फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
फलदीपिका १५९
को जीतने वाला, विख्यात पुरुष होता है। मन्त्रेश्वर महाराज के विचार
से अष्टम दुःस्थान होने के कारण इसका मालिक भी यदि दुःस्थान में जावे
तो उसी प्रकार उत्तम गिना जाता है जैसे यदि अपना दुश्मन गड्ढे में
में पड़ा हुआ हो तो इसे उत्तम कहेंगे। वी० सुब्रह्मण्य शास्त्री ने टीका
करते हुए लिखा है, कि अष्टम भाव पाप ग्रह युतवीक्षित हो तो भी
'सरल' योग होता है। परन्तु हमारे विचार से अष्टम ग्रह को यदि
पाप ग्रह देखें या अष्टम में पाप ग्रह बैठें तो जिस भाव के वे स्वामी
हैं उनको तो बिगाड़ेंगे ही साथ में अष्टम भाव को भी बिगाड़ेंगे—
केवल मात्र शनि के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि अष्टम में शनि
आयु को बढ़ाता है। अष्टम में मंगल तो बहुत ही खराब है; गुदा रोग
करता है और मनुष्य को प्रायः कर्जदार रखता है। अष्टम में केतु भी
गुदा सम्बन्धी रोग देता है जैसे कांच निकलना। इन सब उदाहरणों
द्वारा हमारा अभिप्राय यह है कि अष्टमेश दुःस्थान में बैठे अर्थात् छठे
या बारह में बैठे तो सरल योग होगा किन्तु अष्टम भाव में पाप ग्रह
का बैठना उत्तम नहीं।
(९) यदि नवें भवन का स्वामी लग्न से ६, ८, या १२वें भाव में
हो और नवमेश तथा नवम गृह पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो या वहां
अशुभ ग्रह बैठे हों (या नवमेश पाप ग्रह युत वीक्षित हो) तो
“निर्भाग्य” योग होता है। जो व्यक्ति निर्भाग्य योग में पैदा
होता है वह बहुत दुःख उठाने वाला, पुराने कपड़े पहनने वाला
दुर्गति को प्राप्त होता है। नवम भाव धर्म भाव है यह बिगड़ने से
मनुष्य साधुओं की और गुरुओं की निन्दा करता है। ऐसे व्यक्ति को
जो कुछ पैत्रिक सम्पति प्राप्त होती है (घर, खेत, ज़मीन, जायदाद) वह
सब नष्ट हो जाती है।
(१०) यदि दशम में क्रूर ग्रह बैठे हों और दशमेश अशुभ ग्रहों से
वीक्षित या युत हो और वह (दशम ग्रह का मालिक) ६, ८, या बारहवें
स्थान में पड़ा हो तो “दुर्योग” होता है। जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह
१६० छठा अध्याय : योग
योग हो उस मनुष्य के द्वारा पूर्ण परिश्रम से किए हुये कार्यों में भी
सफलता प्राप्त नहीं होती। उसके प्रयास निष्फल होते हैं। ऐसा मनुष्य
प्रायः प्रवासी (घर से बाहर परदेश में) रहता है। दुर्योग में उत्पन्न
मनुष्य का आदर नहीं होता। वह और लोगों से द्रोह करता रहता
है और अपने पेट पालने की ही फिक्र में रहता है।
(११) यदि ११वें भाव का स्वामी दुःस्थान में हो तो दरिद्रयोग
होता है। हमने ऊपर अनेक स्थानों पर यह लिखा है कि भावपति
दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रह से युत वीक्षित हो तो योग
होगा। वास्तव में यह एक टीकाकार का मत है। मन्त्रेश्वर महाराज
ने ५७वें श्लोक की प्रारम्भिक दो पंक्तियों में जो शब्द उपयोग किये
हैं उनका यह अर्थ करना विशेष उपयुक्त होगा कि भावेश दुःस्थान
में हो और भावेश अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो और भाव भी
अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो तो विविध योग होते हैं। किन्तु
इसके अपवाद हैं यदि भाव में सर्वत्र अशुभ ग्रह होने से खराब योग
बने तो एकादश भाव में पाप ग्रह के बैठने से दरिद्रयोग बनना
चाहिये ? किन्तु ज्योतिषियों का आप्त वाक्य है कि "लाभे सर्वे
प्रशस्ताः" सारावली में भी लिखा है कि
लग्नस्थाः सुखसंस्थाः दशमस्थापि कारकाः सर्वे ।
एकादशमपि केचित् वाञ्छन्ति न तन्मतं मुनीन्द्राणाम् ॥
अतः हम यही अर्थ करेंगे कि यदि एकादशेश त्रिक में हो या अशुभ
ग्रहों से युत वीक्षित हो तो दरिद्रयोग होता है। जिसकी जन्मकुण्डली
में यह योग हो वह कर्जदार, अत्यन्त दरिद्री कान की बीमारी से
तकलीफ़ पाने वाला, अच्छे भाइयों से हीन, दुष्कार्य करने वाला,
अप्रशस्त वचन बोलने वाला, दूसरे का नौकर और दुःख उठाने वाला
होता है।
(१२) यदि १२वें घर का मालिक दुःस्थान में हो और अशुभ
ग्रहों से युत वीक्षित हो तो विमल योग होता है। ऐसा व्यक्ति व्यय
छठा अध्याय : योग १६१
थोड़ा करता है। उसके धन की अधिक वृद्धि होती है। ऐसा मनुष्य
सुखी, स्वतन्त्र, अपने सद्गुणों के लिये विख्यात, उत्तम कार्य करने वाला
होता है और सब व्यक्तियों के अनुकूल आचरण करता है।
