पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७४-कुञ्जलका अपने पुत्र विज्ज्वलको श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्र सुनाना
३१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
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जो मनुष्योंसे कटु वचन बोलना नहीं जानते, जो प्रिय वचन बोलनेके लिये प्रसिद्ध हैं; जिन्होंने बावली, कुआँ, सरोवर, पौसला, धर्मशाला और बगीचे बनवाये हैं; जो मिथ्यावादियोंके लिये भी सत्यपूर्ण बर्ताव करनेवाले और कुटिल मनुष्योंके लिये भी सरल हैं, वे दयालु तथा सदाचारी मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं।
जो एकमात्र धर्मका अनुष्ठान करके अपने प्रत्येक दिवसको सदा सफल बनाते हैं तथा नित्य ही व्रतका पालन करते हैं; जो शत्रु और मित्रकी समान भावसे सराहना करते और सबको समान दृष्टिसे देखते हैं; जिनका चित्त शान्त है, जो अपने मनको वशमें कर चुके हैं, जिन्होंने भयसे डरे हुए ब्राह्मणों तथा स्त्रियोंकी रक्षाका नियम ले रखा है; जो गङ्गा, पुष्कर तीर्थ और विशेषतः गयामें पितरोंको पिण्ड-दान करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं। जो इन्द्रियोंके वशमें नहीं रहते, जिनकी संयममें प्रवृत्ति है; जिन्होंने लोभ, भय और क्रोधका परित्याग कर दिया है; जो शरीरमें पीड़ा देनेवाले जूँ, खटमल और डाँस आदि जन्तुओंका भी पुत्रकी भाँति पालन करते हैं—उन्हें मारते नहीं; सर्वदा मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें लगे रहते हैं और परोपकारमें ही जीवन व्यतीत करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकके अतिथि होते हैं। जो विशेष विधिके अनुसार यज्ञोंका अनुष्ठान करते, सब प्रकारके द्वन्द्वोंको सहते तथा इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं; जो पवित्र और सत्त्वगुणमें स्थित रहकर मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा भी कभी परायी स्त्रियोंके साथ रमण नहीं करते; निन्दित कर्मोंसे दूर रहते, विहित कर्मोंका अनुष्ठान करते तथा आत्माकी शक्तिको जानते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं।
जो दूसरोंके प्रतिकूल आचरण करता है, उसे अत्यन्त दुःखदायी घोर नरकमें गिरना पड़ता है तथा जो सदा दूसरोंके अनुकूल चलता है, उस मनुष्यके लिये सुखदायिनी मुक्ति दूर नहीं है। राजन्! कर्मोंद्वारा जिस प्रकार दुर्गति और सुगति प्राप्त होती है, वह सब मैंने तुम्हें यथार्थरूपसे बतला दिया।
कुञ्जल कहता है—धर्म-अधर्मकी सम्पूर्ण गतिके विषयमें महर्षि जैमिनिका भाषण सुनकर राजा सुबाहुने कहा—'द्विजश्रेष्ठ! मैं भी धर्मका ही अनुष्ठान करूँगा, पापका नहीं। जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत भगवान् वासुदेवका निरन्तर भजन करूँगा।'
इस निश्चयके अनुसार राजा सुबाहुने धर्मके द्वारा भगवान् मधुसूदनका पूजन किया तथा नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्की आराधना करके तथा सम्पूर्ण भोगोंको भोगकर वे शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक विष्णुलोकको पधार गये।
