परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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ISBN : 81-7270-024-5
Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy: Dayanidhi Mishra ji
पृ. ३
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YOGATANTRA-GRANTHAMĀLĀ
[ Vol. 28 ]
PARAŚURĀMAKALPASŪTRA
With the Commentaries
'VṚTTI'
By
ŚRĪ RĀMEŚVARA
'NĪRAKṢĪRAVIVEKA'
By
DR. PARAM HANS MISHRA 'HANS'
FOREWORD BY
PROF. RAMMURTI SHARMA
VICE-CHANCELLOR
EDITED BY
PROF. VIDYA NIWAS MISHRA | DR. PARAM HANS MISHRA
EX-VICE-CHANCELLOR | 'HANS'
Mahātmā Gāndhī Kāśīvidyāpīṭha | A. 36, Badshahbaga
& | Varanasi
Sampurnanand Sanskrit University
Varanasi
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयः
श्रुतम् मे गोपाय
VARANASI
2000
Vidya Niwas Mishra Collection, Varanasi. Courtesy. Dayanidhi Mishra ji
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Research Publication Supervisor— ISBN : 81-7270-024-5
Director, Research Institute
Sampurnanand Sanskrit University
Varanasi.
▢
Published by—
Dr. Harish Chandra Mani Tripathi
Director, Publication Institute
Sampurnanand Sanskrit University
Varanasi-221 002.
▢
Available at—
Sales Department,
Sampurnanand Sanskrit University
Varanasi-221 002.
▢
First Edition, 500 Copies
Price : Rs. 280.00
▢
Printed by—
Shreejee Computer Printers
Nati Imali, Varanasi-221 002
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योगतन्त्र-ग्रन्थमाला
[ २८ ]
श्रीरामेश्वरवृत्तिमुख्यांशसमलङ्कृतम्
परशुरामकल्पसूत्रम्
डॉ० परमहंसमिश्रविरचित'नीरक्षीरविवेक'भाषाभाष्यसंवलितम्
कुलपतेः प्रो. राममूर्तिशर्मणः प्रस्तावनया विभूषितम्
सम्पादकौ
प्रो०विद्यानिवासमिश्रः | डॉ०परमहंसमिश्रः 'हंसः'
कुलपतिचरः | ए. ३६, बादशाहबाग
महात्मागान्धीकाशीविद्यापीठस्य | वाराणसी
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयस्य च
वाराणसी
वाराणस्याम्
२०५७ तमे वैक्रमाब्दे १९२२ तमे शकाब्दे २००० तमे ख्रैस्ताब्दे
अनुसन्धान-प्रकाशन-पर्यवेक्षकः — ISBN : 81-7270-024-5
निदेशकः, अनुसन्धान-संस्थानस्य
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालये
वाराणसी।
☐
प्रकाशकः —
डॉ. हरिश्चन्द्रमणित्रिपाठी
निदेशकः, प्रकाशनसंस्थानस्य
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालये
वाराणसी-२२१००२
☐
प्राप्ति-स्थानम्—
विक्रय-विभागः,
सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयस्य
वाराणसी-२२१००२
☐
प्रथमं संस्करणम् – ५०० प्रतिरूपाणि
मूल्यम् – २८०.०० रूप्यकाणि
☐
मुद्रकः —
श्रीजी कम्प्यूटर प्रिण्टर्स
नाटी इमली, वाराणसी-२२१००२
माननीय मानव संसाधन विकास मन्त्री और प्रसिद्ध चिन्तक
डॉ० मुरली मनोहर जोशी
के कर-कमलों में
विद्यानिवास मिश्र
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प्रस्तावना
भगवान् परशुराम द्वारा प्रणीत 'परशुरामकल्पसूत्र' की प्रस्तावना लिखते
हुए मैंने इस ग्रन्थ का आद्योपान्त आलोडन किया और पाया कि श्रीविद्या की
उपासना का यह रहस्यात्मक महाग्रन्थ उत्तर-भारत की विद्वन्मण्डली में
अध्ययनाध्यापन, चिन्तन-मनन, अर्चना-उपासना से ओझल क्यों होता गया?
