पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१३६-नाम-कीर्तनकी महिमा, भगवान्के चरण-चिह्नोंका परिचय तथा प्रत्येक मासमें भगवान्की विशेष आराधनाका वर्णन
पातालखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा भगवान्की विशेष आराधनाका वर्णन * ५६५
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पत्तेमें भोजन करना निषिद्ध है। जला हुआ तथा भगवान्को अर्पण न किया हुआ अन्न, जम्बीर और बिजौरा नीबू, शाक तथा खाली नमक भी वैष्णवको नहीं खाना चाहिये। यदि दैवात् कभी खा ले तो भगवन्नामका स्मरण करना चाहिये। हेमन्त ऋतुमें उत्पन्न होनेवाला सफेद धान जो सड़ा हुआ न हो, मूँग, तिल, यव, केराव, कंगनी, नीवार (तीना), शाक, हिलमोचिका (हिलसा), कालशाक, बथुआ, मूली, दूसरे-दूसरे मूल-शाक, सेंधा और साँभर नमक, गायका दही, गायका घी, बिना मक्खन निकाला हुआ गायका दूध, कटहल, आम, हरें, पिप्पली, जीरा, नारङ्गी, इमली, केला, लवली (हरफा रेवरी), आँवलेका फल, गुड़के सिवा ईंखके रससे तैयार होनेवाली अन्य सभी वस्तुएँ तथा बिना तेलके पकाया हुआ अन्न—इन सभी खाद्य पदार्थोंको मुनलोग हविष्यान्न कहते हैं।
जो मनुष्य तुलसीके पत्र और पुष्प आदिसे युक्त माला धारण करता है, उसको भी विष्णु ही समझना चाहिये। आँवलेका वृक्ष लगाकर मनुष्य विष्णुके समान हो जाता है। आँवलेके चारों ओर साढ़े तीन सौ हाथकी भूमिको कुरुक्षेत्र जानना चाहिये। तुलसीकी लकड़ीके रुद्राक्षके समान दाने बनाकर उनके द्वारा तैयार की हुई माला कण्ठमें धारण करके भगवान्का पूजन आरम्भ करना चाहिये। भगवान्को चढ़ायी हुई तुलसीकी माला मस्तकपर धारण करे तथा भगवान्को अर्पण किये हुए चन्दनके द्वारा अपने अङ्गोंपर भगवान्का नाम लिखे। यदि तुलसीके काष्ठकी बनी हुई मालाओंसे अलङ्कृत होकर मनुष्य देवताओं और पितरोंके पूजनादि कार्य करे तो वह कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो मनुष्य तुलसीके काष्ठकी बनी हुई माला भगवान् विष्णुको अर्पित करके पुनः प्रसादरूपसे उसको भक्तिपूर्वक धारण करता है, उसके पातक नष्ट हो जाते हैं। पाद्य आदि उपचारोंसे तुलसीकी पूजा करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—जो दर्शन करनेपर सारे पापसमुदायका नाश कर देती है, स्पर्श करनेपर शरीरको पवित्र बनाती है, प्रणाम करनेपर रोगोंका निवारण करती है, जलसे सींचनेपर यमराजको भी भय पहुँचाती है, आरोपित करनेपर भगवान् श्रीकृष्णके समीप ले जाती है और भगवान्के चरणोंमें चढ़ानेपर मोक्षरूपी फल प्रदान करती है, उस तुलसी देवीको नमस्कार है।*
नाम-कीर्तनकी महिमा, भगवान्के चरण-चिह्नोंका परिचय तथा प्रत्येक मासमें भगवान्की विशेष आराधनाका वर्णन
