सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯,
▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯?
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯-▯▯ ▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯-▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯--▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯,
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯-▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯?
▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯-▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯!
▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯? ▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯-▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯! ▯▯▯--▯▯▯▯ ▯▯▯--▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯,
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯--▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯,
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯; ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯-▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
42

कहना पड़ा होगा, हाँ, न्याय संगत अधिकार देने की बात कही जाय अथवा
किया जाय तो वह बात सुन कर हँसेगा, सिर धुनने लगेगा या कान बन्द
कर लेगा।
जो प्रत्येक को रूप, रस, गन्ध स्पर्श! का ज्ञान, वाणी शक्ति से मुक्त
कर दे? उसके बाद भी हम यह न सोच सकें तो, सो तो सो ही गये होंगे?
हम तो सो गये, मगर वो जागा ही, जिस ने प्रत्येक को ज्ञान से भी वंचित
कर डाला तथा यह न सोचे कि हम भी कभी जागेंगे? उठ कर खड़े तो नहीं होंगे?
जब से उठ कर वो सब कुछ कर डाला जिसका परिणाम हम भोगते रहे, फिर भी हमारी
अक्ल पर तो ताला लगा रहा, न तो हम ने अपने अस्तित्व को, न ही उस की
राह को जाना जो समाज को, देश को आगे लेकर जाती है?
वो लोग अधिकार दे या न दे मगर उनका तो फर्ज बनता था सो उन्होंने किया,
हम लोग अपना फर्ज भूलते
जीवन तो समाज का था, उस वक्त जिस प्रकार से अन्धविश्वास बढ़ ही
गया था कि लोग या तो वो सब जानते नहीं थे, जिस कारण समाज से बहिष्कार या
समाज निष्कासित कर दिये जाने का भय बना रहता, क्योंकि बहुत सारे अत्याचार
तो केवल इसी, से डर कर लोग सहन कर रहे थे, उस वक्त उन लोगों
क्या वो अधिकार था? क्या वो समाज से बहिष्कृत नहीं हो रहे? वो अकेले
पड़ गये थे मगर वो, उस वक्त वो समाज से बहिष्कार को नहीं, अपने विचार
प्रवाह को ज्यादा महत्व दे रहे थे? हालांकि समाज से ही तो वो सब डर रहे
थे, सो जन-जागृति का बिगुल, समाज को ही जगा कर तथा समाज के ही
लोगों को जगाकर बताया गया कि वो जो कर रहे हैं, वो सब सो रहे
हैं! जब जगाया जा रहा, उनकी राह सरल की जाती हो तो, वो सो ही रहे
हैं! जाग जाओ, इस प्रकार के संदेश जन तक लोग पहुंचाते रहे, मगर उस
अन्धविश्वास को, उस वक्त समाप्त कर पाना बड़ा कठिन दायित्व! उस वक्त
निर्वहन किया गया!
जो प्रकाश उन के द्वारा इन लोगों को मिला वो लोग प्रकाश को प्रकाशित
तो कर सके, पर अन्धकारमय उस राह को जिसे समाज पर थोपकर यह दिखाया जा
रहा था सब कुछ, अन्धविश्वास से ग्रसित हो समाज के ही लोग कर रहे थे।
इस से बड़ा क्या होगा, कि लोग अपने हक अधिकार को पहचान नहीं, उस वक्त
पा रहे!
वो प्रकाश उन के ही अन्धकारमय के उस स्वरूप को सामने लाया, जो
केवल अपने लाभ के लिये ऐसा किया जा रहा था अथवा सो सोचा जा रहा
था! वो लोग समाज सुधारक बन कर सामने तो आये, समाज की बहुत सारी
ऐसी प्रथाओं को तो दूर कर सके!
उस काल में भी लोग, सब के अन्धविश्वास से मुक्त तो नहीं मगर कुछ
तो थे जो उन सब बातों को जान चुके थे, इस लिये समाज को एक रोशनी
मिली तो प्रकाश फैलता गया, जब रोशनी से राह को देखा गया, तो लोगों
समझ कर उस राह को अपनाया जिस कारण आज हम सब कुछ बन
सके हैं। यदि हम समाज के लिये कुछ-कुछ भी कर पाते हैं तो उस
विचार को तो माना ही जा रहा है। जिसकी शुरुआत उन
लोगों ने की, क्या विचार वो सब था? हालांकि! उस का स्वरूप, वो
आज तो नहीं? जो सब हम देख रहे हैं, वो स्वरूप तो आज का नहीं?
वक्त के साथ बदल गया सब।
मगर सच, क्या हमारा समाज आज-कल सही की तरफ जा रहा है? कुछ लोग
आज भी तो अन्धविश्वास अथवा अंध विश्वास फैलाकर, तथा अंधविश्वासी
बनाकर ही समाज को दिशा-हीन तो नहीं कर रहे? कुछ लोग तो ऐसा कर
ही रहे हैं, अन्धविश्वास को अपनाकर हम उन लोगों को बढ़ावा दे सकते
हैं अन्यथा नहीं! उस वक्त के, स्वरूप से तो वर्तमान का रूप सही नहीं,
अंधविश्वास केवल रूप तो बदल गया मगर उस स्वरूप को सब लोग आज
भी नहीं समझ पा रहे हैं कि क्या है और क्या नहीं! हालांकि वो ही, इस
बात को नहीं मान कर अपनी राह बना
रहे होंगे। वो, उन बातों को छोड़ कर आगे बढ़ रहे
तो उनका तो कल्याण हो ही गया, पर जो अन्धविश्वास के साथ आगे बढ़ा होगा,
43