ऊपर योगों मे दो बात बताई गई हैं।
(१) भावेश दुःस्थान में हों।
(२) भाव अशुभग्रह से युत वीक्षित हो।
यदि भावेश अशुभग्रह युत वीक्षित हो तो और भी दुष्ट फल
होगा।
इस फलदीपिका के टीकाकार श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने ५७वें
इलोक की टीका करते हुए लिखा है कि यदि भावेश दुःस्थान में हो
और भाव अशुभ युत वीक्षित हो। संस्कृत के मूल इलोक में जो
'अशुभ संयुक्तेक्षितैर्वा क्रमात्' यह पद आये हैं वह देहली दीपक न्याय
(अर्थात् देहली पर रक्खा हुआ दीपक—जिन दो कमरों के बीच की
देहली पर रक्खा होता है उन दोनों में प्रकाश करता है) से भावेश,
और भाव दोनों में लग सकता है अर्थात्
(i) यदि भावेश दुःस्थान में हो और अशुभग्रहों से युत वीक्षित
हो तथा भाव अशुभ ग्रहों से युत वीक्षित हो।
(ii) यदि भावेश दुःस्थान में हो और भाव अशुभ ग्रहों से युत
वीक्षित हो।
वास्तव में सिद्धान्ततः
(१) भावेश का खराब जगह बैठना।
(२) भावेश का दुष्ट ग्रहों से युत होना।
(३) भावेश का पापग्रहों से वीक्षित होना।
(४) भाव में अशुभग्रहों का बैठना।
(५) भाव का अशुभग्रहों से देखा जाना।
यह पाँच बातें भाव को खराब करतीं हैं। जितनी अधिक खराब
ग्रह स्थिति होगी उतना ही उस भाव सम्बन्धी कष्ट होगा।
१६२ फलदीपिका
छिद्रारिव्ययनायकाः प्रबलगाः केन्द्रत्रिकोणाश्रिताः
लग्नव्योमचतुर्थभाग्यपतयः षड्रन्ध्ररिःफस्थिताः
निर्वीर्या विगतप्रभा यदि तदा दुर्योग एव स्मृत-
स्तद्व्यस्ते सति योगवान्धनपतिर्भू'पः सुखी धार्मिकः ॥७०॥
यदि षष्ठ, अष्टम तथा द्वादश के स्वामी प्रबल (बलवान्) होकर
केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में हों और लग्न, चतुर्थ,
नवम तथा दशम इन चारों भवनों के स्वामी निर्वीय (बलहीन) और
अस्त (सूर्य के समीप रहने के कारण) होकर ६, ८, १२ स्थान
या स्थानों में हो तो 'दुर्योग ही होता है । अर्थात् यह खराब योग है।
यदि इससे उलटा हो अर्थात् ६, ८, १२ के मालिक बलहीन हो
कर दुःस्थान में पड़ें और लग्न चतुर्थ नवम दशम के स्वामी बलवान्
पूर्ण प्रभा से युक्त (अस्त नहीं) सुस्थान में पड़ें तो ऐसा योगवाला
धनपति (लक्ष्मीवान्) राजा (अर्थात् ऐश्वर्यशाली) सुखी और
धार्मिक होता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि ६,८,१२ दुःस्थान हैं। इनके स्वामी
निर्बल होने चाहियें। १,४,९,१० विशिष्ट स्थान हैं इनके स्वामी बलवान्
होने चाहियें । विष जितना थोड़ा और कमजोर हो उतना अच्छा ।
अमृत जितना अधिक और बलशाली हो उतना अच्छा । ॥७०॥
- हमारे विचार से ५७-७० स्लोकों में जो योग गनाए गए हैं।
वे प्रधानतः भावेशों से विचार करना चाहिए, भाव से भी। परन्तु
तारतम्य कर लेना चाहिए, जैसे द्वादश का स्वामी दुःस्थान में हो तो
विमल योग होगा । बारहवें भाव में अशुभ ग्रह होने से योग नहीं
होगा । हमने अपने विचार से 'तारतम्य करते हुए ग्रंथकार का अभिप्राय
वर्णन किया है।
सातवां अध्याय
राजयोग
त्र्याद्यैः खेटैः स्वोच्चगैः केन्द्रसंस्थैः स्वक्षैस्थैर्वा भूपतिः स्यात्प्रसिद्धः।
पञ्चाद्यैस्तैरन्यवंशप्रसूतोऽप्युर्वीनाथो वारणाश्वौघयुक्तः ॥१॥
यदि किसी की जन्मकुण्डली में तीन या अधिक ग्रह उच्च राशि
या स्वराशि में स्थित होते हुए केन्द्र में हों तो वह प्रसिद्ध राजा होता
है, यदि पाँच या पाँच से अधिक ग्रह स्वराशि या उच्चराशि में • स्थित
होकर केन्द्र में हों तो चाहे वह किसी भी वंश में पैदा हुआ हो, वह
पृथ्वी पति होता है और उसके पास हाथी और घोड़ों के झुंड रहते हैं
अर्थात् वहत वैभवशाली राजा होता है । ॥१॥
भूपाः स्युर्नृपवंशजास्तु यदि दुर्योगे न जातास्तथा
ह्यन्तर्धिर्नहि चेत्कराद्दिनकराज्जाताः स्फुरन्त्येव ते ।
त्र्याद्यैः केन्द्रगतैः स्वभोच्चसहितैर्भू पोद्भवाः पार्थिवाः
मर्त्यास्त्वन्यकुलोद्भवाः क्षितिपतेस्तुल्याः कदाचिन्नृपाः ॥२॥
यदि कोई राजा के वंश में पैदा हो और उसकी कुण्डली में कोई
दुर्योग न हो और न उसके ग्रह सूर्य के सान्निध्य के कारण अस्त हों
तो वह राजा होता है । यदि तीन या तीन से अधिक ग्रह स्वराशि या
उच्चराशि में स्थित होकर केन्द्र में हों और ऐसा जन्मकुण्डली वाला
राज वंश में उत्पन्न हो तो वह राजा होता है । किन्तु यदि किसी
साधारण वंश में उत्पन्न व्यक्ति की कुण्डली में यह योग हो तो वे राजा