यह अपने आप में अनुसन्धान का विषय है। दुरूह एवं सर्वथा ओझल हो चुके
इस श्रीविद्योपासनाविषयक ग्रन्थ का हिन्दी-भाष्य लिखकर स्वतन्त्रता-संग्राम-
सेनानी, श्रीविद्योपासक, तान्त्रिक-साधना-निष्णात पण्डित श्री परमहंस मिश्र ने
पूरे उत्तर-भारत के विद्वानों के लिए एक अनमोल उपहार दिया है। एतदर्थ मैं
उन्हें सादर साधुवाद निवेदित करता हूँ। इसके साथ ही मैं श्रीविद्या के उपासक
एवं इस ग्रन्थ के हिन्दी-भाष्य के उत्प्रेरक विश्वविश्रुत मनीषी 'पद्मभूषण'
आचार्य श्री विद्यानिवास मिश्र जी को भी विनयाञ्जलि अर्पित करता हूँ, जिन्होंने
सारगर्भित 'पुरोवाक्' लिखकर इस ग्रन्थ का गौरव बढ़ाया है एवं पण्डित समाज
में पठन-पाठन से दूर छूटे हुए इस श्रीविद्या-साधना के उपपादक ग्रन्थ का उद्धार
कराया है।
मैं इस मणि-काञ्चन-संयोग की उपपत्ति में इतना ही कहना चाहता हूँ
कि डॉ. परमहंस मिश्र एवं आचार्य श्री विद्यानिवास मिश्र दोनों विभूतियाँ
श्रीविद्या-साधना में दूर तक प्रवेश कर चुकी हैं और इन विभूतियों की इस प्रविष्ट
साधना ने ही इस ग्रन्थ का हिन्दी-भाष्य के साथ सम्पादन कराया है और इस
साधना-पद्धति में निष्णात होने के लिए लाखों-लाख पाठकों को पाथेय दिया
है। पुलकित भाव से मैं इन दोनों विभूतियों के प्रति भूयोभूयः नमोवाकं निवेदित
करता हूँ।
जैसा कि आचार्य श्री विद्यानिवास मिश्र जी ने एवं आचार्य श्री परमहंस
मिश्र जी ने अपने 'पुरोवाक्' तथा 'श्रीविद्योपासनाविमर्श' में पूरी स्थिति स्पष्ट
कर दी है कि चाहे वह त्रैपुर-साधना हो, चाहे वह श्रीविद्या-साधना हो, चाहे
वह षोढ़ा-साधना हो, इन साधनाओं में त्रिपुरसुन्दरी एवं चिन्मय शिव के
( २ )
सामरस्य की साधना ही अभिप्रेत होती है। साधक अपनी प्राणाहुति को हव्य
बनाकर पूरे त्रिविष्टप के प्रतीकभूत त्रैपुर-साधना की प्राणाग्नि को पुष्ट से पुष्टतर
करता है। इस महाभाव को 'श्रीपरशुरामकल्पसूत्र' में ही प्रतीकात्मक रूप में
दर्शाया गया है—
“अथो वाचो ‘ब्लूं झौ’मिति ‘जूंस्ः’ इति चोक्त्वा अमृते अमृतोद्भवे
अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहेति चतुर्थो मन्त्रः”।
(श्रीक्रम - २९, पृ. ९५)
महापण्डित श्री रामेश्वर ने अपनी वृत्ति में इस सूत्र की गम्भीर व्याख्या
करते हुए लिखा है कि साधक जब साधना की चरम भूमिका में त्रिपुरसुन्दरी
एवं परमशिव के निमीलनोन्मीलन में अपनी प्राणाहुति देता है, तो वह अमृतत्व
के सन्निकट पहुँच जाता है। इसी तथ्य का रेखाङ्कन श्रीमद्भगवद्गीता में भी
महायोगी श्रीकृष्ण ने अपनी तेजोदीप्त वाणी में किया है—
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।।
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।।
(श्रीमद्भगवद्गीता - ४।२९-३०)
मैंने बहुत श्रद्धाभाव से इस ग्रन्थ का आलोडन करते हुए यह अनुभव
किया कि चाहे वह अद्वैतोपासना हो, चाहे वह श्रीविद्योपासना हो, चाहे वह
शाक्तोपासना हो, चाहे वह त्रैपुर-साधना हो, सभी के मूल में महात्रिपुरसुन्दरी
