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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

७८-भारतवर्षका वर्णन और वसिष्ठजीके द्वारा पुष्कर तीर्थकी महिमाका बखान

स्वर्गखण्ड ] * भारतवर्षका वर्णन और वसिष्ठजीके द्वारा पुष्कर-तीर्थकी महिमाका बखान * ३३३


इन्द्रिय बताया है। विप्रगण ! आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये क्रमशः शब्दादि उत्तरोत्तर गुणोंसे युक्त हैं। ये पाँचों भूत पृथक्-पृथक् नाना प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, किन्तु परस्पर संघटित हुए बिना वे प्रजाकी सृष्टि करनेमें समर्थ न हुए। इसलिये महत्तत्त्वसे लेकर पञ्चभूतपर्यन्त सभी तत्त्व परम पुरुष परमात्माद्वारा अधिष्ठित और प्रधानद्वारा अनुगृहीत होनेके कारण पूर्णरूपसे एकत्वको प्राप्त हुए। इस प्रकार एक-दूसरेसे संयुक्त होकर परस्परका आश्रय ले उन्होंने अण्डकी उत्पत्ति की। महाप्राज्ञ महर्षियो ! इस तरह भूतोंसे प्रकट हो क्रमशः वृद्धिको प्राप्त हुआ वह विशाल अण्ड पानीके बुलबुलेकी तरह सब ओरसे समान—गोलाकार दिखायी देने लगा। वह पानीके ऊपर स्थित होकर ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ) के रूपमें प्रकट हुए भगवान् विष्णुका उत्तम स्थान बन गया। सम्पूर्ण विश्वके स्वामी अव्यक्त-स्वरूप भगवान् विष्णु स्वयं ही ब्रह्माजीका रूप धारण कर उस अण्डके भीतर विराजमान हुए।

उस समय मेरु पर्वतने उन महात्मा हिरण्यगर्भके लिये गर्भको ढकनेवाली झिल्लीका काम दिया, अन्य पर्वत जरायु—जेरके स्थानमें थे और समुद्र उसके भीतरका जल था। उस अण्डमें ही पर्वत और द्वीप आदिके सहित समुद्र, ग्रहों और ताराओंके साथ सम्पूर्ण लोक तथा देवता, असुर और मनुष्योंसहित सारी सृष्टि प्रकट हुई। आदि-अन्तरहित सनातन भगवान् विष्णुकी नाभिसे जो कमल प्रकट हुआ था, वही उनकी इच्छासे सुवर्णमय अण्ड हो गया। परमपुरुष भगवान् श्रीहरि स्वयं ही रजोगुणका आश्रय ले ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट होकर संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त होते हैं। वे परमात्मा नारायणदेव ही सृष्टिके समय ब्रह्मा होकर समस्त जगत्की रचना करते हैं, वे ही पालनकी इच्छासे श्रीराम आदिके रूपमें प्रकट हो इसकी रक्षामें तत्पर रहते हैं तथा अन्तमें वे ही इस जगत्का संहार करनेके लिये रुद्रके रूपमें प्रकट हुए हैं।


