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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

२६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
सर्वथा सत्यवचनम् ।।७७।।
सर्वथा सङ्कटेऽपि। यद्वा सर्वदा सहसा सङ्कटमन्तरेत्यर्थः।।७७।।
'सत्यं वद' इस वैदिक विधि वाक्य का ही यह सूत्र प्रतिपादक है।
'सर्वथा' शब्द किसी दशा में भी असत्य बोलने का निषेधक ही है।।७७।।
परदारधनेष्वनासक्ति ।।७८।।
परस्त्री, दूसरे के धन के प्रति उपासक में अनासक्ति अनिवार्यतः
आवश्यक है।।७८।।
स्वस्तुति-परनिन्दा-मर्मविरुद्धवचन-परिहास-धिक्काराक्रोश-
त्रासनवर्जनम् ।।७९।।
स्वस्तुति-परनिन्दे प्रसिद्धे। मर्मवचनं गूढदोषप्रकाशकः शब्दः।
विरुद्धवचनः श्रवणकटुवचः। परिहासो हेलम्। धिक्कारस्तु तुच्छीकरणम्।
आक्रोशो रोदनादिः। त्रासनं परस्य भयजनकम् उक्तानाममीषां वर्जनं
कार्यम् ।।७९।।
अपनी बड़ाई को आत्मश्लाघा कहते हैं। यह अच्छी नहीं मानी जाती।
इसी तरह दूसरे भी शिवरूप ही हैं। अतः किसी की निन्दा उपासक न करे।
मर्मवेधक चुभने वाली बातें होती हैं। ऐसी बात उपासक न बोले। किसी की
हँसी न उड़ाये। किसी को धिक्कृत न करे। किसी को क्रोध में आकर कभी
लोग कोसने लगते हैं और कभी डराते-धमकाते भी हैं। यह सब बुरी बातें हैं।
उपासक धर्म के सर्वथा प्रतिकूल हैं। इनसे बचे।।७९।।
एवं सामयिकधर्मेषु अत्यन्तमावश्यकं मुख्यं धर्ममाह
प्रयत्नेन विद्याऽऽराधनद्वारा पूर्णख्यातिसमावेशनेच्छा चेत्येते
सामयिकाचाराः ।।८०।।
प्रयत्नेन श्रीविद्याराधने न प्राक्प्रपञ्चितामपूर्णख्यातिं व्युदस्य जीवस्य या
स्वतःसिद्धा पूर्णख्यातिः सा प्रकटा भवतीत्याकारिका इच्छा तां सदा कुर्यात्।
एते इच्छान्ता निरूपिता धर्मास्ते सामयिकाः। समये कुलशास्त्रमर्यादायां
वर्त्तमानास्ते कुलशास्त्रप्रतिपादिता उपासकधर्मा इति यावत् ।।८०।।

