पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७०-मातलिके द्वारा भगवान् शिव और श्रीविष्णुकी महिमाका वर्णन, मातलिको विदा करके राजा ययातिका वैष्णवधर्मके प्रचारद्वारा भूलोकको वैकुण्ठतुल्य बनाना तथा ययातिके दरबारमें काम आदिका नाटक खेलना
२९८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
धर्मराजके नगरमें सुखपूर्वक जाता है; इसलिये धर्मका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। राजन् ! जो लोग क्रूर कर्म करते और दान नहीं देते हैं, उन्हें नरकमें दुःसह दुःख भोगना पड़ता है। दान करके मनुष्य अनुपम सुख भोगते हैं।
जो एक दिन भी भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह भी शिवलोकको प्राप्त होता है; फिर जो अनेकों बार उनकी अर्चना कर चुका है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। श्रीविष्णुकी भक्तिमें तत्पर और श्रीविष्णुके ध्यानमें संलग्न रहनेवाले वैष्णव वैकुण्ठधाममें चक्रधारी भगवान् श्रीविष्णुके समीप जाते हैं। श्रीविष्णुका उत्तम लोक श्रीशङ्करजीके निवासस्थानसे ऊपर समझना चाहिये। वहाँ श्रीविष्णुके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले वैष्णव मनुष्य ही जाते हैं। मनुष्योंमें श्रेष्ठ, सदाचारी, यज्ञ करानेवाले, सुनीतियुक्त और विद्वान् ब्राह्मण ब्रह्मलोकको जाते हैं। युद्धमें उत्साहपूर्वक जानेवाले क्षत्रियोंको इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है तथा अन्यान्य पुण्यकर्ता भी पुण्यलोकोंमें गमन करते हैं।
मातलिके द्वारा भगवान् शिव और श्रीविष्णुकी महिमाका वर्णन, मातलिको विदा करके राजा ययातिके वैष्णवधर्मके प्रचारद्वारा भूलोकको वैकुण्ठ-तुल्य बनाना तथा ययातिके दरबारमें काम आदिका नाटक खेलना
ययाति बोले— मातले ! तुमने धर्म और अधर्म—सबका उत्तम प्रकारसे वर्णन किया। अब देवताओंके लोकोंकी स्थितिका वर्णन करो। उनकी संख्या बताओ। जिस पुण्यके प्रसङ्गसे जिसने जो लोक प्राप्त किया हो, उसका भी वर्णन करो।
मातलिने कहा— राजन् ! देवताओंके लोक भावमय हैं। भावोंके अनेक रूप दिखायी देते हैं; अतः भावात्मक जगत्की संख्या करोड़ोंतक पहुँच जाती है। परन्तु पुण्यात्माओंके लिये उनमेंसे अट्ठाईस लोक ही प्राप्य हैं, जो एक-दूसरेके ऊपर स्थित और अत्यन्त विशाल हैं। जो लोग भगवान् शङ्करको नमस्कार करते हैं, उन्हें शिवलोकका विमान प्राप्त होता है। जो प्रसङ्गवश भी शिवका स्मरण या नाम-कीर्तन अथवा उन्हें नमस्कार कर लेता है, उसे अनुपम सुखकी प्राप्ति होती है। फिर जो निरन्तर उनके भजनमें ही लगे रहते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है। जो ध्यानके द्वारा भगवान् श्रीविष्णुका चिन्तन करते हैं और सदा उन्हींमें मन लगाये रहते हैं, वे उन्हींके परम पदको प्राप्त होते हैं। नरश्रेष्ठ ! श्रीशिव और भगवान् श्रीविष्णुके लोक एक-से ही हैं, उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है; क्योंकि उन दोनों महात्माओं—श्रीशिव तथा श्रीविष्णुका स्वरूप भी एक ही है। श्रीविष्णुरूपधारी शिव और श्रीशिवरूपधारी विष्णुको नमस्कार है। श्रीशिवके हृदयमें विष्णु और श्रीविष्णुके हृदयमें भगवान् शिव विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये तीनों देवता एकरूप ही हैं। इन तीनोंके स्वरूपमें कोई अन्तर नहीं है, केवल गुणोंका भेद बतलाया गया है।* राजेन्द्र ! आप श्रीशिवके भक्त तथा भगवान् विष्णुके अनुरागी हैं; अतः आपपर ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवता प्रसन्न हैं। मानद ! मैं इन्द्रकी आज्ञासे इस समय आपके पास आया हूँ। अतः पहले इन्द्रलोकमें चलिये; उसके बाद क्रमशः ब्रह्मलोक, शिवलोक तथा विष्णुलोकको जाइयेगा। वे लोक दाह