इसलिए तुम सब उस प्रभु का भजन करो। परमात्मा दयालु, कृपालु, सब जीवोंपर उसका बड़ा भारी उपकार है!
उस उपकार को जो मनुष्य भूल जाता है—कृतघ्नताका वह पाप सिरपर बाँधता है। अरे भाइयो, उठो सचेत,
उस परमात्मा की शरण गहो!
यह विचार कर किसी वृद्ध ने कहा—हे भाई! मुझे तो अब तक मालूम ही नहीं हुआ था कि माता-
पिताका हमारे ऊपर इतना उपकार है। आज प्रभु की कृपा से सब ज्ञात हुआ, जो उपदेश तूने दिया, बड़ा
उत्तम उपकार का रूप हमारे मन में दृढ़ किया। सो अब ऐसा उपाय बता कि जिससे हमारा उद्धार
कैसे हो। सब दुःखों से छूटने का उपाय क्या है!
तब सब को ऐसा समझा उपदेश दिया—हे भाई! जो माता का भजन न करे—जो पिता की सेवा
पूजा मन से न करे—जो बड़े भाई का आदर न करे, जो स्वामी अर्थात् जिससे आजीविका पाता है उसका
उपकार न माने—जो माता-पिता अपने बच्चों का उपकार भूल जावें अर्थात् उनका आदर न करें,
ऐसा नर घोर नरक में जायगा! ऐसा वचन सुनकर लज्जित, भयभीत होकर बोले, हे हमारे भाई, अब कोई
ऐसा उपाय
हम लोगों द्वारा होना तो बड़ा ही कठिन जान पड़ता है! तब उस पुरुष ने सब को समझाकर कहा
परस्पर प्रीति का, सत्यताका मार्ग धारण करना चाहिए जिससे सबका उपकार हो सके। ऐसा धर्म
धारण करो!
तब सबलोग उठ कर, विचार करके सब जन घर को आये। आपस में परस्पर मिलकर
ऐसा निश्चय कर अपने घर-गृहस्थ का काम करने लगे। जो माता-पिता थे, सो बच्चों
की भलाई का विचार करने लगे। जो बच्चे थे सो माता-पिता, बड़े भाई आदिकों की
आज्ञा मानने लगे। माता-पिता की सेवा-पूजा करें! सब का मन आनन्द में मग्न हो गया। जिस
घर में सब पुत्र आज्ञाकारी हों उस घर में सर्व सम्पदा वास करती है। अतः हे शिष्य,
ऐसा विचार कर सेवा-भक्ति का आदर करो! सो भी निश्छलभाव, निष्कपट होकर। सो अपने
धर्म का आचरण करनेवाला हो। गुरु से कपट भाव न रखे। जो गुरु से कपट भाव रखेगा सो नरक
में जायगा। शिष्य का धर्म है कि सत्यवादी, सेवापरायण, गुरु के चरणों में लीन रहे।
इसलिए जो शिष्य गुरु का आदर न करे, कपट भाव रखे... तो वह गुरुद्रोही कहलावेगा। जो गुरुद्रोही
होगा वह नरक में जायगा। शिष्य को चाहिए कि गुरु आज्ञाकारी हो। गुरु सेवा से कल्याण होगा। गुरु
की सेवा करे, गुरु की आज्ञा में सदा रहे। यदि ऐसा न करेगा तो नरकगामी होगा। माता-पिता की सेवा
न करेगा, तो वह अवश्य नरक जायगा, चौरासी-लाख में भटकेगा। इस बात का विचार
करो!
शिष्य ने यह वचन सुनकर हाथ जोड़े, और कहा—हे महाराज! जो आपने माता-पिता का उपकार
कहा सो सच-सच है। उन जैसा उपकारी कोई संसार में नहीं। माता का उपकार बड़ा, पिता
का आदर बड़ा, इन दोनों का आदर-सम्मान करना सब का मुख्य धर्म है। जो माता-पिता का
आदर नहीं
करता वह नरक का भागी होता है। अब कहिये—संसार में बड़ा कौन है? बड़ा भाई या छोटा
भाई? इस बात का विचार करके आप मुझे समझाइये। तब गुरु ने कहा—बड़ा भाई पिता के
समान है, सो उसका आदर करना, उस का सत्कार करना, उस का हुक्म मानना, उस की आज्ञा
में रहना, गुरु के समान उस का आदर करना, उस की सेवा करना सब जीवों का धर्म है। बड़ा
भाई, जो अपनी पत्नी का आदर न करे, उस का आदर न करे, उस के साथ प्रीति न रखे, उसको
भी नरक में जाना पड़ता है। इस प्रकार भाई-भाई आपस में प्रेम रखें।
जो भाई अपने भाई से कपट भाव रखेगा, उस को नरक में जाना पड़ेगा, बड़ा भाई
पिता समान है, उस का अनादर करने से भारी पाप होता है। छोटा भाई पुत्र के समान
है। जो माता-पिता अपने बालकों को मारते हैं या उनको दुःख देते हैं अथवा अपने धर्म से
पतित होते हैं, सो भी नरक के भागी होते हैं, इस बात का विचार करना चाहिए?
शिष्य बोला—हे महाराज! यह सब बात सत्य है। इस संसार में कोई किसी का नहीं
सहायता करता। सब अपने-अपने स्वार्थ के सम्बन्धी हैं, कोई किसी का उपकार नहीं मानता।
कोई किसी का आदर नहीं करता। कोई किसी के धर्म को नहीं मानता। तब गुरु ने कहा—संसार
असार है, माया-मोह में फंसा हुआ है!
अतः इस संसार का मोह छोड़कर उस जगदीश्वर का भजन करो जिससे मोक्ष
प्राप्त हो। इस संसार में आकर जो मनुष्य हरिभजन नहीं करता, उस का जन्म व्यर्थ है।
इस शरीर का कोई भरोसा नहीं। यह शरीर पानी के बुलबुले के समान नष्ट होनेवाला है।
अंत में केवल हरि का नाम ही काम आता है, सो हरि का भजन करो और गुरु की सेवा में
रत रहो। गुरु की शरण में जाने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सद्गति प्राप्त होती
है। जो मनुष्य गुरु की आज्ञा का पालन करता है वह भवसागर से पार हो जाता है। इसलिए
गुरु की सेवा करो, हरिभजन करो जिससे तुम्हारा उद्धार हो।
44

इस बात बात सिद्धान्तप्रमेय का विवेचन करते समय मैंने न्याय शास्त्र का एक सूत्र
भी लिख कर समझाया, जिसको कि कोई, कदाचित् आस्तिक न्याय शास्त्र को नहीं पढे,
या नहीं भी समझे, शास्त्रविशारद को सब बात, सहज बात समझ, उसकी तो बुद्धि में
बैठजाती है कि ईश्वर
कर्त्ता कैसा? ईश्वर कैसा निमित्त वा न्याय के प्रमाण से ईश्वर को कर्त्ता कह सकता
सकता है, सो सब प्रमाण में ऊपर दे--चुकेगा अब तो उसका ही, कभी-कभी मन
का हो जाय! कितना समझा दिया जाय, सब ही प्रमाण निष्फल हो जाय, सो तो
महाशयजी को, यह पहले ही लिख समझाकर कह दिया था जिस पर विचार न कर
अपनी एक--तनी बात ही पकडकर बैठे।
सो महाशयजी प्रथम बार फिर इस बात पर, न्याय दृष्टान्त पर ही जोर देकर ही
लिखना शुरू किया सो ठीक ही, अपने सब प्रमाण तो निष्फल हो चुके ही, आगे क्या
लिखते? जब तक बात न्याय में ठीक न हो तब तक प्रमाण कैसे माना जाय। सो, सो
भी न्याय का सूत्र? न्याय का दृष्टान्त क्या समझना पडेगा? न्याय दृष्टान्त को सत्य
ही है, पर जो बात समझ, सो सब बात समझकर सिद्ध करे, तब न्याय माना
सो न्याय शास्त्र के प्रमाण से, जो यह तो सिद्ध करने का यत्न किया कि कुम्हार
मिट्टी आदि का कर्त्ता है, सो न्याय के प्रमाण लिखे से यह सिद्ध हो गया कुम्हार
सो, तो निमित्तमात्र ही ठहरा जैसा कि कहा, पर जैसा मिट्टी का निमित्त रूप से
कर्त्ता रूप से ही जो ईश्वर को कर्त्ता वा जैसा सिद्ध किया गया वैसा सिद्ध ही ईश्वर
का भी सिद्ध मानना पडेगा
ईश्वर को भी न्याय के प्रमाण से न्याय सम्मत कर्त्ता तो सिद्ध हो गया निमित्त
का रूप सिद्ध रूप रूप से।
ईश्वर सब रचना रूपी जगत कार्यरचना को, जैसा निमित्त से, निमित्त कर्त्ता
मानने से निमित्त का रूप न तो रूप सिद्ध रूप ठहरा; सो उस ही रूप निमित्त रूप कर्त्ता
का रूप सिद्ध रूप निमित्त ठहरा सो सो ही, सब व सब बात निमित्त सम्मत सिद्ध
स्वरूप निमित्त सिद्ध सो सो सब कुम्हार निमित्त से सिद्धान्त को सिद्ध हो गया जो
बात थी, पहले सिद्ध सिद्धान्त से सिद्ध हो गई सो हुई
पर ईश्वर को तो सब रूप से ही सिद्ध रूप में निमित्त रूप रहा, निमित्त कर्त्ता
ठहराया?
सो सब बात सत्य ही सिद्धान्त रूप रहा, सो निमित्त कर्त्ता ठहरा व रूप सिद्ध
निमित्त रूप रहा निमित्त सिद्ध रूप से निमित्त सिद्ध हो निमित्त का सिद्ध रूप सिद्ध
सिद्ध सब ही का महाप्रलय काल सिद्ध महाप्रलय काल सिद्ध सब सिद्ध स्वरूप
सिद्ध रहता, जैसा पहले सब सिद्ध सिद्धान्त से निमित्त ही सिद्ध
सब ही महाप्रलय के समय निमित्त रूप से निमित्त ठहराया सो सिद्ध रूप ही
सिद्ध रूप ही ही सिद्ध रूप ही सिद्ध निमित्त रूप महाप्रलय काल में ही सिद्ध रूप
महा, सिद्ध, महाप्रलयकाल, सिद्ध सब निमित्त ही ही सिद्ध? निमित्त ही ही सिद्ध
रूप सब ही सिद्ध सिद्ध रूप!
ऐसा रूप ही निमित्त सिद्ध ही, निमित्त सिद्ध रूप सिद्ध ही सब सिद्ध
निमित्त सिद्ध रूप निमित्त सिद्ध महाप्रलय सिद्ध, महा, सब सिद्ध निमित्त
सिद्ध ही रहा? सब सिद्ध निमित्त ही?
सो ऐसा सिद्ध ही सिद्ध ही निमित्त सिद्ध सब ही को महाप्रलय से सब रूप से,
सिद्ध निमित्त रूप निमित्त रूप सब ही निमित्त सिद्ध हो ही निमित्त सिद्ध सब ही
निमित्त, सब ही सिद्ध ही निमित्त रूप सब सब निमित्त ही ही रहा?
जो सिद्धान्त सिद्ध ही, सब सिद्ध ही सब निमित्त सिद्ध का सिद्ध कर्त्ता
निमित्त ही सब सब ही ही सब सिद्ध ही सिद्ध, निमित्त ही निमित्त सिद्ध ही?
सब सिद्ध का निमित्त सिद्ध ही निमित्त रूप ही सब ही ही सिद्ध ही सब सब सब
निमित्त सिद्ध रहा
निमित्त सिद्ध सब सिद्ध सब ही सिद्ध ही, सिद्ध ही सिद्ध सब ही सिद्ध स्वरूप!
निमित्त सिद्ध व सिद्ध ही सब निमित्त ही निमित्त, सब सिद्ध ही सिद्ध निमित्त
सिद्ध निमित्त सब सिद्ध सब ही सिद्ध सिद्ध सब ही निमित्त निमित्त ही,
सिद्धान्तसिद्ध सब ही सब सब सब ही, सो सब सिद्ध ही सब निमित्त सिद्ध सब
45

