पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
१०४ पाकदर्पणम्
बाहुकेन ऊषरजलस्वादुनिर्माणप्रकारनिरूपणम्
विचित्रं शृणु भूपाल ! प्रयोगं किल साम्प्रतम् ॥ १६ ॥
अष्टाद्विगुणितं तोयं कषायेण समन्वितम् ।
एकेन शोणवर्णेन मृद्भाण्डेन विलोडयेत् ॥ १७ ॥
तत्तादृशं पचेत्सम्यक् आकषायविमोचनात् ।
कथं भवति पाकेन कषायगुणमोचनम् ॥ १८ ॥
किन्तु पाकविशेषेण द्रव्ययुक्तेन तद्भवेत् ।
यस्मादुत्पद्यते दोषस्तेनानेन प्रणश्यति ॥ १९ ॥
मृद्योगेन च सम्भूतो मृद्विशेषेण नश्यति ।
नल के द्वारा ऊषर जल स्वादिष्ट बनाने का प्रकार निरूपण — नल ने राजा
ऋतुपर्ण से कहा कि हे राजन् ! ऊषर जल को स्वादिष्ट बनाने का विचित्र प्रयोग
सुने । कषाय से युक्त अठारह गुना जल को एक शोणवर्ण (लाल वर्ण) के मिट्टी
के घड़े में मिलाये और उसको इस प्रकार तब तक पकाये जब तक कि उसका कषाय
गुण नष्ट न हो जाय । पकाने से कषाय गुण से मुक्ति कैसे सम्भव है ? किन्तु पाक
की विशेषता तथा विशिष्ट द्रव्यों के संयोग से यह सम्भव है । जिससे दोष
उत्पन्न होता है वह इस विधि से कषाय दोष नष्ट हो जाता है । मिट्टी के संयोग
से उत्पन्न दोष विशेष मिट्टी के संयोग से नष्ट हो जाता है ॥ १६-१९½ ॥
अतो मृदस्य सहजो दोषो नास्ति नराधिप ! ॥ २० ॥
तप्तं पयश्च विशमेत् तत्र कुर्यादनाविलम् ।
अनाविलं जलं भूयः पात्रेऽन्यस्मिन् प्रपूरयेत् ॥ २१ ॥
कल्कं कतकबोजस्य भाण्डेऽम्भसि समाविशेत् ।
तत्तादृशं सटीसान्द्रे तथा मण्डं विशोधयेत् ॥ २२ ॥
निःक्षिपेत्तत्र रम्याणि जात्यादिकुसुमानि च ।
हे राजन् ! इस प्रकार मिट्टी का कोई स्वाभाविक दोष नहीं है । गरम जल
जब शीतल हो जाय तब मिट्टी निकाल दे और उस अनाविल जल को दूसरे पात्र
में भर दे । इसके बाद निर्मली (रीठा) के बीज का कल्क उस जलपूर्ण पात्र
में छोड़ दे । वह घनी पोटली में बांधकर घुमाने से मण्ड (पंक) का शोधन हो
जाता है । इसके बाद उसमें सुगन्धित एवं रमणीय चमेली आदि के पुष्प को
छोड़ दे ॥ २०-२२ ॥
यस्मिन् देशे प्रसूनानि नास्ति तत्र कथं भवेत् ॥ २३ ॥
नलविरचितम् १०५
राजा ऋतुपर्ण ने नल से पूछा कि जिस देश में पुष्प न मिले वहाँ पर कैसे
जल को सुगन्धित किया जाय ॥ २३ ॥
उपायस्तन्त्ररूपोऽत्र सूक्ष्मोऽस्ति सुदुर्लभम् ।
यस्मिन् सन्ति प्रसूनानि देशे काले च बुद्धिमान् ॥ २४ ॥
तस्मिंस्तदा हि संगृह्य संगृही नावसीदति ।
तं प्रकाशमहं वच्मि शृणु भूपालसत्तम ! ॥ २५ ॥
