥१६॥
जन्मकुंडली में १२ भाव होते हैं । एक-एक भाव को अनेक नाम से
पुकारते हैं । किस-किस भाव के कितने और क्या-क्या नाम हैं, यह नीचे
बताया जाता है । इसका प्रयोजन यह है कि एक ही भाव के भिन्न-भिन्न
नामों से यह पता चलता है कि उस एक ही भाव से किन-किन
भिन्न-भिन्न चीज़ों का विचार करना ।
(१) लग्न, होरा, कल्प (प्रभात, सूर्योदय अर्थात् प्रारंभ) देह,
उदय (प्रारंभ होना), रूप, सिर, वर्तमान काल (मौजूदा हालत), जन्म
इन सब का विचार पहले घर (भाव) से करें ।
(२) धन, विद्या, अपनी वस्तु (धन पर अधिकार), खाना पीना,
भोजन, दाहिना नेत्र, चेहरा, पत्रिका (चिट्ठी), वाणी (बोलने की
शक्ति), कुटुम्ब—यह द्वितीय घर के नाम हैं अर्थात् इन सब का विचार
द्वितीय भाव से करें ।
(३) दुश्चिक्य, छाती, दाहिना कान, सेना, हिम्मत, वीरता, शक्ति
तथा भाई (बहिनों) का विचार तृतीय से करें । इसको दुश्चिक्य स्थान
भी कहते हैं ।

प्रथम अध्याय : राशि भेद २७
(४) घर, खेत, मामा, भान्जा, बन्धु, मित्र, सवारी, मां, गाय-भैंस,
सुगन्धि, वस्त्र, जेवर, तथा सुख का विचार चौथे घर से करें। इसी घर
से पानी, नदी, पुल, आदि का विचार करना चाहिये । चौथे घर को
‘हिबुक’ भी कहते हैं ।
(५) राजशासन की मोहर, मंत्री, कर (टैक्स), आत्मा, बुद्धि,
भविष्य ज्ञान, प्राण, सन्तान, पेट, श्रुति (वेद) स्मृति (मनुस्मृति आदि)
का विचार पंचम से करे । श्रुति-स्मृति से तात्पर्य है शास्त्र ज्ञान का। अतः
समस्त शास्त्र ज्ञान का विचार पंचम स्थान से करना चाहिये ।
(६) कर्ज़, अस्त्र, चोर, घाव (चोट), रोग, शत्रु, जाति (भाई
बन्धु जो शत्रुता का भाव रखते हों) युद्ध, दुष्ट कर्म, पाप, भय, अपमान आदि
का विचार छठे घर से करे ।
(७) हृदय की इच्छाएँ (काम वासना), मद, मार्ग, लोक (जनता),
पति, पत्नी आदि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिये । इस सातवें
स्थान को ‘द्यूत’ तथा ‘जामित्र’ भी कहते हैं । सूर्य अस्त के समय, पूर्व
क्षितिज लग्न राशि से सातवें घर में रहता है इस कारण सप्तम स्थान की
‘अस्त’ संज्ञा भी है।
(८) मांगल्य (स्त्री का सौभाग्य—पति का जीवित रहना), रंध्र
(छिद्र), आधि (मानसिक बीमारी-चिन्ता) अपमान या हार, आयु
(कितने वर्ष मनुष्य ज़िन्दा रहेगा) क्लेश, बदनामी, मृत्यु, विघ्न, अशुचि
(अपवित्रता या मरने के कारण सूतक) दास (गुलामों) का विचार अष्टम
स्थान से करना चाहिये । गुदा का विचार भी अष्टम से किया जाता है।
अष्टम में मंगल प्रायः बवासीर का रोग करता है ।
(९) आचार्य (गुरु), देवता (आराध्य देव), पिता, पूजा, पूर्वभाग्य
(तप, सत्कर्म) पौत्र, उत्तम वंश आदि का विचार नवम भाव से करना
चाहिये । इस को शुभ स्थान भी कहते हैं। दक्षिण भारत में नवें घर से
पिता का विचार किया जाता है किंतु उत्तर भारत में दसवें घर से पिता
का विचार करते हैं ।

२८ फलदीपिका
(१०) व्यापार उच्च स्थान (पोजीशन) इज्जत, कर्म, जय, यश,
यज्ञ, जीविका का उपाय, कार्य में अभिरुचि, आचार (सदाचार या
दुराचार) गमन, हुकूमत, गुण, आकाश आदि का विचार दसवें घर से करे।
