फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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(पराक्रम) युद्ध में विजय, आत्मा, सुख, प्रताप, राजसेवा, शक्ति,
प्रकाश, भगवान शिव सम्बन्धी कार्य, वन (जंगल) या पहाड़ में यात्रा,
होम (हवन) कार्य में प्रवृत्ति, देवस्थान (मन्दिर) तीक्ष्णता, उत्साह
आदि का विचार बुद्धिमान् मनुष्य सूर्य से करे। अर्थात् सूर्य उपर्युक्त का
कारक है ॥ १ ॥
माता का कुशल, चित्त की प्रसन्नता, समुद्र स्नान, सफ़ेद चंवर (या
सफ़ेद वस्तु और चंवर) छत्र, सुन्दर पंखे (राज चिह्न) फल, पुण्य,
मुलायम वस्तु, खेती, अन्न, कीर्ति (यश), मोती, चाँदी, काँसा, दूध, मधुर
पदार्थ, वस्त्र, जल, गाय, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुन्दरता)
—इनके सम्बन्ध का फलादेश चन्द्रमा से कहना चाहिये। चन्द्रमा इन सब
का कारक है ॥ २ ॥
अब यह बताते हैं कि मंगल से किन-किन वस्तुओं का विचार करे ।
सत्व (शारीरिक और मानसिक ताक़त) पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले
पदार्थ, भाई-बहिनों के गुण (भाई-बहिनों का सुख कैसा रहेगा ) क्रूरता,
रण, साहस, विद्वेष (शत्रुता) रसोई की अग्नि, सोना, ज्ञाति (जाति के
लोग—दायाद) अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति,
मिथ्या भाषण, वीर्य (ताक़त, पराक्रम) चित्त की समुन्नति (चित्त का
उत्साह, उदारता; बहादुरी या ऊंचापन), कालुष्य (पाप या बुरा
काम) व्रण (घाव), चोट, सेनाधिपत्य आदि का विचार मंगल से
करें ॥ ३ ॥
बुध किन बातों पर विशेष प्रभाव डालता है या यों कहिये कि बुध
किन वस्तुओं का विशेष अधिष्ठाता है ? पाण्डित्य, अच्छी वाक् शक्ति
(बोलने की शक्ति), कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, वाक्-
चातुर्य, उपासना आदि में पटुता (चतुरता), विद्या में बुद्धि का योग,
बुद्धि (बुद्धिमान होना अलग बात है और विद्या में बुद्धि लगाये रहना
पृथक् बात है ) यज्ञ, भगवान विष्णु सम्बन्धी धार्मिक कार्य, सत्य
वचन, सीप, विहार स्थल (आमोद-प्रमोद की जगह), शिल्प (तथा