कुञ्जलका अपने पुत्र विज्वलको श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्र सुनाना
तदनन्तर वक्ताओंमें श्रेष्ठ कुञ्जलने विज्वलको परम पवित्र श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्रका उपदेश किया—
इस श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्रके अनुष्टुप् छन्द, नारद ऋषि और ओंकार देवता हैं; सम्पूर्ण पातकोंके नाश तथा चतुर्वर्गकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग है।* 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—यही इस स्तोत्रका मूलमन्त्र है।†
‡ जो परम पावन, पुण्यस्वरूप, वेदके ज्ञाता,
* ॐ अस्य श्रीवासुदेवाभिधानस्तोत्रस्यानुष्टुप् छन्दः, नारद ऋषिः, ओंकारो देवता, सर्वपातकनाशाय चतुर्वर्गसाधने च विनियोगः।
† 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इति मन्त्रः। (१८।३८)
‡ परमं पावनं पुण्यं वेदज्ञं वेदमन्दिरम्। विद्याधारं मखाधारं प्रणवं तं नमाम्यहम्॥
निरावासं निराकारं सुप्रकाशं महोदयम्। निर्गुणं गुणकर्तारं नमामि प्रणवं परम्॥
गायत्रीसाम गायन्तं गीतज्ञं गीतसुप्रियम्। गन्धर्वगीतभोक्तारं प्रणवं तं नमाम्यहम्॥
भूमिखण्ड ] <p align="center">* कुञ्जलका अपने पुत्र विज्वलको श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्र सुनाना *</p> <p align="right">३१९</p>
वेदमन्दिर, विद्याके आधार तथा यज्ञके आश्रय हैं, उन प्रणवस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो आवास (गृह) और आकारसे रहित, उत्तम प्रकाशरूप, महान् अभ्युदयशाली, निर्गुण तथा गुणोंके उत्पादक हैं, उन प्रणवस्वरूप परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ। जो गायत्री-सामका गान करनेवाले, गीतके ज्ञाता, गीतप्रेमी तथा गन्धर्वगीतका अनुभव करनेवाले हैं, उन प्रणवस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ।
महाकान्तं महोत्साहं महामोहविनाशनम्। आचिन्वन्तं जगत् सर्वं गुणातीतं नमाम्यहम्॥
भाति सर्वत्र यो भूत्वा भूतानां भूतिवर्धनः। समभावाय सद्धर्मं नमामि प्रणवं परम्॥
विचारं वेदरूपं तं यज्ञाख्यं यज्ञवल्लभम्। योनिं सर्वस्य लोकस्य ओंकारं प्रणमाम्यहम्॥
तारकं सर्वलोकानां नौरूपेण विराजितम्। संसारार्णवमग्नानां नमामि प्रणवं हरिम्॥
वसते सर्वभूतेषु एकरूपेण नैकधा। धामकैवल्यरूपेण नमामि वरदं सुखम्॥
सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं शुद्धं निर्गुणं गुणनायकम्। वर्जितं प्राकृतैर्भावैर्वेदाख्यं तं नमाम्यहम्॥
देवदैत्यवियोगैश्च वर्जितं तुष्टिभिस्तथा। वेदैश्च योगिभिर्ध्येयं तमोङ्कारं नमाम्यहम्॥
व्यापकं विश्ववेत्तारं विज्ञानं परमं पदम्। शिवं शिवगुणं शान्तं वन्दे प्रणवमीश्वरम्॥
यस्य मायां प्रविष्टास्तु ब्रह्माद्याश्च सुरासुराः। न विन्दन्ति परं शुद्धं मोक्षद्वारं नमाम्यहम्॥
आनन्दकन्दाय च केवल शुद्धाय हंसाय परावराय। नमोऽस्तु तस्मै गुणनायकाय श्रीवासुदेवाय महाप्रभाय॥
श्रीपाञ्चजन्येन विराजमानं रविप्रभेणापि सुदर्शनिन। गदाख्यकेनापि विशोभमानं विष्णुं सदैव शरणं प्रपद्ये॥
यं वेद कोशं सुगुणं गुणानामाधारभूतं सचराचरस्य। यं सूर्यवैश्वानरतुल्यतेजसं तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
