परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें( २ )
सामरस्य की साधना ही अभिप्रेत होती है। साधक अपनी प्राणाहुति को हव्य
बनाकर पूरे त्रिविष्टप के प्रतीकभूत त्रैपुर-साधना की प्राणाग्नि को पुष्ट से पुष्टतर
करता है। इस महाभाव को 'श्रीपरशुरामकल्पसूत्र' में ही प्रतीकात्मक रूप में
दर्शाया गया है—
“अथो वाचो ‘ब्लूं झौ’मिति ‘जूंस्ः’ इति चोक्त्वा अमृते अमृतोद्भवे
अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहेति चतुर्थो मन्त्रः”।
(श्रीक्रम - २९, पृ. ९५)
महापण्डित श्री रामेश्वर ने अपनी वृत्ति में इस सूत्र की गम्भीर व्याख्या
करते हुए लिखा है कि साधक जब साधना की चरम भूमिका में त्रिपुरसुन्दरी
एवं परमशिव के निमीलनोन्मीलन में अपनी प्राणाहुति देता है, तो वह अमृतत्व
के सन्निकट पहुँच जाता है। इसी तथ्य का रेखाङ्कन श्रीमद्भगवद्गीता में भी
महायोगी श्रीकृष्ण ने अपनी तेजोदीप्त वाणी में किया है—
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।।
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।।
(श्रीमद्भगवद्गीता - ४।२९-३०)
मैंने बहुत श्रद्धाभाव से इस ग्रन्थ का आलोडन करते हुए यह अनुभव
किया कि चाहे वह अद्वैतोपासना हो, चाहे वह श्रीविद्योपासना हो, चाहे वह
शाक्तोपासना हो, चाहे वह त्रैपुर-साधना हो, सभी के मूल में महात्रिपुरसुन्दरी
एवं भगवान् शिव के सामरस्य की साधना ही भक्त को अमृत एवं अमरता प्रदान
करती है। इसी महाभाव को विवृत करते हुए भगवत्पाद श्री शङ्कराचार्य जी ने
'आनन्दलहरी' में निरूपित किया है—
तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
तवात्मानं वन्दे नवरसमहाताण्डवनटम्।
उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम्।।
(आनन्दलहरी - ४१)