इसे ‘मेषूरण’ या आज्ञा स्थान भी कहते हैं।
-(११) लाभ, आमदनी, प्राप्ति, आगमन, सिद्धि, वैभव (धन,
ऐश्वर्य) कल्याण, श्लाघ्यता—प्रशंसा, बड़ा भाई या बड़ी बहन, बायाँ
कान, सरसता, अच्छी खबर आदि का विचार ग्यारहवें घर से करे।
(१२) दुःख, पैर, बायाँ नेत्र, ह्रास, चुगलखोर, अन्त (किसी का
आखिरी परिणाम), दरिद्रता, पाप, शयन (पलंग पर शयन करना—
इसके अतिरिक्त पुरुष स्त्री गुप्त संबंध भी समझना चाहिये), खर्चा, बन्धन
(जेल जाना) आदि का विचार बारहवें स्थान से करें। बारहवें घर को
'व्यय' स्थान या “रिःफ" भी कहते हैं।
तीसरे, छठे, आठवें तथा बारहवें घर को 'लीन' स्थान कहते हैं।
'लीन' का अर्थ है छिपा हुआ। आठवां सब से निकृष्ट समझा जाता है।
६ठे, ८वें तथा १२वें स्थान को 'त्रिक' भी कहते हैं ॥ १०-१६ ॥
दुःस्थानमष्टमरिपुव्ययभावमाहुः सुस्थानमन्यभवनं शुभदं प्रदिष्टम् ।
प्राहुर्विलग्नदशसप्तचतुर्थभानि केन्द्रं हि कण्टकचतुष्टयनामयुक्तम् ॥
छठे, आठवें तथा बारहवें घरों को 'दुःस्थान' कहते हैं। दुःस्थान का
अर्थ है खराब स्थान। अन्य स्थान १, २, ३, ४, ५, ७, ९, १०, ११
शुभ स्थान हैं। वे शुभ फल करते हैं। जन्मकुंडली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम
तथा दशम स्थानों को ‘केन्द्र’ कहते हैं। केन्द्र को ‘कंटक’ या ‘चतुष्टय’
भी कहते हैं ॥ १७ ॥
पणफरमिति केन्द्रादूर्ध्वमापोक्लिमन्तत्-
परमथ चतुरस्रं नैधनं बन्धुभं च ।

प्रथम अध्याय : राशि भेद २९
अथ समुपचयानि व्योमशौर्यारिलाभा
नवमसुतभयुग्मं स्यात् त्रिकोणं प्रशस्तम् ॥१८॥
जन्म लग्न से द्वितीय, पंचम, अष्टम तथा एकादश स्थानों को 'पणफर'
कहते हैं तथा तृतीय, षष्ठ, नवम और द्वादश स्थानों को 'आपोक्लिम' ।
चौथे तथा आठवें घर को 'चतुरस्र' कहते हैं । तृतीय, छठे, दसवें तथा
ग्यारहवें घर का 'उपचय' नाम है । पाँचवें तथा नवें घर को 'त्रिकोण'
कहते हैं । त्रिकोण स्थान बहुत उत्तम माने गये हैं । त्रिकोण में शुभ
ग्रह बैठे तो और भी शुभ फल दिखलाता है । त्रिकोण का स्वामी भी
अपनी दशा, अन्तर्दशा में शुभ फल दिखाता है ॥ १८ ॥

दूसरा अध्याय
ग्रह भेद
अब इस अध्याय के प्रारंभ में सबसे पहले यह बताते हैं कि किस ग्रह
से क्या विचार करना चाहिये—किस वस्तु का कौन-सा ग्रह कारक है ।
प्रथम अध्याय में यह बता चुके हैं कि किस भाव से क्या-क्या विचार करना
चाहिये, इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो बात भाव से विचार की
जावे वह भाव के स्वामी से भी विचार करना चाहिये । उदाहरण के लिये
यदि छठे भाव से शत्रु का विचार किया जाता है तो छठे भाव के स्वामी
से भी शत्रु का विचार करना चाहिये । यह तो भाव का मालिक होने
के कारण उस ग्रह में विशेषता आई । परन्तु उसका अपना साधारण गुण
क्या है ? मान लीजिये दस आदमियों की कुण्डली में सूर्य अलग-अलग दस
भावों का स्वामी है । जिसमें लग्न का स्वामी है उसमें लग्नेश का प्रभाव
दिखावेगा, जिसमें धन स्थान का स्वामी है उसमें धनेश का प्रभाव दिखावेगा
—यह उचित ही है परन्तु सूर्य का अपना स्वाभाविक गुण, धर्म क्या है ?