१६४ फलदीपिका
के समान वैभवशाली हो जाते हैं । या कदाचित् राजा भी हो
जाँय । ॥ २ ॥
यद्येकोऽपि विराजितांशुनिकरः सुस्थानगो वक्रगो
नीचस्थोऽपि करोति भूपसदृशं द्वौ वा त्रयो वा ग्रहाः ।
एवं चेज्जनयन्ति भूपतिममी शस्तांशराशिस्थिता
स्तद्वच्चेद्बहवो नृपं समकुटच्छत्रोल्लसच्चामरम् ॥३॥
एक भी ग्रह यदि सुस्थान में हो (६,८ या १२वें भाग में न हो)
और वक्री हो (चाहे, नीच भी हो), किन्तु यदि अस्त न हो और
उज्ज्वल प्रभा से *युक्त हो तो वह राजा के सदृश वैभवशाली बना
देता है। यदि ऐसे दो या तीन ग्रह हों तो जातक राजा हो जाता है।
यदि ऐसे बहुत से ग्रह हों और वे उत्तम राशि और उत्तम नवांश में
स्थित हों तो मुकुट, छत्र और चाँवर से शोभायमान अत्यन्त वैभव-
शाली राजा होता है। हमारे विचार से राजवंश प्रसूत नरों में ही यह
योग विशेष लागू करना चाहिये । ॥३॥
द्वौ वा त्र्याद्या दिग्बलयुक्ता यदि जातः
क्ष्माभृद्वंशे भूमिपतिः स्याज्जयशीलः ।
हित्वा मन्दं पञ्चखगा दिग्बलयुक्ता-
श्चत्वारो वा भूपतिरन्यन्वयजोऽपि ॥४॥
*सूर्य के सान्निध्य के कारण ग्रहों की किरणें सूर्य प्रकाश में लय होने
से नहीं दिखाई देती उस दशा में ग्रह को अस्त कहते हैं किन्तु जब ग्रह
सूर्य से दूर होता है तो वह खूब उज्ज्वल भा पूर्ण दिखाई देता है। ऐसा
ग्रह बलवान् होता है ।
सातवाँ अध्याय : राजयोग १६५
यदि जातक राजवंश में उत्पन्न हुआ हो और उसकी कुण्डली में
दो या अधिक ग्रह दिग्बली हों जो वह राजा होता है और सर्वत्र विजय
प्राप्त करता है । सूर्य और मंगल दशम भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होते
हैं । बुध और बृहस्पति प्रथम भाव मध्ध में पूर्ण दिग्बली होते हैं,
चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थ भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होते हैं तथा शनि
सप्तम भाव मध्य में पूर्ण दिग्बली होता है ।
यदि शनि को छोड़कर बाकी ६ ग्रहों में से कोई से पांच दिग्बली
हों या ४ भी दिग्बली हों तो चाहे किसी भी वंश में पैदा हो (यह
ज़रुरी नहीं कि राजा के ही वंश में पैदा हो) तो राजा
होता है ॥ ४ ॥
गणोत्तमे लग्ननवांशकोद्गमे निशाकरश्चापि गणोत्तमेऽपि वा ।
चतुर्ग्रहैश्चन्द्रविवर्जितैस्तदा निरीक्षितः स्यादधमोद्भवो नृपः ॥५॥
यदि लग्न में वर्गोत्तम* नवांश हो और चन्द्रका भी वर्गोत्तम नवांश
हो और लग्न को चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य चार ग्रह देखते
हों तो ऐसा जातक चाहे अधम वंश में भी पैदा हुआ हो राजा हो
जाता है ।॥५॥
श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर की कुंडली नीचे दी जाती है। इनका जन्म
लग्नमीन है और नवांश लग्न भी मीन ही है इस कारण वर्गोत्तमलग्न
हुआ । रेवती नक्षत्र में जन्म होने के कारण मीन राशि का चन्द्रमा
था। और रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म होने के कारण चन्द्रमा
मीन नवांश में था । अतः चन्द्रमा भी वर्गोत्तम हुआ । लग्नेश बृहस्पति
*जो राशि हो वही नवांश भी हो तो वर्गोत्तम कहलाता है । जैसे
मेष राशि मेष नवांश वर्गोत्तम । वृषभ राशि, वृषभ नवांश वर्गोत्तम, मिथुन
राशि, मिथुन नवांश वर्गोत्तम इत्यादि ।
१६६ फलदीपिका
लग्न तथा चन्द्रमा को पूर्ण दृष्टि से देखता है। उपर्युक्त श्लोक के
अनुसार चार ग्रह तो लग्न को पूर्ण दृष्टि से नहीं देखते किन्तु जितनी
सी मात्रा में यह योग घटित होता है—उससे कहीं अधिक उच्च पदवी
उन्होंने प्राप्त की। सूर्य तथा बृहस्पति का उच्चराशि में होना भी राज
योग में सहायक हुआ। इनका जन्म ७ मई सन् १८६१ को प्रातः ४
बजकर २ मिनट पर हुआ था।
[लग्न कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१): सू., शु., बु. | भाव ३ (वृष/२) | भाव ४ (मिथुन/३): मं., के. | भाव ५ (कर्क/४): बृ. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७) | भाव ९ (वृश्चिक/८): श. | भाव १० (धनु/९): रा. | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११)]
[नवांश कुण्डली: भाव १ (मीन/१२): चं. | भाव २ (मेष/१) | भाव ३ (वृष/२): के. | भाव ४ (मिथुन/३): बु. | भाव ५ (कर्क/४): श. | भाव ६ (सिंह/५) | भाव ७ (कन्या/६) | भाव ८ (तुला/७): मं., शु. | भाव ९ (वृश्चिक/८): रा. | भाव १० (धनु/९) | भाव ११ (मकर/१०) | भाव १२ (कुम्भ/११): बृ.]