जीवन का सबसे पहला लक्षण या विशेषता स्वयं रक्षा और अपना विकास ही माना गया
जिस रूप उसने चाहा, या वह अपने माता-पिता के रूप समझाता, उस रूप उसने उस विकास
अथवा जीवन को भय अथवा संकट देखा तो, वह चिल्ला उठा, प्रतिवाद करता रहा, अपने जीवन
की, अपनी ही रक्षा उसने की तथा अपने माता-पिता का ध्यान अपनी कठिनाई की ओर खींच
दिया यह उसका पर विचार यदि ध्यान दिया जाए तो ज्ञात, मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्रता
प्रिय या प्रेमी रहा
किस प्रकार की मुक्ति वह चाहता? किस वह मुक्ति या स्वतंत्रता अपने जीवन
विकास के लिए ही केवल वह चाहता था? जिस वह मुक्ति अथवा विकास चाहता था वह कहाँ
तक सही थी? अनेक प्रकारों से, परिस्थितियों के दो रूपों द्वारा उसे सिद्ध किया जा सकता
जा रहा था, और वह यह भी अनुभव करने लगा था कि आगे, वह किस दिशा प्रवृत्त हो?
इसी प्रकार से वह इस और अपने विकास को नए सिरे देकर मानव स्वरूप में प्रवेश कर रहा
था, या यह कहिए कि वह अपने नए रूप अथवा दिशा को जान ही गया, या फिर उसने यह
जान ही लिया
अपनी ओर उसने अब जो स्वरूप या रूप देखा था क्या वैसा पहले कभी देखा था? या
केवल उसने अपनी रक्षा और अपने शरीर रक्षा तक अपने आप को रखा, या स्वावलम्बन तक
ही था, जिसे स्वावलम्बन कहा जा सके, जिसे केवल मनुष्य अपनी रक्षा, या फिर केवल अपनी
सन्तान रक्षा तक सीमित समझे
अब उसके कदम और विस्तृत होकर पड़े, उसकी दृष्टि कुछ और, उसकी समझ कुछ
और, उस दिशा स्वरूप दिशा बनकर उस ओर उसने पहला कदम उठाया तो वह क्या स्वरूप
था? जिसने यह पहला कदम देखा, उसने देखा केवल, स्वावलम्बन स्वरूप जिसे उसने सही
जाना था, और जिसे उसने अपना लक्ष्य या दिशा स्वरूप भी स्वीकार कर लिया था?
स्वरूप तो वह केवल स्वरूप ही देखा जा रहा था और मनुष्य के मन में उसका जो रूप
निर्मित हो रहा देखा जा रहा था वह तो एक ऐसा रूप लेकर सामने आया, जो केवल उस
रूप तक सीमित रहकर रह गया
इस ओर उसने जब नया कदम रखा, उसने पहला स्वरूप किस प्रकार का लिया था
जिसमें केवल दूसरों पर प्रभाव था? जिसने उस पर प्रभाव था, उस दिशा द्वारा उसका
रूप जो बना, उसने उस रूप को अपने प्रभाव का साधन ही तो माना था, वह
प्रभाव किस पर था और क्यों! जो अपने स्वरूप में तो स्वयं को उस रूप में प्रस्तुत कर
रहा अथवा जिस स्वरूप में वह अपने आप को देख रहा था, प्रभाव केवल उसका ही,
सीमित रूप ही स्वावलम्बन रूप कहा गया
जब तक वह रूप इस स्वरूप तक ही एक सीमा तक, जिसे यह कह कर नया
रूप दिया गया, जिसे यह भी कहा गया, रूप जो उसने अन्य को प्रभावित करके
उस पर केवल अपना ही शासन या प्रभाव तो न देखा हो, उस रूप को तो स्वा-
मी कहा जा रहा था अथवा वह यह स्वरूप इस प्रकार से था जिसने प्रभाव तो कर दिखाया
रूप को नया ही, पर वह प्रभाव उस सीमा तक ही रहा, जो था अपने घर तक, या
उस सीमा तक कहा, जो घर या परिवार अथवा समाज तक ही सीमित रह सका, या यह
कहा गया हो, जिसको हम समाज कहा जाए या केवल परिवार स्वरूप समझा जाए, अथवा यह,
कि वह रूप जो केवल अपने तक सीमित रहा उसे तो केवल समाज की सीमा के बाहर
माना गया
केवल समाज का रूप तो तब तक ही एक रूप में तब तक रहा जब तक केवल
अपना ही रूप था! केवल उस समय स्वरूप केवल सीमित था समाज की उस
व्यवस्था तक सीमित या सीमा थी, जब तक समाज केवल व्यक्तिगत परिवारों तक ही
रूप बनाकर खड़ा रहा था या व्यक्तिगत स्वरूप समाज के व्यक्तियों द्वारा अपना
व्यक्तिगत या स्वरूप ही बन सका जिसे समाज का नाम भी दिया गया और इस
नाम स्वरूप से ही उस समाज स्वरूप को देखा जा सका था या समझा गया अथवा
माना जा सका था, व्यक्तिगत रूप समाज! समाज-का तो वह रूप उस समय तक सही
रूप कहा गया
समाज कहाँ तक समाज! जब व्यवस्था एक परिवार से हो ही नहीं सकती
थी, समाज का रूप बन ही नहीं रहा था जब तक समाज का रूप नहीं था
केवल स्वयं तक ही! समाज अथवा जो दिशा दी जा रही थी वह केवल
परिवार से प्रारम्भ, या दो पारिवारिक लोग मिलकर या उस से अधिक उस
स्वरूप--के आधार पर था, समाज बन सके, ऐसा होना ही था, जिस समाज का रूप