ग्रहों के जो स्वाभाविक गुण, धर्म हैं, जिन वस्तुओं के वे कारक हैं—वह
नीचे के श्लोकों में बताया जाता है ।
ताम्रं स्वर्णं पितृशुभफलं चात्मसौख्यप्रतापं
धैर्यं शौर्यं समितिविजयं राजसेवां प्रकाशम् ।
शैवं कार्यं वनगिरिगतिं होमकार्यप्रवृत्ति
देवस्थानं कथयतु बुधस्तैक्ष्ण्यमुत्साहमर्कात् ॥१॥
मातुः स्वस्ति मनःप्रसादमुदधिस्नानं सितं चामरं
छत्रं सुव्यजनं फलानि मृदुलं पुष्पाणि सस्यं कृषिम् ।
कीर्तिं मौक्तिककांस्यरौप्यमधुरक्षीरादिवस्त्राम्बुगो-
योषाप्ति सुखभोजनं तनुसुखं रूपं वदेच्चन्द्रतः ॥२॥

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३१
सत्त्वं भूफलितं सहोदरगुणं शौर्यं रणं साहसं
विद्वेषं च महानसाग्निकनकज्ञात्यस्त्रचोरान्रिपून् ।
उत्साहं परकामिनीरतिमसत्योक्तिं महीजाद्वदे-
द्वैर्यं चित्तसमुन्नतिं च कलुषं सेनाधिपत्यं क्षतम् ॥३॥
पाण्डित्यं सुवचः कलानिपुणतां विद्वत्स्तुतिं मातुलं
वाक्चातुर्यमुपासनादिपटुतां विद्यासु युक्तिं मतिम् ।
यज्ञं वैष्णवकर्म सत्यवचनं शुक्तिं विहारस्थलं
शिल्पं बान्धवयौवराज्यसुहृदस्तद्भागिनेयं बुधात् ॥४॥
ज्ञानं सद्गुणमात्मजं च सचिवं स्वाचारमाचार्यकं •
माहात्म्यं श्रुतिशास्त्रधीस्मृतिमतिं सर्वोन्नतिं सद्गतिम् ।
देवब्राह्मणभक्तिमध्वरतपःश्रद्धाश्च कोशस्थलं
वैदुष्यं विजितेन्द्रियं धवसुखं संमानमीड्याद्वदेत् ॥५॥
संपद्वाहनवस्त्रभूषणनिधिद्रव्याणि तौर्यत्रिकं
भार्यासौख्यसुगन्धपुष्पमदनव्यापारशय्यालयान् ।
श्रीमत्त्वं कवितासुखं बहुवधूसङ्गं विलासं मदं
साचिव्यं सरसोक्तिमाह भृगुजादुद्वाहकर्मोत्सवम् ॥६॥
आयुष्यं मरणं भयं पतिततां दुःखावमानामयान्
दारिद्र्यं भृतकापवादकलुषाण्याशौचनिन्द्यापदः ।
स्थैर्यं नीचजनाश्रयं च महिषं तन्द्रीमृणं चायसं
दासत्वं कृषिसाधनं रविसुतात्कारागृहं बन्धनम् ॥७॥
तांबा, सोना, पिताः, शुभ फल, (अर्थात् अपना शुभ), धैर्य, शौर्य,

३२ फलदीपिका
(पराक्रम) युद्ध में विजय, आत्मा, सुख, प्रताप, राजसेवा, शक्ति,
प्रकाश, भगवान शिव सम्बन्धी कार्य, वन (जंगल) या पहाड़ में यात्रा,
होम (हवन) कार्य में प्रवृत्ति, देवस्थान (मन्दिर) तीक्ष्णता, उत्साह
आदि का विचार बुद्धिमान् मनुष्य सूर्य से करे। अर्थात् सूर्य उपर्युक्त का
कारक है ॥ १ ॥
माता का कुशल, चित्त की प्रसन्नता, समुद्र स्नान, सफ़ेद चंवर (या
सफ़ेद वस्तु और चंवर) छत्र, सुन्दर पंखे (राज चिह्न) फल, पुण्य,
मुलायम वस्तु, खेती, अन्न, कीर्ति (यश), मोती, चाँदी, काँसा, दूध, मधुर
पदार्थ, वस्त्र, जल, गाय, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुन्दरता)