एवं भगवान् शिव के सामरस्य की साधना ही भक्त को अमृत एवं अमरता प्रदान
करती है। इसी महाभाव को विवृत करते हुए भगवत्पाद श्री शङ्कराचार्य जी ने
'आनन्दलहरी' में निरूपित किया है—
तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
तवात्मानं वन्दे नवरसमहाताण्डवनटम्।
उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम्।।
(आनन्दलहरी - ४१)
( ३ )
अन्ततः पुनः इस तथ्य का उल्लेख करते हुए मैं अपनी प्रस्तावना का
उपसंहार करता हूँ कि 'पद्मभूषण' आचार्य श्री विद्यानिवास मिश्र एवं
स्वतन्त्रता-संग्राम-सेनानी आचार्य श्री परमहंस मिश्र ने अपनी श्रीविद्या-साधना
की शक्ति से इस दुरूह ग्रन्थ का हिन्दी 'नीरक्षीरविवेक' भाष्य लिखकर सम्पूर्ण
उत्तर-भारत से विलुप्त हो रहे इस ग्रन्थ का उद्धार करते हुए हिन्दीभाषी जगत्
को एक अनुपम साधना-मार्ग दिखाया है, जिससे भगवान् श्रीपरशुराम द्वारा
आविष्कृत श्रीविद्या-साधना में जिज्ञासु निष्णात हो सकें एवं अपने शिष्यों-प्रशिष्यों
को भी उस मार्ग में प्रेरित एवं प्रवर्तित कर सकें। एतदर्थ इन मिश्रद्वयी विभूतियों
के प्रति पुनः अपनी आदराञ्जलि समर्पित करता हूँ।
इस ग्रन्थ के शीघ्र एवं हृदयावर्जक प्रकाशन करने वाले प्रकाशन-
संस्थान के निदेशक डॉ. हरिश्चन्द्र मणि त्रिपाठी को हार्दिक आशीर्वाद प्रदान
करता हूँ एवं प्रकाशन-सहायक श्री कन्हई सिंह कुशवाहा, ईक्ष्यकर्म-प्रवीण
डॉ. हरिवंश कुमार पाण्डेय तथा डॉ. ददन उपाध्याय, श्री अशोक कुमार
शुक्ल एवं श्री अतुल कुमार भाटिया का मङ्गलाभिशंसन करता हूँ। इस ग्रन्थ
के मुद्रक श्रीजी-कम्प्यूटर-प्रिन्टर्स के संचालक श्री अनूप कुमार नागर हमारे
आशीर्वाद के विशेषाधिकारी हैं, जिन्होंने इस ग्रन्थ की प्रकृति के अनुसार इसके
आवरण-पृष्ठ आदि का भी संयोजन एवं मुद्रण किया है।
अन्त में मैं इस ग्रन्थ को सान्नपूर्णा महाशिव भगवान् विश्वेश्वर के कर-
कमलों में समर्पित करते हुए यह प्रार्थना करता हूँ कि श्रीविद्या-उपासना के
आचार्यों एवं उनके शिष्यों तथा भक्तों के लिए यह ग्रन्थ परम श्रेयस्कर हो।
राममूर्ति शर्मा (हस्ताक्षर)
वाराणसी राममूर्ति शर्मा
श्रावणी-पूर्णिमा, वि.सं. २०५७ कुलपति
( १५.८.२००० खैस्ताब्द ) सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय
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पुरोवाक्
श्रीविद्या उपासना के तीन मुख्य आकर ग्रन्थ हैं—परशुरामकल्पसूत्र,
प्रपंचसारतन्त्र और सौन्दर्यलहरी। इनमें प्रपंचसारतन्त्र और सौन्दर्यलहरी आद्य
शंकराचार्य की कृतियाँ हैं। परशुरामकल्पसूत्र इनके पूर्व का है। पूरे आकर ग्रन्थों
का विभाजन श्रीविद्यार्णव नामक ग्रन्थ में किया गया है। पूज्य स्वामी करपात्री
जी ने श्रीविद्यार्णव से ही अपने देश-काल के अनुरूप श्रीविद्यारत्नाकर ग्रन्थ की
रचना की और सम्पादन का भार पूज्य श्री सीताराम कविराज 'जी. को दिया।