हे राजन् ! जहाँ जिस देश में पुष्प नहीं हैं वहाँ के लिये देवताओं को भी
दुर्लभ, सूक्ष्म एवं तन्त्र रूप में उपाय है ।¹ बुद्धिमान् व्यक्ति जिस देश एवं काल
में पुष्प नहीं होते हैं उस समय पहले से ही पुष्पों का संग्रह कर ले । संग्रह करने
वाला व्यक्ति दुःखी नहीं होता । हे राजन् ! उसको हम अच्छी तरह समझा
कर कह रहे हैं ॥ २४-२५ ॥
प्रसूनाभावे देशे काले च तन्त्ररूपेण सुवासनाविधिः
अपक्वभाण्डमानीय कुम्भकारगृहान्नवम् ।
कल्केन घनसारादिसम्भवेन सुगन्धिना ॥ २६ ॥
अन्तर्बहिश्च तस्यापि लेपयेच्च समन्ततः ।
आतपेन विना कुर्यात् च्छायाशुष्कं पुनः पुनः ॥ २७ ॥
दिनेष्वेवं बहुषु कुर्यात्तत्र प्रयत्नतः ।
तथाविधं च तं भाण्डं छिन्द्यान्निष्पावमानतः ॥ २८ ॥
फलेन निर्मितं पात्रं नारिकेलस्य मानवित् ।
भावयेद्बहुभिः पुष्पैः घनसारादिना बहु ॥ २९ ॥
पुराणानि च पुष्पाणि प्रसूनानि नवानि च ।
पक्त्वा च पूरयित्वा च मासमेकं पुनः पुनः ॥ ३० ॥
पूरयेत्तादृशान् तस्मिन् वटकान् घटसम्भवान् ।
तस्मिंश्च घटखण्डानि पूरयेत्तानि गोपयेत् ॥ ३१ ॥
प्रसूनाभावदेशे च खण्डानेतान् घटोद्भवान् ।
पाने तक्रे च मूषादिवस्तुष्वेतान् प्रतिक्षिपेत् ॥ ३२ ॥
भवेयुस्तानि तान्येव तत्तद्गुणयुतानि च ।
तोरेषु घटखण्डानि तादृशानि विनिक्षिपेत् ॥ ३३ ॥
१. तन्त्र रूप से आज कल पुष्पों का सेन्ट एवं एसेन्स आदि का प्रयोग
होता है । प्राचीन काल में सुगन्धित बनाने की तन्त्ररूप प्रक्रिया का
आगे निरूपण है ।
पृष्ठ १०६
१०६ पाकदर्पणम्
प्रसूनाभावे देशे च कर्त्तव्योऽयं मनीषिभिः ।
पुष्परहित देश तथा काल में जल सुवासित करने की विधि—कुम्भकार
(कोहार) के घर से नवीन कच्चा घड़ा लाकर कर्पूर-कस्तूरी आदि सुगन्धित
द्रव्यों के कल्क से बाहर-भीतर बराबर-बराबर लेप करे और इसके बाद
छाया में सुखा ले । इस प्रकार बार-बार प्रयत्नपूर्वक कई दिन तक करे । इस
प्रकार सुगन्धित उस पात्र के निष्पाव (मटर) के बराबर टुकड़े बनाकर
नारियल के फल से निर्मित पात्र में प्रमाण को जाननेवाला पाचक बहुत से
पुष्प एवं कर्पूर आदि द्रव्यों से अनेक बार भावित कर ले । पुराने पुष्प तथा
नवीन पुष्पों को पकाकर तथा भर कर एक माह तक बार-बार घड़े के बनाये
उन वटकों को उस भाण्ड में भर दे । उन घड़े के टुकड़ों को भर कर गुप्त
स्थान में रख दे । जहाँ पर पुष्प नहीं होते हैं उन देशों में इन घड़े के टुकड़ों
