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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

१२५-सीताका अपवाद करनेवाले धोबीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

५१८ । * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * । [ संक्षिप्त पद्मपुराण


महान् अभ्युदयसे शोभा पानेवाली सीताजी तो आपके बिना क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकतीं। इसलिये मेरा अनुरोध तो यही है कि आप पतिव्रता श्रीसीताके साथ रहकर इस विशाल राज्य-लक्ष्मीकी रक्षा कीजिये।'

भरतके ये वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ, परम धार्मिक श्रीरघुनाथजी इस प्रकार बोले—'भाई ! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह धर्मसम्मत और युक्तियुक्त है। परन्तु इस समय मैं जो बात कह रहा हूँ, उसीको मेरी आज्ञा मानकर करो। मैं जानता हूँ मेरी सीता अग्निद्वारा शुद्ध, पवित्र और लोकपूजित है, तथापि मैं लोकापवादके कारण आज उसका त्याग करता हूँ। इसलिये तुम जनककिशोरीको वनमें ले जाकर छोड़ आओ।' श्रीरामका यह आदेश सुनते ही भरतजी मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।


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सीताका अपवाद करनेवाले धोबीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

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**वात्स्यायनजीने पूछा—**स्वामिन् ! जिनकी उत्तम कीर्ति सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करनेवाली है, उन्हीं जानकीदेवीके प्रति उस धोबीने निन्दायुक्त वचन क्यों कहे? इसका रहस्य बतलाइये।

**शेषजीने कहा—**मिथिला नामकी महापुरीमें महाराज जनक राज्य करते थे। उनका नाम था सीरध्वज। एक बार वे यज्ञके लिये पृथ्वी जोत रहे थे। उस समय चौड़े मुँहवाली सीता (फालके धँसनेसे बनी हुई गहरी रेखा) के द्वारा एक कुमारी कन्याका प्रादुर्भाव हुआ, जो रतिसे भी बढ़कर सुन्दर थी। इससे राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भुवनमोहिनी शोभासे सम्पन्न उस कन्याका नाम सीता रख दिया। परम सुन्दरी सीता एक दिन सखियोंके साथ उद्यानमें खेल रही थीं। वहाँ उन्हें शुक पक्षीका एक जोड़ा दिखायी दिया, जो बड़ा मनोरम था। वे दोनों पक्षी एक पर्वतकी चोटीपर बैठकर इस प्रकार बोल रहे थे—'पृथ्वीपर श्रीराम नामसे प्रसिद्ध एक बड़े सुन्दर राजा होंगे। उनकी महारानी सीताके नामसे विख्यात होंगी। श्रीरामचन्द्रजी

पातालखण्ड ] * सीताका अपवाद करनेवाले धोबीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त * ५१९


बड़े बुद्धिमान् और बलवान् होंगे तथा समस्त राजाओंको अपने वशमें रखते हुए सीताके साथ ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकीदेवी और धन्य हैं श्रीराम, जो एक-दूसरेको प्राप्त होकर इस पृथ्वीपर आनन्दपूर्वक विहार करेंगे।'