श्रीविद्यावरिवस्या इसी का लघु रूप है। परशुरामकल्पसूत्र का महत्त्व केवल
श्रीविद्या का आद्य ग्रन्थ होने के कारण ही नहीं है, इसलिए भी है कि इस
विद्या की गुरु. परम्परा में उनका नाम बहुत ऊपर आता है। एक तरह से वे
श्रीविद्या की उपासना की दो धाराओं को वशिष्ठ द्वारा प्रवर्तित और दुर्वासा द्वारा
प्रवर्तित मिलाकर समग्र धारा के प्रवर्तक माने जाते हैं। जिस रूप में यह ग्रन्थ
है, उसकी प्राचीनता में सन्देह कोई करे भी पर परशुराम के द्वारा प्रवर्तन की
बात सभी श्रीविद्या परम्परा के विद्वानों को मान्य है।
परशुरामकल्पसूत्र का सिद्धान्त त्रैपुर सिद्धान्त कहा जाता है। त्रैपुर सिद्धान्त
का अभिप्राय यह है कि सृष्टि, स्थिति, लय; इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और
क्रियाशक्ति—इन त्रिपुटियों को समेटने वाली त्रिपुर शक्ति है। इसी की अभिव्यक्ति
वामा, ज्येष्ठा और रौद्री रूपों में होती है। इन्हीं को क्रमशः सृष्टि, स्थिति, संहार
भी कह सकते हैं। यही त्रिपुरा शक्ति अपने शुद्ध परात्पर रूप में महात्रिपुरसुन्दरी
शक्ति है। उसी का विलास यह प्रपंच दिखता है, विलीन हो जाता है।
श्रीविद्या साधना मूलतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाशक्ति की शिव
के साथ समरसता की ही साधना है। जिस तत्त्व की साधना है, वह तत्त्व
शिवशक्त्यैक्य रूप है। सिद्धान्त स्तर पर यह गूढ़ तादात्म्य की ही साधना है।
द्वैत से अन्तर केवल इतना है कि, द्वैत कल्पित होते हुए भी श्रीविद्या साधना
में अद्वैत प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है। उपनिषदों में भी यह संकेत है कि,
( २ )
“एकाकी न रमते तदात्मानं व्याकरोत्” अकेले रमना संभव नहीं है, इसलिए
अपने को विभक्त किया। इसलिए यहाँ माया से उद्वेग नहीं है, न माया का
निरसन है, बल्कि माया का अतिक्रमण है। यह अतिक्रमण मायिक मार्गों में
रहते हुए ही होता है। इसलिए अद्वैत में प्रवेश के लिए संसार का त्याग
आवश्यक नहीं है। संसार का संस्कार आवश्यक है। प्रायः यह शंका की जाती
है कि, कैसे दो प्रकार की बातें आदि शंकर कहते हैं। एक ओर संसार का
तिरस्कार, दूसरी ओर संसार का स्वीकार। एक ओर निष्कल परब्रह्म का ध्यान,
दूसरी ओर कामेश्वर-कामेश्वरी के सम्मेलन का ध्यान। पर ध्यान से देखने पर
इसमें विरोध नहीं है। उपासना के लिए द्वैत की परिकल्पना अपरिहार्य है।
उपासना की समाप्ति में समर्पण में द्वैत का भी समर्पण हो जाता है। जो यह
बोध होता है कि, मैं ब्रह्म हूँ, जो कुछ है, वह सब ब्रह्म ही है और यह अनुभव
करने वाला मैं इस ब्रह्म के साथ ऐक्य का अनुभव करने वाला मैं अपने को
आहुति के रूप में सौंप रहा हूँ अर्थात् जिस सर्वात्म भाव का मुझे दर्शन मिला
है, वह दर्शन भी मेरा अकेला न रहे, वह सबका हो जाए। अर्थात् सर्वभाव
का अनुभव करने वाला भी दूसरों को अनुभव हो। इसलिए अपने को अनुभव
की परम्परा में खपा देता है। यही गूढ़ तत्त्व है।