46

गया तथा रात--दिन एकाग्र हो उसकी प्राप्ति का अभ्यास करने लगा। इस प्रकार करते हुए
वह प्रत्येक बात अपने गुरुदेव भगवान् श्रीकृष्ण को बता रहा था।
अर्जुन जितने साधन करता जाता था उतना ही! साधनों का अहंकारमय पर्दा
गिरता गया, उस जीव-भाव रूपी जो पर्दा था, वह जाता रहा। जब पर्दा हट गया
तोअभ्यास रूप सब लेन-देन बन्द हो गए और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई।अहंकारमय पर्दा
हटा, तब सब कुछ मिटकर सब कुछ भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप ही बन गया। केवल शान्ति
का, आनन्दमय स्वरूप अपने-आप प्रकट हो गया, अभ्यास करने का भाव, साधन करने
वाला सब कुछ न रह सकता। अभ्यास करनेवाला मिट गया और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई।
अर्जुन का, अभ्यास सब परमात्मा रूप होकर सब प्रकार का संशय मिट गया!
साधन के बाद उसका जो रूप बदला सो, साधन का रूप ही बदल गया। पहले
तक सब साधन के द्वारा कुछ न कुछ पाना था, साधन का अहंकारमय पर्दा लगा रहता
था कि मुझे परमात्मा को पाना है, सिर्फ साधना अभ्यासकर्त्तापने तक सीमित
रह जाती थी मगर उसका पर्दा रूपी अज्ञान समाप्त होने के बाद साधन साधन न
रहाअहंकारमय पर्दा न रह सका। अब तो सब कुछ ईश्वर की लीला लगी, कर्त्ता-
अकर्त्ता सब, स्वरूप का साक्षात्कार हुआ जब, फिर अर्जुन सब प्रकार निष्काम हो
हर काम कर सकता था।
अब अर्जुन का ध्यान सब अभ्यास-अभ्यासी अभ्यास का नाश होने पर जो पूर्ण
निष्ठा प्राप्त करनी थी उसपर गया, जो कि अज्ञान-अहंकार के हट जाने के बाद
की स्थिति सब अर्जुन जान, हर प्रकार अपने को उस ज्ञान रूप से सब तरफ देखने
लगा!
इस निष्ठावान् का जो रूप है, सो अर्जुन सब बात को समझ गया,
जिस प्रकार पानी पर जो बर्फ जमती जाती थी सो पिघल, जल ही निष्ठावान् रूप, बर्फ का
अहंकार जमने वाला सब रूप जब पिघल कर सब रूप एक ही बर्फ पिघलकर, सब कुछ
जल स्वरूप ही बनकर एकरस परब्रह्म परमात्मा रूप स्थिति बन गई।
ज्ञान स्वरूप का ऐसा साधन होने पर यह सब रूप ही ज्ञान स्वरूप बन गया जिस
पर विचार कर, अभ्यास सब रूप त्याग के शान्ति प्राप्त करने का यही साधन अर्जुन
किया करो! अब सब कर्म कर और फल सब त्याग रूप में निष्काम कर्म को प्राप्त हो,
जिस रूप में सब कर्म कर तू जो कुछ त्याग रूप फल त्याग रूप कर्म करता है, जिससे
अनासक्त भाव हो; सब कुछ त्याग फल रूप को तू स्वीकार करके निष्काम भाव से रह,
सब कर्म त्याग फल रूप होकर; फिर सब प्रकार शान्ति को प्राप्त होकर, उस
ज्ञान स्वरूप का साधन कर जिस रूप से सब कुछ त्याग, त्याग ही शान्ति का मूल
जानकर सब का त्याग करके, कर्म-धर्म, अभ्यास-अहंकार, विचार-
अभ्यासवान् का त्याग करके, सब प्रकार उस परमात्मा शान्ति को ही प्राप्त
होकर सब बात को तय कर अर्जुन ज्ञान... परब्रह्म रूप, जो हर प्रकार न त्याग और
कर्म-धर्म का कोई त्याग न रहा, परमात्मा सब त्याग... जो सब प्रकार
समझा दिया सो स्वरूप ज्ञान अर्जुन, सब बात समझकर उस परब्रह्म को प्राप्त
होकर उस ज्ञान रूप को जान कर परमात्मा के ज्ञान स्वरूप में लीन रहा सो अर्जुन
सब कुछ जान सब भाव को त्याग कर्म त्याग फल निष्काम भाव सब कुछ त्याग करके
अर्जुन, तू हर प्रकार शान्ति फल भोग ले!
जो हर दम हर प्रकार ज्ञान, हर दम कर्म-धर्म त्याग करके सब कुछ
भगवान् को अर्पण कर दे और तन--मन से केवल परमात्मा रूप को समझे तथापि
निष्काम कर्म--फल त्यागकर जो सब को ईश्वर का ही, ईश्वर ही सबका सब है, सब
का त्याग कर, जो अपना त्याग ही परमात्मा को कर दिया तो सब रूप उस ईश्वर का
सब प्रकार हर समय निष्काम भाव से ईश्वर स्वरूप बन कर नहीं प्राप्त होगा?
जिस का ऐसा स्वरूप है, सो हर रूप से ज्ञान-स्वरूप होकर जो शान्ति प्राप्त कर
हर समय शान्ति के भाव से सब कुछ ईश्वर ज्ञान से सब निष्काम भाव होकर
सब कुछ त्याग हर कर्म निष्काम रूप करता है, जिससे हर दम शांति रूप
रह सकता है सो, परमात्मा के हर रूप, स्वरूप के हर स्वरूप को, त्याग स्वरूप
सब प्रकार से सब बात का त्याग-धर्म, कर्म-धर्म निष्काम होकर केवल प्रभु
का ध्यान स्वरूप सब प्रकार करता हुआ जो कि परमात्मा का ही सब कुछ है
वह केवल स्वरूप के साथ अपने स्वरूप को न रूप का, नाम को न रूप का, नाम का
स्वरूप न रूप रूप परमात्मा को सब ही सब ध्यान रूप सब कुछ सब प्रकार से
47

▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯--▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯,
▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯-
▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯!
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯! ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯
▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯! ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯!
▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯?
▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯... ?
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯!
▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯!
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯
▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯
▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯... ▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯
▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯! ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯
▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯
▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯
▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯?
48