तोतेके उस जोड़ेको ऐसी बातें करते देख सीताने सोचा कि 'ये दोनों मेरे ही जीवनकी मनोहर कथा कह रहे हैं इन्हें पकड़कर सभी बातें पूछूँ।' ऐसा विचार कर उन्होंने अपनी सखियोंसे कहा, 'यह पक्षियोंका जोड़ा बहुत सुन्दर है, तुमलोग चुपकेसे जाकर इसे पकड़ लाओ।' सखियाँ उस पर्वतपर गयीं और दोनों सुन्दर पक्षियोंको पकड़ लायीं। लाकर उन्होंने सीताको अर्पण कर दिया। सीता उन पक्षियोंसे बोलीं— 'तुम दोनों बड़े सुन्दर हो; देखो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँसे आये हो ? राम कौन हैं ? और सीता कौन हैं ? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई ? इस सारी बातोंको जल्दी-जल्दी बताओ। मेरी ओरसे तुम्हें भय नहीं होना चाहिये।' सीताके इस प्रकार पूछनेपर दोनों पक्षी सब बातें बताने लगे— 'देवि ! वाल्मीकि नामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़े महर्षि हैं, जो धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं। हम दोनों उन्हींके आश्रममें रहते हैं। महर्षिने रामायण नामका एक ग्रन्थ बनाया है, जो सदा ही मनको प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्योंको उस रामायणका अध्ययन कराया है। तथा प्रतिदिन वे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहकर उस रामायणके पद्योंका चिन्तन किया करते हैं। रामायणका कलेवर बहुत बड़ा है। हमलोगोंने उसे पूरा-पूरा सुना है। बारम्बार उसका गान और पाठ सुननेसे हमें भी उसका अभ्यास हो गया है। राम और जानकी कौन हैं, इस बातको हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि श्रीरामके साथ क्रीडा करनेवाली जानकीके विषयमें क्या-क्या बातें होनेवाली हैं; तुम ध्यान देकर सुनो। 'महर्षि ऋष्यशृङ्गके द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञके प्रभावसे भगवान् विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। देवाङ्गनाएँ भी उनकी उत्तम कथाका गान करेंगी। श्रीमान् राम महर्षि विश्वामित्रके साथ भाई लक्ष्मणसहित हाथमें धनुष लिये मिथिला पधारेंगे। उस समय वहाँ एक ऐसे धनुषको, जिसका धारण करना दूसरोंके लिये कठिन है, देखकर वे उसे तोड़ डालेंगे और अत्यन्त मनोहर रूपवाली जनककिशोरी सीताको अपनी धर्म-पत्नीके रूपमें ग्रहण करेंगे। फिर उन्हींके साथ श्रीरामचन्द्रजी अपने विशाल साम्राज्यका पालन करेंगे।' ये तथा और भी बहुत-सी बातें वहाँ रहते समय हमारे सुननेमें आयी हैं। सुन्दरी ! हमने तुम्हें सब कुछ बता दिया। अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो।'

कानोंको अत्यन्त मधुर प्रतीत होनेवाली पक्षियोंकी ये बातें सुनकर सीताने उन्हें मनमें धारण किया और पुनः उन दोनोंसे इस प्रकार पूछा— 'राम कहाँ होंगे ? किसके पुत्र हैं और कैसे वे दूल्ह-वेषमें आकर जानकीको ग्रहण करेंगे ? तथा मनुष्यावतारमें उनका श्रीविग्रह कैसा होगा ?' उनके प्रश्न सुनकर शुकी मन-ही-मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचानकर वह सामने आ उनके चरणोंपर गिर पड़ी और बोली— 'श्रीरामचन्द्रजीका मुख कमलकी कलीके समान सुन्दर होगा। नेत्र बड़े-बड़े तथा खिले हुए पङ्कजकी शोभाको धारण करनेवाले होंगे। नासिका ऊँची, पतली और मनोहारिणी होगी। दोनों भौंहें सुन्दर ढंगसे परस्पर मिली होनेके कारण मनोहर प्रतीत होंगी। भुजाएँ घुटनोंतक लटकी हुई एवं मनको लुभानेवाली होंगी। गला शङ्खके समान सुशोभित और छोटा होगा। वक्षःस्थल उत्तम, चौड़ा एवं शोभासम्पन्न होगा। उसमें श्रीवत्सका चिह्न होगा। सुन्दर जाँघों और कटिभागकी शोभासे युक्त उनके दोनों घुटने अत्यन्त निर्मल होंगे, जिनकी भक्तजन आराधना करेंगे। श्रीरघुनाथजीके चरणारविन्द भी परम शोभायुक्त होंगे; और समस्त भक्तजन उनकी सेवामें सदा संलग्न रहेंगे। श्रीरामचन्द्रजी ऐसा ही मनोहर रूप धारण करनेवाले हैं। मैं उनका क्या वर्णन कर सकती हूँ। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणोंका बखान नहीं कर सकता। फिर हमारे-जैसे पक्षीकी क्या बिसात है। परम सुन्दर रूप धारण करनेवाली लावण्यमयी लक्ष्मी भी जिनकी झाँकी

५२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


करके मोहित हो गयी, उन्हें देखकर पृथ्वीपर दूसरी कौन स्त्री है, जो मोहित न हो। उनका बल और पराक्रम महान् है। वे अत्यन्त मोहक रूप धारण करनेवाले हैं। मैं श्रीरामका कहाँतक वर्णन करूँ। वे सब प्रकारके ऐश्वर्यमय गुणोंसे युक्त हैं। परम मनोहर रूप धारण करनेवाली वे जानकीदेवी धन्य हैं, जो श्रीरघुनाथजीके साथ हजारों वर्षोंतक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी। परन्तु सुन्दरी ! तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है, जो इतनी चतुरता और आदरके साथ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका कीर्तन सुननेके लिये प्रश्न कर रही हो।'