—इनके सम्बन्ध का फलादेश चन्द्रमा से कहना चाहिये। चन्द्रमा इन सब
का कारक है ॥ २ ॥
अब यह बताते हैं कि मंगल से किन-किन वस्तुओं का विचार करे ।
सत्व (शारीरिक और मानसिक ताक़त) पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले
पदार्थ, भाई-बहिनों के गुण (भाई-बहिनों का सुख कैसा रहेगा ) क्रूरता,
रण, साहस, विद्वेष (शत्रुता) रसोई की अग्नि, सोना, ज्ञाति (जाति के
लोग—दायाद) अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति,
मिथ्या भाषण, वीर्य (ताक़त, पराक्रम) चित्त की समुन्नति (चित्त का
उत्साह, उदारता; बहादुरी या ऊंचापन), कालुष्य (पाप या बुरा
काम) व्रण (घाव), चोट, सेनाधिपत्य आदि का विचार मंगल से
करें ॥ ३ ॥
बुध किन बातों पर विशेष प्रभाव डालता है या यों कहिये कि बुध
किन वस्तुओं का विशेष अधिष्ठाता है ? पाण्डित्य, अच्छी वाक् शक्ति
(बोलने की शक्ति), कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, वाक्-
चातुर्य, उपासना आदि में पटुता (चतुरता), विद्या में बुद्धि का योग,
बुद्धि (बुद्धिमान होना अलग बात है और विद्या में बुद्धि लगाये रहना
पृथक् बात है ) यज्ञ, भगवान विष्णु सम्बन्धी धार्मिक कार्य, सत्य
वचन, सीप, विहार स्थल (आमोद-प्रमोद की जगह), शिल्प (तथा

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३३

शिल्प कार्य में चतुरता), बन्धु, युवराज, मित्र, भानजा, भानजी आदि
का विचार बुध से करें ॥ ४ ॥
अब बृहस्पति किन-किन का कारक है यह बताते हैं : ज्ञान : अच्छे
गुण, पुत्र, मंत्री, अच्छा आचार (आचरण), या अपना आचरण (चरित्र,
कार्य), आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा देना) माहात्म्य (आत्मा का महान्
होना) श्रुति (वेद) शास्त्र, स्मृति आदि का ज्ञान, सब की उन्नति,
सद्गति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खज़ाना,
विद्वत्ता, जितेन्द्रियता, सम्मान, दया आदि का विचार बृहस्पति से करें ।
विशेष यह है कि यदि स्त्री की जन्मकुण्डली का विचार करना हो तो
पति सुख का विचार भी बृहस्पति से करना चाहिये ॥ ५ ॥
सम्पत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, निधि¹ में रखे हुए द्रव्य, तौर्यत्रिक
(नाचने, गाने तथा बाजे का योग), सुगन्धि, पुष्प, रति (स्त्री, पुरुष
प्रसंग), शय्या (पलंग) और उससे सम्बन्धित व्यापार, मकान, धनिक
होना, अर्थात् वैभव, कविता का सुख, विलास, मंत्रित्व (मिनिस्टर होना),
सरस उक्ति, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव आदि का विचार शुक्र से