इस एक वाक्य का अर्थ समझना हर एक जन-जन को अति नितांत आवश्यक था, केवल सुनना भर
मात्र कोई लाभ कारक या कारण बन सका है? इस असंतोषप्रदायकता का उत्तर हर एक जन को मिल चुका था
जन-जन इसके परिणाम भुगतने को वि-वश मजबूर हुआ था, जब तक शक्ति थी, क्षमता वि-वश
होकर कराहता ही जाता, पर शक्ति का नाम मात्र शेष न बचा था।
हर मानव का तन जरजर तो था आत्मा भी रोती थी, परिवार में शांति का नाम
निशान तक न बचा था, केवल उस ही दशा द्वारा जीव-जन्तु त्राहिमाम् का रूप धारण
कर इधर उधर भाग तो रहे थे पर विवशता का भार इतना भारी तथा असहनीय था जिसके
परिणाम स्वरूप सभी; परिवार संताप की ज्वाला भयानक ज्वाला भड़क कर घर-गृहस्थी का
विध्वंस कर उस भयानक अग्नि ज्वाला में ही भस्म होकर स्वाहा हो जाते। केवल शक्तिमान
ही ऐसा था जो बचन शक्ति रखता था अथवा जिसे पूर्ण रूप से प्रभु-कृपा प्राप्त या सुरक्षा
कवच का वरदान था, अन्यथा हर मानव अपनी सुरक्षा का दावा कर इसका पूर्ण दायित्व लेने में असम-
र्थता था, हाथ पैर, साधन सब कुछ होते हुए भी यह सब कुछ रहते हुए भी मानव हाथ पर हाथ
धरे बैठा असहाय बन रोता, पर उस दशा का कोई अंत न दिखाई देता?
इस तरह प्रलयंकारी रूप हर एक को अपना ग्रास बनाता, केवल आश्चर्यचकित
दृष्टि, मूक विवशता भरा यह वातावरण सब को सब ओर से घेरे हुए था।
उस समय सब के सब जो जो जीवित थे केवल कंकाल, दुर्बलता का स्वरूप
विवशता, लाचारी का भयानक स्वरूप हर व्यवस्था तथा शक्ति शून्य होकर भय से कांपते थरथराते
दयनीयता के उस चरम शिखर जिसे विनाश कहा जाता है पहुंच चुके थे। केवल मात्र आशा
जिसे किरण का नाम दिया जा सके उपलब्ध शक्ति द्वारा शून्य नजर, सब दिशाएं घोर अंधकार
का रूप बन चुकी थी चारों ओर से असहायता ही असहायता का नग्न तांडव सब तरफ
व्याप्त था, हर आश्चर्यचकित था कि प्रभु कहां हैं! जो सब रक्षक हैं वे कहां हैं? यह
पुकार हर एक के अधरों अथवा कंठों द्वारा निकल रही थी, सब तरफ से भयानक चीत्कार, चीख
ही चीख, विकट विद्रुप रूप हर ओर से मानव को पल-पल को ग्रसता हुआ, दिखाई देता,
मानव केवल यह ही कह सकने योग्य था कि, हे प्रभु इन सब का अंत कब होगा, या इस
स्वरूप का भयानक परिणाम ही सब कुछ नाश करके स्वतः-समाप्ति की ओर होगा।
पश्चात्ताप की ज्वालाएं प्रज्वलित हो हृदय-अन्तःकरण को जलाकर भस्म कर
दिया करती थी उस समय केवल रुदन था जो सब ओर सब को घेर रहा था तथा, हर एक
पश्चात्ताप या पश्चात्ताप ही करता था, वास्तविकता से सब मुंह तो मोड़ते थे,
परंतु उस मुंह मोड़ने का परिणाम भयानक था, सब ने, सबने मिलकर पश्चात्ताप का पथ चुना
था, पर बिना दिशा के केवल रोने का मार्ग सब तरफ व्याप्त था। केवल आंसू थे जो बहते
जाते थे तथा उनका बहाव सब कुछ बहा कर ले जाने समर्थ हो चला था, केवल रो रोकर
जीवन व्यतीत हो रहा था पर उस बहाव अथवा रुदन का कोई
केवल यह विचार ही सब हृदय में बार बार उठता था कि हम सब जीवित क्यों हैं?
या, जीवित रहने का क्या फल मिल रहा है? केवल यही विचार सब को मथ रहा था, पर कोई उपाय
उस भयानक अंधकार में से निकलने का नहीं सूझ रहा था। केवल मृत्यु, जो केवल एकमात्र
मुक्ति का ही पथ या द्वार, सब को ही नजर, सब को ही अंतिम परिणाम दिखाई
पड़ता नजर आता दिखाई पड़ता नजर आता! सब केवल यही सोचने लगे, हर एक
केवल मृत्यु द्वारा अपने जीवन की समाप्ति को ही, केवल मुक्ति को, ही इस महान संताप
स्वरूप भयानक कष्टों मुक्ति नजर आती! केवल विचार सब को ऐसा ही नजर आता!
केवल इस तरह सब सोचते हुए भयानक परिणाम को हर एक विचार सोचने को बाध्य था,
जिसका कोई परिणाम अथवा निराकरण सब के सब जन मिलकर खोजना चाहते थे
अथवा यह विचार किया करते?
हर एक भयानक परिणाम का अंत कब होगा? इसका क्या रूप होगा? इसका
जो स्वरूप बन चुका था उससे हर एक अत्यंत ही भयभीत था। भयानक संशय तथा
भयानक ही सब ओर का रूप जो सामने था, हर एक मानव को यह सोचने तथा जीने योग्य
नहीं छोड़ता नजर! सब तरफ ही अंधकार नजर! हर दिशा शून्य का ही स्वरूप
दिखाई देती थी हर वातावरण में केवल अंधकार तथा अंधकार भरा स्वरूप? हर ओर
संशय ही तो व्याप्त देखकर था, केवल यह सब
भयानक स्वरूप का रूप हर तरफ तथा इस भयानक का स्वरूप बढ़ रहा था।
सब इस तरफ व्याकुल होकर एक दूसरे को केवल भय से देखते भर ही पाते थे, पर हर
एक सब कुछ खोकर केवल असहायता का स्वरूप धारण किए-हुए आश्चर्यचकित ही बैठा
विवशता लाचारी का रूप सब ओर भरा नजर आता? सब आश्चर्य ही भरा न था!
49

□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□? □□ □□□□
□□□□□□□, □□ □□□□ □□□□□, □□ □□□□ □□□□□, □□ □□□□ □□□□□, □□ □□□□ □□□□□□□□□,
□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□-□□□ □□□ □□ □□ □□□? □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□
□□□ □□ □□ □□, □□□□□□
□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□,
□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□--□□□□□ □□? □□□□! □□□□ □□, □□□□□□ □□, □□□□□
□□, □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□
□□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□--□□□□□□□□□ □□? □□□□,
□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□
□□□□ □□ □□ □□ □□□□□
□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□
□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□
□□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□
□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□, □ □□□□ □□□ □□
□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□
□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□
□□ □□ □□□ □□□□□ □□□, □□□-□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□
□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□
□□□□□□, □□□□□□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□
□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□
□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□
□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□
□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□
□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□
□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□
□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□--□□□□□
□□? □□□□□□ □□ □□□□□□□□□□□□ □□? □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□? □□□□□□
□□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□? □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□?
□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□... □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□□ □□
□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□-
□□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□
□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□,
□□□□□□□□ □□ □□□□□□, □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□,
□□□-□□□ □□□□□□ □□□□□□, □□□-□□□ □□□□□□ □□□□□□□□
□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□? □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□
□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□□, □□□□□ □□ □□□ □□□□□--□□□□□ □□
□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□--□□□□
□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□
□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□! □□ □□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□,
□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□--□□ □□ □□□□ □□□□; □□□□□□□□
□□□ □□ □□□□, □□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□--□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□
□□□ □□ □□□□, □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□
□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□ □□□□-□□□□□ □□
□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□
□□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□
□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□
□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□,
□□□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□
□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□
□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□
□□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□
□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□
□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□, □□□ □□
50