सर्वसाधारणक्रमः २६९
उपासक को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये। सक्रियतापूर्वक गुरुप्रदत्त
श्रीविद्या की समाराधना में संलग्न रहना उपासक का प्रधान धर्म है। इसके
सम्पादन के माध्यम से सर्वदा पूर्णख्याति समावेश का उत्कट अभिलाष स्वात्म
में उद्वेलित रहना चाहिये। इससे कुलशास्त्र और गुरुपरम्परा की मर्यादा में
अभिवृद्धि होती है। पालनीय धर्म समय कहलाते हैं। समय से सम्बद्ध धर्म
सामयिक धर्म हैं। इनका पालन करना चाहिये।।८०।।
परे च शास्त्रानुशिष्टाः ।।८१।।
ये पूर्वोक्तास्तेभ्यः परे अन्यधर्मास्ते शास्त्रे तन्त्रान्तरेऽनुशिष्टास्तेऽपि
ग्राह्या इति शेषः।।८१।।
पहले सूत्रों में निर्दिष्ट जितने समय धर्मों का निर्देश हैं, इनके अतिरिक्त
भी धर्म के अन्य भेद हैं। उनकी विधियाँ हैं। यहाँ उनका उल्लेख नहीं है।
हाँ, सूत्रकार यह कह रहे हैं कि, शास्त्रों में ये अनुशिष्ट हैं। यहाँ शास्त्रों से
शास्त्रान्तर और तन्त्रान्तर दोनों भाव लिये गये हैं। वे भी ग्राह्य हैं।।८१।।
कुलमार्गनिष्ठप्रशंसा
इत्थं विदित्वा विधिवदनुष्ठितवतः कुलनिष्ठस्य सर्वतः
कृतकृत्यता शरीरत्यागे श्वपचगृहकाश्योर्नन्तरं जीवन्मुक्तः ।।८२।।
इत्थमुक्तप्रकारं विदित्वा सम्यग्विदित्वा विधिवद् यथाशास्त्रम्
अनुष्ठितवतः अनुष्ठानं कुर्वतः कुलनिष्ठस्य कुलमार्गे श्रद्धाभक्तिमतः। सर्वतः
सर्वप्रकारैः कृतकृत्यता। अनुष्ठेयशेषरहितता सम्पन्नेति शेषः। एवं
शरीरस्थितिकाले फलमुक्त्वा देहत्यागेऽपि। फलमाह— शरीरत्याग इति।
एतदनुष्ठातृभिन्नानां काश्यां देहत्यागे मुक्तिः, कीकटे नरकः, पुण्यप्रदेशे
स्वर्गः, इति फलतारतम्यम्। अस्य तु श्वपचः चाण्डालः, तद्गृहकाश्योर्न
किञ्चिदन्तरम्। अत्र हेतुमाह— जीवन्मुक्त इति। यतोऽयं जीवन्नेव मुक्तः।
प्रथमखण्डे श्रुतं फलं दीक्षाया एव। एवं तत्तत्कारणावसाने दर्शितं फलं
तस्य तस्यैव। इदं तु विशिष्टानुष्ठानस्यैव इति बोध्यम्।।८२।।

२७० परशुरामकल्पसूत्रम्
परशुरामकल्पसूत्र की अब तक की विशिष्ट शिक्षाओं की जानकारी साधक
अध्येता प्राप्त करता रहा है। अब इसका पूरा ज्ञान हो गया है। विधिपूर्वक वह
कुलनिष्ठ रहते हुए सारे अनुष्ठान कर रहा है। उसी के फलस्वरूप वह कृतकृत्य
हो गया है। जीवन में उसे शास्त्रानुसार अनुष्ठित करना था, उसका अनुष्ठान
कर वह कृतार्थ हो गया है। उसका जीवन धन्य है। अब वह जीवन्मुक्त हो
गया है। उसे श्वपच गृह और काशी में कोई अन्तर नहीं रह जाता।।८२।।
एवं दशखण्डैर्विहितानुष्ठानकर्त्तारं स्तुत्वा दशखण्डाध्येतारं स्तौति
य इमां दशखण्डीं महोपनिषदं, महात्रैपुरसिद्धान्तसर्वस्वभूता-
मधीते, सः सर्वेषु यज्ञेषु यष्टा भवति। यं यं क्रतुमधीते तेन तेनास्येष्टं
भवति इति हि श्रूयते इत्युपनिषद् इति शिवम्।।८३।।
इमां पूर्वोक्तां दशखण्डीं महोपनिषदं दशखण्डसमुदायात्मिकाम्।
उपनिषदिति ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादकवेदस्य संज्ञा। तत्र ब्रह्मप्रतिपादनं साक्षात्
परम्परया चेति द्विविधम्। तत्र साक्षात्प्रतिपादिका महोपनिषद्। अस्यापि
साक्षात्प्रतिपादकश्रुत्यर्थानुवादकत्वाद् महोपनिषत्त्वमौपचारिकम्।
एतेन केवलब्रह्मप्रापकशास्त्ररूपत्वात् परमपुरुषार्थसाधनमेतदध्ययनमिति
ध्वनितम्। त्रैपुरसिद्धान्तमिति। त्रिभ्यः सृष्टिस्थितिलयेभ्यः पुरा पूर्ववर्तिनी
नित्येति यावत् सा त्रिपुरेति। तदुक्तं त्रैपुरसिद्धान्ते—
त्रिभ्यः पुरा त्रिपुरा त्रिपुरासम्बन्धी त्रैपुरः। स चासौ
सिद्धान्तश्च तस्मिन्।
सर्वस्वभूतां दध्नो नवनीतवत् सारभूतां तां योऽधीते स सर्वयज्ञेषु
गाणपत्यादिपरान्तेषु यज्ञेषु यष्टा भवति। क्रियाननुष्ठानेऽप्यध्ययनमात्रेणैव
तावदनुष्ठानफलं भवतीत्यर्थः। शिवमिति कल्याणवाचि।।८३।।
परशुरामकल्पसूत्र दशखण्डी महोपनिषद् है। उपनिषद् ब्रह्मविद्या को कहते
हैं। उसका साक्षात् और परम्परापूर्वक प्रतिपादन होता है। इसमें पारम्परिक
प्रतिपादन होने के कारण महोपनिषद् संज्ञा औपचारिक है। साक्षात् प्रतिपादन में
महोपनिषद् संज्ञा मुख्य होती है। यह त्रैपुरसिद्धान्त की सर्वस्व है। इसका अध्येता

