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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

४५-श्रीगङ्गाजीकी महिमा और उनकी उत्पत्ति

सृष्टिखण्ड ] \ * श्रीगङ्गाजीकी महिमा और उनकी उत्पत्ति * \ २०३


गोपियोंके हितके लिये तुलसीका सेवन किया। जगत्प्रिया तुलसी ! पूर्वकालमें वसिष्ठजीके कथनानुसार श्रीरामचन्द्रजीने भी राक्षसोंका वध करनेके उद्देश्यसे सरयूके तटपर तुम्हें लगाया था। तुलसीदेवी ! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। श्रीरामचन्द्रजीसे वियोग हो जानेपर अशोकवाटिका में रहते हुए जनककिशोरी सीताने तुम्हारा ही ध्यान किया था, जिससे उन्हें पुनः अपने प्रियतमका समागम प्राप्त हुआ। पूर्वकालमें हिमालय पर्वतपर भगवान् शङ्करकी प्राप्तिके लिये पार्वतीदेवीने तुम्हें लगाया और अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये तुम्हारा सेवन किया था। तुलसीदेवी ! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। सम्पूर्ण देवाङ्गनाओं और किन्नरोंने भी दुःस्वप्नका नाश करनेके लिये नन्दनवनमें तुम्हारा सेवन किया था। देवि ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। धर्मारण्य गयामें साक्षात् पितरोंने तुलसीका सेवन किया था। दण्डकारण्यमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने अपने हित-साधनकी इच्छासे परम पवित्र तुलसीका वृक्ष लगाया तथा लक्ष्मण और सीताने भी बड़ी भक्तिके साथ उसे पोसा था। जिस प्रकार शास्त्रोंमें गङ्गाजीको त्रिभुवनव्यापिनी कहा गया है, उसी प्रकार तुलसीदेवी भी सम्पूर्ण चराचर जगत्में दृष्टिगोचर होती हैं। तुलसीका ग्रहण करके मनुष्य पातकोंसे मुक्त हो जाता है। और तो और, मुनीश्वरो ! तुलसीके सेवनसे ब्रह्महत्या भी दूर हो जाती है। तुलसीके पत्तेसे टपकता हुआ जल जो अपने सिरपर धारण करता है, उसे गङ्गा-स्नान और दस गोदानका फल प्राप्त होता है। देवि ! मुझपर प्रसन्न होओ। देवेश्वरि ! हरिप्रीये ! मुझपर प्रसन्न हो जाओ। क्षीरसागरके मन्थनसे प्रकट हुई तुलसीदेवि ! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।

द्वादशीकी रात्रिमें जागरण करके जो इस तुलसी-स्तोत्रका पाठ करता है, भगवान् श्रीविष्णु उसके बत्तीस अपराध क्षमा करते हैं। बाल्यावस्था, कुमारावस्था, जवानी और बुढ़ापेमें जितने पाप किये होते हैं, वे सब तुलसी-स्तोत्रके पाठसे नष्ट हो जाते हैं। तुलसीके स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर भगवान् सुख और अभ्युदय प्रदान करते हैं। जिस घरमें तुलसीका स्तोत्र लिखा हुआ विद्यमान रहता है, उसका कभी अशुभ नहीं होता, उसका सब कुछ मङ्गलमय होता है, किञ्चित् भी अमङ्गल नहीं होता। उसके लिये सदा सुकाल रहता है। वह घर प्रचुर धन-धान्यसे भरा रहता है। तुलसी-स्तोत्रका पाठ करनेवाले मनुष्यके हृदयमें भगवान् श्रीविष्णुके प्रति अविचल भक्ति होती है। तथा उसका वैष्णवोंसे कभी वियोग नहीं होता। इतना ही नहीं, उसकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं प्रवृत्त होती। जो द्वादशीकी रात्रिमें जागरण करके तुलसी-स्तोत्रका पाठ करता है, उसे करोड़ों तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त होता है।