अथवा रात-दिन, रुपया, रोजगार, मकान, इन पर आत्मबुद्धि करे। बिना समझे जीव का
व्यवहार ऐसा बन जाताहै परंतु ज्ञान-नेत्र उघड़े तब यह जाने कि वास्तवमें इन
पर पर्याय का वा इन पर्याय का रच मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। शरीर तो जड़-द्रव्य है, इसमें
तो ज्ञानस्वभाव ही नहीं है। आत्मा तो ज्ञान स्वरूप, चैतन्य रूप है, वास्तवमें इन सब
का, पर भावों का कर्ता निश्चय भगवान आत्मा रूप मैं कभी नहीं।
इस ही तरह व्यवहार सम्यक्त्व अथवा ज्ञान को भी पर--द्रव्य के आलम्बन से
होनेवाला मान सम्यक्त्व वा ज्ञानस्वभाव केवल ज्ञान का कर्ता है, आत्मा को ऐसा कर्त्ता मानना और
स्वरूप को छोड़ते देखना सो सब भूल मिथ्या श्रद्धानके वशमें जीव को भ्रम उत्पन्न करता
है। समय पर, सब भाव पर से भिन्न हैं, ऐसा तो विचार सम्यक्त्व का धारक ही
करेगा। यह जीव रूप से अन्य विचार को वास्तवमें नहीं स्वीकार कर सकता है। व्यवहार
समय सम्यक्त्व का स्वरूप ही, इस व्यवहारी जीव को--सम्यक्त्व मात्र ज्ञान पर्याय रूपमें
है, वास्तवमें स्वभावमें इसका प्रवेश नहीं हो--सके ऐसा सम्यक्त्व का विचार रूप ही
सदासमयसारकाहै, पर सो भी भिन्न ही स्वावलम्बी सम्यक्त्व केवल ज्ञान ही
निश्चयनय से ही हो सकता है। यह पर्याय प्रमाण स्वरूप सर्व सम्यग्ज्ञानियों का सार रूप
विचार ही सार स्वरूप आत्मा को आत्मज्ञान से देख सकता है।
जिस प्रकार से ही सर्व द्रव्य अपने ही स्वरूप में, जहां पर सर्व द्रव्य रूप पर ही
संसार रूप सब का पर ज्ञान, यह सब निश्चय से ही है, राग-द्वेष का कारण ही
संसार समझना यह सब भूल, अविद्या अर्थात् अज्ञान ही सर्व काल मिथ्या रूप सब कुछ
अपने स्वरूप रूप लग रहा है। जब इस स्वरूप को, पर भावों को भिन्न जान इसका
परिणाम ही सब विकार, त्यागने को ही अपना स्वरूप मान, सो सर्व का त्याग करता
व्यवहार से भिन्न रूप से सब पर ज्ञानवान् का स्वावलम्बन सदा काल रहता आया है।
जीव का सार ही सम्यक्त्व रूप ज्ञान मात्र ही सब राग का नाश कर सकता है। समय
सार सर्व सार पदार्थ का सार होकर सर्व को केवल ज्ञान रूप ही प्रकाशक है,
निराधार समय मात्र ही, इसका स्वरूप!
आत्मज्ञानियों स्वरूप को विचार करो, वास्तवमें जीव का परावलम्बीपना
एक समय को भी स्वावलम्बी रूप ही होता है, संसारी को परावलम्बीपना ही
सत्य है, व्यवहारज्ञानियों का ज्ञान ही, व्यवहार ही सब कुछ है, जो कि व्यवहार दृष्टि
का धारक पर से स्वावलम्बन का ध्यान ही न पावे। निश्चय दृष्टि सब द्रव्य रूप पर ही
भगवान जीव रूप ज्ञान-नेत्र उघाड़े ज्ञान रूप, स्वरूप के अवलोकत स्वरूप रूप,
सबको ऐसा ज्ञान है? आत्मा रूप निश्चय से, सब स्वावलम्बी ज्ञान सर्व प्रकाश
निरन्तर प्रकाश ही स्वरूप को प्रकाश कर रहा, जिसे ही सिद्ध रूप सब संसार के
प्राणियों को प्रकाशक है।
संसार से भिन्न सब सार को ही ग्रहण करने रूप ही सर्व ज्ञान रूप आत्म रूप
व्यवहार को छोड़ ही निजत्व रूप ग्रहण कर ज्ञानी को परम सम्यक्त्वदृष्टि ही हो जाता है।
इस ही समय जीव, पर निमित्त से ही भिन्न केवल ज्ञान स्वभाव स्वरूप है।
सदा ही ऐसा विचार सर्व सम्यक् रूप ही निश्चय व्यवहार स्वरूप सबही जाने, ज्ञान
स्वभाव से भिन्न विचार ही अज्ञान के कारणही जीव स्वरूप को राग-द्वेष
वा रागवान्--द्वेषी जाने, पर जीव, सदा स्वरूप ही केवल ज्ञान का रूप ही
हो कर भी ऐसा विभाव स्वभाव का कर्ता ही सब भव रूप संसार प्रपंच का कारण
व्यवहार स्वावलम्बन से अज्ञान भाव सब अज्ञान रूप भासे, ऐसा सब
सम्यग्ज्ञानियों
स्वरूप विचार ही स्वावलम्बन रूप है, यह ही प्रकार से सब समय ज्ञान
मात्र ही सब संसार विभाव से ही राग-द्वेष से भिन्न है।
जो ऐसा ही माने, उस सर्व काल ज्ञान रूप भगवान्
परमेश्वर के ज्ञान रूप सार भाव को जान सकता रूप सब ही ज्ञान रूप हो
सब स्वावलम्बन का ज्ञान पाकर केवल ज्ञान रूप प्रकाश होता?
व्यवहार से सब भाव को सब ही केवल समय का प्रकाश मान जो परावलम्ब
रूप ही सदा काल का सब मान कर जाने, उस समय राग--द्वेष रूप कैसा हो
संसार होगा?
हे भव्य जीव, तू भी सदा ही केवल समय बन! ज्ञान ही केवल समय!
ज्ञानरूप सब संसार का सार रूप बन, अज्ञान-विभाव से भिन्न ज्ञान-रूप?
भगवान् रूप ज्ञान का प्रकाश सदा पावे॥
51

The provided image contains unrendered text with font-encoding errors (all characters appear as blank rectangular/box placeholders / tofu characters □) with only punctuation marks and the page number (52) visible.

Because the actual text glyphs were not embedded/rendered properly in the source document, it is not possible to read or transcribe the contents. Please provide a clear copy or scan where the text font is correctly rendered.

इस पर उसने उत्तर दिया कि, स्वामी हमारा सर्वथा समर्थ और न्याय रूप सब धर्म पर वह स्थिर
रहता है। उसने न्याय को दृढ़ आलम्बन किया, तो कौन उसका नाश करने पावे? सो जिसने
किया--सो सब इस में न्याय का प्रकाश, जो तो सब उस जगदीश्वर रूप सूर्य का प्रकाश,
उसका प्रकाशमान स्वरूप नित्य, सो वह जगदीश्वर सब से परे स्वयम् ही सत्य रूप,
सबका अंत और नित्य ही रहता
तब फिर उस पापी पुरुष ने कहाकि राजा सो, जो सब देश और सब लोक और
सर्व जगत् का न्याय करता है सो, उसी राजा से सो, दूसरा न्याय क्या हो सकता है।
जिससे तू बच जावे! उसने उत्तर दिया राजा तो न्याय रूप जल का घट अर्थात् उसका
सब धन सो--उसी न्याय से सो, उसका न्याय सो तो, दूसरा न्याय क्या होवे! सो घट
फूट गया तो जल बिखर ही तो जावेगा न्याय तो! राजा तो नश्वर है, न्याय नित्य? सो जो
ईश्वर का न्याय अखंड सो तो सब काल सब पर सर्वथा रहै, जो घट के जल समान सब
सो, उस जगदीश्वर रूप जल स्वरूप सो तो अखंड परम आनन्द प्रकाश रूप सब पर
यथा योग्य सब पर सदा न्याय किया प्रकाशता सो सब को, सो सो सब काल में सो ऐसा
न्याय रूप से जो, राजा प्रजा को सब से सब ही सब न्याय करै, सो सो ही
कल्याण
उसने राजा के भयभीत रूप कारागार में जो ऐसा दुःख पाया, जिससे
वह दुःखी सो, राजा को दुःख देता सो, राजा न देता सब को सब न्याय सुख रूप
सो, तन-मन, धन-जन, जन-मन को सब सुख दया न्याय रूप सब को दे, तन-
मन, धन सब सो, दया रूप सब को, सब ही परस्पर के सुख का हेतु सब
सब सुख सब को सब प्रकार दया से पावै, सब जन जन-जन-के सुख दुःख
सुख सब प्रकार परस्पर सुख दया से सब जगत् का परमेश्वर की दया से
सब सुख सब जगत्, सब परमात्मा सब का सब से सब का कल्याण रूप,
सो कल्याण से प्रकाश स्वरूप हो रहा
राजा सब सब जगत् प्रजा सुख से रहे, सो तन-मन से सो सब
न्याय रूप से सब जन सब जगत् का दुःख मिटाकर सुख करे सो, जिससे
जगत् का उपकार सब प्रजा का सुख रूप सब जगत् सब सुख
पावे सो सो, जगत् प्रजा के न्याय से परस्पर सुख--दुःख,
सुख, दुःख से परस्पर तन-मन से जो सब यथा योग्य सो सो सब न्याय
रूप सुख
सब पर यथा योग्य सो सो न्याय सब का दया से; सो सो सब यथा सुख
सब, सब का, परस्पर, सब को यथा न्याय से सो सदा सब को सो न्याय
सो दया सो सो दया सो तन-मन सब प्रकार से सब परस्पर का तन-
मन, सब को परस्पर सब का यथा न्याय, सब सब जन सब को सब प्रकार
सब का दया से, सब सो दया, सब सो सुख--का रूप
सो सो दया परस्पर का यथा सो प्रकार से सब जन सब कल्याण-
रूप सब को सब सब से सो प्रकार दया से सब परमात्मा सब जन को सो
सो परमात्मा स्वरूप से सुख से दया सब को, सो दया से, यथा योग्य
सो, जगत् यथा योग्य परस्पर परस्पर सब जन सब जगत् का कल्याण रूप
दया से सब यथा सब प्रकार से सो दया से परस्पर परस्पर का सब जगत्
का सब से सब प्रकार सब जगत् रूप दया से सब को न्याय सो
सब का सब यथा रूप
फिर उस का दुःख मिटा कर सब यथा योग्य सब का सब न्याय रूप
सब को जो जो जगत् से सब तन-मन दया से सब सब को सब सुख, सो
सब सो सुख सब, सब सो दया--का सो, सुख सो, दया सो, सो
सो, सब ही सब ही दया सब को सब ही दया सब जन को सो दया,
सुख, सुख, सब, सो सो सब का तन-मन सब को दया
सब को सब दया सो, सो सो परस्पर का जगत् सब प्रकार सुख
का सब प्रकार से सब परस्पर-परस्पर सुख, तन-मन दया, सब ही
सब, सब को! सो सदा सब पर सो दया से सो सब दया से सब सुख सब
को सो सब प्रकार दया से सो सब परस्पर का जगत् सुख सब
प्रकार से परमात्मा का ऐसा यथा रूप सब को, कल्याण रूप