नवांश में बुध और शुक्र स्वनवांश में हैं।
विलग्नेशः केन्द्रे यदि तपसि वर्गोत्तमगतः
स्वतुङ्गे स्वक्षेत्रे वा गुरुपतिरपि स्याद्यदि तथा ।
गजस्कन्धे कार्तस्वरकृतविमानेऽतिसुषमे ।
सुखासीनं भूपं जनयति लसच्चामरयुगम् ॥१६॥
यदि लग्नेश १-४-७-९-१० इन भावों में से किसी में वर्गोत्तम हो
कर पड़ा हो और नवें स्थान का स्वामी अपनी स्वराशि या उच्च-
राशि में वर्गोत्तम होकर केन्द्र या नवम में हो तो अत्यन्त वैभवशाली राजा
होता है, जो हाथी के कन्धे पर रखे हुए सोने के सुन्दर विमान में चलता
है और जिसमें दोनों ओर चंवर हिलते रहते हैं । ॥१६॥
or ्र? In the image, under ग, there is a distinct loop curling to the left: ृ. But wait, is there a repha? Yes, र्गृ. Wait, could it be भृगुर्ग्रहेन्द्रै-? If a font has र्ग्र, the ्र is a diagonal stroke, not a loop. Here it has a loop. However, whether it's भृगुर्गृहेन्द्रै- or भृगुर्ग्रहेन्द्रै-, let's look closely at गृहेन्द्रै. In line 16, look at नीचार्योर्गृहमपहाय vs नीचार्योर्गुहमपहाय.
- Wait! In line 16, look at
नीचार्योर्गृहमपहाय:
Does the letter afterर्योhave a repha?
Look at the top horizontal bar: there is a repha hook above the bar:र्!
Wait, what's onर्यो? Just the matraो. No dot! The speck is just noise or the top ofो.
Under the bar:ग.
Belowग: there is a ृ loop!
Wait, why doesनीचार्योर्गृlook so similar toभृगुर्गृ?
Because both haveर्गृ!
In line 14:भृगुर्गृहेन्द्रै-->
१६८ फलदीपिका
या नीच राशि नहीं होनी चाहिये) तो ऐसा व्यक्ति राजा
होता है । ॥८॥
भौमश्चेदजहरिचापलग्नसंस्थः
पृथ्वीशं कलयति मित्रखेटदृष्टः ।
कर्मेशो नवमगतश्च भाग्यनाथो
मध्यस्थो भवति नृपो जनैः प्रशस्तः ॥९॥
(क) यदि मंगल, मेष, सिंह या धनु राशि में स्थित होकर लग्न
में हो और उसको मित्र ग्रह देखता हो तो मनुष्य राजा होता है ।
(ख) यदि दशम स्थान का स्वामी नवम भाव में स्थित हो और
नवम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है
और सब उसकी प्रशंसा करते हैं। तात्पर्य यह है कि यह योग प्रबल-
राजयोग कारक है । ॥९॥
चापार्द्धे भगवान् सहस्रकिरणस्तत्रैव ताराधिपो
लग्ने भानुसुतेऽतिवीर्यसहितः स्वोच्चे च भूनन्दनः ।
यद्येवं भवति क्षितेरधिपतिः संश्रुत्य दूरं भयात्
त्रस्ता एव नमन्ति तस्य रिपवो दग्धाः प्रतापाग्निना ॥१०॥
यदि धनु राशि के आधे में (पन्द्रह अंश तक) सूर्य हो और वहीं
चन्द्रमा हो और लग्न में शनि* हो तथा अति बलवान् मंगल उच्च
- मन्मेश्वर महाराज ने यहां नहीं लिखा है किन्तु अन्य आचार्यों
के मत से तुला धनु मकर कुम्भ और मीन इन पांच राशियों में लग्नस्थ
शनिश्चर को प्रशस्त माना गया है ।
सातवाँ अध्याय : राजयोग १६९
राशि में हो तो जातक बड़ा पराक्रमी राजा होता है उसके भय से उसके
शत्रु उसे दूर से ही नमस्कार करते हैं ॥१०॥
सुधामृणालोपमविम्बशोभितः शशी नवांशे नलिनीप्रियस्य
यदि क्षितीशो बहुहस्तिपूर्णः शुभाश्च केन्द्रेषु न पापयुक्ताः ॥११॥
यदि अमृत या मृणाल के समान सफेद पूर्ण विम्ब वाला (पूर्णिमा
के आस पास का) चन्द्र सिंह नवांश में हो और शुभ ग्रह (पाप ग्रहों
से संयुत नहीं होने चाहिये) केन्द्र में हों तो ऐसा जातक राजा होता है
और उसके बहुत से हाथी होते हैं ॥११॥
नीचारिवर्गरहितैर्विहगैस्त्रिभिस्तु
स्वांशोपगैर्बलयुतैः शुभदृष्टिजुष्टैः ।
गोक्षीरशङ्खधवलोमृगलाञ्छनश्च
स्याद्यस्य जन्मनि स भूमिपतिर्जितारिः ॥१२॥
