पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१४-श्रीमद्भगवद्गीताके छठे अध्यायका माहात्म्य
उत्तरखण्ड ] * श्रीमद्भगवद्गीताके छठे अध्यायका माहात्म्य * ८२३
प्रतिदिन गीताके पाँचवें अध्यायका जप करना उनका सदाका नियम था। पाँचवें अध्यायको श्रवण कर लेनेपर महापापी पुरुष भी सनातन ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त कर लेता है। उसी पुण्यके प्रभावसे शुद्धचित्त होकर उन्होंने अपने शरीरका परित्याग किया था। गीताके पाठसे जिनका शरीर निर्मल हो गया था, जो आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके थे, उन्हीं महात्माकी खोपड़ीका जल पाकर तुम दोनों पवित्र हो गये हो। अतः अब तुम दोनों मनोवाञ्छित लोकोंको जाओ; क्योंकि गीताके पाँचवें अध्यायके माहात्म्यसे तुम दोनों शुद्ध हो गये हो।
**श्रीभगवान् कहते हैं—**सबके प्रति समान भाव रखनेवाले धर्मराजके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर ये दोनों बहुत प्रसन्न हुए और विमानपर बैठकर वैकुण्ठ-धामको चले गये।
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श्रीमद्भगवद्गीताके छठे अध्यायका माहात्म्य
**श्रीभगवान् कहते हैं—**सुमुखि ! अब मैं छठे अध्यायका माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुननेवाले मनुष्योंके लिये मुक्ति करतलगत हो जाती है। गोदावरी नदीके तटपर प्रतिष्ठानपुर (पैठण) नामक एक विशाल नगर है, जहाँ मैं पिप्पलेशके नामसे विख्यात होकर रहता हूँ। उस नगरमें जानश्रुति नामक एक राजा रहते थे, जो भूमण्डलकी प्रजाको अत्यन्त प्रिय थे। उनका प्रताप मार्तण्ड-मण्डलके प्रचण्ड तेजके समान जान पड़ता था। प्रतिदिन होनेवाले उनके यज्ञके धुएँसे नन्दनवनके कल्पवृक्ष इस प्रकार काले पड़ गये थे, मानो राजाकी असाधारण दानशीलता देखकर वे लज्जित हो गये हों। उनके यज्ञमें प्राप्त पुरोडाशके रसास्वादनमें सदा आसक्त होनेके कारण देवतालोग कभी प्रतिष्ठानपुरको छोड़कर बाहर नहीं जाते थे। उनके दानके समय छोड़े हुए जलकी धारा, प्रतापरूपी तेज और यज्ञके धूमोंसे पुष्ट होकर मेघ ठीक समयपर वर्षा करते थे। उस राजाके शासनकालमें ईतियों (खेतीमें होनेवाले छः प्रकारके उपद्रवों) के लिये कहीं थोड़ा भी स्थान नहीं मिलता था और अच्छी नीतियोंका सर्वत्र प्रसार होता था। वे बावली, कुएँ और पोखरे खुदवानेके बहाने मानो प्रतिदिन पृथ्वीके भीतरकी निधियोंका अवलोकन करते थे। एक समय राजाके दान, तप, यज्ञ और प्रजापालनसे सन्तुष्ट होकर स्वर्गके देवता उन्हें वर देनेके लिये आये। वे कमलनालके समान उज्ज्वल हंसोंका रूप धारण कर अपनी पाँखें हिलाते हुए आकाशमार्गसे चलने लगे। बड़ी उतावलीके साथ उड़ते हुए वे सभी हंस परस्पर बातचीत भी करते जाते थे। उनमेंसे भद्राश्व आदि दो-तीन हंस वेगसे उड़कर आगे निकल गये। तब पीछेवाले हंसोंने आगे जानेवालोंको सम्बोधित करके कहा—'अरे भाई भद्राश्व ! तुमलोग वेगसे चलकर आगे क्यों हो गये ? यह मार्ग बड़ा दुर्गम है; इसमें हम सबको साथ मिलकर चलना चाहिये। क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता, यह सामने ही पुण्यमूर्ति महाराज जानश्रुतिका तेजःपुंज अत्यन्त स्पष्ट रूपसे प्रकाशमान हो रहा है। [उस तेजसे भस्म होनेकी आशङ्का है, अतः सावधान होकर चलना चाहिये।]'
पीछेवाले हंसोंके वचन सुनकर आगेवाले हंस हँस पड़े और उच्चस्वरसे उनकी बातोंकी अवहेलना करते हुए बोले—'अरे भाई ! क्या इस राजा जानश्रुतिका तेज ब्रह्मवादी महात्मा रैक्वके तेजसे भी अधिक तीव्र है ?'