श्रीगङ्गाजीकी महिमा और उनकी उत्पत्ति

ब्राह्मण बोले— गुरुदेव ! अब आप हमें कोई ऐसा तीर्थ बतलाइये, जहाँ डुबकी लगानेसे निश्चय ही समस्त पाप तथा दूसरे-दूसरे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं।

व्यासजी बोले— ब्राह्मणो ! अविलम्ब सद्गतिका उपाय सोचनेवाले सभी स्त्री-पुरुषोंके लिये गङ्गाजी ही एक ऐसा तीर्थ हैं, जिनके दर्शनमात्रसे सारा पाप नष्ट हो जाता है। गङ्गाजीके नामका स्मरण करनेमात्रसे पातक, कीर्तनसे अतिपातक और दर्शनसे भारी-भारी पाप (महापातक) भी नष्ट हो जाते हैं। गङ्गाजीमें स्नान, जलपान और पितरोंका तर्पण करनेसे महापातकोंकी राशिका प्रतिदिन क्षय होता रहता है। जैसे अग्निका संसर्ग होनेसे रूई और सूखे तिनके क्षणभरमें भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार गङ्गाजी अपने जलका स्पर्श होनेपर मनुष्योंके सारे पाप एक ही क्षणमें दग्ध कर देती हैं।*

जो विधिपूर्वक सङ्कल्पवाक्यका उच्चारण करते हुए


*गङ्गेति स्मरणादेव क्षयं याति च पातकम्। कीर्तनादतिपापानि दर्शनाद् गुरुकल्मषम् ॥
स्नानात् पानाच्च जाह्नव्यां पितॄणां तर्पणात्तथा। महापातकवृन्दानि क्षयं यान्ति दिने दिने ॥
अग्निना दह्यते तूलं तृणं शुष्कं क्षणाद् यथा। तथां गङ्गाजलस्पर्शात् पुंसां पापं दहेत् क्षणात् ॥ (६० । ५—७)

२०४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


गङ्गाजीके जलमें पितरोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करता है, उसे प्रतिदिन सौ यज्ञोंका फल होता है। जो लोग गङ्गाजीके जलमें अथवा तटपर आवश्यक सामग्रियोंसे तर्पण और पिण्डदान करते हैं, उन्हें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति होती है। जो अकेला भी गङ्गाजीकी यात्रा करता है, उसके पितरोंकी कई पीढ़ियाँ पवित्र हो जाती हैं। एकमात्र इसी महापुण्यके बलपर वह स्वयं भी तरता है और पितरोंको भी तार देता है। ब्राह्मणो ! गङ्गाजीके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन करनेमें चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। इसलिये मैं भागीरथीके कुछ ही गुणोंका दिग्दर्शन कराता हूँ।

मुनि, सिद्ध, गन्धर्व तथा अन्यान्य श्रेष्ठ देवता गङ्गाजीके तीरपर तपस्या करके स्वर्गलोकमें स्थिर भावसे विराजमान हुए हैं। आजतक वे वहाँसे इस संसारमें नहीं लौटे। तपस्या, बहुत-से यज्ञ, नाना प्रकारके व्रत तथा पुष्कल दान करनेसे जो गति प्राप्त होती है, गङ्गाजीका सेवन करके मनुष्य उसी गतिको पा लेता है।*