**पार्वतीजीने पूछा—**कृपानिधे ! विषयरूपी ग्राहोंसे भरे हुए भयङ्कर कलियुगके आनेपर संसारके सभी मनुष्य पुत्र, स्त्री और धन आदिकी चिन्तासे व्याकुल रहेंगे, ऐसी दशामें उनके उद्धारका क्या उपाय है? यह बतानेकी कृपा कीजिये।
**महादेवजीने कहा—**देवि! कलियुगमें केवल हरिनाम ही संसारसमुद्रसे पार लगानेवाला है। जो लोग प्रतिदिन 'हरे राम हरे कृष्ण' आदि प्रभुके मङ्गलमय नामोंका उच्चारण करते हैं, उन्हें कलियुग बाधा नहीं पहुँचाता, अतः बीच-बीचमें जो आवश्यक कर्म प्राप्त हों, उन्हें करते-करते भगवान्के नामोंका भी स्मरण करते रहना चाहिये। जो बारम्बार 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' की रट लगाता रहता है तथा मेरे और तुम्हारे नामका भी व्यतिक्रमपूर्वक अर्थात् गौरीशङ्कर आदि कहकर जप किया करता है, वह भी जैसे आग रूईकी ढेरीको जला डालती है उसी प्रकार अपनी पाप-राशिको भस्म करके उससे मुक्त हो जाता है। जय अथवा श्रीशब्दपूर्वक जो तुम्हारा, मेरा या श्रीकृष्णका मङ्गलमय नाम है, उसका
* या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवतः कृष्णस्य संरोपिता न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नमः॥ (७९।६६)
५६६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
जप करनेसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। दिन, रात और सन्ध्या—सभी समय नाम-स्मरण करना चाहिये। दिन-रात हरि-नामका जप करनेवाला पुरुष श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन पाता है। अपवित्र हो या पवित्र, सब समय, निरन्तर भगवन्नामका स्मरण करनेसे वह क्षणभरमें भव-बन्धनसे छुटकारा पा जाता है।* भगवान्का नाम नाना प्रकारके अपराधोंसे युक्त मनुष्यका पाप भी हर लेता है। कलियुगमें यज्ञ, व्रत, तप और दान—कोई भी कर्म सब अङ्गोंसे पूर्ण नहीं उतरता; केवल गङ्गाका स्नान और हरि-नामका कीर्तन—ये ही दो साधन विघ्न-बाधाओंसे रहित हैं। कल्याणी! हत्याजनित हजारों भयङ्कर पाप तथा दूसरे-दूसरे पातक भी भगवान्के गोविन्द नामका उच्चारण करनेसे नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य अपवित्र हो या पवित्र अथवा किसी भी दशामें क्यों न स्थित हो, जो पुण्डरीकाक्ष (कमल-नयन) भगवान् विष्णुका स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर—सब ओरसे पवित्र हो जाता है। † केवल भगवन्नामोंके स्मरणसे तथा भगवान्के चरणोंका चिन्तन करनेसे शुद्धि होती है। सोने, चाँदी, भिगोये हुए आटे अथवा पुष्प-मालाके द्वारा भगवान्के चरणोंकी आकृति बनाकर उसे चक्र आदि चिह्नोंसे अङ्कित कर ले, उसके बाद पूजन आरम्भ करे। पूजनके समय भगवच्चरणोंका इस प्रकार ध्यान करे—भगवान् अपने दाहिने पैरके अँगूठेकी जड़में प्रणतजनोंके संसार-बन्धनका उच्छेद करनेके लिये चक्रका चिह्न धारण करते हैं। मध्यमा अँगुलीके मध्यभागमें अच्युतने अत्यन्त सुन्दर कमलका चिह्न धारण कर रखा है; उसका उद्देश्य है—ध्यान करनेवाले भक्तोंके चित्तरूपी भ्रमरको लुभाना। कमलके नीचे वे ध्वजका चिह्न धारण करते हैं, जो मानो समस्त अनर्थोंको परास्त करके फहरानेवाली विजय-ध्वजा है। कनिष्ठिका अँगुलीकी जड़में वज्रका चिह्न है, जो भक्तोंकी पापराशिको विदीर्ण करनेवाला है। पैरके पार्श्व-भागमें बीचकी ओर अङ्कुशका चिह्न है, जो भक्तोंके चित्तरूपी हाथीका दमन करनेवाला है। श्रीहरि अपने अङ्गुष्ठके पर्वमें भोग-सम्पत्तिके प्रतीकभूत यवका चिह्न धारण करते हैं तथा मूल-भागमें गदाकी रेखा है, जो