पक्षियोंकी ये बातें सुनकर जनककुमारी सीता अपने जन्मकी ललित एवं मनोहर चर्चा करती हुई बोलीं—'जिसे तुमलोग जानकी कह रहे हो, वह जनककी पुत्री मैं ही हूँ। मेरे मनको लुभानेवाले श्रीराम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम दोनोंको छोड़ूँगी, अन्यथा नहीं; क्योंकि तुमने अपने वचनोंसे मेरे मनमें लोभ उत्पन्न कर दिया है। अब तुम इच्छानुसार खेल करते हुए मेरे घरमें सुखसे रहो और मीठे-मीठे पदार्थ भोजन करो।' यह सुनकर सुग्गीने जानकीसे कहा—'साध्वी ! हम वनके पक्षी हैं, पेड़ोंपर रहते हैं और सर्वत्र विचरा करते हैं। हमें तुम्हारे घरमें सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थानपर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर तुम्हारे यहाँ आ जाऊँगी।' उसके ऐसा कहनेपर भी सीताने उसे न छोड़ा। तब उसके पतिने विनीत वाणीमें उत्कण्ठित होकर कहा—'सीता ! मेरी सुन्दरी भार्याको छोड़ दो। इसे क्यों रख रही हो। शोभने ! यह गर्भिणी है, सदा मेरे मनमें बसी रहती है। जब यह बच्चोंको जन्म दे लेगी, तब इसे लेकर फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा।' तोतेके ऐसा कहनेपर जानकीने कहा—'महामते ! तुम आरामसे जा सकते हो, मगर तुम्हारी यह भार्या मेरा प्रिय करनेवाली है। मैं इसे अपने पास बड़े सुखसे रखूँगी।'

यह सुनकर पक्षी दुःखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणीमें कहा—'योगीलोग जो बात कहते हैं, वह सत्य ही है—किसीसे कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोषके कारण ही बन्धनमें पड़ता है। यदि हम इस पर्वतके ऊपर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिये यह बन्धन कैसे प्राप्त होता। इसलिये मौन ही रहना चाहिये।' इतना कहकर पक्षी पुनः बोला—'सुन्दरी ! मैं अपनी इस भार्याके बिना जीवित नहीं रह सकता, इसलिये इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बड़ी अच्छी हो [मेरी प्रार्थना मान लो]।' इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर उसने समझाया, किन्तु सीताने उसकी पत्नीको नहीं छोड़ा, तब उसकी भार्याने क्रोध और दुःखसे आकुल होकर जानकीको शाप दिया— 'अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पतिसे विलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणीकी अवस्थामें श्रीरामसे अलग होना पड़ेगा।' यों कहकर पति-वियोगके शोकसे उसके प्राण निकल गये। उसने श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण तथा पुनः-पुनः राम-नामका उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिये उसे ले जानेके लिये एक सुन्दर विमान आया और वह पक्षिणी उसपर बैठकर भगवान्‌के धामको चली गयी।

भार्याकी मृत्यु हो जानेपर पक्षी शोकसे आतुर होकर बोला—'मैं मनुष्योंसे भरी हुई श्रीरामकी नगरी अयोध्यामें जन्म लूँगा तथा मेरे ही वाक्यसे उद्वेगमें पड़कर इसे पतिके वियोगका भारी दुःख उठाना पड़ेगा।' यह कहकर वह चला गया। क्रोध और सीताजीका अपमान करनेके कारण उसका धोबीकी योनिमें जन्म हुआ। जो बड़े लोगोंकी बुराई करते हुए क्रोधपूर्वक अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह द्विजोंमें श्रेष्ठ ही क्यों न हो, मरनेके बाद नीच-योनिमें उत्पन्न होता है। यही बात उस तोतेके लिये भी हुई। उस धोबीके कथनसे ही सीताजी निन्दित हुईं और उन्हें पतिसे वियुक्त होना पड़ा। धोबीके रूपमें उत्पन्न हुए उस तोतेका शाप ही सीताका पतिसे विछोह करानेमें कारण हुआ और इसीसे वे वनमें गयीं। विप्रवर ! विदेहनन्दिनी सीताके सम्बन्धमें तुमने जो बात पूछी थी वह कह दी। अब फिर आगेका वृत्तान्त कहता हूँ, सुनो।