पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४६-गणेशजीकी महिमा और उनकी स्तुति एवं पूजाका फल
सृष्टिखण्ड ]
* गणेशजीकी महिमा और उनकी स्तुति एवं पूजाका फल *
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मिलती, जो श्रीगङ्गाजीके सेवनसे प्राप्त होती है।* गङ्गाजीके सेवनसे बढ़कर धर्म-साधनका दूसरा कोई उपाय नहीं है। इसलिये नारद ! तुम भी गङ्गाजीका आश्रय लो। हड्डियोंमें गङ्गाजीके जलका स्पर्श होनेसे राजा सगरके पुत्र अपने पितरों तथा वंशजोंके साथ स्वर्गलोकमें पहुँच गये।
**व्यासजी कहते हैं—**मुनिश्रेष्ठ नारद ब्रह्माजीके मुखसे यह बात सुनकर गङ्गाद्वार (हरिद्वार) में गये और वहाँ तपस्या करके ब्रह्माजीके समान हो गये। गङ्गाजी सर्वत्र सुलभ होते हुए भी गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गा-सागर-संगम—इन तीन स्थानोंमें दुर्लभ हैं—वहाँ इनकी प्राप्ति बड़े भाग्यसे होती है। वहाँ तीन रात्रि या एक रात निवास करनेसे भी मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है; इसलिये धर्मज्ञ ब्राह्मणो ! सब प्रकारसे प्रयत्न करके तुमलोग परम कल्याणमयी भगवती भागीरथीके तीरपर जाओ। विशेषतः इस कलिकालमें सत्त्वगुणसे रहित मनुष्योंको कष्टसे छुड़ाने और मोक्ष प्रदान करनेवाली गङ्गाजी ही हैं। गङ्गाजीके सेवनसे अनन्त पुण्यका उदय होता है।†
**पुलस्त्यजी कहते हैं—**भीष्म ! तदनन्तर वे ब्राह्मण व्यासजीकी कल्याणमयी वाणी सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और गङ्गाजीके तटपर तपस्या करके मोक्षमार्गको पा गये। जो मनुष्य इस उत्तम परम पवित्र उपाख्यानका श्रवण करता है, वह समस्त दुःख-राशिसे पार हो जाता है तथा उसे गङ्गाजीमें स्नान करनेका फल मिलता है। एक बार भी इस प्रसङ्गका पाठ करनेपर सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिल जाता है। जो गङ्गाजीके तटपर ही दान, जप, ध्यान, स्तोत्र, मन्त्र और देवार्चन आदि कर्म कराता है, उसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है।
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गणेशजीकी महिमा और उनकी स्तुति एवं पूजाका फल
**पुलस्त्यजी कहते हैं—**भीष्म ! इसके बाद एक दिन व्यासजीके शिष्य महामुनि संजयने अपने गुरुदेवको प्रणाम करके प्रश्न किया।
**संजयने पूछा—**गुरुदेव ! आप मुझे देवताओंके पूजनका सुनिश्चित क्रम बतलाइये। प्रतिदिनकी पूजामें सबसे पहले किसका पूजन करना चाहिये ?
**व्यासजी बोले—**संजय ! विघ्नोंको दूर करनेके लिये सर्वप्रथम गणेशजीकी पूजा करनी चाहिये। पार्वतीदेवीने पूर्वकालमें भगवान् शङ्करजीके संयोगसे स्कन्द (कार्तिकेय) और गणेश नामके दो पुत्रोंको जन्म दिया। उन दोनोंको देखकर देवताओंको पार्वतीजीपर बड़ी श्रद्धा हुई और उन्होंने अमृतसे तैयार किया हुआ एक दिव्य मोदक (लड्डू) पार्वतीके हाथमें दिया। मोदक देखकर दोनों बालक मातासे माँगने लगे। तब पार्वतीदेवी विस्मित होकर पुत्रोंसे बोलीं—'मैं पहले इसके गुणोंका वर्णन करती हूँ, तुम दोनों सावधान होकर सुनो। इस मोदकके सूँघनेमात्रसे अमरत्व प्राप्त होता है; जो इसे सूँघता या खाता है, वह सम्पूर्ण शास्त्रोंका मर्मज्ञ, सब तन्त्रोंमें प्रवीण, लेखक, चित्रकार, विद्वान्, ज्ञान-विज्ञानके तत्त्वको जाननेवाला और सर्वज्ञ होता है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। पुत्रो ! तुममेंसे जो धर्माचरणके द्वारा श्रेष्ठता प्राप्त करके आयेगा, उसीको मैं यह मोदक दूँगी। तुम्हारे पिताकी भी यही सम्मति है।'
माताके मुखसे ऐसी बात सुनकर परम चतुर स्कन्द
*पाठयज्ञपरैः सर्वैर्मन्त्रहोमसुराचनैः। सा गतिर्न भवेज्जन्तोगङ्गासंसेवया च या ॥ (६०।११६)
† विशेषात्कलिक्राले च गङ्गा मोक्षप्रदा नृणाम्। कृच्छ्रघ्ना क्षीणसत्त्वानामनन्तः पुण्यसम्भवः ॥ (६०।१२३)