पिता पुत्रको, पत्नी प्रियतमको, सम्बन्धी अपने सम्बन्धीको तथा अन्य सब भाई-बन्धु भी अपने प्रिय बन्धुको छोड़ देते हैं, किन्तु गङ्गाजी उनका परित्याग नहीं करतीं।† जिन श्रेष्ठ मनुष्योंने एक बार भी भक्तिपूर्वक गङ्गामें स्नान किया है, कल्याणमयी गङ्गा उनकी लाख पीढ़ियोंका भवसागरसे उद्धार कर देती हैं। संक्रान्ति, व्यतीपात, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण और पुष्य नक्षत्रमें गङ्गाजीमें स्नान करके मनुष्य अपने कुलकी करोड़ पीढ़ियोंका उद्धार कर सकता है। जो मनुष्य [अन्तकालमें] अपने हृदयमें भगवान् श्रीविष्णुका चिन्तन करते हुए उत्तरायणके शुक्लपक्षमें दिनको गङ्गाजीके जलमें देह-त्याग करते हैं, वे धन्य हैं। जो इस प्रकार भागीरथीके शुभ जलमें प्राण-त्याग करते हैं, उन्हें पुनरावृत्ति-रहित स्वर्गकी प्राप्ति होती है। गङ्गाजीमें पितरोंको पिण्डदान तथा तिलमिश्रित जलसे तर्पण करनेपर वे यदि नरकमें हों तो स्वर्गमें जाते हैं और स्वर्गमें हों तो मोक्षको प्राप्त होते हैं।

पर-स्त्री और पर-धनका हरण करने तथा सबसे द्रोह करनेवाले पापी मनुष्योंको उत्तम गति प्रदान करनेका साधन एकमात्र गङ्गाजी ही हैं। वेद-शास्त्रके ज्ञानसे रहित, गुरु-निन्दापरायण और सदाचार-शून्य मनुष्यके लिये गङ्गाके समान दूसरी कोई गति नहीं है। गङ्गाजीमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्योंके अनेक जन्मोंकी पापराशि नष्ट हो जाती है तथा वे तत्काल पुण्यभागी होते हैं।

प्रभासक्षेत्रमें सूर्यग्रहणके समय एक सहस्र गोदान करनेपर जो फल मिलता है, वह गङ्गाजीमें स्नान करनेसे प्रतिदिन प्राप्त होता है। गङ्गाजीका दर्शन करके मनुष्य पापोंसे छूट जाता है और उसके जलका स्पर्श करके स्वर्ग पाता है। अन्य कार्यके प्रसङ्गसे भी गङ्गाजीमें गोता लगानेपर वे मोक्ष प्रदान करती हैं। गङ्गाजीके दर्शन-मात्रसे पर-धन और पर-स्त्रीकी अभिलाषा तथा पर-धर्म-विषयक रुचि नष्ट हो जाती है। अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसीमें सन्तोष करना, अपने धर्ममें प्रवृत्त रहना तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान भाव रखना—ये सद्गुण गङ्गाजीमें स्नान करनेवाले मनुष्यके हृदयमें स्वभावतः उत्पन्न होते हैं। जो मनुष्य गङ्गाजीका आश्रय लेकर सुखपूर्वक निवास करता है, वही इस लोकमें जीवन्मुक्त और सर्वश्रेष्ठ है। उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। गङ्गाजीमें या उनके तटपर किया हुआ यज्ञ, दान, तप, जप, श्राद्ध और देवपूजन प्रतिदिन कोटि-कोटिगुना अधिक फल देनेवाला होता है। अपने जन्म-नक्षत्रके दिन गङ्गाजीके सङ्गममें स्नान करके मनुष्य अपने कुलका उद्धार कर देता है। जो बिना श्रद्धाके भी पुण्यसलिला गङ्गाजीके नामका कीर्तन करता है, वह निश्चय ही स्वर्गका अधिकारी हैं। वे पृथ्वीपर मनुष्योंको, पातालमें नागोंको और स्वर्गमें देवताओंको तारती हैं। जानकर या अनजानमें, इच्छासे या


* तपोभिर्बहुभिर्यज्ञैर्व्रतैर्नानाविधैस्तथा । पुरुदानैर्गतिर्या च गङ्गां संसेव्यतां लभेत् ॥ (६० । २४)
† त्यजन्ति पितरं पुत्राः प्रियं पत्न्यः सुहृद्गणाः । अन्ये च बान्धवाः सर्वे गङ्गा तान्न परित्यजेत् ॥ (६० । २६)