भारतवर्षका वर्णन और वसिष्ठजीके द्वारा पुष्कर-तीर्थकी महिमाका बखान

सूतजी कहते हैं—महर्षिगण ! अब मैं आपलोगोंसे परम उत्तम भारतवर्षका वर्णन करूँगा। राजा प्रियमित्र, देव, वैवस्वत मनु, पृथु, इक्ष्वाकु, ययाति, अम्बरीष, मान्धाता, नहुष, मुचुकुन्द, कुबेर, उशीनर, ऋषभ, पुरूरवा, राजा नृग, राजर्षि कुशिक, गाधि, सोम तथा राजर्षि दिलीपको, अन्यान्य बलिष्ठ क्षत्रिय राजाओंको एवं सम्पूर्ण भूतोंको ही यह उत्तम देश भारतवर्ष बहुत ही प्रिय रहा। इस देशमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्षवान्, विन्ध्य तथा पारियात्र—ये सात कुल-पर्वत हैं। इनके आसपास और भी हजारों पर्वत हैं। भारतवर्षके लोग जिन विशाल नदियोंका जल पीते हैं, उनके नाम ये हैं—गङ्गा, सिन्धु, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, बाहुदा, शतद्रु (सतलज), चन्द्रभागा, यमुना, दृषद्वती, विपाशा (व्यास), वेत्रवती (बेतवा), कृष्णा, वेणी, इरावती, (इरावती), वितस्ता (झेलम), पयोष्णी, देविका, वेदस्मृति, वेदशिरा, त्रिदिवा, सिन्धुलाकृमि, करीषिणी, चित्रवहा, त्रिसेना, गोमती, चन्दना, कौशिकी (कोसी), दृढ़ा, नाचिता, रोहितारणी, रहस्या, शतकुम्भा, सरयू, चर्मण्वती, हस्तिसोमा, दिशा, शरावती, भीमरथी, कावेरी, बालुका, तापी (ताप्ती), नीवारा, महिता, सुप्रयोगा, पवित्रा, कृष्णला, वाजिनी, पुरुमालिनी, पूर्वाभिरामा, वीरा, मालवती, पापहारिणी, पलाशिनी, महेन्द्रा, पाटलावती, . असिक्नी, कुशवीरा, मरुत्वा, प्रवरा, मेना, होरा, घृतवती, अनाकती, अनुष्णी, सेव्या, कापी, सदावीरा, अधृष्या, कुशचीरा, रथचित्रा, ज्योतिस्था, विश्वामित्रा, कपिञ्जला, उपेन्द्रा, बहुला, कुवीरा, वैनन्दी, पिञ्जला, वेणा, तुङ्गवेगा, महानदी, विदिशा, कृष्णवेगा, ताम्रा, कपिला, धेनु, सकामा, वेदस्वा, हविःस्रावा, महापथा, क्षिप्रा (सिप्रा), पिच्छला, भारद्वाजी, कौर्णिकी, शोणा (सोन), चन्द्रमा, अन्तःशिला, ब्रह्ममेध्या, परोक्षा, रोही, जम्बून्दी (जम्मू), सुनासा, तपसा, दासी, सामान्या, वरुणा, असी, नीला, धृतिकरी,

३३४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


पर्णाशा, मानवी, वृषभा तथा भाषा। द्विजवरो! ये तथा और भी बहुत-सी बड़ी-बड़ी नदियाँ हैं।

अब जनपदोंका वर्णन करता हूँ, सुनिये। कुरु, पाञ्चाल, शाल्व, माद्रेय, जाङ्गल, शूरसेन (मथुराके आसपासका प्रान्त), पुलिन्द, बौद्ध, माल, सौगन्ध्य, चेदि, मत्स्य (जयपुरके आसपासका भूखण्ड), करूष, भोज, सिन्धु (सिंध), उत्तम, दशार्ण, मेकल, उत्कल, कोशल, नैकपृष्ठ, युगंधर, मद्र, कलिङ्ग, काशि, अपरकाशि, जठर, कुकुर, कुन्ति, अवन्ति (उज्जैनके आसपासका देश), अपरकुन्ति, गोमन्त, मल्लकम, पुण्ड्र, नृपवाहिक, अश्मक, उत्तर, गोराष्ट्र, अधिराज्य, कुराष्ट्र, मल्लराष्ट्र, मालव (मालवा), उपवास्य, वक्रा, वक्राताप, मागध, सद्म, मलज, विदेह (तिरहुत), विजय, अङ्ग (भागलपुरके आसपासका प्रान्त), वङ्ग (बंगाल), यकृल्लोमा, मल्ल, सुदेष्ण, प्रह्लाद, महिष, शशक, बाह्निक (बलख), वाटधान, आभीर, कालतोयक, अपरान्त, परान्त, पङ्गल, चर्मचण्डक, अटवीशेखर, मेरुभूत, उपावृत्त, अनुपावृत्त, सुराष्ट्र (सूरतके आसपासका देश), (केकय, कुट्ट, माहेय, कक्ष, सामुद्र, निष्कुट, अन्ध्र, बहु, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, मलद, सत्वतर, प्रावृषेय, भार्ग, भार्गव, भासुर, शक, निषाद, निषध, आनर्त्त (द्वारकाके आसपासका देश), नैर्ऋत, पूर्णल, पूतिमत्स्य, कुन्तल, कुशाक, तीरग्रह, ईजिक, कल्पकारण, तिलभाग, मसार, मधुमत्त, ककुन्दक काश्मीर, सिन्धुसौवीर, गान्धार (कंधार), दर्शक, अभीसार, कुहुत, सौरिल, दर्वी, दर्वावात, जामरथ, उरग, बलराष्ट्र, सुदामा, सुमल्लिक, बन्ध, करीकष, कुलिन्द, गन्धिक, वानायु, दश, पार्श्वरोमा, कुशबिन्दु, कच्छ, गोपालकच्छ, कुरुवर्ण, किरात, बर्बर, सिद्ध, ताम्रलिप्तिक, औडूम्लेच्छ, सैरिन्ध्र और पर्वतीय। ये सब उत्तर भारतके जनपद बताये गये हैं।