साधक में अहंकार के क्षरण के लिए यह आवश्यक है कि, वह यह अनुभव
करे कि, हमारे पूर्व गुरुओं ने अपने अनुभव को अपने पूर्ववर्ती गुरुओं के अनुभव
के साथ जोड़कर अपने को उसी अनुभव में विलीन कर दिया है। इसलिए मैं
उस कड़ी में जुड़ता हूँ तो स्वयं भी विलीन होने के लिए। इसका उद्देश्य यह
है कि, साधना का अहंकार किसी भी साधक के मन में न रहे। उसको बराबर
अनुभव हो कि, साधना में निरन्तर परिष्कार करते रहने वाली गुरु परम्परा कारक
रही है। जिस प्रकार श्राद्ध करते समय अपने पूर्व की तीन पीढ़ियों को पिण्ड
देते हैं और इसके द्वारा वंश परम्परा की श्रृंखला को अविच्छिन्न रखते हैं, उसी
प्रकार गुरु, परम गुरु (गुरु के गुरु), परमेष्ठि गुरु (गुरु के गुरु के गुरु) इन तीन
गुरुओं की चरण वन्दना की जाती है ताकि विद्या परम्परा की अविच्छिन्नता साधक
तक आए और साधक से उसके आगे जाए। उसका एक यह भी अभिप्राय होता
है कि, पूर्व अनुभवों के साथ जुड़ने पर अपना अनुभव बड़ा भी हो जाता है
और अहंकार का विसर्जन भी होता है।
( ३ )
गुरु पूजा के साथ-साथ ही गणपति पूजा श्रीविद्या का आवश्यक अंग
है। गणपति समष्टि के देवता हैं। समष्टि के साथ जुड़ करके पूजना सम्यक्
पूजा होती है। पाँच तत्त्वों में पृथ्वी तत्त्व के अधिष्ठाता देवता गणपति होते
हैं। इसलिए भी उनकी आराधना की जाती है। उसके साधक का पार्थिव तत्त्व
से सम्बन्ध रहे। इसी पार्थिव तत्त्व को ऊपर उठाना श्रीविद्या का लक्ष्य है।
श्रीविद्या उपासना के चार सोपान हैं— श्रीक्रम, श्यामाक्रम, वाराही-क्रम और
पराक्रम। श्रीक्रम महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना है। श्यामा-क्रम मातंगी या श्यामला
की उपासना है। वाराही-क्रम महात्रिपुरसुन्दरी की दंडिनी दण्डनायक/सेनानायक/
सचिव वाराही शक्ति की उपासना है। पराक्रम अव्यक्त महाशक्ति की
उपासना है।
परशुरामकल्पसूत्र में सभी उपासनाओं का प्रतिपादन है। उसके साथ ही
साथ संक्षेप में सिद्धान्त का भी है। सिद्धान्त पक्ष बहुत स्पष्ट है। विश्व ३६
तत्त्वों वाला है। ये ३६ तत्त्व हैं— शुद्धविद्या, सदाशिव या परमशिव, सांख्य
के तत्त्व प्रकृति, अहंकार, बुद्धि, मन, पंचतन्मात्रा, पंचमहाभूत, दस इन्द्रिय=२४
और पुरुष को लेकर पच्चीस। इनके अतिरिक्त पंच कंचुक कला, अविद्या, राग,
काल, नियति और शिव-शक्ति, सदाशिव, ईश्वर, विद्या और जीव। स्वविमर्श
ही पुरुषार्थ है। वर्णात्मक शब्द नित्य है। मन्त्रों में अचिन्त्य अपार शक्ति है।
सर्वसिद्धि सम्प्रदाय के अनुसार साधना से और विश्वास से प्राप्त होती है। विश्वास
ही प्रमाण है। गुरु मन्त्र, देवता और अपने प्राण की एकता के साधन से
आत्मज्ञान होता है। भावना की दृढ़ता से शक्ति की सिद्धि होती है।
साधना के नियमों में कुछ नियम बहुत आवश्यक हैं। किसी भी दर्शन
की निन्दा नहीं करें। किसी की भी अवहेलना न करें। रहस्य केवल अपने शिष्य
को बतलाएँ। विद्या के साथ अर्थात् अपने मन्त्र के साथ निरन्तर जुड़ाव बनाए