यदि चन्द्रमा गाय के दूध या शंख के समान उज्ज्वल कान्ति वाला
हो (पक्ष बली हो) और तीन और ग्रह (चन्द्रमा मिलाकर चार)
बलवान् होकर अपने-अपने अंशो में हो। नीच राशि या नीच वर्ग में
न हों, शत्रु राशि या शत्रु वर्ग में न हों और उनको शुभ ग्रह देखते
हों तो ऐसा व्यक्ति भूमिपति होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त
करता है। ॥१२॥*
कुमुदगहनबन्धुं श्रेष्ठमंशं प्रपन्नं
यदि बलसमुपेतः पश्यति व्योमचारी ।
उदयभवनसंस्थः पापसंज्ञो न चैवं
भवति मनुजनाथः सार्वभौमः सुदेहः ॥१३॥
- कुछ लोगों के मत से चन्द्रमा लग्न में होना चाहिये ।
१७० फलदीपिका
यदि लग्न में कोई पाप ग्रह न हो, और चन्द्रमा श्रेष्ठ* अंश में हो
और चन्द्रमा को बलवान् ग्रह देखता हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला,
सर्व भूमि पर अधिकार वाला राजा होता है ॥१३॥
जीवो बुधो भृगुसुतोऽथ निशाकरो वा
धर्मे विशुद्धतनवः स्फूटरश्मिजालाः ।
मित्रैर्निरीक्षितयुता यदि सूतिकाले
कुर्वन्ति देवसदृशं नृपतिं महान्तम् ॥१४॥
बृहस्पति, बुध, शुक्र या चन्द्रमा--अस्त न हों और विशुद्ध शरीर
वाले होकर नवम भाव में बैठे हों (मूल श्लोक में धर्मे शब्द आया
है। नवम भाव से धर्म का विचार किया जाता है इसलिये धर्म स्थान
का अर्थ हुआ लग्न से नवम स्थान) और मित्र ग्रहों से युत या
वीक्षित हों तो जातक महान् राजा होता है। और उसकी प्रजा उसे
देवता के सदृश मानती है। मूल श्लोक में विशुद्धतनु शब्द आया है
इसका शब्दार्थ हुआ विशुद्ध शरीर वाला। ग्रह को विशुद्ध शरीर वाला
कब और कैसे समझा जाय ? जब वह पाप ग्रह या शत्रु की राशि
या नवांश में न हो और पाप ग्रहों से युत या वीक्षित न हो, उच्च
राशि, नवांश आदि में स्थित ग्रह—उस पर शुभ दृष्टि होने से
विशुद्धतनु कहेंगे। जिस ग्रह पिंड में दोष न हो वह विशुद्ध हुआ।
जिन कारणों से ग्रह निकृष्ट समझा जाय, वे उसके दोष समझे
जाते हैं ॥१४॥
- श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने श्रेष्ठ अंश का अर्थ किया है—उत्तम
वर्ग। कोई ग्रह तीन अधि मित्र वर्गों में हो तो उसे उत्तम वर्ग कहते
हैं। परन्तु मान्य ज्योतिषियों का सम्प्रदाय यह है कि स्व राशि,
स्वद्रेष्काण, स्वनवांश होने पर ही उत्तम वर्ग होता है।
सातवाँ अध्याय : राजयोग १७१
शुक्रेज्यौ सवितुः शिशुस्तिमियुगे स्वोच्चे च पूर्णः शशी
दृष्टस्तीव्रविलोचनेन दिनकृन्मेषोदयेऽसौ नृपः ।
सेनायाश्चलनेन रेणुपटलैर्यस्य प्रविष्टे रवा-
वस्तभ्रान्तिसमाकुला कमलिनी संकोचमागच्छति ॥१५॥
शुक्र, बृहस्पति और शनि मीन राशि में हों, चन्द्रमा पूर्ण हो (पूर्णिमा
का) और अपनी उच्च राशि में हो, सूर्य को मंगल देखता हो और
मेष लग्न हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत बड़ा राजा होता है। जिसकी
सेना के चलने के कारण इतनी धूल उड़ती है कि दिन में भी संध्या
की भ्रान्ति होने से कमलिनी संकोच को प्राप्त हो जाती है। ॥१५॥
नीचारिस्थैर्भवभवनगैः षष्ठदुश्चिक्यगैर्वा ।
सौम्यैः स्वोच्चं परममुपगतैर्निर्मलैः केन्द्रगैर्वा ।
आज्ञां याते शिशिरकिरणे कर्कटस्थे निशाया-
मेकच्छत्रं त्रिभुवनमिदं यस्य स क्षत्रियेश
१७२ फलदीपिका
यदि पूर्णिमा का चन्द्र वर्गोत्तमांश में हो तो केवल एक इसी योग
से मनुष्य महा प्रतापशाली राजा होता है, जिसकी सेना के घोड़ों के
खुरों से उड़ी हुई धूलि सूर्य को ऐसा म्लान कर देती है कि सूर्य प्रातः
कालीन चन्द्र सा नज़र आता है।
केन्द्रगौ यदि च जीवशशाङ्कौ
यस्य जन्मनि च भार्गवदृष्टौ ।
भूपतिर्भवति सोऽतुलकीर्ति