समस्त देहधारियोंके पापरूपी पर्वतको चूर्ण कर डालनेवाली है। इतना ही नहीं, वे अजन्मा भगवान् सम्पूर्ण विद्याओंको प्रकाशित करनेके लिये भी पद्म आदि चिह्नोंको धारण करते हैं। दाहिने पैरमें जो-जो चिह्न हैं, उन्हीं-उन्हीं चिह्नोंको करुणानिधान प्रभु अपने बायें पैरमें भी धारण करते हैं; इसलिये गोविन्दके माहात्म्यका, जो आनन्दमय रसके कारण अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है, सदा श्रवण और कीर्तन करना चाहिये। ऐसा करनेवाले मनुष्यकी मुक्ति होनेमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
अब मैं प्रत्येक मासका वह कृत्य बतला रहा हूँ, जो भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला है। जेठके महीनेमें पूर्णिमा तिथिको स्नान आदिसे पवित्र होकर यत्नपूर्वक श्रीहरिका स्नानोत्सव मनाना चाहिये, इससे दिन, पक्ष, मास, ऋतु और वर्षभरके पाप नष्ट हो जाते हैं। कोटि-कोटि सहस्र जो पातक और उपपातक होते हैं, उन सबका नाश हो जाता है। स्नानके समय कलशमें जल लेकर भगवान्के मस्तकपर धीरे-धीरे गिराना चाहिये और पुरुषसूक्तके मन्त्रों तथा पावमानी ऋचाओंका क्रमशः पाठ करते रहना चाहिये। नारियल-युक्त जल, तालफलसे युक्त जल, रत्नमिश्रित जल, चन्दनमिश्रित जल तथा पुष्पयुक्त जल—इन पाँच उपचारोंसे स्नान कराकर अपने वैभव-विस्तारके अनुसार भगवान्की आराधना करे। तत्पश्चात् 'घं घण्टायै नमः' इस मन्त्रको पढ़कर घण्टा बजावे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'अपनी ऊँची आवाजसे पतितोंकी पातकराशिका निवारण करनेवाली घण्टे! घोर संसारसागरमें पड़े हुए मुझ पापीकी रक्षा करो।' जो श्रोत्रिय विद्वान् ब्राह्मण पवित्रभावसे इस प्रकार भगवान्की
* अशुचिर्वा शुचिर्वापि सर्वकालेषु सर्वदा। नामसंस्मरणादेव संसारान्मुच्यते क्षणात्॥ (८०।७, ८)
† अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ (८०।११)
पातालखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा भगवान्की विशेष आराधनाका वर्णन * ५६७
आराधना करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णु-लोकमें जाता है।
आषाढ़ शुक्ला द्वितीयाको भगवान्की सवारी निकालकर रथयात्रा-सम्बन्धी उत्सव करना चाहिये। तथा आषाढ़ शुक्ला एकादशीको भगवान्के शयनका उत्सव मनाना चाहिये फिर श्रावणके महीनेमें श्रावणीकी विधिका पालन करना उचित है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमीको भगवान् श्रीकृष्णके जन्मका दिन है, उस दिन व्रत रखना चाहिये। तत्पश्चात् आश्विनके महीनेमें सोये हुए भगवान्के करवट बदलनेका उत्सव मनाना उचित है। उसके बाद समयानुसार श्रीहरिके शयनसे उठनेका उत्सव करे, अन्यथा वह मनुष्य विष्णुका द्रोह करनेवाला माना जाता है। आश्विनके शुक्लपक्षमें भगवती महामायाका भी पूजन करना कर्तव्य है। उस समय विष्णुरूपा भगवतीकी सोने या चाँदीकी प्रतिमा बना लेनी चाहिये। हिंसा और द्वेषका परित्याग करना चाहिये; क्योंकि विष्णुकी पूजा करनेवाला पुरुष धर्मात्मा होता है [और हिंसा, द्वेष आदि महान् अधर्म हैं]। कार्तिक पुण्यमास