रखें। निरन्तर अपने भीतर शिवता है यह अनुभव करते रहें। काम, क्रोध, लोभ,
मोह, मद, मत्सर, हिंसा, स्तेय, लोक-विद्वेष से बचें। संशयरहित होकर एक
गुरु की ही उपासना करें। परिग्रह त्याग करते रहें, निष्काम कर्म करते रहें।
नित्य कर्म करें अनित्य को छोड़ दें। निर्भय रहें। समस्त सिद्धान्तों का निचोड़
देते हुए परशुरामकल्पसूत्र में कहा गया है कि, यह मानकर के आचरण करें
कि, जितने भी पदार्थ ज्ञेय हैं, वे हव्य हैं, इन्द्रियाँ स्वाहा हैं। शक्तियाँ ज्वाला
( ४ )
हैं। अपने भीतर रहने वाले शिव अग्नि हैं। स्वयं ही साधक होता है। यह इस
प्रकार का ज्ञान निरन्तर हो रहा है। इस यज्ञ का फल है विषयरहित चित् तत्त्व
का विमर्श। इस आत्मलाभ से बढ़कर कोई अन्य लाभ नहीं है।
इस सिद्धान्त की पीठिका देने के बाद परशुरामकल्पसूत्र में दीक्षा का क्रम
आया है। दीक्षा लिए बिना कोई इस विद्या का अधिकारी नहीं रहता है। गुरु
दीक्षा देने के पहले शिष्य की परीक्षा लेता है और उसके बाद उसका मुख
बाँध देता है। उसे सिद्धान्त पक्ष पहले सुनाकर समझाता है। इसके बाद परीक्षा
देता है। दीक्षा के बाद ऊपर लिखित पाँचों क्रमों की पूजा का विधान है।
परशुरामकल्पसूत्र में पंच मकार का विधान है पर साथ ही साथ चेतावनी है
कि, यह अप्रकाश्य है। यदि इसको प्रकट किया गया, तो अगति होगी। एक
प्रकार से व्यवहार की दृष्टि से यह चेतावनी निषेध ही है। इसीलिए श्रीमद् आदि
शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित श्रीविद्या उपासना क्रम में पंच मकारों के पाँच अनुकल्पों
से ही काम चलाया जाता है और जिन-जिन तत्त्वों के ये मकार बोधक हैं उनकी
भावना की जाती है। वस्तुतः ये तत्त्व भी किसी न किसी आभ्यन्तर क्रिया के
प्रतीक मात्र हैं।
परशुरामकल्पसूत्र सूत्रात्मक ग्रन्थ है। इसमें बहुत-सी बातें खोलकर नहीं
कही गयी हैं। उस पर कई टीकाएँ उपलब्ध हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ की रामेश्वर झा
की टीका जो अनावश्यक रूप से विस्तृत का संक्षेप करके उसके अनुसार और
अंशतः शास्त्र की परंपरा के अनुसार पं. परमहंस मिश्र ने व्याख्या की है।
इस व्याख्या के कारण यह ग्रन्थ बहुत सुगम हो गया है। यह एक प्रकार से
प्रथम समग्र हिन्दी व्याख्या है। मिश्र जी स्वयं न केवल तन्त्रशास्त्र के अध्येता
हैं बल्कि एक नैष्ठिक साधक भी हैं। इसलिए मैंने उन्हें व्याख्या के लिए प्रेरित
किया। वे तन्त्रालोक पर विस्तृत व्याख्या लिख चुके हैं। वे सर्वथा अधिकारी
हैं, इसीलिए मैंने उनसे अनुरोध किया था। उन्होंने बड़ी तत्परता से इस काम
को सम्पन्न किया। इसके लिए वे जिज्ञासु पंडित समाज के बधाई के पात्र हैं।
श्रीविद्या उपासना बाह्य अर्चन नहीं है। बाह्य अर्चन को सोपान बनाकर
आभ्यन्तर अर्चन में प्रवेश पर ही विशेष बल दिया जाता है। श्रीविद्या का तात्पर्य
ही यह है कि, सर्वमय होकर सर्वात्मिका पराशक्ति की अपने भीतर भावना करे
और इस भावना के द्वारा समस्त ब्रह्माण्ड में समरसता का विकिरण करे।