को पीने के पानी में तथा तक्र (मट्ठा) में प्रयोग करे और घड़ा आदि
में मिला दे । वे जिन-जिन पुष्पों से भावित घड़े के टुकड़े होंगे उन-उन पुष्पों
के गुण के अनुसार गुण होंगे । इस प्रकार के घड़े के टुकड़ों को जल में छोड़े ।
विद्वान् लोग पुष्परहित देश में जल को सुगन्धित बनाने के लिये इस विधि का
प्रयोग करें ॥ २६-३३ ॥
एवं प्रसाद्य पानीयं पिपासूंश्च प्रदापयेत् ॥ ३४ ॥
इदं पित्तहरं पथ्यं श्रमजिद् बलवर्धनम् ।
पूर्वोक्त प्रकार से जल को शुद्ध कर प्यासे व्यक्ति को दे । यह जल पित्त को
दूर करता है, पथ्य है, थकावट को दूर करता है तथा बल को बढ़ाता है ॥३४॥
जलशैत्यीकरणे वादिप्रतिवादिनोरुक्तिः
एवमादि विचित्राणि सन्ति मध्येऽत्र भूमिषु ॥ ३५ ॥
पानीयविषये वादो वादिना प्रस्तुते सति ।
तयोरन्यं वदत्येकः शृणु मे वचनं परम् ॥
स्वभावशीतलं वारि कुरुते शीतलाधिकम् ॥ ३६ ॥
सिकता वेदिकायां च तालवृन्तसमीरणैः ।
पाटल्यादिप्रसूनैश्च वासनां कुरुते जले ॥ ३७ ॥
एवं तु घनशारेण विना बालुकवेदिकाम् ।
विना पुष्पैर्विना शैत्यैस्तालवृन्तानिलान् विना ॥ ३८ ॥
उष्मवारिक्षयेनैव कुरु शैत्ये च वासितम् ।
इति पानीयविषये वादिन्यतिवदत्यपि ॥ ३९ ॥
पृष्ठ १०७
नलविरचितम् १०७
क उपायो महानास्ते लघुर्बाहुक मे वद ।
जल के शीतल करने के सम्बन्ध में वादी तथा प्रतिवादी का कथन—इस
प्रकार पृथ्वी के ऊपर बीच-बीच में जल को शीतल करने के लिए विचित्र-विचित्र
साधन हैं । पानी के विषय में वादी के द्वारा वाद प्रस्तुत करने पर दोनों में से
एक ने जो कहा उसको सुनें । हे बाहुक ! स्वभाव से ही शीतल जल को अधिक
शीतल क्यों बनाते हैं । बालू की वेदी पर ताड़ के पंखा के हवा से तथा पाटल
आदि के पुष्प से जल को सुगन्धित करते हैं। इस प्रकार बिना कर्पूर की वासना
बालुका वेदी के बिना, पुष्पों के बिना तथा ताड़ के पंखा के बिना उष्ण
जल के क्षय से ही शीतल तथा सुवासित करे । इस प्रकार यदि वादी कहे तो
कौन सा उत्तम उपाय है जो हल्का हो उसे मुझसे कहो ॥ ३२-३८ ॥
राज्ञश्च वचनं श्रुत्वा तथेत्युत्तरमब्रवीत् ॥ ४० ॥
लघूपायं महद्वच्मि श्रूयनामत्र भूमिप ।
यदातपे हि तद्वस्त्रं शान्तं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥ ४१ ॥
सुगन्धगुणसंयुक्तै बहुपुष्पैश्च वासिते ।
नव कुम्भे च तद्वस्त्रं सम्यङ्निक्षिप्य गोपयेत् ॥ ४२ ॥
राजा के वचन को सुनकर वैसा ही कहूँगा यह कहकर बोले कि हे राजन् !