हंसोंकी ये बातें सुनकर राजा जानश्रुति अपने ऊँचे महलकी छतसे उतर गये और सुखपूर्वक आसनपर विराजमान हो अपने सारथिको बुलाकर बोले—'जाओ, महात्मा रैक्वको यहाँ ले आओ।' राजाका यह अमृतके समान वचन सुनकर मह नामक सारथि प्रसन्नता प्रकट करता हुआ नगरसे बाहर निकला। सबसे पहले उसने मुक्तिदायिनी काशीपुरीकी यात्रा की, जहाँ जगतके स्वामी भगवान् विश्वनाथ मनुष्योंको उपदेश दिया करते हैं। उसके बाद वह गयाक्षेत्रमें पहुँचा, जहाँ प्रफुल्ल नेत्रोंवाले भगवान् गदाधर सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेके लिये
८२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
निवास करते हैं। तदनन्तर नाना तीर्थोंमें भ्रमण करता
हुआ सारथि पापनाशिनी मथुरापुरीमें गया; यह भगवान्
श्रीकृष्णका आदि स्थान है, जो परम महान् एवं मोक्ष
प्रदान करनेवाला है। वेद और शास्त्रोंमें वह तीर्थ
त्रिभुवनपति भगवान् गोविन्दके अवतारस्थानके नामसे
प्रसिद्ध है। नाना देवता और ब्रह्मर्षि उसका सेवन करते
हैं। मथुरा नगर कालिन्दी (यमुना) के किनारे शोभा
पाता है। उसकी आकृति अर्द्धचन्द्रके समान प्रतीत होती
है। वह सब तीर्थोंके निवाससे परिपूर्ण है। परम आनन्द
प्रदान करनेके कारण सुन्दर प्रतीत होता है। गोवर्धन
पर्वतके होनेसे मथुरामण्डलकी शोभा और भी बढ़ गयी
है। वह पवित्र वृक्षों और लताओंसे आवृत्त है। उसमें
बारह वन हैं। वह परम पुण्यमय तथा सबको विश्राम
देनेवाले श्रुतियोंके सारभूत भगवान् श्रीकृष्णकी आधार-
भूमि है।
तत्पश्चात् मथुरासे पश्चिम और उत्तर दिशाकी ओर
बहुत दूरतक जानेपर सारथिको काश्मीर नामक नगर
दिखायी दिया, जहाँ शङ्खके समान उज्ज्वल गगनचुम्बी
महलोंकी पङ्क्तियाँ भगवान् शङ्करके अट्टहासकी भाँति
शोभा पाती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंके शास्त्रीय आलाप सुनकर
मूक मनुष्य भी सुन्दर वाणी और पदोंका उच्चारण करते
हुए देवताके समान हो जाते हैं। जहाँ निरन्तर होनेवाले
यज्ञ-धूमसे व्याप्त होनेके कारण आकाश-मण्डल मेघोंसे
धुलते रहनेपर भी अपनी कालिमा नहीं छोड़ता। जहाँ
उपाध्यायके पास आकर छात्र जन्मकालीन अभ्याससे ही
सम्पूर्ण कलाएँ स्वतः पढ़ लेते हैं तथा जहाँ माणिक्येश्वर
नामसे प्रसिद्ध भगवान् चन्द्रशेखर देहधारियोंको वरदान
देनेके लिये नित्य निवास करते हैं। काश्मीरके राजा
माणिक्येशने दिग्विजयमें समस्त राजाओंको जीतकर
भगवान् शिवका पूजन किया था, तभीसे उनका नाम
माणिक्येश्वर हो गया था। उन्हींके मन्दिरके दरवाजेपर
महात्मा रैक एक छोटी-सी गाड़ीपर बैठे अपने अङ्गोंको
खुजलाते हुए वृक्षकी छायाका सेवन कर रहे थे। इसी
अवस्थामें सारथिने उन्हें देखा। राजाके बताये हुए
भिन्न-भिन्न चिह्नोंसे उसने शीघ्र ही रैकको पहचान लिया
और उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—'ब्रह्मन् ! आप
किस स्थानपर रहते हैं ? आपका पूरा नाम क्या है ?
आप तो सदा स्वच्छन्द विचरनेवाले हैं, फिर यहाँ
किसलिये ठहरे हैं ? इस समय आपका क्या करनेका
विचार है ?'
सारथिके ये वचन सुनकर परम आनन्दमें निमग्न
महात्मा रैकने कुछ सोचकर उससे कहा—'यद्यपि हम
पूर्णकाम हैं—हमें किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है,
तथापि कोई भी हमारी मनोवृत्तिके अनुसार परिचर्या कर
सकता है।' रैकके हार्दिक अभिप्रायको आदरपूर्वक
ग्रहण करके सारथि धीरेसे राजाके पास चल दिया। वहाँ
पहुँचकर राजाको प्रणाम करके उसने हाथ जोड़ सारा
समाचार निवेदन किया। उस समय स्वामीके दर्शनसे
उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। सारथिके वचन सुनकर
राजाके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। उनके हृदयमें
रैकका सत्कार करनेकी श्रद्धा जाग्रत् हुई। उन्होंने दो
खच्चरियोंसे जुती हुई एक गाड़ी लेकर यात्रा की। साथ
ही मोतीके हार, अच्छे-अच्छे वस्त्र और एक सहस्र गौएँ
भी ले लीं। काश्मीरमण्डलमें महात्मा रैक जहाँ रहते थे,