फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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यदि लग्न में कोई पाप ग्रह न हो, और चन्द्रमा श्रेष्ठ* अंश में हो
और चन्द्रमा को बलवान् ग्रह देखता हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला,
सर्व भूमि पर अधिकार वाला राजा होता है ॥१३॥
जीवो बुधो भृगुसुतोऽथ निशाकरो वा
धर्मे विशुद्धतनवः स्फूटरश्मिजालाः ।
मित्रैर्निरीक्षितयुता यदि सूतिकाले
कुर्वन्ति देवसदृशं नृपतिं महान्तम् ॥१४॥
बृहस्पति, बुध, शुक्र या चन्द्रमा--अस्त न हों और विशुद्ध शरीर
वाले होकर नवम भाव में बैठे हों (मूल श्लोक में धर्मे शब्द आया
है। नवम भाव से धर्म का विचार किया जाता है इसलिये धर्म स्थान
का अर्थ हुआ लग्न से नवम स्थान) और मित्र ग्रहों से युत या
वीक्षित हों तो जातक महान् राजा होता है। और उसकी प्रजा उसे
देवता के सदृश मानती है। मूल श्लोक में विशुद्धतनु शब्द आया है
इसका शब्दार्थ हुआ विशुद्ध शरीर वाला। ग्रह को विशुद्ध शरीर वाला
कब और कैसे समझा जाय ? जब वह पाप ग्रह या शत्रु की राशि
या नवांश में न हो और पाप ग्रहों से युत या वीक्षित न हो, उच्च
राशि, नवांश आदि में स्थित ग्रह—उस पर शुभ दृष्टि होने से
विशुद्धतनु कहेंगे। जिस ग्रह पिंड में दोष न हो वह विशुद्ध हुआ।
जिन कारणों से ग्रह निकृष्ट समझा जाय, वे उसके दोष समझे
जाते हैं ॥१४॥
- श्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने श्रेष्ठ अंश का अर्थ किया है—उत्तम
वर्ग। कोई ग्रह तीन अधि मित्र वर्गों में हो तो उसे उत्तम वर्ग कहते
हैं। परन्तु मान्य ज्योतिषियों का सम्प्रदाय यह है कि स्व राशि,
स्वद्रेष्काण, स्वनवांश होने पर ही उत्तम वर्ग होता है।