सरल तथा उत्तम उपाय को कहता हूँ, सुनें । जो वस्त्र धूप में सुवासित कर
सुखाया गया है उसको प्रयत्न पूर्वक शीतल करे और सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित
तथा अनेक पुष्पों से सुवासित नवीन घड़े में अच्छी तरह रखकर बन्द कर
रख दे ॥ ३७-४२ ॥
ईदृशस्तु यदा वादः सम्प्राप्तः सूदराट् तदा ।
शैत्योदकं तदा वादो दत्वा तु प्रातवादितः ॥ ४३ ॥
वादं कुरु बलस्याय यावच्छेत्यादिमेलनम् ।
तावत्करोम्यहं सम्यक् पथ्यं वैचित्र्यमुत्तमम् ॥ ४४ ॥
इस प्रकार का जब वाद-विवाद उपस्थित हुआ तब पाचक वादी प्रतिवादी
को शीतल जल देकर बोला कि जब तक शीतलता आदि का मिलान विषय का
वाद-विवाद करे तब तक मैं जलशीतल विषयक उत्तम विचित्र प्रकार को करता हूँ,
आप देखें ॥ ४३-४४ ॥
इत्युक्त्वा सूदराडाशु सुतप्तं जलमग्रहीत् ।
तस्मिन्नम्भसि तद्वस्त्रं प्रयत्नेन निमज्जयेत् ॥ ४५ ॥
१०८ पाकदर्पणम्
यस्याञ्चलानि चत्वारि वादिवारणकेशरी ।
चतुर्भिः पुरुषैराशु ग्राहयेद्वारिमण्डपे ॥ ६४ ॥
पीडयित्वा तु तद्वस्त्रं जलमादाय सूदराट् ।
इदमेतावता चोष्णं मज्जयेत्तज्जलं गुणैः ॥ ४७ ॥
अतस्तु वादी जयति प्रतिवादी गजांकुशः ।
इदं स्वादुतरं पथ्यं वातश्लेष्महरं भवेत् ॥ ४८ ॥
पाचक जल को ठण्डा करने के लिए सरल उपाय को बताते हुए उपरोक्त
बातों को कह कर शीघ्र ही संतप्त जल को ग्रहण कर उस जल में पूर्वोक्त सुवा-
सित वस्त्र को भिगो दे । इसके बाद प्रतिवादी चार पुरुषों के द्वारा चारों
अञ्चलों को जलमण्डप में ग्रहण कराये। पुनः उस वस्त्र को निचोड़ कर
उस उष्ण जल को उसके गुणों के साथ डुबा दे । अतः वादी तथा प्रतिवादी
गजांकुश की जीत है। यह जल स्वादिष्ट पथ्य तथा वात एवं कफ-नाशक
होता है ॥ ४५-४८ ॥
जलशैत्यकरणप्रकरणस्योपसंहारः
पानीयमेतादृशमन्यपूर्णमनेकजन्मान्तरितं हिताय ।
सम्पाद्य यत्नेन पिबेच्च यो वा स चोत्तमः पुण्यजनेषु मध्ये ॥४९॥
इति नलकृतपाकदर्पणे शैत्यजलनिरूपणं नाम नवमप्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥
जल शीतल करनेवाले प्रकरण का उपसंहार -- दूसरों से न पूर्ण होनेवाले
अनेक जन्मों के बीच का ऐसा जल हित के लिये प्रयत्न पूर्वक बनाकर जो पीता है
वह पुण्यजनों के मध्य में उत्तम है ॥ ४९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित स्वच्छशैत्यजल निरूपण नामक नवम प्रकरण समाप्त ॥ ९ ॥
अथ क्षीरादिपाकनिरूपणप्रकरणम्
क्षीरपाकनिर्माणप्रकारः
सर्वपायसभेदानां कथितानां निदानके ।
करिष्यमाण दध्यादि कार्याणां मूलकारणम् ॥ १ ॥
अतोऽत्र कथ्यते सम्यक् क्षीरपाकमनुत्तमम् ।
क्षीरपाक बनाने का प्रकार — पहले सभी प्रकार के पायस आदि के भेदों
को कहा गया । अतः अब यहाँ किये जानेवाले दही आदि पदार्थों के आदि कारण
उत्तम क्षीरपाक को कहते हैं ॥ १ ॥
क्षीरपाकनिर्माणविधिः
महिष्याः सम्भवं क्षीरं सावधानः समाहरेत् ॥ २ ॥