है; उसमें इच्छानुसार पुण्य करे। भगवान् दामोदरके लिये प्रतिदिन किसी ऊँचे स्थानपर दीपदान करना उचित है। दीपक चार अङ्गुलका चौड़ा हो और उसमें सात बत्तियाँ जलायी जायें। फिर पक्षके अन्तमें अमावास्याको सुन्दर दीपावलीका उत्सव मनाया जाय। अगहनके शुक्लपक्षमें षष्ठी तिथिको सफेद वस्त्रोंके द्वारा भगवान् जगदीशकी और विशेषतः ब्रह्माजीकी पूजा करे। पौष मासमें भगवान्का पुष्पमिश्रित जलसे अभिषेक तथा तरल चन्दन वर्जित है। मकरसंक्रान्तिके दिन तथा माघके महीनेमें अधिवासित तण्डुलका भगवान्के लिये नैवेद्य लगावे और ‘ॐ विष्णवे नमः’ इस मन्त्रका उच्चारण करे। फिर ब्राह्मणोंको देवाधिदेव भगवान्के सामने बिठाकर भक्तिपूर्वक भोजन करावे तथा उन भगवद्भक्त द्विजोंकी भगवद्बुद्धिसे पूजा करे। एक भगवद्भक्त पुरुषके भोजन करा देनेपर करोड़ों मनुष्योंके भोजन करानेका फल होता है। यदि पूजामें किसी अङ्गकी कमी रह गयी हो तो वह ब्राह्मण-भोजन करानेसे अवश्य पूर्ण हो जाती है। माघके शुक्लपक्षमें वसन्त-पञ्चमीको भगवान् केशवको नहलाकर आमके पल्लव तथा भाँति-भाँतिके सुगन्धित चूर्ण आदिके द्वारा विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। तत्पश्चात् ‘जय कृष्ण’ कहकर भगवान्का स्मरण करते हुए उन्हें एक मनोहर उपवनमें प्रदक्षिणभावसे ले जाय और वहाँ दोलोत्सव मनावे। उक्त उपवनको प्रज्वलित दीपकोंके द्वारा प्रकाशित किया जाय। उसमें ऐसे-ऐसे वृक्ष हों, जो सभी ऋतुओंमें फूलोंसे भरे रहें। फल-फूलोंसे सुशोभित नाना प्रकारके वृक्ष, पुष्पनिर्मित चँदोवे, जलसे भरे हुए घट, आमकी छोटी-बड़ी शाखाएँ तथा छत्र और चँवर आदि वस्तुएँ उस वनकी शोभा बढ़ा रही हों। कलियुगमें विशेषरूपसे दोलोत्सवका विधान है। फाल्गुनकी चतुर्दशीको आठवें पहरमें अथवा पूर्णमासी या प्रतिपदाकी सन्धिमें भगवान्की भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा करे। उस समय श्वेत, लाल, गौर तथा पीले—इन चार प्रकारके चूर्णोंका उपयोग करे, उनमें कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थ मिले होने चाहिये। हल्दीका रंग मिला देनेसे उन चूर्णोंके रंग तथा रूप और भी मनोहर हो जाते हैं। इनके सिवा, अन्य प्रकारके रंग-रूपवाले चूर्णोंद्वारा भी परमेश्वरको प्रसन्न करे। एकादशीसे लेकर पञ्चमीतक इस उत्सवको पूरा करे अथवा पाँच या तीन दिनतक दोलोत्सव करना उचित है। यदि मनुष्य एक बार भी झूलेमें झूलते हुए दक्षिणाभिमुख श्रीकृष्णका दर्शन कर लें तो वे पापराशिसे मुक्त हो जाते हैं; इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
महाभागे! जो मनुष्य वैशाख-मासमें जलसे भरे हुए सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टीके पात्रमें श्रीशालग्रामको या भगवान्की प्रतिमाको पधराकर जलमें ही उसका पूजन करता है, उसके पुण्यकी गणना नहीं हो सकती। ‘दमन’ (दौना) नामक पुष्पका आरोपण करके उसे श्रीविष्णुको अर्पित करना चाहिये। वैशाख, श्रावण अथवा भाद्रपद मासमें ‘दमनार्पण’ करना उचित है। पूर्वी हवा चलनेपर ही दमनार्पण आदि कर्म होते हैं; उस समय विधिपूर्वक भगवान्का पूजन