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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 154 में से

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गया तथा रात--दिन एकाग्र हो उसकी प्राप्ति का अभ्यास करने लगा। इस प्रकार करते हुए
वह प्रत्येक बात अपने गुरुदेव भगवान् श्रीकृष्ण को बता रहा था।
अर्जुन जितने साधन करता जाता था उतना ही! साधनों का अहंकारमय पर्दा
गिरता गया, उस जीव-भाव रूपी जो पर्दा था, वह जाता रहा। जब पर्दा हट गया
तोअभ्यास रूप सब लेन-देन बन्द हो गए और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई।अहंकारमय पर्दा
हटा, तब सब कुछ मिटकर सब कुछ भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप ही बन गया। केवल शान्ति
का, आनन्दमय स्वरूप अपने-आप प्रकट हो गया, अभ्यास करने का भाव, साधन करने
वाला सब कुछ न रह सकता। अभ्यास करनेवाला मिट गया और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई।
अर्जुन का, अभ्यास सब परमात्मा रूप होकर सब प्रकार का संशय मिट गया!
साधन के बाद उसका जो रूप बदला सो, साधन का रूप ही बदल गया। पहले
तक सब साधन के द्वारा कुछ न कुछ पाना था, साधन का अहंकारमय पर्दा लगा रहता
था कि मुझे परमात्मा को पाना है, सिर्फ साधना अभ्यासकर्त्तापने तक सीमित
रह जाती थी मगर उसका पर्दा रूपी अज्ञान समाप्त होने के बाद साधन साधन न
रहाअहंकारमय पर्दा न रह सका। अब तो सब कुछ ईश्वर की लीला लगी, कर्त्ता-
अकर्त्ता सब, स्वरूप का साक्षात्कार हुआ जब, फिर अर्जुन सब प्रकार निष्काम हो
हर काम कर सकता था।
अब अर्जुन का ध्यान सब अभ्यास-अभ्यासी अभ्यास का नाश होने पर जो पूर्ण
निष्ठा प्राप्त करनी थी उसपर गया, जो कि अज्ञान-अहंकार के हट जाने के बाद
की स्थिति सब अर्जुन जान, हर प्रकार अपने को उस ज्ञान रूप से सब तरफ देखने
लगा!
इस निष्ठावान् का जो रूप है, सो अर्जुन सब बात को समझ गया,
जिस प्रकार पानी पर जो बर्फ जमती जाती थी सो पिघल, जल ही निष्ठावान् रूप, बर्फ का
अहंकार जमने वाला सब रूप जब पिघल कर सब रूप एक ही बर्फ पिघलकर, सब कुछ
जल स्वरूप ही बनकर एकरस परब्रह्म परमात्मा रूप स्थिति बन गई।
ज्ञान स्वरूप का ऐसा साधन होने पर यह सब रूप ही ज्ञान स्वरूप बन गया जिस
पर विचार कर, अभ्यास सब रूप त्याग के शान्ति प्राप्त करने का यही साधन अर्जुन
किया करो! अब सब कर्म कर और फल सब त्याग रूप में निष्काम कर्म को प्राप्त हो,
जिस रूप में सब कर्म कर तू जो कुछ त्याग रूप फल त्याग रूप कर्म करता है, जिससे
अनासक्त भाव हो; सब कुछ त्याग फल रूप को तू स्वीकार करके निष्काम भाव से रह,
सब कर्म त्याग फल रूप होकर; फिर सब प्रकार शान्ति को प्राप्त होकर, उस
ज्ञान स्वरूप का साधन कर जिस रूप से सब कुछ त्याग, त्याग ही शान्ति का मूल
जानकर सब का त्याग करके, कर्म-धर्म, अभ्यास-अहंकार, विचार-
अभ्यासवान् का त्याग करके, सब प्रकार उस परमात्मा शान्ति को ही प्राप्त
होकर सब बात को तय कर अर्जुन ज्ञान... परब्रह्म रूप, जो हर प्रकार न त्याग और
कर्म-धर्म का कोई त्याग न रहा, परमात्मा सब त्याग... जो सब प्रकार
समझा दिया सो स्वरूप ज्ञान अर्जुन, सब बात समझकर उस परब्रह्म को प्राप्त
होकर उस ज्ञान रूप को जान कर परमात्मा के ज्ञान स्वरूप में लीन रहा सो अर्जुन
सब कुछ जान सब भाव को त्याग कर्म त्याग फल निष्काम भाव सब कुछ त्याग करके
अर्जुन, तू हर प्रकार शान्ति फल भोग ले!
जो हर दम हर प्रकार ज्ञान, हर दम कर्म-धर्म त्याग करके सब कुछ
भगवान् को अर्पण कर दे और तन--मन से केवल परमात्मा रूप को समझे तथापि
निष्काम कर्म--फल त्यागकर जो सब को ईश्वर का ही, ईश्वर ही सबका सब है, सब
का त्याग कर, जो अपना त्याग ही परमात्मा को कर दिया तो सब रूप उस ईश्वर का
सब प्रकार हर समय निष्काम भाव से ईश्वर स्वरूप बन कर नहीं प्राप्त होगा?
जिस का ऐसा स्वरूप है, सो हर रूप से ज्ञान-स्वरूप होकर जो शान्ति प्राप्त कर
हर समय शान्ति के भाव से सब कुछ ईश्वर ज्ञान से सब निष्काम भाव होकर
सब कुछ त्याग हर कर्म निष्काम रूप करता है, जिससे हर दम शांति रूप
रह सकता है सो, परमात्मा के हर रूप, स्वरूप के हर स्वरूप को, त्याग स्वरूप
सब प्रकार से सब बात का त्याग-धर्म, कर्म-धर्म निष्काम होकर केवल प्रभु
का ध्यान स्वरूप सब प्रकार करता हुआ जो कि परमात्मा का ही सब कुछ है
वह केवल स्वरूप के साथ अपने स्वरूप को न रूप का, नाम को न रूप का, नाम का
स्वरूप न रूप रूप परमात्मा को सब ही सब ध्यान रूप सब कुछ सब प्रकार से
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