53

सो भाई, उस दिन को स्मरण करके आज पश्चात्ताप करो अथवा न करो सो
तुम्हारी इच्छा पर छोड़ दिया जाता अथवा नहीं, उस पश्चात्-तापसे उस को सुख-ही
सुख अथवा आनन्द-आनन्द होगा वा नहीं
उस मनुष्य को उस सुख वा आनन्द पर क्या कुछ सन्देह-सा ठहरताहै ?
और जो पश्चात्ताप वा उस समय उत्पन्न हो जाता रहा, तो उसका फल किस प्रकार होता
सो आज तक उस को सुख--आनन्द और सुख-हीन तथा केवल दुःख का मुख तक भी नहीं मिला सो
कहा नहीं जाता है, परन्तु उस सुखस्वरूप को, जिससे सब किसी मनुष्य को सुख वा
आनन्दही मिले, सुखही मिला, जिस की सहायता से मनुष्य सब प्रकार का सुख और आनन्द
पावे
तो उसका स्मरण करना उचित था, किंवा उस बात का? जिसपर कि मन और वचन तथा इन
सब इन्द्रियों से उस दिन तक कोई सुख अथवा आनन्द का लेश उपलब्ध न हुआ, सो किस
लिये कि उस दिन तक तो केवल? विपत्ति ही विपत्ति सुख के सम्बन्ध रूप में भुगती
गईथी, सो भुगती; इस से निश्चय ज्ञान-रूपी प्रकाश, जिससे मनमलीन रूपी अन्ध
कार से रहित हो स्वच्छ और पवित्र हो ही जाता रहा था, जिससे संसार के माया रूपी
दल का स्पर्श स्वाभाविक रूप से छूटने लगता था सो उस पर मन और मन की स्वाभाविक वृ
त्ति उस की मुख्य वृत्ति
और मुख्य सुख स्वाभाविक था, जिसके विपरीत होने से मनुष्यता का नाश
होने लगता गया अथवा होता है, जिससे मन का काम केवल काम वासना ही उत्पन्न
करना अथवा भोग था, जिस दिन से इन सब विपत्तियों उत्पन्न होती
तो ऐसा ही परिणाम हो या होने लगाथा कि संसार की बातों अथवा माया
संसार से भिन्न हो या उस बात अथवा पश्चात्ताप का स्वरूप भिन्न भिन्न होकर उस के हृदय
में जो कि सुख-सम्पन्नता रूप उत्पन्न हो होकर अपना प्रभाव करताथा सो स्वाभाविक ही
विपरीत रहा, जिससे केवल काम वासना ही मन को सताती जा रही थी, जिस से उस के हृदय
रूपी राज्य नष्ट हो कर काम रूपी विषयी का उस हृदय पर राज्य हो चलाथा तथा, उस
हृदय रूपी राज्य का जो कि आनन्दमय होता, सो आनन्दमय विपरीत भाव को पा कर
उस विपत्ति, रूपी विपत्ति, का कारण बनकर उस परिणाम का दाता हुआ था जिसके
पाने पश्चात्, जो पश्चात् भाव-हो कर हृदय का स्वभाव हो चला था अर्थात्
काम वासना को मन रूपी राज्य में, उस स्थान रूपी राज्य रूपी अचेतन
अभिमान उस का उस सब समय रूपी राज्य अथवा प्रभाव करता, सो उस का प्रभाव उस
साक्षात्कार स्वरूप
संसार पर अपना प्रभाव करता? या मन का परिणाम तो अपना प्रभाव करता, या
कि काम रूपी स्वरूप अथवा १ काम रूप उस मन को वा मनुष्य रूप मनुष्य का नाश
संसार के काम रूप फल रूपी वा मनुष्य रूपी उस मनुष्य, या उस के विचार रूपी वा
उसी काम का विचार हो गया था।
तो ऐसा अनुभव या साक्षात्कार का ज्ञान वा उस साक्षात्कार रूपी फल अथवा
उक्त प्रकार के साक्षात्कार रूपी वा जो कुछ साक्षात्कार हुआ उस बात अथवा विषय का
विचार हो रहा होगा, जिससे कि ज्ञान, जिससे कि फल--का स्वरूप अथवा प्रकाश,
जिस सब अविद्या रूपी तम का नाश अथवा जो सब अज्ञान रूपी तम रूपी अन्धकार का नाश
करता रहा, सो उस का काम करता ही था, जो काम करता था उस का फल अथवा
जो फल उस समय होता, तो काम रूपी उस काम रूपी फल का रूप अथवा फल ही,
तो ऐसा ज्ञान रूपी फल अथवा वा विचार का वा, सो अविद्या रूपी फल रूपी तम का
नाश उस समय पश्चात् रूप में, या अज्ञान रूपी काम रूपी फल उस को रूपता को
और साक्षात्कार
तो उस समय रूप ज्ञान रूपी अविद्या रूपी, जिस प्रकार से, ज्ञान स्वरूप
का, नाश काम-रूपी अन्धकार रूपी का नाश कर ज्ञान रूपी रूप साक्षात्कार या
प्रकाश रूप रहा, जिस परिणाम साक्षात्कार कहता
54

□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□
□□□□□□□ □□□□□□
□□□□ □□□□ □□?

□□□□ □□□□ □□□□□□!
□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□? □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□
□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□,
□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□
□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□
□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□
□□□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□,
□□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□
□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□, □□ □□
□□□□ □□□□ □□□
□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□? □□□□□□□□
□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□? □□ □□□□□□□ □□ □□□, □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□, □□□□
□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□, □□ □□□□
□□□□□ □□ □□□□, □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□□□
□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□
□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□
□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□
□□□ □□□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□
□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □ □□□□, □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □ □□□□□ □□□ □□
□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□
□□ □□ □□□□ □□□? □□□ □□□□ □□ □□□□ □ □□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□
□□ □□□ □□□□□? □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□
□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□, □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□; □□□□
□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□
□□□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□
□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□
□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□? □□□□□ □□□□ □□□□
□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□
□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□
□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□
□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□ □□□□□□,
□□□□□□□; □□□□□ □□ □□□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□□□□□
□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□? □□
□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□?
□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□□□□□□, □□□□□ □□
□□□□□□□ □□□□□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□
□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□□□□,
□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□
□□□□□□□ □□□□□□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□, □□ □□ □□□ □□□□□□□□
□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□, □□□□□, □□ □□□□□
□□□ □□ □□ □□□□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□
□□□□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□,
□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□, □□□ □□ □□□ □□ □□, □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□
□□ □□□
□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□
□□□□□□□□ □□□□□□□□□□ □□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□
□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□, □□ □□□□ □□□
□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□?

55

  • Wait, let's look at the last few lines:
    • ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜! ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜
    • ⬜⬜⬜ ⬜⬜, ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜, ⬜⬜⬜⬜
    • ⬜⬜⬜ ⬜⬜, ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜
    • `⬜ ⬜⬜, ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜

□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □ □□ □□ □□□□□ □□, □ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□
□□□□ □□ □□□ □□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□
□□□□□□ □□ □□□, □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□□
□□□□□□ □□□□□, □□□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□□□□ □□□□□--□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□
□□ □□□□ □□ □□□, □□□ □□□ □ □□ □□□□□, □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□
□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□, □□□□ □□□ □□□□□□
□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□, □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□
□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□-□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□
□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□!
□□□□ □□□, □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□
□□□□□
□□□□□□ □□ □□□, □□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□□
□□□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□
□□ □□□□ □□ □□□, □□□□
□□□□□□ □□ □□□, □□□ □□□□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□!
□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□, □□□ □□□ □□□□ □□□
□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□
□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□
□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □ □□□ □□□□□□
□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□□□
□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□--□□□□□□□□
□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□
□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□, □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□
□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□! □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□
□□□! □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□
□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□
□□□□□, □□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□, □□□□ □□□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□
□□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□
□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□
□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□? □□ □□□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□
□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□? □□ □□□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□ □□
□□□□□ □□ □□□□□□□, □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□? □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□
□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□, □□ □□ □□□ □□ □□□□□, □□□□□□□□□, □□□□□, □□□□□□
□□□□□□□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□!
□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□
□□□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□
□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□ □ □□ □□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□□? □□ □□ □□□
□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□
□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□
□□□
□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□? □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□
□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□
□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □ □□ □□□□□□□ □□,
□□ □ □□ □□□□□□□ □□, □□ □ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□□□ □□ □□ □□□□□
□□□□□ □□□ □□□□ □□□? □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□
□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□,
□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□
□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □ □□□□□,
□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□, □□□
□□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□□□□□□□
□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□!
□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□? □□□
□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□
57

The text in the provided image cannot be transcribed into Devanagari because the document suffered from a font-rendering error (missing/corrupted embedded font), causing all Devanagari characters to be displayed as empty rectangular boxes ("tofu" / ▯), with only basic punctuation marks (?, !, ,, -, ", ...) and the page number 58 visible.