मुनिवरो ! अब दक्षिण भारतके जनपदोंका वर्णन किया जाता है। द्रविड (तमिलनाड), केरल (मलवार), प्राच्य, मूषिक, बालमूषिक, कर्णाटक, महिषक किष्किन्ध, झिल्लिक, कुन्तल, सौहृद, नलकानन, कोकुट्टक, चोल, कोण, मणिवालव, सभङ्ग, कनङ्गु, कुकुर, अङ्गार, मारिष, ध्वजिनी, उत्सव, संकेत, त्रिगर्त, माल्यसेनि, व्यूढक, कोरक, प्रोष्ठ, सङ्गवेगधर, विन्ध्य, रुलिक, बल्वल, मलर, अपरवर्तक, कालद, चण्डक, कुरट, मुशल, तनवाल, सतीर्थ, पूति, सृञ्जय, अनिदाय, शिवाट, तपान, सूतपं, ऋषिक, विदर्भ (बरार), तङ्गण और परतङ्गण। अब उत्तर एवं अन्य दिशाओंमें रहनेवाले म्लेच्छोंके स्थान बताये जाते हैं—यवन (यूनानी) और काम्बोज—ये बड़े क्रूर म्लेच्छ हैं। कृधुह, पुलत्थ्य, हूण, पारसिक (ईरान) तथा दशमानिक इत्यादि अनेकों जनपद हैं। इनके सिवा क्षत्रियोंके भी कई उपनिवेश हैं। वैश्यों और शूद्रोंके भी स्थान हैं। शूरवीर आभीर, दरद तथा काश्मीर जातिके लोग पशुओंके साथ रहते हैं। खाण्डीक, तुषार, पद्माव, गिरिह्वर, आत्रेय, भारद्वाज, स्तनपोषक, द्रोषक और कलिङ्ग—ये किरातोंकी जातियाँ हैं [और इनके नामसे भिन्न-भिन्न जनपद हुए हैं]। तोमर, हन्यमान और करभञ्जक आदि अन्य बहुत-से जनपद हैं। यह पूर्व और उत्तरके जनपदोंका वर्णन हुआ। ब्राह्मणो ! इस प्रकार संक्षेपसे ही मैंने सब देशोंका परिचय दिया है। इस अध्यायका पाठ और श्रवण त्रिवर्ग, (धर्म, अर्थ और काम) रूप महान् फलको देनेवाला है।

द्विजवरो ! प्राचीन कालमें राजा युधिष्ठिरके साथ जो देवर्षि नारदका संवाद हुआ था, उसका वर्णन करता हूँ; आपलोग श्रवण करें। महारथी पाण्डवोंके राज्यका अपहरण हो चुका था। वे द्रौपदीके साथ वनमें निवास करते थे। एक दिन उन्हें परम महात्मा देवर्षि नारदजीने दर्शन दिया। पाण्डवोंने उनका स्वागत-सत्कार किया। नारदजी उनकी की हुई पूजा स्वीकार करके युधिष्ठिरसे बोले—'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ! तुम क्या चाहते हो ?' यह सुनकर धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिरने भाइयोंसहित हाथ जोड़ देवतुल्ये नारदजीको प्रणाम किया और कहा—'महाभाग ! आप सम्पूर्ण लोकोंद्वारा पूजित हैं। आपके संतुष्ट हो जानेपर मैं अपनेको कृतार्थ मानता हूँ—मुझे किसी बातकी आवश्यकता नहीं है। मुनिश्रेष्ठ ! जो

स्वर्गखण्ड ] * भारतवर्षका वर्णन और वसिष्ठजीके पुष्कर-तीर्थकी महिमाका बखान * ३३५


तीर्थयात्रामें प्रवृत्त होकर समूची पृथ्वीकी परिक्रमा करता
है, उसको क्या फल मिलता है? ब्रह्मन्! इस बातको
आप पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें।'

नारदजी बोले—राजन्! पहलेकी बात है,
राजाओंमें श्रेष्ठ दिलीप धर्मानुकूल व्रतका नियम लेकर
गङ्गाजीके तटपर मुनियोंकी भाँति निवास करते थे। कुछ
कालके बाद एक दिन जब महामना दिलीप जप कर रहे
थे, उसी समय उन्हें ऋषियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीका दर्शन
हुआ। महर्षिको उपस्थित देख राजाने उनका विधिवत्
पूजन किया और कहा—'उत्तम व्रतका पालन करने-
वाले मुनिश्रेष्ठ! मैं आपका दास दिलीप हूँ। आज
आपका दर्शन पाकर मैं सब पापोंसे मुक्त हो गया।'

वसिष्ठजीने कहा—महाभाग! तुम धर्मके ज्ञाता
हो। तुम्हारे विनय, इन्द्रियसंयम तथा सत्य आदि गुणोंसे मैं
सर्वथा संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?