(५)
इसीलिए इसके आचार में किसी मत की निन्दा, छोटे से छोटे व्यक्ति या पदार्थ
की अवहेलना विशेष रूप से वर्जित है। विशेष करके स्त्री मात्र को आदर देना
और यह सब इसी का सूचक है कि, श्रीविद्या विरोधों के उपशम का अभ्यास
है और जीवन को स्वीकार बनाने का अभ्यास है। बाह्य पूजा इसलिए आवश्यक
है कि, इसके अभ्यास से बाह्य संसार का दिव्य रूपान्तरण होता रहता है। यह
भावना करना कि, समस्त पदार्थ चिन्मय हैं। वस्तु को वस्तु मात्र नहीं रहने
देती और साधक के मन में जैसा भी संसार है, उसको स्वीकार करते हुए उसको
चिन्मय बनाने के लिए प्रेरित करती है। यह अपने आप में इस विद्या की सबसे
बड़ी विशेषता है। इसके भीतर जैसे-जैसे प्रवेश करते हैं, त्यों त्यों अपार परितोष
का अनुभव होने लगता है। इसके साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के यन्त्रों की
रचना से एक आध्यात्मिक राग-बोध होता है। यह राग-बोध अर्चन के क्रम
में अर्चन सामग्री की तैयारी में और अर्चन के अन्त में एकाग्र होकर जल में
और अन्त में इन सबके समर्पण में परिलक्षित होता है। परशुरामकल्पसूत्र
शिवशक्त्यैक्यरूपिणी भगवती ललिता महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना का आधार
ग्रन्थ है। मुझे विश्वास है कि, परशुरामकल्पसूत्र की आचार्य पं. परमहंस मिश्र
द्वारा प्रस्तुत व्याख्या विद्या-प्रेमियों के लिए बड़ी उपकारक होगी।
श्रीविद्या के उपासकों से अपेक्षा की जाती है कि, वे अपने आचरण में
सर्वात्म भाव का ही परिचय दें और भगवती की उपासना इस बुद्धि से करें
कि, इस उपासना के फल के सभी साझेदार हों। वे चाहे उपासना करते हों,
न करते हों या उसका विरोध करते हों। पर सभी प्रपंच के अंग में और सब
में उस शक्ति की व्यापकता की अनुभूति हो। इसीलिए उपासना की जाती है।
यह अपने आप में परम सुख है। अपने आप में परामुक्ति है।
अन्त में वरिवस्या, सपर्या, पूजा और अर्चना इन चार शब्दों पर थोड़ा
विचार देना आवश्यक समझता हूँ। वरिवस्या शब्द का प्रयोग तान्त्रिक साधना
में विशेष रूप से हुआ है। वेदों में वरिवस का अर्थ है खुला स्थान, अवकाश,
ऐसा स्थान जो ठीक-ठाक करके किसी के लिए तैयार किया गया हो। उससे
नामधातु बनायेंगे तो उसका अर्थ यह होगा कि, अपने इष्ट के लिए स्थान
बनाना। उनको प्रतिष्ठित करने के लिए उचित आसन् देना। तान्त्रिक पूजा की
विशेषता यही है कि वहाँ पहले पूजा सामग्री के लिए, पूजा पात्र के लिए,
( ६ )
देवता के लिए स्थान बनाना होता है। जड़ता के वितान में कहीं एक चिन्मय
स्थान बनाना। पूजा का अभिप्राय ही यह है कि, चिन्मय पदार्थों से चिन्मयी
की पूजा हो। अपने शरीर के प्रत्येक अवयव को चिन्मय बनाना होता है
क्योंकि शरीर का प्रत्येक अवयव तभी अर्पणीय होता है जब देवी से एकाकार
हो जाए। सपर्या शब्द दूसरा है। यह सत्कार मात्र के लिए प्रयुक्त होता है।
इसकी व्युत्पत्ति तो नहीं मिलती लेकिन मेरे अनुभव से संस्कृत में विरल धातु
