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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 684 में से

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दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३३

शिल्प कार्य में चतुरता), बन्धु, युवराज, मित्र, भानजा, भानजी आदि
का विचार बुध से करें ॥ ४ ॥
अब बृहस्पति किन-किन का कारक है यह बताते हैं : ज्ञान : अच्छे
गुण, पुत्र, मंत्री, अच्छा आचार (आचरण), या अपना आचरण (चरित्र,
कार्य), आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा देना) माहात्म्य (आत्मा का महान्
होना) श्रुति (वेद) शास्त्र, स्मृति आदि का ज्ञान, सब की उन्नति,
सद्गति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खज़ाना,
विद्वत्ता, जितेन्द्रियता, सम्मान, दया आदि का विचार बृहस्पति से करें ।
विशेष यह है कि यदि स्त्री की जन्मकुण्डली का विचार करना हो तो
पति सुख का विचार भी बृहस्पति से करना चाहिये ॥ ५ ॥
सम्पत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, निधि¹ में रखे हुए द्रव्य, तौर्यत्रिक
(नाचने, गाने तथा बाजे का योग), सुगन्धि, पुष्प, रति (स्त्री, पुरुष
प्रसंग), शय्या (पलंग) और उससे सम्बन्धित व्यापार, मकान, धनिक
होना, अर्थात् वैभव, कविता का सुख, विलास, मंत्रित्व (मिनिस्टर होना),
सरस उक्ति, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव आदि का विचार शुक्र से
करें । विशेष यह है कि यदि पुरुष की जन्मकुण्डली हो तो स्त्री सुख का
विचार भी शुक्र से करना चाहिये—अपनी विवाहिता पत्नी से कैसा
सुख है और विवाहिता के अतिरिक्त—अन्य स्त्रियों का उपभोग कैसा
होगा ।—जिस तरह श्लोक ५ में बताया गया है कि बृहस्पति पति कारक
है उसी तरह श्लोक ६ में यह बताया है कि शुक्र स्त्री कारक है। फल-
दीपिका के इस अध्याय में जो स्थिरकारक बताये हैं उनका फलादेश में
बड़ा महत्त्व है । जो ज्योतिषी स्थिर कारक का विचार नहीं करते वह
फलादेश में बहुत भूल कर बैठते हैं। एक सज्जन ने हमें जन्मकुण्डली दिखाई,
कुंभ लग्न था । शुक्र की महादशा चल रही थी, उम्र करीब २२ वर्ष के
लगभग थी । करीब २४वें वर्ष में सूर्य की महादशा प्रारम्भ होती थी। उन्हें
१. ज़मीन के अन्दर गड़ा हुआ या संग्रह किया हुआ द्रव्य ।