सर्वसाधारणक्रमः २७१
सर्वयज्ञों का यष्टा माना जाता है, जिससे इसके इष्ट की सिद्धि होती है। यह
परम्परा से श्रुत सत्य है। इससे विश्व का कल्याण हो।।८३।।
खण्डादिपरिपठनम्
अथातः सर्वेषां मन्त्राणाम्, अथ स्वेष्टमन्त्रस्य, इति विधिवत्,
इत्थं साङ्गम्, इयमेव महती विद्या। अथ प्राथमिके चतुरस्रे, अथ
हृच्चक्रस्थिताम्। एवं गणपतिमिष्ट्वा। इत्थं सद्गुरोः, अथातो दीक्षां
व्याख्यास्यामः। अथ, एवम्, अथ, इत्थम्। अथ स्वेष्टेति
पञ्च ।।८४।।
अथातः सर्वेषां मन्त्राणाम्, अथातो दीक्षाम् इत्यनेन खण्डविभागमुक्त्वा
पटलानुक्रमणिकां दर्शयति—अथेत्यारभ्य खण्डद्वयानन्तरं तृतीयखण्डादारभ्य
एवमिति। अथ १. एवं, २. अथ, ३. इत्थं, ४. अथ स्वेष्टम्, ५. एवमेकैकं
पटलं खण्डद्वयात्मकं ज्ञेयम् ।।८४।।
प्रथम पटल—दीक्षाविधि—अथ से प्रारम्भ—अथातो दीक्षां सूत्र में
द्वितीय पटल—गणनायक-पद्धति—इत्थं से प्रारम्भ—इत्थं सद्गुरोः सूत्र में
तृतीय पटल—श्रीक्रम-पद्धति—एवं से प्रारम्भ—एवं गणपतिम् सूत्र में
चतुर्थ पटल—ललिता-क्रम—अथ से प्रारम्भ—अथ हृच्चक्र सूत्र में
पञ्चम पटल—अनावरणपूजा—अथ से प्रारम्भ—अथ प्राथमिके सूत्र में
षष्ठ पटल—श्यामाक्रम—इयम् से प्रारम्भ—इयमेव महती सूत्र में
सप्तम पटल—वाराही-क्रम—इत्थं से प्रारम्भ—इत्थं साङ्गं सूत्र में
अष्टम पटल—पराक्रम—इति से प्रारम्भ—इति विधिवत् सूत्र में
नवम पटल—होम-विधि—अथ से प्रारम्भ—अथ स्वेष्टमन्त्र सूत्र में
दशम पटल—सर्वसाधारणक्रम—अथ से प्रारम्भ—अथातः सर्वेषां सूत्र में।
इस तरह पाँच खण्ड का आकलन, इन प्रारम्भ में प्रयुक्त अव्यय शब्दों
से हो जाता है। १. अथ से प्रथम-द्वितीय, २. एवं से तृतीय-चतुर्थ, ३. अथ
से पञ्चम-षष्ठ, ४. इत्थं से सप्तम-अष्टम और ५. अथ से नवम-दशम। इस