तमोध्नानां स्वकरैर्विनाशं करोति नित्यं यतिधर्महेतुम्। उद्योतमानं रवितेजसोध्वं तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
सुधानिधानं विमलांशुरूपमानन्दमानेन विराजमानम्। यं प्राप्य जीवन्ति सुरादिलोकास्तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
यो भाति सर्वत्र रविप्रभावैः करोति शोषं च रसं ददाति। यः प्राणिनामन्तरगः स वायुस्तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
ज्येष्ठस्तु रूपेण स देवदेवो बिभर्ति लोकान् सकलान् महात्मा। एकार्णवे नौरिव वर्तते यस्तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
अन्तर्गतो लोकमयः सदैव भवत्यसौ स्थावरजङ्गमानाम्। स्वाहामुखो देवगणस्य हेतुस्तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
रसैः सुपुण्यैः सकलैस्तु पुष्टः ससौम्यरूपैर्गुणवित् स लोके। रत्नाधिपो निर्मलतेजसैव तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
अस्त्येव सर्वत्र विनाशहेतुः सर्वाश्रयः सर्वमयः स सर्वः। विना हृषीकैर्विषयान् प्रभुङ्क्ते तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
तेजःस्वरूपेण बिभर्ति लोकान् सत्त्वान् समस्तान् स चराचरस्य। निष्केवलो ज्ञानमयः सुशुद्धस्तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
दैत्यान्तकं दुःखविनाशमूलं शान्तं परं शक्तिमयं विशालम्। संप्राप्य देवा विलयं प्रयान्ति तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
सुखं सुखासं सुहृदं सुरेशं ज्ञानार्णवं तं सुहितं हितं च। सत्याश्रयं सत्यगुणोपविष्टं तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
यज्ञस्वरूपं पुरुषार्थरूपं सत्यान्वितं मार्पत्तिमेव पुण्यम्। विज्ञानमेतं जगतां निवासं तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
अम्भोधिमध्ये शयनं हि यस्य नागाङ्गभोगे शयने विशाले। श्रीः पादपद्मद्वयमेव सेवते तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
पुण्यान्वितं शङ्खरमेव नित्यं तीर्थैरनेकैः परिसेव्यमानम्। तत्पादपद्मद्वयमेव तस्य श्रीवासुदेवस्य नमामि नित्यम्॥
अघापहं वा यदि वाम्बुजं तद्रक्तोत्पलाभं ध्वजवायुयुक्तम्। अलंकृतं नूपुरमुद्रिकाभिः श्रीवासुदेवस्य नमामि पादम्॥
देवैस्तु सिद्धैर्मुनिभिः सदैव नुतं सुभक्त्या भुजगाधिपैश्च। तत्पादपङ्केरुहमेव पुण्यं श्रीवासुदेवस्य नमामि नित्यम्॥
यस्यापि पादाम्भसि मज्जमानाः पूतं दिवं यान्ति विकल्पनास्ते। मोक्षं लभन्ते मुनयः सुतुष्टास्तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये॥
पादोदकं तिष्ठति यत्र विष्णोर्गङ्गादितीर्थानि सदैव तत्र। पिबन्ति येऽद्यापि सपापदेहाः प्रयान्ति शुद्धाः सुगृहं मुरारेः॥
पादोदकेनाप्यभिषिच्यमाना अत्युग्रपापैः परिलिप्तदेहाः। ते यान्ति मुक्तिं परमेश्वरस्य तस्यैव पादौ सततं नमामि॥
नैवेद्यमात्रेण सुभक्षितेन सुचक्रणस्तस्य महात्मनश्च। ते वाजपेयस्य फलं लभन्ते सर्वार्थयुक्ताश्च नरा भवन्ति॥
नारायणं दुःखविनाशनं तं मायाविहीनं सकलं गुणज्ञम्। यं ध्यायमानाः सुगतिं व्रजन्ति तं वासुदेवं सततं नमामि॥
यो वन्द्यस्त्वृषिसिद्धचारणगणैर्देवैः सदा पूज्यते यो विश्वस्य हि सृष्टिहेतुकरणे ब्रह्मादिकानां प्रभुः।