तदादाय शुभे भाण्डे निदध्यात् सूदकोविदः ।
गाङ्गं जलं च ललितं पूरयेदपरे घटे ॥ ३ ॥
वासयेत्तज्जलं पुष्पैर्नाना परिम्लान्वितैः ।
मुहूर्तमेकमालोक्य तानि पुष्पाणि संत्यजेत् ॥ ४ ॥
क्षीरं जलं समं कृत्वा क्षीरभाण्डे पचेद्बुधः ।
त्रिनिष्कमानमुक्तानि प्रत्येकं तत्र मानवित् ॥ ५ ॥
घटानि त्रीणि निक्षिप्य कार्तस्वरकृतानि च ।
दर्व्या मुहुर्मुहुः क्षीरं सम्यगालोड्य तत्पचेत् ॥ ६ ॥
एवं द्वित्रि शुभे पात्रे पचेदनिलसंक्षयात् ।
दर्वी यथातथा संज्ञादवतार्य तदासुधा ॥ ७ ॥
पिधाय रन्ध्रं भाण्डाना मङ्गारेषु न्यसेच्च तत् ।
तस्मिन्मन्दे तु संजाते यथार्हा शर्करां क्षिपेत् ॥ ८ ॥
ईषदुष्णेन संयुक्तं दापयेत् क्षीरमुत्तमम् ।
वृष्यं पित्तादिदोषघ्नं शरीरबलवर्धनम् ॥ ९ ॥
श्रमजित् स्वादुसंयुक्तं बुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ।
क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण — पाचक सावधानी पूर्वक भैंस का
दूध लेकर उत्तम पात्र में रक्खे । स्वच्छ गंगा का जल दूसरे पात्र में भर दे
और अनेक प्रकार के सुगन्धों से युक्त पुष्पों से उस जल को सुवासित करे ।
११० पाकदर्पणम्
जल में थोडी देर रखने के बाद चलाकर पुष्पों को फेक दें । इसके बाद
दूध तथा जलको बराबर मिलाकर दूध के पात्र में बुद्धिमान् पाचक पकावे । प्रमाण
को जानने वाला पाचक त्रिनिष्क (तीन ग्राम) प्रमाण के तीन पात्र लेकर उनमें छोड़
दे और धीरे-धीरे शब्द होने तक पकावे । कलछुल से बारबार अच्छी तरह
चलाकर उसको पकावें । इस प्रकार दो-तीन उत्तम पात्र में जल के जलजाने
तक पकावे । जब कलछुल में लगने लगे तब बुद्धिमान् पाचक उनको उतार
कर तथा उनका मुख बन्द कर मन्दाग्नि पर रख दे । उसके थोड़ा ठण्डा हो
जाने पर उचित मात्रा में शक्कर छोड़ दे । इस उत्तम दूधपाक को थोड़ा गरम-
गरम खाने के लिये दे । यह क्षीर पाक वीर्यवर्द्धक, पित्त-कफ-वात आदि दोष-
नाशक, शरीर एवं बलवर्द्धक, थकावट को दूर करने वाला, स्वादिष्ट एवं बुद्धि
तथा इन्द्रियों के बल को बढ़ानेवाला है ॥ १८ ॥
प्रकारान्तरेण क्षीरपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विना जलेन तत् क्षीरं क्षीरभाण्डे नियोजयेत् ॥ १०॥
स्थाल्यां पचेन्मृदावग्नौ दवघट्टनपुरःसरम् ।
अर्धावशिष्टमिति तत् लेह्यमाहुश्च कोविदाः ॥ ११ ॥
षड्भागशेषमिति तत् घटिकां प्रवदन्ति हि ।
ब्रुवन्त्यष्टावशिष्टं तत् शर्केरामिति साधकाः ॥ १२ ॥
चतुर्थजमिदं क्षीरं न्यसेद्भाण्डचतुष्टये ।
सम्यग्विश्राम्य तत्क्षीरं मानविद्भाण्डसंस्थितम् ॥ १३ ॥
तेषु क्षीरेषु मानज्ञाः फलपुष्पाणि निक्षिपेत् ।
पानरूपे पुनः क्षीरे पनसस्य फलं क्षिपेत् ॥ १४ ॥
सारामृतं पुनस्तत्र आर्द्रकस्य क्षिपेत्कणान् ।
जात्यादिकुसुमं तत्र पुनः सूदः प्रवेशयेत् ॥ १५ ॥
भूयो लेह्याह्वये दुग्धे खर्जूरफलमाहरेत् ।