* शैवं च वैष्णवं लोकमेकरूपं नरोत्तम । द्वयोश्चाप्यन्तरं नास्ति एकरूपं महात्मनोः ॥
शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे । शिवस्य हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये शिवः ॥
एकमूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । त्रयाणामन्तरं नास्ति गुणभेदाः प्रकीर्तिताः ॥
(७१ । १८—२०)
भूमिखण्ड ] * मातलिके द्वारा भगवान् शिव और श्रीविष्णुकी महिमाका वर्णन * २९९
और प्रलयसे रहित हैं।
**पिप्पलने पूछा—**ब्रह्मन् ! मातलिकी बात सुनकर नहुषपुत्र राजा ययातिने क्या किया ? इसका विस्तारके साथ वर्णन कीजिये।
**सुकर्मा बोले—**विप्रवर ! सुनिये, उस समय सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नृपवर ययातिने मातलिसे इस प्रकार कहा—'देवदूत ! तुमने स्वर्गका सारा गुण-अवगुण मुझे पहले ही बता दिया है। अतः अब मैं शरीर छोड़कर स्वर्गलोकमें नहीं जाऊँगा। देवाधिदेव इन्द्रसे तुम यही जाकर कह देना। भगवान् हृषीकेशके नामोंका उच्चारण ही सर्वोत्तम धर्म है। मैं प्रतिदिन इसी रसायनका सेवन करता हूँ। इससे मेरे रोग, दोष और पापादि नष्ट हो गये हैं। संसारमें श्रीकृष्णका नाम सबसे बड़ी औषध है। इसके रहते हुए भी मनुष्य पाप और व्याधियोंसे पीड़ित होकर मृत्युको प्राप्त हो रहे हैं—यह कितने आश्चर्यकी बात है। लोग कितने बड़े मूर्ख हैं कि श्रीकृष्ण-नामका रसायन नहीं पीते।* भगवान्की पूजा, ध्यान, नियम, सत्य-भाषण तथा दानसे शरीरकी शुद्धि होती है। इससे रोग और दोष नष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर भगवान्के प्रसादसे मनुष्य शुद्ध हो जाता है। इसलिये मैं अब स्वर्गलोकको नहीं चलूँगा। अपने तपसे, भावसे और धर्माचरणके द्वारा भगवत्-कृपासे इस पृथ्वीको ही स्वर्ग बनाऊँगा; यह जानकर तुम यहाँसे जाओ और सारी बातें इन्द्रसे कह सुनाओ।'
राजा ययातिकी यह बात सुनकर मातलि चले गये। उन्होंने इन्द्रसे सब बातें निवेदन कीं। उन्हें सुनकर इन्द्र पुनः राजाको स्वर्गमें लानेके विषयमें विचार करने लगे।
**पिप्पलने पूछा—**ब्रह्मन् ! इन्द्रके दूत महाभाग मातलिके चले जानेपर धर्मात्मा ययातिने कौन-सा कार्य किया ?
**सुकर्मा बोले—**विप्रवर ! देवराजके दूत मातलि जब चले गये, तब राजा ययातिने मन-ही-मन कुछ विचार किया और तुरंत ही प्रधान-प्रधान दूतोंको बुलाकर उन्हें धर्म और अर्थसे युक्त उत्तम आदेश दिया—'दूतो ! तुमलोग मेरी आज्ञा मानकर अपने और दूसरे देशोंमें जाओ; तुम्हारे मुखसे वहाँके सब लोग मेरी धर्मयुक्त बात सुनें और सुनकर उसका पालन करें। जगत्के मनुष्य परम पवित्र और अमृतके समान सुखदायी भगवत्-सम्बन्धी भावोंद्वारा उत्तम मार्गका आश्रय लें। सदा तत्पर होकर शुभ कर्मोंका अनुष्ठान, भगवत्तत्त्वका ज्ञान, भगवान्का ध्यान और तपस्या करें। सब लोग विषयोंका परित्याग करके यज्ञ और दानके द्वारा एकमात्र मधुसूदनका पूजन करें। सर्वत्र सूखे और गीलेमें, आकाश और पृथ्वीपर तथा चराचर प्राणियोंमें केवल श्रीहरिका दर्शन करें। जो मानव लोभ या मोहवश लोकमें मेरी इस आज्ञाका पालन नहीं करेगा, उसे निश्चय ही कठोर दण्ड दिया जायगा। मेरी दृष्टिमें वह चोरकी भाँति निकृष्ट समझा जायगा।'