करें । विशेष यह है कि यदि पुरुष की जन्मकुण्डली हो तो स्त्री सुख का
विचार भी शुक्र से करना चाहिये—अपनी विवाहिता पत्नी से कैसा
सुख है और विवाहिता के अतिरिक्त—अन्य स्त्रियों का उपभोग कैसा
होगा ।—जिस तरह श्लोक ५ में बताया गया है कि बृहस्पति पति कारक
है उसी तरह श्लोक ६ में यह बताया है कि शुक्र स्त्री कारक है। फल-
दीपिका के इस अध्याय में जो स्थिरकारक बताये हैं उनका फलादेश में
बड़ा महत्त्व है । जो ज्योतिषी स्थिर कारक का विचार नहीं करते वह
फलादेश में बहुत भूल कर बैठते हैं। एक सज्जन ने हमें जन्मकुण्डली दिखाई,
कुंभ लग्न था । शुक्र की महादशा चल रही थी, उम्र करीब २२ वर्ष के
लगभग थी । करीब २४वें वर्ष में सूर्य की महादशा प्रारम्भ होती थी। उन्हें
१. ज़मीन के अन्दर गड़ा हुआ या संग्रह किया हुआ द्रव्य ।

३४ फलदीपिका
कई ज्योतिषियों ने यह बताया था कि सूर्य सप्तमेश है इस कारण सूर्य की
महादशा लगने पर विवाह होगा किन्तु हमने शुक्र स्त्री कारक होता है
इस आधार पर शुक्र में ही विवाह कहा था और हमारा फलादेश ठीक
बैठा। कहने का तात्पर्य यह है कि केवल भावेश के भंवर में पड़कर भूल
में न पड़ना चाहिये। किसी भी स्थान का स्वामी बृहस्पति हो और यदि
अच्छे स्थान पर पड़ा है और उसकी अन्तर्दशा है तो मनुष्य की युवावस्था
में सन्तान दे जावेगा या सन्तान सम्बन्धी सुख देगा। शुक्र अच्छा पड़ा हो
तो स्त्री सम्बन्धी विलास देगा ॥ ६ ॥
आयु, मरण, भय, पतन (किसी ऊंचे स्थान से गिरना या सम्मान-
च्युत होना, जातिच्युत आदि होना), अपमान, बीमारी, दुःख, दरिद्रता,
बदनामी, पाप, मज़दूरी, अपवित्रता, निन्दा, आपत्ति, कलुषता (मन का
साफ न होना, निन्दा, निन्दित कर्म आदि) आपत्ति, मरने का सूतक,
स्थिरता, नीच व्यक्तियों का आश्रय, भैंस, तन्द्रा (आलस्य, ऊँघना) कर्ज़,
लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, गिरफ्तार होना, खेती के
साधन आदि का विचार शनि महाराज से करें । ७ ॥
पित्तास्थिसारोऽल्पकचश्च रक्तश्यामाकृतिः स्यान्मधुपिङ्गलाक्षः ।
कौसुम्भवासाश्चतुरस्रदेहः शूरः प्रचण्डः पृथुबाहुरर्कः ॥८॥
स्थूलो युवा च स्थविरः कृशः सितः कान्तेक्षणश्चासितसूक्ष्ममूर्धजः ।
रक्तैकसारो मृदुवाक् सितांशुको गौरः शशी वातकफात्मको मृदुः ॥
मध्ये कृशः कुञ्चितदीप्तकेशः क्रूरेक्षणः पैत्तिक उग्रबुद्धिः ।
रक्ताम्बरो रक्ततनुर्महीजश्चण्डोऽत्युदारस्तरुणोऽतिमज्जः ॥१०॥
दूर्वालताश्यामतनुस्त्रिधातुमिश्रः सिरावान्मधुरोक्तियुक्तः ।
रक्तायताक्षो हरितांशुकस्त्वक्सारो बुधो हास्यरुचिः समाङ्गः ॥

