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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 154 में से

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अथवा रात-दिन, रुपया, रोजगार, मकान, इन पर आत्मबुद्धि करे। बिना समझे जीव का
व्यवहार ऐसा बन जाताहै परंतु ज्ञान-नेत्र उघड़े तब यह जाने कि वास्तवमें इन
पर पर्याय का वा इन पर्याय का रच मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। शरीर तो जड़-द्रव्य है, इसमें
तो ज्ञानस्वभाव ही नहीं है। आत्मा तो ज्ञान स्वरूप, चैतन्य रूप है, वास्तवमें इन सब
का, पर भावों का कर्ता निश्चय भगवान आत्मा रूप मैं कभी नहीं।
इस ही तरह व्यवहार सम्यक्त्व अथवा ज्ञान को भी पर--द्रव्य के आलम्बन से
होनेवाला मान सम्यक्त्व वा ज्ञानस्वभाव केवल ज्ञान का कर्ता है, आत्मा को ऐसा कर्त्ता मानना और
स्वरूप को छोड़ते देखना सो सब भूल मिथ्या श्रद्धानके वशमें जीव को भ्रम उत्पन्न करता
है। समय पर, सब भाव पर से भिन्न हैं, ऐसा तो विचार सम्यक्त्व का धारक ही
करेगा। यह जीव रूप से अन्य विचार को वास्तवमें नहीं स्वीकार कर सकता है। व्यवहार
समय सम्यक्त्व का स्वरूप ही, इस व्यवहारी जीव को--सम्यक्त्व मात्र ज्ञान पर्याय रूपमें
है, वास्तवमें स्वभावमें इसका प्रवेश नहीं हो--सके ऐसा सम्यक्त्व का विचार रूप ही
सदासमयसारकाहै, पर सो भी भिन्न ही स्वावलम्बी सम्यक्त्व केवल ज्ञान ही
निश्चयनय से ही हो सकता है। यह पर्याय प्रमाण स्वरूप सर्व सम्यग्ज्ञानियों का सार रूप
विचार ही सार स्वरूप आत्मा को आत्मज्ञान से देख सकता है।
जिस प्रकार से ही सर्व द्रव्य अपने ही स्वरूप में, जहां पर सर्व द्रव्य रूप पर ही
संसार रूप सब का पर ज्ञान, यह सब निश्चय से ही है, राग-द्वेष का कारण ही
संसार समझना यह सब भूल, अविद्या अर्थात् अज्ञान ही सर्व काल मिथ्या रूप सब कुछ
अपने स्वरूप रूप लग रहा है। जब इस स्वरूप को, पर भावों को भिन्न जान इसका
परिणाम ही सब विकार, त्यागने को ही अपना स्वरूप मान, सो सर्व का त्याग करता
व्यवहार से भिन्न रूप से सब पर ज्ञानवान् का स्वावलम्बन सदा काल रहता आया है।
जीव का सार ही सम्यक्त्व रूप ज्ञान मात्र ही सब राग का नाश कर सकता है। समय
सार सर्व सार पदार्थ का सार होकर सर्व को केवल ज्ञान रूप ही प्रकाशक है,
निराधार समय मात्र ही, इसका स्वरूप!
आत्मज्ञानियों स्वरूप को विचार करो, वास्तवमें जीव का परावलम्बीपना
एक समय को भी स्वावलम्बी रूप ही होता है, संसारी को परावलम्बीपना ही
सत्य है, व्यवहारज्ञानियों का ज्ञान ही, व्यवहार ही सब कुछ है, जो कि व्यवहार दृष्टि
का धारक पर से स्वावलम्बन का ध्यान ही न पावे। निश्चय दृष्टि सब द्रव्य रूप पर ही
भगवान जीव रूप ज्ञान-नेत्र उघाड़े ज्ञान रूप, स्वरूप के अवलोकत स्वरूप रूप,
सबको ऐसा ज्ञान है? आत्मा रूप निश्चय से, सब स्वावलम्बी ज्ञान सर्व प्रकाश
निरन्तर प्रकाश ही स्वरूप को प्रकाश कर रहा, जिसे ही सिद्ध रूप सब संसार के
प्राणियों को प्रकाशक है।
संसार से भिन्न सब सार को ही ग्रहण करने रूप ही सर्व ज्ञान रूप आत्म रूप
व्यवहार को छोड़ ही निजत्व रूप ग्रहण कर ज्ञानी को परम सम्यक्त्वदृष्टि ही हो जाता है।
इस ही समय जीव, पर निमित्त से ही भिन्न केवल ज्ञान स्वभाव स्वरूप है।
सदा ही ऐसा विचार सर्व सम्यक् रूप ही निश्चय व्यवहार स्वरूप सबही जाने, ज्ञान
स्वभाव से भिन्न विचार ही अज्ञान के कारणही जीव स्वरूप को राग-द्वेष
वा रागवान्--द्वेषी जाने, पर जीव, सदा स्वरूप ही केवल ज्ञान का रूप ही
हो कर भी ऐसा विभाव स्वभाव का कर्ता ही सब भव रूप संसार प्रपंच का कारण
व्यवहार स्वावलम्बन से अज्ञान भाव सब अज्ञान रूप भासे, ऐसा सब
सम्यग्ज्ञानियों
स्वरूप विचार ही स्वावलम्बन रूप है, यह ही प्रकार से सब समय ज्ञान
मात्र ही सब संसार विभाव से ही राग-द्वेष से भिन्न है।
जो ऐसा ही माने, उस सर्व काल ज्ञान रूप भगवान्
परमेश्वर के ज्ञान रूप सार भाव को जान सकता रूप सब ही ज्ञान रूप हो
सब स्वावलम्बन का ज्ञान पाकर केवल ज्ञान रूप प्रकाश होता?
व्यवहार से सब भाव को सब ही केवल समय का प्रकाश मान जो परावलम्ब
रूप ही सदा काल का सब मान कर जाने, उस समय राग--द्वेष रूप कैसा हो
संसार होगा?
हे भव्य जीव, तू भी सदा ही केवल समय बन! ज्ञान ही केवल समय!
ज्ञानरूप सब संसार का सार रूप बन, अज्ञान-विभाव से भिन्न ज्ञान-रूप?
भगवान् रूप ज्ञान का प्रकाश सदा पावे॥
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