सृष्टिखण्ड ]
* श्रीगङ्गाजीकी महिमा और उनकी उत्पत्ति *
२०५


अनिच्छांसे गङ्गामें मरनेवाला मनुष्य स्वर्ग और मोक्षको भी प्राप्त करता है। सत्त्वगुणमें स्थित योगयुक्त मनीषी पुरुषको जो गति मिलती है, वही गङ्गाजीमें प्राण त्यागनेवाले देहधारियोंको प्राप्त होती है। एक मनुष्य अपने शरीरका शोधन करनेके लिये हजारों चान्द्रायण-व्रत करता है और दूसरा मनचाहा गङ्गाजीका जल पीता है—उन दोनोंमें गङ्गाजलका पान करनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है। मनुष्यके ऊपर तभीतक तीर्थों, देवताओं और वेदोंका प्रभाव रहता है, जबतक कि वह गङ्गाजीको नहीं प्राप्त कर लेता।

भगवती गङ्गे ! वायु देवताने स्वर्ग, पृथ्वी और आकाशमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ बतलाये हैं; वे सब तुम्हारे जलमें विद्यमान हैं। गङ्गे ! तुम श्रीविष्णुका चरणोदक होनेके कारण परम पवित्र हो। तीनों लोकोंमें गमन करनेसे त्रिपथगामिनी कहलाती हो। तुम्हारा जल धर्ममय है; इसलिये तुम धर्मद्रवीके नामसे विख्यात हो। जाह्नवी ! मेरे पाप हर लो। भगवान् श्रीविष्णुके चरणोंसे तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम श्रीविष्णुद्वारा सम्मानित तथा वैष्णवी हो। मुझे जन्मसे लेकर मृत्युकतके पापोंसे बचाओ। महादेवी ! भागीरथी ! तुम श्रद्धासे, शोभायमान रजःकणोंसे तथा अमृतमय जलसे मुझे पवित्र करो।* इस भावके तीन श्लोकोंका उच्चारण करते हुए जो गङ्गाजीके जलमें स्नान करता है, वह करोड़ जन्मोंके पापसे निःसन्देह मुक्त हो जाता है। अब मैं गङ्गाजीके मूल-मन्त्रका वर्णन करूँगा, जिसे साक्षात् श्रीहरिने बतलाया है। उसका एक बार भी जप करके मनुष्य पवित्र हो जाता तथा श्रीविष्णुके श्रीविग्रहमें प्रतिष्ठित होता है। वह मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ नमो गङ्गायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः।’ (भगवान् श्रीनारायणसे प्रकट हुई विश्वरूपिणी गङ्गाजीको बारंबार नमस्कार है।)

जो मनुष्य गङ्गातीरकी मिट्टी अपने मस्तकपर धारण करता है, वह गङ्गामें स्नान किये बिना ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गङ्गाजीकी लहरोंसे सटकर बहनेवाली वायु यदि किसीके शरीरका स्पर्श करती है, तो वह घोर पापसे शुद्ध होकर अक्षय स्वर्गका उपभोग करता है। मनुष्यकी हड्डी जबतक गङ्गाजीके जलमें पड़ी रहती है, उतने ही हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। माता-पिता, बन्धु-बान्धव, अनाथ तथा गुरुजनोंकी हड्डी गङ्गाजीमें गिरानेसे मनुष्य कभी स्वर्गसे भ्रष्ट नहीं होता। जो मानव अपने पितरोंकी हड्डियोंके टुकड़े बटोरकर उन्हें गङ्गाजीमें डालनेके लिये ले जाता है, वह पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। गङ्गा-तीरपर बसे हुए गाँव, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े तथा चर-अचर—सभी प्राणी धन्य हैं।