२७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रकार सभी पटलों का एक साथ स्मरण कर इस महोपनिषद् को पूर्णता प्रदान
की गयी है॥८४॥
ग्रन्थकर्त्तारं तद्गुणोत्कर्षं च प्रकटयति
इति श्रीदुष्टक्षत्रियकुलकालान्तकरेणुकागर्भसम्भूतमहादेव-
प्रधानशिष्य-जामदग्न्यश्रीपरशुरामभार्गवमहोपाध्यायमहाकुलाचार्य-
निर्मितं कल्पसूत्रं सम्पूर्णम्॥८५॥
दुष्टेत्यनेन दुष्टनिग्रहपूर्वकधर्मव्यवस्थापकत्वं दर्शितम्। महादेवेत्यनेन
सम्प्रदायप्रवर्त्तकशुद्धिर्दर्शिता। कुलाचार्य इत्यनेन स्वस्य सर्वतन्त्रस्वतन्त्रता
सूचिता। एतैः सर्वविशेषणैः स्वप्रणीतग्रन्थे अप्रामाण्यशङ्काकलङ्कलेशाभावः
सूचितः॥८५॥
सूत्र में दुष्टक्षत्रियकालान्तक विशेषण एक ऐतिहासिक सन्दर्भ को सूचित
करता है। यद्यपि इस श्रीविद्या-साधना की परम्परा में इस विशेषण की कोई
प्रासङ्गिकता नहीं, फिर भी इस उपनिषद् की धर्ममूलकता को ध्यान में रखते
हुए एक धर्मप्रवर्त्तक द्वारा ही यह धर्माङ्ग शास्त्र प्रवर्त्तित है, इसका गर्व लेखक
में होना स्वाभाविक लगता है। अध्येता को भी इस रहस्य से परिचित होना
चाहिये।
भगवान् परशुराम का महत्त्व सूचित करते हुए यह घोषणा करते हैं कि,
मैं रेणुका सदृश विश्वविश्रुता विदुषी ऋषि का पुत्र हूँ। तत्पश्चात् गुरु स्मरण भी
प्रसङ्गसम्मत है। ये भार्गव हैं महोपाध्याय हैं। ये महाकुलाचार्य हैं। इन सद्विशेषणों
से विभूषित भगवान् परशुराम इस महोपनिषद् के रचनाकार हैं। उनकी जय हो।
इति शिवम्॥८५॥
वृत्तिकारपरिचयः
एषोऽपराजितानन्दनाथः श्रीगुरुसेवया।
सम्यन्त्रसूक्ष्मविज्ञानः श्रीदेवीप्रेरितः कृती॥
जामदग्न्यं कल्पसूत्रं व्याचख्यौ गूढभावकम्।
बालानां सुखबोधाय श्रीदेवीप्रीतयेऽपि च।

सर्वसाधारणक्रमः २७३
रचनाकालः -
अग्निबाणाद्रिभूसंख्ये शाके तपसि गीष्पतेः।
वासरे शुक्लपक्षस्य दिन आद्ये निशामुखे।।
अर्पितः श्रीकालिकायामनेन प्रीयतां शिवा।।
।। इति श्रीपण्डितकुलावतंसनिखिलनित्यनैमित्तिकानुष्ठानपुष्टीकृतकलशो-
द्भवाद्युपासकवर्य्यामृतेशानन्दनाथप्रेमपात्रसुब्रह्मण्यतनूद्भवश्रीरामेश्वरविरचिता
सौभाग्योदयसंज्ञिका परशुरामकल्पसूत्र(मुख्यांश)वृत्तिः परिपूर्णा।।
।। इति शिवम्।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का सर्वसाधारणक्रम नामक दशम खण्ड परिपूर्ण ।।१०।।
।। शुभं भूयात् ।।

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CC.0 Digitized by Arya Samaj Foundation, Chennai and eGangotri
Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji

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श्रीजी कम्प्यूटर प्रिण्टर्स, वाराणसी