राजाके ये वचन सुनकर दूतोंका हृदय प्रसन्न हो गया। वे समूची पृथ्वीपर घूम-घूमकर समस्त प्रजाको महाराजका आदेश सुनाने लगे—'ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके मनुष्यो ! राजा ययातिने संसारमें परम पवित्र अमृत ला दिया है। आप सब लोग उसका पान करें। उस अमृतका नाम है—पुण्यमय वैष्णव धर्म। वह सब दोषोंसे रहित और उत्तम परिणामका जनक है। भगवान् केशव सबका क्लेश हरनेवाले, सर्वश्रेष्ठ, आनन्दस्वरूप और परमार्थ-तत्त्व हैं। उनका नाममय अमृत सब दोषोंको दूर करनेवाला है। महाराज ययातिने उस अमृतको यहीं सुलभ कर दिया है। संसारके लोग इच्छानुसार उसका पान करें। भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है। उनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं। वे जगत्के आधारभूत और महेश्वर हैं। पापोंका नाश करके आनन्द प्रदान करते हैं। दानवों और दैत्योंका संहार करनेवाले हैं। यज्ञ उनके अङ्गरूप हैं, उनके
* विद्यमाने हि संसारे कृष्णनाम्नि महौषधे। मानवा मरणं यान्ति पापव्याधिप्रपीडिताः।
न पिबन्ति महामूढाः कृष्णनामरसायनम्॥ (७२। १८)
३०० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
हाथमें सुदर्शन चक्र शोभा पाता है। वे पुण्यकी निधि और सुखरूप हैं। उनके स्वरूपका कहीं अन्त नहीं है। सम्पूर्ण विश्व उनके हृदयमें निवास करता है। वे निर्मल, सबको आराम देनेवाले, 'राम'-नामसे विख्यात, सबमें रमण करनेवाले, मुर दैत्यके शत्रु, आदित्यस्वरूप, अन्धकारके नाशक, मलरूप कमलोंके लिये चाँदनीरूप, लक्ष्मीके निवासस्थान, सगुण और देवेश्वर हैं। उनका नामामृत सब दोषोंको दूर करनेवाला है। राजा ययातिने उसे यहीं सुलभ कर दिया है, सब लोग उसका पान करें। यह नामामृतस्तोत्र दोषहारी और उत्तम पुण्यका जनक है। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुमें भक्ति रखनेवाला जो महात्मा पुरुष प्रतिदिन प्रातःकाल नियमपूर्वक इसका पाठ करता है, वह मुक्त हो जाता है।*
सुकर्मा कहते हैं— राजा ययातिके दूत सम्पूर्ण देशों, द्वीपों, नगरों और गाँवोंमें कहते फिरते थे— 'लोगो! महाराजकी आज्ञा सुनो, तुमलोग पूरा जोर लगाकर सर्वतोभावेन भगवान् विष्णुकी पूजा करो। दान, यज्ञ, शुभकर्म, धर्म और पूजन आदिके द्वारा भगवान् मधुसूदनकी आराधना करते हुए मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंसे उन्हींका ध्यान—चिन्तन करो।' इस प्रकार राजाके उत्तम आदेशका, जो शुभ पुण्य उत्पन्न करनेवाला था, भूतल-निवासी सब लोगोंने श्रवण किया। उसी समयसे सम्पूर्ण मनुष्य एकमात्र भगवान् मुरारिका ध्यान, गुणगान, जप और तप करने लगे। वेदोक्त सूक्तों और मन्त्रोंद्वारा, जो कानोंको पवित्र करनेवाले तथा अमृतके समान मधुर थे, श्रीकेशवका यजन करने लगे। उनका चित्त सदा भगवान्में ही लगा रहता था। वे समस्त विषयों और दोषोंका परित्याग करके व्रत, उपवास, नियम और दानके द्वारा भक्तिपूर्वक जगन्निवास श्रीविष्णुका पूजन करते थे। राजाका भगवदाराधन-सम्बन्धी आदेश