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३५
पीतद्युतिः पिङ्गरुचेक्षणः स्यात् पीनोन्नतोराश्च बृहच्छरीरः ।
कफात्मकः श्रेष्ठमतिः सुरेड्यः सिंहाब्जनादश्च वसुप्रधानः ॥१२॥
चित्राम्बराकुञ्चितकृष्णकेशः स्थूलाङ्गदेहश्च कफानिलात्मा ।
दूर्वाङ्कुराभः कमनो विशालनेत्रो भृगुः साधितशुक्लवृद्धिः ॥१३॥
पङ्गुर्निम्नविलोचनः कृशतनुर्दीर्घः सिरालोऽलसः
कृष्णाङ्गः पवनात्मकोऽतिपिशुनः स्नाय्वात्मको निर्घृणः ।
मूर्खः स्थूलनखद्विजः परुषरोमाङ्गोऽशुचिस्तामसो
रौद्रः क्रोधपरो जरापरिणतः कृष्णाम्बरो भास्करिः ॥१४॥
अब प्रत्येक ग्रह का स्वरूप और उसकी प्रकृति बताते हैं। इसका
प्रयोजन क्या है ? यदि लग्न में कोई ग्रह हो तो उसी ग्रह के गुण और
प्रकृति के अनुसार जातक की प्रकृति होती है । जिसके लग्न में मंगल है
उसकी प्रकृति में उग्रता, साहस, रणप्रियता आदि गुण आवेंगे । किस राशि
में स्थित होकर लग्न में मंगल है इसका भी बहुत प्रभाव पड़ेगा । यदि
बलवान् मंगल है तो शूरवीर सेनापति होकर लड़ सकता है, यदि दुर्बल
पाप पीड़ित मंगल है तो कुंजड़ों की-सी लड़ाई मोल ले सकता है । जब
लग्न में कोई ग्रह नहीं होता है तो लग्नेश की तरह मनुष्य की आकृति,
प्रकृति, गुण, स्वभाव आदि होते हैं । इस कारण प्रत्येक ग्रह की प्रकृति,
स्वभाव आदि जानना आवश्यक है । जो ग्रह लग्न को देखते हैं वह भी
अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार जातक को प्रभावित करते हैं । इसके
अतिरिक्त जो ग्रह रोग पीड़ित या बीमार करता है उसी ग्रह की प्रकृति
और दोष जनित रोग होगा । उदाहरण के लिये सूर्य पित्त रोग करेगा
तो शनि वायु रोग । इन्हीं सब बातों को समझने के लिये सातों ग्रहों के
गुण, प्रकृति, स्वभाव आदि नीचे बताये जाते हैं ।
सूर्य की पित्त प्रकृति होती है, इसकी अस्थियाँ (हड्डियाँ) दृढ़ होती

३६ फलदीपिका
हैं, थोड़े केश (सिर के बाल) होंगे । इसकी आकृति रक्त-श्याम (कुछ
स्याही लिये हुए लाल) होती है । इसके नेत्र की पुतलियाँ शहद की
तरह कुछ भूरापन और ललाई लिये हुए; इसकी आकृति चौकोर है;
इसकी भुजायें विशाल हैं; यह लाल वस्त्र धारण किये हुए है; स्वभाव
' से सूय शूर और प्रचण्ड है ॥ ८ ॥
चन्द्रमा का स्थूल (बड़ा) शरीर है । वह युवावस्था का भी है और
प्रौढ़ावस्था का भी है; उसका शरीर सफेद और कमजोर¹ है; उसके सिर
के केश सूक्ष्म और काले हैं; उसके नेत्र बहुत सुन्दर हैं; उसके
शरीर में रक्त की प्रधानता है; अर्थात् शरीर रक्त-प्रवाह पर चन्द्रमा का
आधिपत्य है । चन्द्रमा की वाणी मृदु है और गौर वर्ण वाला सफ़ेद वस्त्र