फलस्वेदं पुनस्तत्र निक्षिपेदमृतोपमम् ॥ १६ ॥
न्यसेच्च पक्वं पुन्नागकुसुमं तत्र मानवित् ।
भूयश्च घटिकारूपे क्षीरे चूतफलं क्षिपेत् ॥ १७॥
सर्पिश्श्च माक्षिकं तत्र निक्षिपेत्सर्वरोगजित् ।
कुसुमं सत्फलादीनां न्यसेत्तत्र नवीदनम् ॥ १८ ॥
क्षीरे तु शर्कराकारे कृत्स्नरम्भाफलं न्यसेत् ।
पुनश्च शर्कराखण्डं जिह्वाजाड्यहरं शुभम् ॥ १९ ॥
नलविरचितम् १११
कुसुमं विन्यसेत्तत्र पुन्नागे च समुद्भवम् ।
तेषु क्षीरेषु सर्वेषु निक्षिपेत्केतकीफलम् ॥ २० ॥
कर्पूरमृगनाभ्योश्च कल्कं कुंकुमवर्जितम् ।
सूदस्तं पानरूपेषु क्षीरेषु प्रसवं न्यसेत् ॥ २१ ॥
संत्यज्य तानि पुष्पाणि वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
अन्य प्रकार के क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण-बिना जल मिला
भैंस का दूध दूध के पात्र में रक्खे और मन्द आँच से दुग्धपात्र में कलछुल से
चलाते हुए पकावे । यह क्षीर पाक का पहला प्रकार है। जब पकाते-पकाते आधा
रह जाय तब वह विद्वानों के पीने योग्य होता है । आधा भाग अवशेष दूध को
विद्वान् लोग "लेह्य" कहते हैं । षष्ठांश अवशिष्ट दूध को घटिका कहते हैं। इन
चारों प्रकार के दूध को चार पात्र में रख कर मात्रा को जाननेवाला पाचक
पात्र में स्थित दूध को थोड़ी देर तक स्थिर होने दे । पुनः उन चार पात्रों में
स्थित दूध में फल एवं पुष्पादि छोड़े। पुनः सारामृत में अदरक के टुकड़ों को
छोड़े। पुनः उसमें पाचक चमेली आदि का फूल रक्खे । पुनः लेह्य संज्ञक दूध
में खजूर का फल छोड़ दे । पुनः उसमें अमृत स्वरूप फलस्वेद (फल का रस)
को छोड़ दे और पके पुन्नाग (श्वेत कमल) का पुष्प छोड़ दे। पुनः घटिका
रूप दूध में आम का फल छोड़ दे । पुन. उसमें घी तथा सभी रोगों को जीतने
वाला मधु छोड़ दे । पुनः सत्फला (अनार) आदि का पुष्प तथा नवीन चावल
का भात छोड़ दे । शर्करा रूप दूध में पूरे केले फल छोड़ दे । पुनः उसमें खाँड
छोड़ दे । यह अच्छी तरह जिह्वा की जड़ता को दूर करता है। पुनः उसमें
पुन्नाग का पुष्प छोड़ दे और कर्पूर तथा कस्तूरी को भी छोड़ दे किन्तु केशर
को न छोड़े । पाचक पानरूप दूध में प्रसव (फूल-फल) छोड़ दे । सभी प्रकार
के दूधों से पुष्पों को निकाल कर और पूगपट्ट में बाँध कर खाने के लिये दे ।
क्षीरपाकस्य गुणाः
वातपित्तकफजानिदं पयो यस्य कुक्षिगतमात्रमामयान् ॥ २२ ॥
हन्ति सर्वसुरलोकदुर्लभं प्रार्थितं सुरगणैर्वृषमुख्यः ।
इति नलकृतपाकदर्पणे क्षीरपाकनिर्माणनिरूपणं नाम दशमं प्रकरणं समाप्तम् ॥
क्षीरपाक के गुण- यह क्षीरपाक इन्द्रप्रमुख देवगणों के द्वारा प्रार्थित
सभी देवलोक में दुर्लभ जो पेट में जाने मात्र से वातज, पित्तज तथा
११२ पाकदर्पणम्
कफज रोगों को नाश करता है। अर्थात् यह क्षीरपाक सभी प्रकार के रोगों को