भूमण्डलपर प्रवर्तित हो गया। सब लोग वैष्णव प्रभावके कारण भगवान्का यजन करने लगे। यज्ञ-विधिको जाननेवाले विद्वान् नाम और कर्मके द्वारा श्रीविष्णुका यजन करते और उन्हींके ध्यानमें संलग्न रहते थे। उनका सारा उद्योग भगवान्के लिये ही होता था। वे विष्णु-पूजामें निरन्तर लगे रहते थे। जहाँतक यह सारा भूमण्डल है और जहाँतक प्रचण्ड किरणोंवाले भगवान् सूर्य तपते हैं, वहाँतक समस्त मनुष्य भगवद्भक्त हो गये। श्रीविष्णुके प्रभावसे, उनका पूजन, स्तवन और नाम-कीर्तन करनेसे सबके शोक दूर हो गये। सभी पुण्यात्मा और तपस्वी बन गये। किसीको रोग नहीं सताता था। सब-के-सब दोष और रोषसे शून्य तथा समस्त ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो गये थे।
महाभाग ! उन लोगोंके घरोंके दरवाजोंपर सदा ही पुण्यमय कल्पवृक्ष और समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली गौएँ रहती थीं। उनके घरमें चिन्तामणि नामकी मणि थी, जो परम पवित्र और सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली मानी गयी है। भगवान् विष्णुकी कृपासे पृथ्वीके समस्त मानव सब प्रकारके दोषोंसे रहित हो गये थे। पुत्र तथा पौत्र उनकी शोभा बढ़ाते थे। वे मङ्गलसे युक्त, परम पुण्यात्मा, दानी ज्ञानी और ध्यानपरायण थे। धर्मके ज्ञाता महाराज ययातिके शासनकालमें दुर्भिक्ष
* श्रीकेशवं क्लेशहरं वरेण्यमानन्दरूपं परमार्थमेव। नामामृतं दोषहरं तु राज्ञा आनीतमत्रैव पिबन्तु लोकाः ॥
श्रीपद्मनाभं कमलेक्षणं च आधाररूपं जगतां महेशम्। नामामृतं दोषहरं तु राज्ञा आनीतमत्रैव पिबन्तु लोकाः ॥
पापापहं व्याधिविनाशलूपमानन्ददं दानवदैत्यनाशनम्। नामामृतं दोषहरं तु राज्ञा आनीतमत्रैव पिबन्तु लोकाः ॥
यज्ञाङ्गरूपं च रथाङ्गपाणिं पुण्याकरं सौख्यमनन्तरूपम्। नामामृतं दोषहरं तु राज्ञा आनीतमत्रैव पिबन्तु लोकाः ॥
विश्वाधिवासं विमलं विरामं रामाभिधानं रमणं मुरारिम्। नामामृतं दोषहरं तु राज्ञा आनीतमत्रैव पिबन्तु लोकाः ॥
आदित्यरूपं तमसां विनाशं चन्द्रप्रकाशं मलपङ्कजानाम्। नामामृतं दोषहरं तु राज्ञा आनीतमत्रैव पिबन्तु लोकाः ॥
सखड्गपाणिं मधुसूदनाख्यं तं श्रीनिवासं सगुणं सुरेशम्। नामामृतं दोषहरं तु राज्ञा आनीतमत्रैव पिबन्तु लोकाः ॥
नामामृतं दोषहरं सुपुण्यमधीत्य यो माधवविष्णुभक्तः। प्रभातकाले नियतो महात्मा स याति मुक्तिं न हि कारणं च ॥
(७३। १०—१७)
भूमिखण्ड ] * मातलिके द्वारा भगवान् शिव और श्रीविष्णुकी महिमाका वर्णन * ३०१
और व्याधियोंका भय नहीं था। मनुष्योंकी अकाल-मृत्यु नहीं होती थी। सब लोग विष्णु-सम्बन्धी व्रतोंका पालन करनेवाले और वैष्णव थे। भगवान्का ही ध्यान और उन्हींके नामोंका जप उनकी दिनचर्याका अङ्ग बन गया था। वे सब लोग भाव-भक्तिके साथ भगवान्की आराधनामें तत्पर रहते थे। द्विजश्रेष्ठ ! उस समय सब लोगोंके घरोंमें तुलसीके वृक्ष और भगवान्के मन्दिर शोभा पाते थे। सबके घर साफ-सुथरे और चमकीले थे तथा उत्तम गुणोंके कारण दिव्य दिखायी देते थे। सर्वत्र वैष्णव भाव छा रहा था। नाना प्रकारके माङ्गलिक उत्सवोंका दर्शन होता था। विप्रवर ! भूलोकमें सदा शङ्खोंकी ध्वनियां सुनायी पड़ती थीं, जो आपसमें टकराया करतीं थीं। वे ध्वनियां समस्त दोषों और पापोंका विनाश करनेवाली थीं। भगवान् विष्णुमें भक्ति रखनेवाली स्त्रियोंने अपने-अपने