यः संसारमहार्णवे निपतितस्योद्धारको वत्सलस्तस्यैवापि नमाम्यहं सुचरणौ भक्त्या वरौ साधकौ॥
यो दृष्टो निजमण्डपेऽसुरगणैः श्रीवामनः सामगः सामोद्गीतकुतूहलः सुरगणैस्त्रैलोक्य एकः प्रभुः।
कुर्वंस्तु ध्वनितैः स्वकैर्गतभयान् यः पापभीतान् रणे तस्याहं चरणारविन्दयुगलं वन्दे परं पावनम्॥
३२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
जो महान् कान्तिमान्, अत्यन्त उत्साही, महामोहके नाशक, सम्पूर्ण जगत्में व्यापक तथा गुणातीत हैं; जो सर्वत्र विद्यमान रहकर शोभायमान हो रहे हैं, प्राणियोंके ऐश्वर्य एवं कल्याणकी वृद्धि करते हैं तथा समताका भाव उत्पन्न करनेके लिये सद्धर्मका प्रसार करनेवाले हैं, उन प्रणवरूप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो विचारक हैं, वेद जिनका स्वरूप है, जो 'यज्ञ' के नामसे पुकारे जाते हैं, यज्ञ जिन्हें अत्यन्त प्रिय है, जो सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्तिका स्थान तथा समस्त जगत्का उद्धार करनेवाले हैं; संसार-सागरमें डूबे हुए प्राणियोंको बचानेके लिये जो नौकारूपसे विराजमान हैं, उन प्रणवस्वरूप श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण भूतोंमें निवास करते हैं, नाना रूपोंमें प्रतीत होते हुए भी एक रूपसे विराजमान हैं तथा जो परमधाम और कैवल्य (मोक्ष) के रूपमें प्रतिष्ठित हैं, उन सुखस्वरूप वरदाता भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, शुद्ध, निर्गुण, गुणोंके नियन्ता और प्राकृत भावोंसे रहित हैं, उन वेदसंज्ञक परमात्माको नमस्कार करता हूँ। जो देवताओं और दैत्योंके वियोगसे वर्जित (सर्वदा सबसे संयुक्त), तुष्टियोंसे रहित तथा वेदों और योगियोंके ध्येय हैं, उन ॐकारस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार करता हूँ। व्यापक, विश्वके ज्ञाता, विज्ञानस्वरूप, परमपदरूप, शिव; कल्याणमय गुणोंसे युक्त, शान्त एवं प्रणवरूप ईश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनकी मायाके प्रभावमें आकर ब्रह्मा आदि देवता और असुर भी उनके परम शुद्ध रूपको नहीं जानते तथा जो मोक्षके द्वार हैं, उन परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ।
जो आनन्दके मूलस्रोत, केवल (अद्वितीय) तथा शुद्ध हंसस्वरूप हैं; कार्य-कारणमय जगत् जिनका स्वरूप है; जो गुणोंके नियन्ता तथा महान् प्रभा-पुञ्जसे परिपूर्ण हैं, उन श्रीवासुदेवको नमस्कार है। जो पाञ्चजन्य नामक शङ्ख और सूर्यके समान तेजस्वी सुदर्शन चक्रसे विराजमान हैं तथा कौमोदकी गदा जिनकी शोभा बढ़ा रही है, उन भगवान् श्रीविष्णुकी मैं सदा शरण लेता हूँ। जो उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हैं, जिन्हें गुणोंका कोश माना जाता है, जो चराचर जगत्के आधार तथा सूर्य एवं अग्निके समान तेजस्वी हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ। जो अपने प्रकाशकी किरणोंसे अविद्याके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देते हैं, संन्यास-धर्मके प्रवर्तक हैं तथा सूर्यके समान तेजसे सबसे ऊँचे लोकमें प्रकाशित होते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ। जो