पहनने वाला है । यह मृदु (मुलायम) है—शरीर से भी, स्वभाव से भी ।
त्रिदोषों में कफ और वात पर इसका विशेष अधिकार है अर्थात् चन्द्रमा
अपनी अन्तर्दशा में वात रोग या कफ रोग या वातकफात्मक रोग उत्पन्न
करेगा ॥ ९ ॥
मंगल मध्य में कृश है अर्थात् उसकी पतली कमर है; इसके सिर के
केश घुंघराले और चमकीले हैं; इसकी दृष्टि में क्रूरता है और स्वभाव
से भी उग्र बुद्धि है । यह पित्त प्रधान है । लाल वस्त्र धारण किये हुए
और इसके शरीर का भी वर्ण लाल ही है । यह स्वभाव से प्रचण्ड है
किन्तु अति उदार है; शरीर के मज्जा भाग पर इसका विशेष अधिकार
है (इसका आशय यह हुआ कि जिसकी जन्मकुण्डली में मंगल बलवान्
है उसके शरीर की मज्जा बलवान् होगी; जिसका मंगल निर्बल है उसकी
मज्जा निर्बल होगी) मंगल तरुण अवस्था का है (इसका आशय यह
हुआ कि यदि किसी मनुष्य की जन्मकुण्डली में बलवान् मंगल लग्न में
१. चन्द्रमा को स्थूल भी कहा है; कृश भी कहा है; प्रतीत होता है
पक्ष बल अधिक होने से स्थूल शरीर होगा, पक्ष बल कम होने से कृश
शरीर होगा ।

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३७
पड़ा है तो वह पचास वर्ष की अवस्था में भी ३० वर्ष के समान प्रतीत
होगा ॥ १० ॥
अब बुध का स्वरूप तथा प्रकृति बतलाते हैं। बुध के शरीर की कान्ति
नवीन दूब के समान है। इसमें वात, पित्त, कफ, त्रिदोषों का सम्मिश्रण
है। इसका आशय यह है कि जन्मकुण्डली में बुध यदि पीड़ित हो तो
अपनी दशा-अन्तर्दशा में वायु से उत्पन्न, कफ से उत्पन्न तथा पित्त से
उत्पन्न तीनों प्रकार के रोग उत्पन्न कर सकता है। यह नसों से युक्त हैं
(कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर में जो स्नायु मंडल है—जिसे अंग्रेजी
में नर्वस सिस्टम कहते हैं उसका अधिष्ठाता बुध है। यदि बुध पीड़ित होतो
नर्वस सिस्टम में खराबी होगी।) बुध स्वभाव से मधुर वाणी बोलने वाला
होता है। इसके शरीर के अंग बराबर हैं अर्थात् सुडौल हैं। जो जितना
बड़ा होना चाहिये वह अंग वैसा ही है। बुध मज़ाकपसंद है। जिन
स्त्रियों या पुरुषों की कुण्डलियों में बुध चन्द्रमा से युक्त होता है वे
मज़ाकपसंद होते हैं। कोई-न-कोई तमसखुर की बात बोलते रहते हैं।
जिस प्रकार मंगल में मज्जा प्रधान है इसी प्रकार बुध त्वचा प्रधान है।
त्वचा शरीर के सबसे ऊपर की जिल्द (खाल) को कहते हैं। बुध अच्छा
होने से त्वचा अच्छी होगी, बुध पापाक्रान्त होने से त्वचा के रोग होंगे।
बुध के नेत्र लंबाई लिये हैं और वह हरे वस्त्र धारण करता है। यह बुध
का स्थूल परिचय है; अब बृहस्पति के विषय में कहते हैं ॥ ११ ॥