नष्ट करता है ।। २२३ ।।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित क्षीरादिपाकनिरूपण नामक दसवाँ प्रकरण समाप्त ।। १० ।।
अथ दधिभेदप्रकरणम्
दधिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अनेकचित्रसंयुक्तः क्षीरभेदश्च दर्शितः ।
दर्श्यते दधिभेदस्तु सुचित्रं विविधं यथा ॥ १ ॥
अर्धावशिष्टधवलं सुपक्वं क्षीरमुत्तमम् ।
सक्षीरखण्डमृद्भाण्डे समादाय शुभे न्यसेत् ॥ २ ॥
सुजातं मातुलुंगस्य फलं स्थूलं समाहरेत् ।
फणाकारसमायुक्तशलाकातीव्रधारया ॥ ३ ॥
वृन्तं मूलं ततस्तस्य किञ्चिच्छित्त्वाऽप्रमाणवित् ।
उद्धरेत्तद्गतान् सर्वान् बीजत्वक्केसरान् बुधः ॥ ४ ॥
एकवारं द्विवारं वा क्षालयेद्वारिणा च तत् ।
कल्केन घनसारादीन् तदन्तं लेपयेद् बुधः ॥ ५ ॥
वासयेद्बहुभिश्चैव जात्यादिकुसुमैः पुनः ।
तत्रत्यानि प्रसूनानि दधिपक्षे समुत्सृजेत् ॥ ६ ॥
ईषदुष्णेन संयुक्तं क्षीरं तत्र समण्डकम् ।
पूरयेन्नवनीतं च किञ्चित्तत्र विनिक्षिपेत् ॥ ७ ॥
छेदेनापूर्य छिन्नेन तन्मुखं छादयेत्सुधीः ।
अनेनैव प्रकारेण दधि कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ८ ॥
इदं रुचिकरं पथ्यं सर्वारुचिनिवारणम् ।
बलपुष्टिकरं रम्यं भवेत्कायाग्निदीपनम् ॥ ९ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे दधिभेदनिरूपणं नाम एकादशप्रकरणं समाप्तम् ॥ ११ ॥
दही बनाने की विधि तथा गुण इसके पूर्व क्षीरप्रकरण में दूध के भेद
दर्शाये गये। अब अनेक प्रकार के विचित्र दही के भेद बताये जा रहे हैं। अच्छी
तरह पकाया हुआ अर्धावशिष्ट दूध लेकर उत्तम शक्करयुक्त दूध के पात्र में
रखे । इसके बाद बड़ा बिजौरा नींबू का फल ले आये और उसको फणाकार
तेज धार वाली शलाका से साफ कर ले । उसकी भेटी तथा मूल भाग का प्रमाण
को जानने वाला थोड़ा काट दे। पुनः उसके अन्दर के सभी पदार्थों (बीज केशर
आदि) को निकाल दे और उसको एक बार या दो बार जल से प्रक्षालन कर ले।
इसके बाद कर्पूर आदि के कल्क से उसके अन्दर लेप लगा दे। पुनः चमेली
११४ पाकदर्पणम्
आदि अनेक सुगन्धित पुष्पों से सुगन्धित कर ले । उसमें के सभी पुष्पों को
दही में छोड़ दे । तदनन्तर उसमें माण्ड सहित थोड़ा गरम दूध १ भर दे और
थोड़ा मक्खन छोड़ दे इस के बाद कटे नींबू के टुकड़े से उसका मुख ढक दे । इस
प्रकार दही बना कर खाने के लिये दे । यह दही रुचिकारक, पथ्य, सभी प्रकार
के अरुचियों को दूर करने वाला बल एवं पुष्टिकारक, मनोहर तथा जाठराग्नि को
प्रदीप्त करने वाला है ॥ १-९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित दधिभेदनिरूपण नामक एकादश प्रकरण समाप्त ॥ ११ ॥
( १ ) आजकल भी यह परम्परा देखी जाती है कि दूकानदार मिट्टी के पुरवे में
अलग-अलग दही जमाकर बेचते हैं। सम्भवतः वही परम्परा आज भी
प्रचलित है । मद्रास में बहुधा अलग-अलग बर्तनों में दही इस प्रकार
बेचा जाता है ।