चन्द्रमाके रूपमें अमृतके भंडार हैं, आनन्दकी मात्रासे जिनकी विशेष शोभा हो रही है, देवताओंसे लेकर सम्पूर्ण जीव जिनका आश्रय पाकर ही जीवन धारण करते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ। जो सूर्यके रूपमें सर्वत्र विराजमान रहकर पृथ्वीके रसको सोखते और पुनः नवीन रसकी वृष्टि करते हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर प्राणरूपसे व्याप्त हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ। जो महात्मा स्वरूपसे सबकी अपेक्षा ज्येष्ठ हैं, देवताओंके भी आराध्य देव हैं, सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं तथा प्रलयकालीन जलमें नौकाकी भाँति स्थित रहते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ। सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो स्थावर और जङ्गम—सभी प्राणियोंके भीतर निवास करते हैं, स्वाहा जिनका मुख है तथा जो देववृन्दकी उत्पत्तिका कारण हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ। जो सब प्रकारके परम पवित्र रसोंसे परिपुष्ट और शान्तिमय रूपोंसे युक्त हैं; संसारमें गुणज्ञ माने जाते हैं, रत्नोंके अधीश्वर हैं और निर्मल तेजसे शोभा पाते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं
राजन्तं द्विजमण्डले मखममुखे ब्रह्मश्रिया पूजितं दिव्यैर्नापि सुतेजसा करमयं यं चेन्द्रनीलोपमम्।
देवानां हितकाम्यया सुतनुजं वैरोचनस्यार्पकं याचन्तं मम दीयतां त्रिपदकं वन्दे परं वामनम्॥
तं दृष्टं रविमण्डले मुनिगणैः सम्भासवन्तं दिवं चन्द्राकैौ तु तपन्तमेव सहसा सम्भास्रवन्तौ सदा।
तस्यैवापि सुचक्रिणः सुरगणाः प्रापुर्लयं सांप्रतं काये विश्वविकोशके तमतुलं नौमि प्रभोर्विक्रमम्॥
(९८। ३९–७७)
भूमिखण्ड ] * कुञ्जलका अपने पुत्र उज्ज्वलको श्रीवासुदेवाभिधान-स्तोत्र सुनाना * ३२१
शरण लेता हूँ। जो सर्वत्र विद्यमान, सबकी मृत्युके हेतु, सबके आश्रय, सर्वमय तथा सर्वस्वरूप हैं, जो इन्द्रियोंके बिना ही विषयोंका अनुभव करते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ। जो अपने तेजोमय स्वरूपसे समस्त लोकों तथा चराचर जगत्के सम्पूर्ण जीवोंका पालन करते हैं तथा केवल ज्ञान ही जिनका स्वरूप है, उन परम शुद्ध भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ।
जो दैत्योंका अन्त करनेवाले, दुःख-नाशके मूल कारण, परम शान्त, शक्तिशाली और विराट्रूपधारी हैं; जिनको पाकर देवता भी मुक्त हो जाते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ। जो सुखस्वरूप और सुखसे पूर्ण हैं, सबके अकारण प्रेमी हैं, जो देवताओंके स्वामी और ज्ञानके महासागर हैं, जो परम हितैषी, कल्याणस्वरूप, सत्यके आश्रय और सत्त्व गुणमें स्थित हैं, उन भगवान् वासुदेवका मैं आश्रय लेता हूँ। यज्ञ और पुरुषार्थ जिनके रूप हैं; जो सत्यसे युक्त, लक्ष्मीके पति, पुण्यस्वरूप, विज्ञानमय तथा सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ। जो क्षीर-सागरके बीचमें शेषनागकी विशाल शय्यापर शयन करते हैं तथा भगवती लक्ष्मी जिनके युगल चरणारविन्दोंकी सेवा करती रहती हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ। श्रीवासुदेवके