२०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मयूरपर आरूढ हो तुरंत ही त्रिलोकीके तीर्थोंकी यात्राके लिये चल दिये। उन्होंने मुहूर्तभरमें सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया। इधर लम्बोदरधारी गणेशजी स्कन्दसे भी बढ़कर बुद्धिमान् निकले। वे माता-पिताकी परिक्रमा करके बड़ी प्रसन्नताके साथ पिताजीके सम्मुख खड़े हो गये। फिर स्कन्द भी आकर पिताके सामने खड़े हुए और बोले, 'मुझे मोदक दीजिये।' तब पार्वतीजीने दोनों पुत्रोंकी ओर देखकर कहा—'समस्त तीर्थोंमें किया हुआ स्नान, सम्पूर्ण देवताओंको किया हुआ नमस्कार, सब यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सब प्रकारके व्रत, मन्त्र, योग और संयमका पालन—ये सभी साधन माता-पिताके पूजनके सोलहवें अंशके बराबर भी नहीं हो सकते। इसलिये यह गणेश सैकड़ों पुत्रों और सैकड़ों गणोंसे भी बढ़कर है। अतः देवताओंका बनाया हुआ यह मोदक मैं गणेशको ही अर्पण करती हूँ। माता-पिताकी भक्तिके कारण ही इसकी प्रत्येक यज्ञमें सबसे पहले पूजा होगी।'
महादेवजी बोले—इस गणेशके ही अग्रपूजनसे सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हों।
व्यासजी कहते हैं—अतः द्विजको उचित है कि वह सब यज्ञोंमें पहले गणेशजीका ही पूजन करे। ऐसा करनेसे उन यज्ञोंका फल कोटि-कोटि गुना अधिक होगा। सम्पूर्ण देवी-देवताओंका कथन भी यही है। देवाधिदेवी पार्वतीने सर्वगुणदायक पवित्र मोदक गणेशजीको ही दिया तथा बड़ी प्रसन्नताके साथ सम्पूर्ण देवताओंके सामने ही उन्हें समस्त गणोंका अधिपति बनाया। इसलिये विस्तृत यज्ञों, स्तोत्रपाठों तथा नित्यपूजनमें भी पहले गणेशजीकी पूजा करके ही मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है। चतुर्थीको दिनभर उपवास करके श्रीगणेशजीका पूजन करे और रातमें अन्न ग्रहण करे। गणेशजीकी स्तुति इस प्रकार करनी चाहिये—'श्रीगणेशजी! आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण विघ्नोंकी शान्ति करनेवाले हैं। उमाको आनन्द प्रदान करनेवाले परम बुद्धिमान् प्रभो! भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। आप भगवान् शङ्करको आनन्दित करनेवाले हैं। अपना ध्यान करनेवालोंको ज्ञान और विज्ञान प्रदान करते हैं। विघ्नराज! आप सम्पूर्ण दैत्योंके एकमात्र संहारक हैं, आपको नमस्कार है। आप सबको प्रसन्नता और लक्ष्मी देनेवाले हैं, सम्पूर्ण यज्ञोंके एकमात्र रक्षक तथा सब प्रकारके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं। गणपते! मैं प्रेमपूर्वक आपको प्रणाम करता हूँ।'* जो मनुष्य उपर्युक्त भावके मन्त्रोंसे गणेशजीका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अब मैं गणेशजीके बारह नामोंका कल्याणमय स्तोत्र सुनाता हूँ। उनके बारह नाम ये हैं—गणपति, विघ्नराज, लम्बतुण्ड, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्ब, एकदन्त, गणाधिप, विनायक, चारुकर्ण, पशुपाल और भवात्मज। जो प्रातःकाल उठकर इन बारह नामोंका पाठ करता है, सम्पूर्ण विश्व उसके वशमें हो जाता है तथा उसे कभी विघ्नका सामना नहीं करना पड़ता।†
उपनयन, विवाह आदि सम्पूर्ण माङ्गलिक कार्योंमें जो श्रीगणेशजीका पूजन करता है, वह सबको अपने वशमें कर लेता है और उसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य सम्पूर्ण यज्ञके कलशोंमें 'गणानां त्वा—' इस मन्त्रसे श्रीगणेशजीका आवाहन करके उनकी पूजा
* गणाधिप नमस्तुभ्यं सर्वविघ्नप्रशान्तिद। उमानन्दप्रद प्राज्ञ त्राहि मां भवसागरात्॥
हरानन्दकर ध्यानज्ञानविज्ञानद प्रभो। विघ्नराज नमस्तुभ्यं सर्वदैत्यैकसूदन॥
सर्वप्रीतिप्रद श्रीद सर्वयज्ञैकरक्षक। सर्वाभीष्टप्रद प्रीत्या नमामि त्वां गणाधिप॥
(६९। २६—२८)
† गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः। द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥
विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः। द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्॥
विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विघ्नं भवेत् क्वचित्।
(६९। ३१—३३)