र्नीचगो यदि न कश्चिदिह स्यात् ॥१८॥
यदि जन्म के समय बृहस्पति और चन्द्रमा केन्द्र में हों और उनको
शुक्र देखता हो और कोई ग्रह नीच राशि में न हो तो मनुष्य अतुलकीर्ति
वाला राजा होता है । ॥१८॥
जलचरराशिनवांशक इन्दुस्तनुभवने शुभदस्वकवर्गे ।
अशुभकरः खलु कण्टकहीनो भवति नृपो बहुवारणनाथः॥१९॥
यदि चन्द्रमा जलचर राशि और नवांश में स्थित होकर लग्न
में अपने वर्ग में या शुभ ग्रह के वर्ग में हो और कोई पाप ग्रह केन्द्र
में न हो तो मनुष्य राजा होता है और बहुत हाथी उसके पास होते
हैं । ॥१९॥
शुक्लो जीवनिरीक्षितो वितनुते भूपोद्भवं भूपति
देवेड्यो मृगभं विहाय तनुगो मत्तेभयुक्तं नृपम् ।
केन्द्रे जन्मपतिर्बलाधिकयुतः कुर्याद्धरित्रीपतिं
दृष्टे वाक्पतिना बुधे दधति पृथ्वीशाश्च तच्छासनम् ॥२०॥
सातवाँ अध्याय : राजयोग १७३
इस श्लोक में चार योग बताए हैं । चारों पृथक्-पृथक् हैं(क) यदि
जातक राजवंश में उत्पन्न हुआ हो और शुक्र को बृहस्पति देखता हो
तो मनुष्य राजा होता है। (ख) यदि मकर राशि के अलावा अन्य
किसी राशि में स्थित होकर बृहस्पति लग्नं में हो तो यह उत्तम
राजयोग है। (ग) यदि लग्नेश* बलवान् होकर केन्द्र में हो तो
यह अकेला प्रबल योग है (घ) जिसकी जन्म कुण्डली में बुध को
बृहस्पति देखता है उसकी सलाह को महाराजा भी मानते हैं । ॥२०॥
एकोप्युच्चक्षेत्रगो मित्रदृष्टः
कुर्याद्भूपं मित्रयोगाद्धनाढ्यम् ।
स्वांशे सूर्ये स्वक्षं गश्चन्द्रमा-
श्चेद्देशाधीशं साश्वनागं विधत्ते ॥२१॥
(क) यदि एक भी ग्रह उच्च राशि में हो और उसको मित्र ग्रह
देखते हों तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है। यदि ऐसा उच्च ग्रह मित्र
ग्रह से युक्त हो तो मनुष्य धनवान होता है।
(ख) यदि सूर्य अपने नवांश में हो और चन्द्रमा कर्क राशि में
हो तो भी उत्तम राजयोग है। यद्यपि मूल श्लोक में सूर्य का अपने
अंश में होना और चन्द्रमा का अपनी राशि में होना ये दो ही बात
कही गई हैं किन्तु सूर्य की राशि भी बलवान् होनी चाहिये और
चन्द्रमा का नवांश भी बलवान् होना चाहिये । ऐसा हम अपने विचार
से समझते हैं। सूर्य और चन्द्रमा इन दो ग्रहों के बलवान् होने से
सारी कुण्डली सुधर जाती है ॥ २१ ॥
*मूल श्लोक में शब्द आया है जन्मपति, इसका बहुत से अर्थ करते
हैं जन्म लग्नेश और बहुत से अर्थ करते हैं जन्म राशि का स्वामी ।
१७४ फलदीपिका
मीने पूर्णज्योतिषि मित्रग्रहदृष्टे चन्द्रे
लोकानन्दकरः स्यान्नृपमुख्यः ।
पूर्णज्योतिः स्वोच्चगतश्चेत्तुहिनांशु-
स्त्यागाधिक्यं सज्जनशस्तं जगदीशम् ॥
(क) यदि चन्द्रमा पूर्ण प्रकाशमान होकर मीन राशि में हो और
इसको मित्र ग्रह देखता हो तो उत्तम राज योग है ।
(ख) यदि चन्द्रमा पूर्ण हो और अपनी उच्चराशि में हो तो ऐसा
व्यक्ति बहुत उदार होता है और उसकी सज्जन लोग बहुत प्रशंसा
करते हैं; वह एक उत्तम राज योग है । ॥२२॥
चन्द्रेऽधिमित्रांशगते सुदृष्टे शुक्रेण लक्ष्मीसहितो नृपः स्यात्
तथा स्थिते वासवमन्त्रिदृष्टे पूर्णां धरित्रीं परिपालयेत्सः ॥२३॥
(क) यदि चन्द्रमा अपने अधिमित्र के अंश में हो और उस पर
शुक्र की दृष्टि हो तो लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ उत्तम राज योग
होता है ।
(ख) ऊपर (क) में जो योग बताया गया है उसके साथ-साथ
यदि चन्द्रमा पर बृहस्पति की भी दृष्टि हो तो राजा हो।* ॥२३॥
*वराहमिहिर के मत से यदि दिन में जन्म हो और अपने या
अधिमित्र अंश में स्थित चन्द्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो राजयोग