गया अथवा नहीं, यह जानकर समाधान कर सके ऐसा कोई भी तो उपाय उनके पास नहीं था। इसके
सिवा उनकी धारणाएं विकृत थीं, जो इसके पर सत्य स्वरूप को जान सके ऐसा उपाय, जो केवल उनके
पास ही था पर वे उस पर ध्यान नहीं देते थे। वे केवल एक ईश्वर की पूजा के स्थान पर अनेक
अन्य कल्पित देवी-देवताओं की भी पूजा करने लगे थे। उन्होंने यह नहीं समझा कि ईश्वर तो एक
है, परब्रह्म के रूप में। फिर भी उसे कई नामों से पुकारा, जैसे कि अग्नि के रूप
में, जल के रूप में। इस प्रकार कुछ कल्पित देवी-देवता बन गये, जिनके पास शक्तियां थीं;
जैसे कि, इन्द्र देव, जल के देव, वायु के देव, सूर्य देव, चन्द्रमा
के देव।
इस पर उस समय भी एक मत के लोग एकत्र नहीं थे। कुछ लोग तो, जो ईश्वर के
सच्चे उपासक थे, वे इस प्रकार की धारणाओं से विमुख रहते थे, वे तो केवल ईश्वर
की, जो सर्व शक्तिमान था और सब का रचियता था और सब को देखता था, उस की पूजा में लगे
थे, पर उनकी संख्या कम थी, वे संख्या में कम थे। अतः वे इन बातों को रोक न सके
जो केवल अन्धविश्वास थी, जिसे वे धर्म समझ रहे, न वे धर्म सुधार सके।
इसके अतिरिक्त धर्म का पतन हो रहा था... इस कारण से कि इस काल में कुछ
ऐसे भी, जो स्वयं को ज्ञानी मानते, ऋषि और सन्यासी मानते, पर थे वास्तव में अज्ञानी
थी, वे इस बात पर बल देने लगे कि ईश्वर केवल यज्ञ के रूप में मिल सकता,
और यह धार्मिक कृत्य केवल ब्राह्मण ही कर सकते हैं। इस प्रकार एक तो पाखण्ड और बढ़
गया जिसके कारण उस काल में, जब कि यज्ञों में पशुओं की बलि दी जाने लगी, एक
विशेष वर्ग, जिसे पुरोहित वर्ग कहते, ने अपने स्वार्थ के लिए ईश्वर को, यज्ञों
द्वारा प्रसन्न करने का, मार्ग बना कर लोगों को, यज्ञों द्वारा ठगना शुरू कर दिया।
ईश्वर के नाम पर इस प्रकार के अनाचार का फल यह हुआ कि वेद काल समाप्त, जिसे
सत्य युग, या सतयुग कहते हैं, वह समाप्त हो गया, क्योंकि
इस प्रकार अनाचार उस समय का रूप बन चुका था। इस काल में जहाँ
कर्म का महत्व समाप्त हो चुका था और भाग्य का ही बोलबाला था। उस समय का मानव
यज्ञ, बलि पर सब कुछ निर्भर समझता हुआ कर्म से ही विमुख होकर, केवल इन
साधनों पर ही अपने उद्धार का साधन समझने लगा था।
हाँ, जब ऐसा समय आ गया, धर्म के नाम पर ऐसा अधर्म होने लगा जिससे
मनुष्य का भाग्य केवल भाग्य पर ही छोड़ कर भगवान और ईश्वर को भूलने लगा तो
मनुष्य का उद्धार करने हेतु इस धरा पर अनेक अवतारी पुरुषों और महात्माओं का आगमन हुआ।
ईश्वर ने जब देखा कि उसके द्वारा बनाये गये संसार में मनुष्य भ्रम में फंसा हुआ है और
सत्य मार्ग छोड़कर अधर्म के मार्ग पर चल रहा है तथा उसके कर्म समाप्त हो रहे
हैं तथा केवल कर्म के नाम पर पाखण्ड हो रहा है।
महात्मा बुद्ध के पूर्व काल की जो यह दशा थी, उस समय एक ऐसा महा-
मानव का इस धरा पर जन्म हुआ जो इन सब कुरीतियों को दूर करने में सहायक हुआ, जिसे
भगवान बुद्ध कहते हैं। वे इस धरा पर धर्म को सच्चा स्वरूप प्रदान करने में सहायक
हुए तथा उनके द्वारा चलाये गये बौद्ध धर्म से इस धरा पर एक नई चेतना का उदय
हुआ तथा वह धर्म भारत की सीमाओं से बाहर जाकर भी, विश्व का सबसे बड़ा धर्म
बन गया!
हाँ, जब यह अनाचार, यह अन्धविश्वास और यह दुराचार इस संसार में व्याप्त
था, तब इस समय के काल के अनुसार इस धरा पर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ।
यह समय ईसा मसीह के जन्म से पूर्व की लगभग छठी शती का था। इस समय मगध
साम्राज्य, जो उस समय अपने में महान था, उत्तर भारत में बहुत शक्तिशाली
माना जाता था। इस काल के इतिहास के अनुसार मगध के साथ तीन अन्य बड़े
राज्य भी भारत में थे, जो अपने प्रभाव तथा प्रभुत्व के कारण विख्यात थे। वे थे,
कोशल राज्य, वत्स राज्य तथा अवन्ति राज्य। इन चार शक्तिशाली राज्यों में
मगध का साम्राज्य सबसे शक्तिशाली था, जिसे इस काल में सब से श्रेष्ठ माना गया
था; शेष अन्य तीन राज्य भी कुछ कम नहीं थे।
इन चार बड़े साम्राज्यों के अतिरिक्त कुछ छोटे-छोटे राज्य भी उस
समय भारत के पूर्व में थे। इनमें से कुछ गणतन्त्र राज्यों में शाक्य
राज्य भी एक था। शाक्य वंश का राज्य हिमालय की तराई में स्थित था। इस
राज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी। यह राज्य आधुनिक नेपाल की सीमा पर स्थित
था। इस शाक्य वंश के राजा शुद्धोदन थे, जिनकी पत्नी का नाम माया देवी था।
राजा शुद्धोदन बड़े-बड़े प्रतापी राजा थे तथा उनकी ख्याति सर्वत्र फैली हुई थी।
59

□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□
□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□, □□ □□ □□□□□ □□□□□□
□□ □□, □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□
□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□,
□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□
□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□, □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□, □□□ □□□□□□□□□□□ □□□
□□□□ □□□□□□□
□□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□□□

भाग 4 (पृष्ठ 61-80)

इस पृष्ठ पर फ़ॉन्ट रेंडरिंग समस्या (Font Missing/Tofu Error) के कारण संपूर्ण पाठ केवल आयताकार बक्सों (▯/□) के रूप में प्रदर्शित हो रहा है और कोई भी देवनागरी अक्षर पठनीय नहीं है।

पृष्ठ पर केवल विराम चिह्न एवं पृष्ठ संख्या दृष्टिगोचर हैं:


[L1-L27] (फ़ॉन्ट लोड न होने के कारण मूल पाठ अपठनीय है)

61