बृहस्पति का पीला वर्ण है किन्तु नेत्र और सिर के बाल कुछ भूरापन
लिये हुए हैं। इसकी छाती पुष्ट और ऊंची है और बड़ा शरीर है। यह कफ
प्रधान है। वैद्यक शास्त्र में कफ प्रकृति वालों में जो लक्षण बताये गये हैं,
वे उस व्यक्ति में घटित होंगे जिसकी कुण्डली में बलवान् बृहस्पति लग्न में
होगा या बलवान् होकर नवांश का स्वामी है। बृहस्पति बलवान् होने से
मनुष्य बहुत बुद्धिमान् होता है; बुध से भी बुद्धि देखी जाती है और
बृहस्पति से भी। तब दोनों से ही बुद्धि का विचार किया जावे तो तारतम्य
क्या होगा ? बुध से किसी बात को शीघ्र समझ लेना, किसी विषय का

४० फलदीपिका
प्रकार सकेत मात्र से श्लोकों में बातें बतायी गई हैं । जन्मकुण्डली में या
प्रश्नकुण्डली में अपनी बुद्धि से ऊहापोह द्वारा इन बताई हुई बातों का
उपयोग करना चाहिये । चन्द्रमा के स्थान निम्नलिखित हैं :—दुर्गा जी का
मन्दिर, जिस कमरे में स्त्री या स्त्रियां रहती हों, ऐसा स्थान जहाँ जल,
औषधि (जड़ी, बूटी आदि) शहद, या शराब हो । चन्द्रमा पश्चिमोत्तर
(वायव्य) दिशा का स्वामी है । अब मंगल के विषय में कहते हैं कि युद्ध
भूमि, जहां अग्नि हो, या जहां चोर और म्लेच्छ रहते हों, इनका आधिपत्य
मंगल का है। मंगल दक्षिण दिशा का स्वामी है । बुध निम्नलिखित स्थानों
का अधिपति है :—जहां विष्णु मन्दिर हो, जहां विद्वान् लोग बैठते हों,
आमोद-प्रमोद का स्थान, जहां ज्योतिषी या गणित कर्ता बैठते हों । बुध
की दिशा उत्तर है । अब बृहस्पति के स्थान बताते हैं । खजाना, पीपल
का वृक्ष, देवताओं और ब्राह्मणों के रहने का स्थान—इनका अधिपति
बृहस्पति है । यह ईशान (पूर्वोत्तर) दिशा का स्वामी है । अब शुक्र
के विशेष स्थान बताते हैं—वेश्याओं के घर, जहां पर्दे में स्त्रियों को
रखा जाता हो, शयन स्थान, नाचने की जगह । शुक्र आग्नेय (पूर्व-दक्षिण)
दिशा का स्वामी है । शनि के स्थान निम्नलिखित हैं—जहां नीची श्रेणी
के लोग रहते हों, शास्ता१ का मन्दिर, अपवित्र स्थान, यह शनि के रहने
के स्थान हैं। यह पश्चिम दिशा का स्वामी है । अब राहु, केतु के स्थान
बताते हैं । वल्मीक (दीमक के कीड़ों द्वारा बनाया हुआ जंगल में उच्च
स्थान) जहां सांप रहते हों, ऐसे छिद्र जिनमें अन्धेरा हो, राहु केतु पश्चिम-
दक्षिण (नैऋत्य) दिशा के स्वामी होते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥
शैवो भिषङ्नृपतिरध्वरकृत्प्रधानी
व्याघ्रो मृगो दिनपतेः किल चक्रवाकः
शास्ताङ्गनारजककर्षकतोयगाः स्यु-
रिन्दोः शशश्च हरिणश्च बकश्चकोरः ॥१७॥
१. देवता विशेष ।