होता है और यदि रात्रि में जन्म हो और अपने या अधिमित्र अंश में
स्थित चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि हो तो विशेष वैभव होता है।
सातवाँ अध्याय : राजयोग १७५
पापास्त्रिशत्रुभवगा यदि जन्मनाथा-
ल्लग्नाद्धने कुजबुधौ हिबुकेऽर्कशुक्रौ ।
कर्मायलग्नसहिताः कुजमन्दजीवा-
स्तज्ज्ञा वदन्ति चतुरस्त्विह राजयोगान् ॥२४॥
(क) इस श्लोक में चार राज योग बताये गये हैं। यदि जन्म
नाथ से ३, ६ और ११वें स्थान में पाप ग्रह हों।
(ख) मंगल और बुध लग्न से दूसरे स्थान में हों
(ग) सूर्य और शुक्र लग्न से चौथे हों ।
(घ) मंगल, बृहस्पति और शनि क्रमशः दशम में, लग्न में और
एकादश में हों तो यह उत्तम राजयोग होते हैं । मूल श्लोक के प्रथम
चरण में जन्मनाथ शब्द आया है अर्थात् जन्म नाथ से । बहुत से लोग
इसका अर्थ लग्नेश करते हैं और बहुत से लोगों के मतानुसार
जन्मनाथ का अर्थ होता है—जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि
में हो उसका स्वामी । हमारे विचार से द्वितीय अर्थ विशेष
उपयुक्त हैं ।
इस श्लोक का तृतीय चरण है “कर्मायलग्न सहिताः कुजमन्दजीवाः”
इसका अर्थ हुआ दशम, एकादश और लग्न में मंगल, शनि, बृहस्पति
हों। यद्यपि मूल श्लोक में क्रमशः यह शब्द नहीं है। परन्तु हमारे
विचार से मंगल दशम में दिग्बली होता है। बृहस्पति लग्न में दिग्बली
होता है और शनि लाभ स्थान में प्रशस्त माना जाता है । इस कारण
१०, ११ और १ में क्रमशः मंगल, शनि और बृहस्पति हों यह अर्थ
विशेष उत्तम होगा । ॥२४॥
लाभेशधर्मेशधनेश्वराणामेकोऽपि चन्द्रग्रहकेन्द्रवर्ती ।
स्वपुत्रलाभाधिपतिर्गुरुश्चेदखण्डसाम्राज्यपतित्वमेति ॥२५॥
१७६ फलदीपिका
यदि (क) द्वितीय, नवम और एकादश इन तीनों के स्वामियों
में से एक भी ग्रह चन्द्रमा से केन्द्र में हो और (ख) द्वितीय, पञ्चम
और एकादश इनमें से किसी का मालिक बृहस्पति हो—यह दोनों बातें
घटित होती हों तो उत्तम राजयोग होता है। ॥२५॥
नीचभंग राजयोग
नीचस्थितो जन्मनि यो ग्रहः स्यात्तद्राशिनाथोऽपि तदुच्चनाथः ।
स चन्द्रलग्नाद्यदि केन्द्रवर्ती राजा भवेद्धार्मिकचक्रवर्ती ॥२६॥
जन्म कुण्डली में किसी ग्रह का नीच राशि में स्थित होना ख़राब
योग माना गया है। किन्तु कभी-कभी ग्रह नीच राशि में स्थित
होकर भी बहुत उत्तम प्रभाव दिखाते हैं अर्थात् उनके नीच होने का
जो दोष है वह भंग हो जाता है--और वह फ़ायदेमन्द साबित होते
हैं। ऐसा कब होता है ? यह नीचे के पांच श्लोकों में बताया
गया है।
यदि किसी के जन्म के समय कोई ग्रह नीच राशि में
पड़ा हो और (क) इस नीच राशि का स्वामी चन्द्रमा से केन्द्र में हो
और (ख) जो ग्रह नीच है और उसका उच्चनाथ भी चन्द्रमा से केन्द्र
में हो तो नीच भंग हो जाता है बल्कि उत्तम राज योग बनाता है।
यह समस्त एक योग है। उच्चनाथ शब्द का क्या अर्थ ? इसके अर्थ
में मतभेद है; मान लीजिये शनि मेष राशि का नीच का है। इसका
उच्चनाथ कौन हुआ ? एक मत तो यह कि शनि तुला राशि का
उच्च का होता है और तुला का स्वामी शुक्र होता है इस कारण
उच्चनाथ शुक्र हुआ। दूसरा मत यह है कि शनि मेष राशि में है
और मेष में सूर्य उच्च का होता है इस कारण उच्चनाथ सूर्य हुआ।
हमारे विचार से पहला अर्थ विशेष उपयुक्त है। सूर्य का उच्चनाथ
मंगल, चन्द्रमा का उच्चनाथ शुक्र, बुध का उच्चनाथ बुध, बृहस्पति
सातवाँ अध्याय : राजयोग १७७
का उच्चनाथ चन्द्रमा, शुक्र का उच्चनाथ बृहस्पति और शनि का
उच्चनाथ शुक्र जैसा ऊपर समझाया गया है।
ऊपर नीचभंग होने के लिये (क) और (ख) दो शर्तें बताई गई