घरके दरवाजेपर शङ्ख, स्वस्तिक और पद्मकी आकृतियां लिख रखी थीं। सब लोग केशवका गुणगान करते थे। कोई 'हरि' और 'मुरारि' का उच्चारण करता तो कोई 'श्रीश', 'अच्युत' तथा माधवका नाम लेता था। कितने ही श्रीनरसिंह, कमलनयन, गोविन्द, कमलापति, कृष्ण और राम-नामकी रट लगाते हुए भगवान्की शरणमें जाते, मन्त्रोंके द्वारा उनका जप करते तथा पूजन भी करते थे। सब-के-सब वैष्णव थे; अतः वे श्रीविष्णुके ध्यानमें मग्न रहकर उन्हींको दण्डवत् प्रणाम किया करते थे।
कृष्ण, विष्णु, हरि, राम, मुकुन्द, मधुसूदन, नारायण, हृषीकेश, नरसिंह, अच्युत, केशव, पद्मनाभ, वासुदेव, वामन, वाराह, कमठ, मत्स्य, कपिल, सुराधिप, विश्वेश, विश्वरूप, अनन्त, अनघ, शुचि, पुरुष, पुष्कराक्ष, श्रीधर, श्रीपति, हरि, श्रीद, श्रीश, श्रीनिवास, सुमोक्ष, मोक्षद और प्रभु—इन नामोंका उच्चारण करते हुए पृथ्वीके समस्त मानव—बाल, वृद्ध और कुमार भी भगवान्का भजन करते थे। घरके काम-धंधोंमें लगी हुई स्त्रियाँ सदा भगवान् श्रीहरिको प्रणाम करतीं और बैठते, सोते, चलते, ध्यान लगाते तथा ज्ञान प्राप्त करते समय भी वे लक्ष्मीपतिका स्मरण करती रहती थीं। खेल-कूदमें लगे हुए बालक गोविन्दको मस्तक झुकाते और दिन-रात मधुर हरिनामका कीर्तन करते रहते थे। द्विजश्रेष्ठ ! सर्वत्र भगवान् विष्णुके नामकी ही ध्वनि सुनायी पड़ती थी। भूतलके समस्त मानव वैष्णवोचित भावसे रहा करते थे। महलों और देवमन्दिरोंके कलशोंपर सूर्यमण्डलके समान चक्र शोभा पाते थे। पृथ्वीपर सर्वत्र श्रीकृष्णका भाव दृष्टिगोचर होता था। यह भूतल विष्णुलोककी समानताको पहुँच गया था। वैकुण्ठमें वैष्णव लोग जैसे विष्णुका उच्चारण करते हैं, उसी प्रकार इस पृथ्वीपर मनुष्य कृष्ण-नामका कीर्तन करते थे। भूतल और वैकुण्ठ दोनों लोकोंका एक ही भाव दिखायी देता था। वृद्धावस्था और रोगका भय नहीं था; क्योंकि मनुष्य अजर-अमर हो गये थे। भूलोकमें दान और भोगका अधिक प्रभाव दृष्टिगोचर होता था। प्रायः सब मनुष्य—द्विजमात्र वेदोंके विद्वान् और ज्ञान-ध्यानपरायण थे। सब यज्ञ और दानमें लगे रहते थे। सबमें दयाका भाव था। सभी परोपकारी, शुभ विचार-सम्पन्न और धर्मनिष्ठ थे। महाराज ययातिके उपदेशसे भूमण्डलके समस्त मानव वैष्णव हो गये थे।
भगवान् श्रीविष्णु कहते हैं—नृपश्रेष्ठ वेन ! नहुषपुत्र महाराज ययातिका चरित्र सुनो; वे सर्वधर्म-परायण और निरन्तर भगवान् विष्णुमें भक्ति रखनेवाले थे। उन्हें इस पृथ्वीपर रहते एक लाख वर्ष व्यतीत हो गये। परन्तु उनका शरीर नित्य-नूतन दिखायी देता था, मानो वे पचीस वर्षके तरुण हों। भगवान् विष्णुके प्रसादसे राजा ययाति बड़े ही प्रशस्त और प्रौढ़ हो गये थे। भूमण्डलके मनुष्य कामनाओंके बन्धनसे रहित होनेके कारण यमराजके पास नहीं जाते थे। वे दान-पुण्यसे सुखी थे और सब धर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहते थे। जैसे दूर्वा और वटवृक्ष पृथ्वीपर विस्तारको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार वे मनुष्य पुत्र-पौत्रोंके द्वारा वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे। मृत्युरूपी दोषसे हीन होनेके कारण वे दीर्घजीवी होते थे। उनका शरीर अधिक कालतक दृढ़ रहता था। वे सुखी थे और बुढ़ापेका रोग उन्हें छू भी नहीं गया था। पृथ्वीके सभी मनुष्य पचीस वर्षकी