दोनों चरण-कमल पुण्यसे युक्त, सबका कल्याण करनेवाले तथा सर्वदा अनेकों तीर्थोंसे सुसेवित हैं, मैं उन्हें प्रतिदिन प्रणाम करता हूँ। श्रीवासुदेवका चरण समस्त पापोंको हरनेवाला है, वह लाल कमलकी शोभा धारण करता है; उसके तलवेमें ध्वजा और वायुके चिह्न हैं; वह नूपुरों तथा मुद्रिकाओंसे विभूषित है। ऐसी सुषमासे युक्त भगवान् वासुदेवके चरणको मैं प्रणाम करता हूँ। देवता, उत्तम सिद्ध, मुनि तथा नागराज वासुकि आदि जिसका भक्तिपूर्वक सदा ही स्तवन करते हैं, श्रीवासुदेवके उस पवित्र चरणकमलको मैं प्रतिदिन प्रणाम करता हूँ। जिनकी चरणोदकस्वरूपा गङ्गाजीमें गोते लगानेवाले प्राणी पवित्र एवं निष्पाप होकर स्वर्गलोकको जाते हैं तथा परम संतुष्ट मुनिजन उसमें अवगाहन करके मोक्ष प्राप्त करते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरण लेता हूँ। जहाँ भगवान् श्रीविष्णुका चरणोदक रहता है, वहाँ गङ्गा आदि तीर्थ सदैव मौजूद रहते हैं; आज भी जो लोग उसका पान करते हैं, वे पापी रहे हों तो भी शुद्ध होकर श्रीविष्णुभगवान्के उत्तम धामको जाते हैं। जिनका शरीर अत्यन्त भयंकर पाप-पङ्कमें सना है, वे भी जिनके चरणोदकसे अभिषिक्त होनेपर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, उन परमेश्वरके युगलचरणोंको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ। उत्तम सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले महात्मा श्रीविष्णुके नैवेद्यका भक्षण करनेमात्रसे मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल प्राप्त करते हैं तथा सम्पूर्ण पदार्थ पा जाते हैं। दुःखोंका नाश करनेवाले, मायासे रहित, सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त तथा समस्त गुणोंके ज्ञाता जिन भगवान् नारायणका ध्यान करके मनुष्य उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं, उन श्रीवासुदेवको मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
जो ऋषि, सिद्ध और चारणोंके वन्दनीय हैं; देवगण सदा जिनकी पूजा करते हैं, जो संसारकी सृष्टिका साधन जुटानेमें ब्रह्मा आदिके भी प्रभु हैं, संसाररूपी महासागरमें गिरे हुए जीवका जो उद्धार करनेवाले हैं, जिनमें वत्सलता भरी हुई है, जो श्रेष्ठ और समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाले हैं; उन भगवान्के उत्तम चरणोंको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ। जिन्हें असुरोंने अपने यज्ञमण्डपमें देवताओंसहित सामगान करते हुए वामन ब्रह्मचारीके रूपमें देखा था, जो सामगानके लिये उत्सुक रहते हैं, त्रिलोकीके जो एकमात्र स्वामी हैं तथा युद्धमें पाप या मृत्युसे डरे हुए आत्मीयजनोंको जो अपनी ध्वनिमात्रसे निर्भय बना देते हैं, उन भगवान्के परम पावन युगल चरणारविन्दोंकी मैं वन्दना करता हूँ। जो यज्ञके मुहानेपर विप्र-मण्डलीमें खड़े हो अपने ब्राह्मणोचित तेजसे देदीप्यमान एवं पूजित हो रहे हैं, दिव्य तेजके कारण किरणोंके समूह-से जान पड़ते हैं तथा इन्द्रनील मणिके समान दिखायी देते हैं, जो देवताओंके हितकी इच्छासे विरोचनके दानी पुत्र बलिके समक्ष 'मुझे तीन पग भूमि दीजिये।' ऐसा कहकर