हैं। जब दोनों ही पूरी होंगी तब ही नीच भंग होगा। अब नीच भंग
का एक अन्य योग बताते हैं। ॥२६॥
एक टीकाकार इस श्लोक का अय करते हैं कि (i) जो ग्रह
नीच राशि में हो उसका स्वामी लग्न से केन्द्र में हों या (ii) जो
नीच राशि में ग्रह है उसका स्वामी चन्द्रमा से केन्द्र में हो (iii)
या जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ लग्न से केन्द्र में हो या
(iv) जो ग्रह नीच राशि में है उसका उच्चनाथ चन्द्रमा से केन्द्र में
हो—इन चारों परिस्थितियों में नीच भंग हो जावेगा। परन्तु हम इस
अर्थ से सहमत नहीं हैं क्योंकि मूल संस्कृत श्लोक में 'अपि' शब्द
आया है जिस का अर्थ है कि जो ग्रह नीच राशि में है उसका स्वामी
और उसका उच्चनाथ भी-अर्थात् दोनों, केवल एक नहीं।
इसी प्रकार मूल श्लोक में लिखा है 'चन्द्रलग्नात्' जिसका श्री सुब्रह्मण्य
शास्त्री ने अर्थ किया है 'चन्द्रमा से या लग्न से' परन्तु यदि दोनों से
अभिप्राय होता तो मूल संस्कृत में 'चन्द्रलग्नात्' यह पञ्चमी का एक
वचन नहीं आता। चन्द्र लग्नात् का अर्थ है चन्द्रलग्न से अर्थात् चन्द्रमा
जिस राशि में है उससे। यदि इस श्लोक में दी गई चार शर्तों को
अलग-अलग चार योग मान लेंगे तब तो प्रायः सभी नीच ग्रहों का
भंग हो जावेगा क्योंकि जो ग्रह नीच राशि का है उसका स्वामी यदि
लग्न से केन्द्र में हो (चार घर इसके अन्तर्गत आ गये) या चन्द्रमा
से केन्द्र में हो (चार घर इस परिभाषा में आ गये) या उच्चनाथ लग्न
से केन्द्र में हो (चार घर इसमें आ गये) या चन्द्र से केन्द्र में हो
(चार घर इसमें आ गये) इस प्रकार १६ निर्दिष्ट स्थानों में से कहीं
न कहीं आ जावेगा ही। परन्तु आगे २९वें श्लोक में यही कहा है।
१७८ फलदीपिका
एक टीकाकार यह भी अर्थ करते हैं कि यदि कोई ग्रह नीच राशि
में हो और उस नीच राशि का स्वामी या उस नीच ग्रह का उच्चनाथ
उस नीच ग्रह से केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है।
यद्येको नीचगतस्तद्राश्यधिपस्तदुच्चपः केन्द्रे ।
यस्य स तु चक्रवर्ती समस्तभूपालवन्द्यांघ्रिः ॥२७॥
यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो तो (क) उस नीच राशि का
स्वामी और जो ग्रह नीच का है उसका उच्चनाथ यदि दोनों परस्पर
केन्द्र में हों तो नीच भंग राजयोग होता है। यहां भी उच्चनाथ के
दो अर्थ हो सकते हैं परन्तु हम यही अर्थ लेंगे कि नीच ग्रह जिस
राशि में उच्च होता है उस राशि का स्वामी उच्चप या उच्चनाथ
कहलावेगा ॥२७॥
यस्मिन्त्राशौ वर्तते खेचरस्तद्राशीशेन प्रेक्षितश्चेत्स खेटः ।
क्षोणीपालं कीर्तिमन्तं विदध्यात् सुस्थानश्चेत्किंपुनः पार्थिवेन्द्रः ॥
एक अन्य नीच भग राजयोग बताते हैं। जिस राशि में नीच ग्रह
हो उस राशि का स्वामी यदि नीच ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखता हो
तो नीच भंग राज योग होता है। यदि यह नीच ग्रह ६-८-१२
दुःस्थान में हो तो इतना अच्छा राजयोग नहीं होगा किन्तु यदि सुस्थान
में हो तो बहुत उत्तम नीचभंग राजयोग बनता है ॥२८॥
*श्लोक २७ का एक अन्य अर्थ भी हो सकता है। वह यह है कि
यदि कोई ग्रह नीच हो तो उस नीच राशि के स्वामी का जो उच्चनाथ
है वह उच्चनाथ यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राजयोग होता है,
उदाहरण के लिये किसी की कुण्डली में सूर्य नीच राशि का है,
तुलाराशि नाथ शुक्र है। शुक्र उच्च होता है मीन में। मीन का स्वामी
हुआ बृहस्पति, यह बृहस्पति यदि केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग
हुआ।