है स्पृणाति। उससे स्पर् या सपर निकला हो और उससे यह शब्द बना हो,
सपर्या। अथवा इसका अर्थ भी उच्छ्वसित होना है, उच्छ्वसित करना है।
किसी भी व्यक्ति या इष्ट के सत्कार के लिए उमगना और उस व्यक्ति या इष्ट
देवता का उमंग के वातावरण में आहूत करना सपर्या है। सपर्या का एक अर्थ
तैयारी भी है, जो लोक-भाषा के सपरने अर्थ में आज भी जीवित है। तीसरा
शब्द है पूजा। यह प्रत्यक्ष या कल्पना में ध्यात द्रव्यों का इष्ट देवता के लिए
निवेदन करना है। यह सत्कार का पूरक है। अर्चना इसी अनुभाव्य रूप की
होती है। चाहे श्रीचक्र हो, मूर्ति हो। इसीलिए अर्चा का एक अर्थ विग्रह भी
होता है। इसका अर्थ किसी मूर्ति या किसी यन्त्र पर कुछ चढ़ाना भी होता
है। इतनी बात मैंने केवल सूचना देने के लिए जोड़ी है क्योंकि प्रायः इन शब्दों
के सूक्ष्म भेद की चर्चा नहीं मिलती। परशुरामकल्पसूत्र का यह संस्करण
प्रकाशित हो रहा हैं इससे मुझे बहुत परितोष है और इसलिए मैं पण्डित जी
को हार्दिक साधुवाद देता हूँ।
विद्यानिवास मिश्र
श्रीविद्योपासनाविमर्श
समस्त आगमों में श्रीविद्या का प्राधान्य पूर्णरूप से स्वीकृत है। वेदविद्या
में विज्ञ विचक्षण विद्वानों की तो यह मान्यता ही है कि, वेदमाता गायत्री भी
श्रीविद्या की अंश मात्र हैं। गायत्री ब्रह्मविद्यारूपिणी है। श्रीविद्या की पञ्चदशी विद्या
से ब्रह्मविद्या का पूर्णतया प्रतिपादन हो जाता है। श्रीविद्यारत्नाकर में श्री करपात्री
जी महाराज ने पंचदशी और गायत्री मन्त्र की एकता का ही प्रतिपादन किया
है। इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि, श्रीविद्योपासक की गायत्री उपासना भी
श्रीविद्या साधना में साथ-साथ सम्पन्न हो रही है, यह इन दोनों के इस शाश्वत
सम्बन्ध का रहस्य है।
इस दृष्टि से यह भी कहा जा सकता है कि, वेदमाता गायत्री की उपासना
के प्रभाव से आगमोक्त श्रीविद्या में प्रवृत्ति होने के कारण वेद और आगमिक
ज्ञान का एकाधिकरण सम्बन्ध उपासना पर ही आधृत है और दोनों वेद और
आगम को परस्पर एक सूत्र में बाँधने वाली विद्यायें हैं।
यही बात वरिवस्यारहस्य और त्रिपुरातापिन्युपनिषत् से भी प्रमाणित होती
है। वरिवस्यारहस्य में यह स्पष्ट उल्लेख है कि, “व्यवहरति न तु प्रकटं यां
विद्यां वेदपुरुषोऽपि (१।८) इति चतुष्पदा गायत्र्याः आवृत्तित्रयं श्रीविद्याकूट-
त्रयसकृत्पठनतुल्यम्”। श्रीत्रिपुरातापिनी में भी कहा गया है कि, ‘चतुष्पदा गायत्री
मन्त्र को तीन बार लिख देने से श्रीविद्या (पञ्चदशी) के तीनों कूटों का उद्धार
हो जाता है। इसलिये आगम-निगम में परस्पर विरोध की बात सोचना ऐक्य
दृष्टि के नितान्त विरुद्ध है।
मनुष्य मात्र का इस विद्या की उपासना का अधिकार भी इसी उद्देश्य
से दिया गया है कि, इसकी उपासना करने वाला भी ब्राह्मण हो जाये। गन्धर्वतन्त्र
में कहा गया है कि, नारी, शूद्र, व्रात्य आदि भी इसकी उपासना से ब्राह्मण
हो जाते हैं।