विप्रवरो ! जो गङ्गाजीसे एक कोसके भीतर प्राण-त्याग करते हैं, वे मनुष्य देवता ही हैं; उससे बाहरके मनुष्य ही इस पृथ्वीपर मानव हैं। गङ्गास्नानके लिये यात्रा करता हुआ यदि कोई मार्गमें ही मर जाता है, तो वह भी स्वर्गको प्राप्त होता है। ब्राह्मणो ! जो लोग गङ्गाजीकी यात्रा करनेवाले मनुष्योंको वहाँका मार्ग बता देते हैं, उन्हें भी परमपुण्यकी प्राप्ति होती है और वे भी गङ्गास्नानका फल पा लेते हैं। जो पाखण्डियोंके संसर्गसे विचारशक्ति खो बैठनेके कारण गङ्गाजीकी निन्दा करते हैं, वे घोर नरकमें पड़ते हैं तथा वहाँसे फिर कभी उनका उद्धार होना कठिन है। जो सैकड़ों योजन दूरसे भी ‘गङ्गा-गङ्गा’ कहता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुलोकको प्राप्त होता है।† जो मनुष्य कभी गङ्गाजीमें स्नानके लिये


*विष्णुपादार्धसम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि। धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि ॥
विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुपूजिता। त्राहि मामेनसस्तस्मादाजन्ममरणान्तिकात् ॥
श्रद्धया धर्मसम्पूर्णे श्रीमता रजसा च ते। अमृतेन महादेवि भागीरथि पुनीहि माम् ॥
(६०। ६०-६२)

† गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥
(६०।७८)

२०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


नहीं गये हैं, वे अंधे और पङ्गुके समान हैं। उनका इस संसारमें जन्म लेना व्यर्थ है। जो गङ्गाजीके नामका कीर्तन नहीं करते, वे नराधम जडके समान हैं। जो लोग श्रद्धाके साथ गङ्गाजीके माहात्म्यका पठन-पाठन करते हैं, वे धीर पुरुष स्वर्गको जाते और पितरों तथा गुरुओंका उद्धार कर देते हैं। जो पुरुष गङ्गाजीकी यात्रा करनेवाले लोगोंको राह-खर्चके लिये अपनी शक्तिके अनुसार धन देता है, उसे भी गङ्गाजीमें स्नान करनेका फल मिलता है। दूसरेके खर्चसे जानेवालेको स्नानका जितना फल मिलता है, उससे दूना फल खर्च देकर भेजनेवालोंको प्राप्त होता है। इच्छासे या अनिच्छासे, किसीके भेजनेसे या दूसरेकी सेवाके मिससे भी जो परम पवित्र गङ्गाजीकी यात्रा करता है, वह देवताओंके लोकमें जाता है।

ब्राह्मणोंने पूछा— व्यासजी ! हमने आपके मुँहसे गङ्गाजीके गुणोंका अत्यन्त पवित्र कीर्तन सुना। अब हम यह जानना चाहते हैं कि गङ्गाजी कैसे इस रूपमें प्रकट हुईं, उनका स्वरूप क्या है तथा वे क्यों अत्यन्त पावन मानी जाती हैं।

व्यासजी बोले— द्विजवरो ! सुनो, मैं एक परम पवित्र प्राचीन कथा सुनाता हूँ। प्राचीन कालकी बात है, मुनिश्रेष्ठ नारदजीने ब्रह्मलोकमें जाकर त्रिलोकपावन ब्रह्माजीको नमस्कार किया और पूछा— 'तात ! आपने ऐसी कौन-सी वस्तु उत्पन्न की है, जो भगवान् शङ्कर और श्रीविष्णुको भी अत्यन्त प्रिय हो तथा जो भूतलपर सब लोगोंका हित करनेके लिये अभीष्ट मानी गयी हो ?'

