माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस पर उसने उत्तर दिया कि, स्वामी हमारा सर्वथा समर्थ और न्याय रूप सब धर्म पर वह स्थिर
रहता है। उसने न्याय को दृढ़ आलम्बन किया, तो कौन उसका नाश करने पावे? सो जिसने
किया--सो सब इस में न्याय का प्रकाश, जो तो सब उस जगदीश्वर रूप सूर्य का प्रकाश,
उसका प्रकाशमान स्वरूप नित्य, सो वह जगदीश्वर सब से परे स्वयम् ही सत्य रूप,
सबका अंत और नित्य ही रहता
तब फिर उस पापी पुरुष ने कहाकि राजा सो, जो सब देश और सब लोक और
सर्व जगत् का न्याय करता है सो, उसी राजा से सो, दूसरा न्याय क्या हो सकता है।
जिससे तू बच जावे! उसने उत्तर दिया राजा तो न्याय रूप जल का घट अर्थात् उसका
सब धन सो--उसी न्याय से सो, उसका न्याय सो तो, दूसरा न्याय क्या होवे! सो घट
फूट गया तो जल बिखर ही तो जावेगा न्याय तो! राजा तो नश्वर है, न्याय नित्य? सो जो
ईश्वर का न्याय अखंड सो तो सब काल सब पर सर्वथा रहै, जो घट के जल समान सब
सो, उस जगदीश्वर रूप जल स्वरूप सो तो अखंड परम आनन्द प्रकाश रूप सब पर
यथा योग्य सब पर सदा न्याय किया प्रकाशता सो सब को, सो सो सब काल में सो ऐसा
न्याय रूप से जो, राजा प्रजा को सब से सब ही सब न्याय करै, सो सो ही
कल्याण
उसने राजा के भयभीत रूप कारागार में जो ऐसा दुःख पाया, जिससे
वह दुःखी सो, राजा को दुःख देता सो, राजा न देता सब को सब न्याय सुख रूप
सो, तन-मन, धन-जन, जन-मन को सब सुख दया न्याय रूप सब को दे, तन-
मन, धन सब सो, दया रूप सब को, सब ही परस्पर के सुख का हेतु सब
सब सुख सब को सब प्रकार दया से पावै, सब जन जन-जन-के सुख दुःख
सुख सब प्रकार परस्पर सुख दया से सब जगत् का परमेश्वर की दया से
सब सुख सब जगत्, सब परमात्मा सब का सब से सब का कल्याण रूप,
सो कल्याण से प्रकाश स्वरूप हो रहा
राजा सब सब जगत् प्रजा सुख से रहे, सो तन-मन से सो सब
न्याय रूप से सब जन सब जगत् का दुःख मिटाकर सुख करे सो, जिससे
जगत् का उपकार सब प्रजा का सुख रूप सब जगत् सब सुख
पावे सो सो, जगत् प्रजा के न्याय से परस्पर सुख--दुःख,
सुख, दुःख से परस्पर तन-मन से जो सब यथा योग्य सो सो सब न्याय
रूप सुख
सब पर यथा योग्य सो सो न्याय सब का दया से; सो सो सब यथा सुख
सब, सब का, परस्पर, सब को यथा न्याय से सो सदा सब को सो न्याय
सो दया सो सो दया सो तन-मन सब प्रकार से सब परस्पर का तन-
मन, सब को परस्पर सब का यथा न्याय, सब सब जन सब को सब प्रकार
सब का दया से, सब सो दया, सब सो सुख--का रूप
सो सो दया परस्पर का यथा सो प्रकार से सब जन सब कल्याण-
रूप सब को सब सब से सो प्रकार दया से सब परमात्मा सब जन को सो
सो परमात्मा स्वरूप से सुख से दया सब को, सो दया से, यथा योग्य
सो, जगत् यथा योग्य परस्पर परस्पर सब जन सब जगत् का कल्याण रूप
दया से सब यथा सब प्रकार से सो दया से परस्पर परस्पर का सब जगत्
का सब से सब प्रकार सब जगत् रूप दया से सब को न्याय सो
सब का सब यथा रूप
फिर उस का दुःख मिटा कर सब यथा योग्य सब का सब न्याय रूप
सब को जो जो जगत् से सब तन-मन दया से सब सब को सब सुख, सो
सब सो सुख सब, सब सो दया--का सो, सुख सो, दया सो, सो
सो, सब ही सब ही दया सब को सब ही दया सब जन को सो दया,
सुख, सुख, सब, सो सो सब का तन-मन सब को दया
सब को सब दया सो, सो सो परस्पर का जगत् सब प्रकार सुख
का सब प्रकार से सब परस्पर-परस्पर सुख, तन-मन दया, सब ही
सब, सब को! सो सदा सब पर सो दया से सो सब दया से सब सुख सब
को सो सब प्रकार दया से सो सब परस्पर का जगत् सुख सब
प्रकार से परमात्मा का ऐसा यथा रूप सब को, कल्याण रूप
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