परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना
भगवान् परशुराम द्वारा प्रणीत 'परशुरामकल्पसूत्र' की प्रस्तावना लिखते
हुए मैंने इस ग्रन्थ का आद्योपान्त आलोडन किया और पाया कि श्रीविद्या की
उपासना का यह रहस्यात्मक महाग्रन्थ उत्तर-भारत की विद्वन्मण्डली में
अध्ययनाध्यापन, चिन्तन-मनन, अर्चना-उपासना से ओझल क्यों होता गया?
यह अपने आप में अनुसन्धान का विषय है। दुरूह एवं सर्वथा ओझल हो चुके
इस श्रीविद्योपासनाविषयक ग्रन्थ का हिन्दी-भाष्य लिखकर स्वतन्त्रता-संग्राम-
सेनानी, श्रीविद्योपासक, तान्त्रिक-साधना-निष्णात पण्डित श्री परमहंस मिश्र ने
पूरे उत्तर-भारत के विद्वानों के लिए एक अनमोल उपहार दिया है। एतदर्थ मैं
उन्हें सादर साधुवाद निवेदित करता हूँ। इसके साथ ही मैं श्रीविद्या के उपासक
एवं इस ग्रन्थ के हिन्दी-भाष्य के उत्प्रेरक विश्वविश्रुत मनीषी 'पद्मभूषण'
आचार्य श्री विद्यानिवास मिश्र जी को भी विनयाञ्जलि अर्पित करता हूँ, जिन्होंने
सारगर्भित 'पुरोवाक्' लिखकर इस ग्रन्थ का गौरव बढ़ाया है एवं पण्डित समाज
में पठन-पाठन से दूर छूटे हुए इस श्रीविद्या-साधना के उपपादक ग्रन्थ का उद्धार
कराया है।
मैं इस मणि-काञ्चन-संयोग की उपपत्ति में इतना ही कहना चाहता हूँ
कि डॉ. परमहंस मिश्र एवं आचार्य श्री विद्यानिवास मिश्र दोनों विभूतियाँ
श्रीविद्या-साधना में दूर तक प्रवेश कर चुकी हैं और इन विभूतियों की इस प्रविष्ट
साधना ने ही इस ग्रन्थ का हिन्दी-भाष्य के साथ सम्पादन कराया है और इस
साधना-पद्धति में निष्णात होने के लिए लाखों-लाख पाठकों को पाथेय दिया
है। पुलकित भाव से मैं इन दोनों विभूतियों के प्रति भूयोभूयः नमोवाकं निवेदित
करता हूँ।
जैसा कि आचार्य श्री विद्यानिवास मिश्र जी ने एवं आचार्य श्री परमहंस
मिश्र जी ने अपने 'पुरोवाक्' तथा 'श्रीविद्योपासनाविमर्श' में पूरी स्थिति स्पष्ट
कर दी है कि चाहे वह त्रैपुर-साधना हो, चाहे वह श्रीविद्या-साधना हो, चाहे
वह षोढ़ा-साधना हो, इन साधनाओं में त्रिपुरसुन्दरी एवं चिन्मय शिव के