ब्रह्माजीने कहा— बेटा ! पूर्वकालमें सृष्टि आरम्भ करते समय मैंने मूर्तिमती प्रकृतिसे कहा— 'देवि ! तुम सम्पूर्ण लोकोंका आदि कारण बनो। मैं तुमसे ही संसारकी सृष्टि आरम्भ करूँगा।' यह सुनकर परा प्रकृति सात स्वरूपोंमें अभिव्यक्त हुई; गायत्री, वाग्देवी (सरस्वती), सब प्रकारके धन-धान्य प्रदान करनेवाली लक्ष्मी, ज्ञान-विद्यास्वरूपा उमादेवी, शक्तिबीजा तपस्विनी और धर्मद्रवा— ये ही सात परा प्रकृतिके स्वरूप हैं। इनमें गायत्रीसे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं और वेदसे सारे जगत्की स्थिति है। स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा और दीक्षा—ये भी गायत्रीसे ही उत्पन्न मानी गयी हैं। अतः यज्ञमें मातृका आदिके साथ सदा ही गायत्रीका उच्चारण करना चाहिये। भारती (सरस्वती) सब लोगोंके मुख और हृदयमें स्थित हैं तथा वे ही समस्त शास्त्रोंमें धर्मका उपदेश करती हैं। तीसरी प्रकृति लक्ष्मी हैं, जिनसे वस्त्र और आभूषणोंकी राशि प्रकट हुई है। सुख और त्रिभुवनका राज्य भी उन्हींकी देन है। इसीसे वे भगवान् श्रीविष्णुकी प्रियतमा हैं। चौथी प्रकृति उमाके द्वारा ही संसारमें भगवान् शङ्करके स्वरूपका ज्ञान होता है। अतः उमाको ज्ञानकी जननी (ब्रह्मविद्या) समझना चाहिये। वे भगवान् शिवके आधे अङ्गमें निवास करती हैं। शक्तिबीजा नामकी जो पाँचवीं प्रकृति है, वह अत्यन्त उग्र और समूचे विश्वको मोहमें डालनेवाली है। समस्त लोकोंमें वही जगत्का पालन और संहार करती है। [तपस्विनी तपस्याकी अधिष्ठात्री देवी है।] सातवीं प्रकृति धर्मद्रवा है, जो सब धर्मोंमें प्रतिष्ठित है। उसे सबसे श्रेष्ठ देखकर मैंने अपने कमण्डलुमें धारण कर लिया। फिर परम प्रभावशाली भगवान् श्रीविष्णुने बलिके यज्ञके समय इसे प्रकट किया। उनके दोनों चरणोंसे सम्पूर्ण महीतल व्याप्त हो गया था। उनमेंसे एक चरण आकाश एवं ब्रह्माण्डको भेदकर मेरे सामने स्थित हुआ। उस समय मैंने कमण्डलुके जलसे उस चरणका पूजन किया। उस चरणको धोकर जब मैं पूजन कर चुका, तब उसका धोवन हेमकूट पर्वतपर गिरा। वहाँसे भगवान् शङ्करके पास पहुँचकर वह जल गङ्गाके रूपमें उनकी जटामें स्थित हुआ। गङ्गा बहुत कालतक उनकी जटामें ही भ्रमण करती रहीं। तत्पश्चात् महाराज भगीरथने भगवान् शङ्करकी आराधना करके गङ्गाको पृथ्वीपर उतारा। वे तीन धाराओंमें प्रकट होकर तीनों लोकोंमें गयीं; इसलिये संसारमें त्रिस्रोताके नामसे विख्यात हुईं। शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु—तीनों देवताओंके संयोगसे पवित्र होकर वे त्रिभुवनको पावन करती हैं। भगवती भागीरथीका आश्रय लेकर मनुष्य सम्पूर्ण धर्मोंका फल प्राप्त करता है। पाठ, यज्ञ, मन्त्र, होम और देवार्चन आदि समस्त शुभ कर्मोंसे भी जीवको वह गति नहीं