दिलीप बोले— मुने! आप प्रसन्न हैं, इतनेसे ही
मैं अपनेको कृतकृत्य समझता हूँ। तपोधन! जो (तीर्थ-
यात्राके उद्देश्यसे) सारी पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करता है,
उसको क्या फल मिलता है? यह मुझे बताइये।

वसिष्ठजीने कहा—तात! तीर्थोंका सेवन
करनेसे जो फल मिलता है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।
तीर्थ ऋषियोंके परम आश्रय हैं। मैं उनका वर्णन करता
हूँ। वास्तवमें तीर्थसेवनका फल उसे ही मिलता है
जिसके हाथ, पैर और मन अच्छी तरह अपने वशमें हों;
जो विद्वान्, तपस्वी और कीर्तिमान् हों तथा जिसने दान
लेना छोड़ दिया हो। जो संतोषी, नियमपरायण, पवित्र,
अहंकारशून्य और उपवास (व्रत) करनेवाला हो; जो
अपने आहार और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर चुका हो;
जो सब दोषोंसे मुक्त हो तथा जिसमें क्रोधका अभाव
हो। जो सत्यवादी, दृढप्रतिज्ञ तथा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति
अपने-जैसा भाव रखनेवाला हो, उसीको तीर्थका पूरा
फल प्राप्त होता है। राजन्! दरिद्र मनुष्य यज्ञ नहीं कर
सकते; क्योंकि उसमें नाना प्रकारके साधन और
सामग्रीकी आवश्यकता होती है। कहीं कोई राजा या
धनवान् पुरुष ही यज्ञका अनुष्ठान कर पाते हैं। इसलिये
मैं तुम्हें वह शास्त्रोक्त कर्म बतला रहा हूँ, जिसे दरिद्र
मनुष्य भी कर सकते हैं तथा जो पुण्यकी दृष्टिसे
यज्ञफलोंकी समानता करनेवाला है; उसे ध्यान देकर
सुनो। पुष्कर तीर्थमें जाकर मनुष्य देवाधिदेवके समान
हो जाता है। महाराज! दिव्यशक्तिसे सम्पन्न देवता, दैत्य
तथा ब्रह्मर्षिगण वहाँ तपस्या करके महान् पुण्यके भागी
हुए हैं; जो मनीषी पुरुष मनसे भी पुष्कर तीर्थके सेवनकी
इच्छा करता है, उसके सब पाप धुल जाते हैं तथा वह
स्वर्गलोकमें पूजित होता है। इस तीर्थमें पितामह ब्रह्माजी
सदा प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं। महाभाग ! पुष्करमें
आकर देवता और ऋषि भी महान् पुण्यसे युक्त हो
परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। जो वहाँ स्नान करके पितरों
और देवताओंके पूजनमें प्रवृत्त होता है, उसके लिये
मनीषी विद्वान् अश्वमेधसे दसगुने पुण्यकी प्राप्ति बतलाते
हैं। जो पुष्करके वनमें जाकर एक ब्राह्मणको भी भोजन
कराता है, वह उसके पुण्यसे ब्रह्मधाममें स्थित अजित
लोकोंको प्राप्त होता है। जो सायंकाल और प्रातःकालमें
हाथ जोड़कर पुष्कर तीर्थका चिन्तन करता है, वह सब
तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। पुष्करमें जाने
मात्रसे स्त्री या पुरुषके जन्मभरके किये हुए सारे पाप नष्ट
हो जाते हैं। जैसे भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके
आदि हैं, उसी प्रकार पुष्कर भी समस्त तीर्थोंका आदि
कहलाता है। पुष्करमें नियम और पवित्रतापूर्वक बारह
वर्षतक निवास करके मनुष्य सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्त
कर लेता है और अन्तमें ब्रह्मलोकको जाता है। जो पूरे
सौ वर्षोंतक अग्निहोत्रका अनुष्ठान करता है अथवा
केवल कार्तिककी पूर्णिमाको पुष्करमें निवास करता है,
उसके ये दोनों कर्म समान ही हैं। पहले तो पुष्करमें
जाना ही कठिन है। जानेपर भी वहाँ तपस्या करना और
भी कठिन है। पुष्करमें दान देना उससे भी कठिन है
और सदा वहाँ निवास करना तो बहुत ही मुश्किल है।