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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 154 में से

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इस प्रकार वह कहने लगा, 'हे! ईश्वर यह तूने क्या किया-कि तीन चार माह की अवधि को तूने कुछ
किया, उसने सोचा कि जिस प्रकार रात बीतने वाली है उसी प्रकार यह भी कुछ समय निकले गा, पर दिनपर
दिन चिन्ता उत्पन्न हो अधिक रोग होने लगा जिससे निराशा छाने लगी जिससे वह और भी रोने और
लगा, उसने समझ लिया कि अब जीवन समाप्तप्राय हो गया जो वह चाहता था उसका उल्टा ही
इस संसार का नियम है, समय समय पर जो रोग उत्पन्न अथवा समाप्त होता है, उसका
निश्चित न हो तब तो वैराग्य अथवा विवेक होना अति कठिन बात है जिससे न शोक हो और न
जिससे आनन्द प्राप्त हो सके और न ही शान्ति प्राप्त करने का कोई उपाय ही सूझता
वह किसी अनुभवी वैराग्यवान् की शरण जाकर अपनी सब व्यथा को सुनाने लगा जिससे कि शांति प्राप्त हो
सके उसका यह विचार था, कि वह मेरी व्यथा को सुन, कुछ तो दया करेगा ही जिससे मैं इस रोग से बच सकूँ,
अथवा जो कुछ भी उचित हो सकेगा वह कर सकेगा। उस वैरागी ने अपने विचारानुसार कहा, 'हे भाई
अपने चित्त को शान्ति प्रदान कर जो कुछ भी संसार में हो रहा है, परमात्मा के ही अधीन है इसलिये
कुछ सोच विचार, शोक, सन्देह अथवा चिन्ता को हृदयङ्गम मत कर केवल प्रभु का ही भजन व स्मरण कर,
हे नर, सब कुछ त्याग कर उस, एक ओंकार पर ही मन को लगा जिससे मुक्ति प्राप्त हो सके वैराग्य
निश्चय ही मुक्ति, का साधन अथवा उपाय है! जिससे तू अपने लक्ष्य को प्राप्त करेगा, यह उपदेश तो
वैरागी ने किया, परन्तु वह व्याकुल हृदय, इन उपदेशों को हृदयङ्गम करके अपने हृदय शान्ति
सुख प्राप्त करने में असमर्थ ही रहा।
वह तो किसी ऐसे अनुभवी अथवा आत्मज्ञानी सिद्ध को, जो अज्ञानता को दूर करने में
समर्थ, आत्मस्वरूप की उपासना का ऐसा सहज मार्ग ला देवे तथा उपदेश प्रदान करे, जिससे
उस का व्याकुल चित्त अनायास पूर्ण शान्त तथा तृप्त हो सके, पर ऐसा ज्ञान प्राप्त करके, उस को अपने
ही स्वरूप तथा स्वरूप विचार होने लगा, जिससे उसका चित्त स्थिर तथा एकाग्र न हो सका
इस लिए वह क्या करता? मन ही मन में कहने लगा, कि जब तक पूर्ण शान्ति प्राप्त नहीं,
तब तक तो उसका कल्याण समझना केवल भ्रम मात्र ही होगा।
जब कोई उपाय नहीं सूझा, तब न चाहते हुए भी विवश हो कर उसने कई प्रकारों तथा
अनेक प्रकारों द्वारा, मन को सब ओर लगा कर देखा परन्तु शान्त न हो सका, तब उसने सोचा कि मैं
अपने जीवन को व्यर्थ ही नष्ट कर रहा हूँ, इस से अच्छा यही होगा कि इस शरीर को
नष्ट कर दूँ, परन्तु हाय, जीवन धारण करना भी कठिन है, न तो शान्ति प्राप्त ही हुई और
ऊपर यह रोग लग गया जिससे न इधर का न उधर का रहा। इस पर भी दयावान् प्रभु की कृपा से कई
वर्ष और व्यतीत हो गये पर चित्त की व्यथा, जो कि मानसिक थी शान्त न हुई। आधिभौतिक
या भौतिक या प्राकृतिक ही वह व्याधि नहीं थी जिससे शान्ति हो सकती, तब किसी ने
ऐसा विचार कर फल-फूल का आहार ही दो सप्ताह तक करने को कहा कि यह सब कुछ नष्ट
हो कर रोग से सर्वथा मुक्ति प्राप्त हो सकेगी।
जब ऐसा उपाय करने का निश्चय कर लिया गया तो उस ने दो सप्ताह केवल फला-
हार करना आरम्भ किया, न तो इस से कोई लाभ ही हुआ अपितु भूख की ज्वाला शान्त न होने
कारण चित्त पहले से भी, अधिक अशान्त हो गया जिससे उसका शरीर भी दिन प्रति दिन क्षीण होने
लगा।
निराश हो कर वह फिर अपने घर की ओर मुँह करके चलने के पश्चात मन में विचार करने
लगा, कि क्या परमात्मा मुझ पर दया नहीं करेगा ? क्या इस प्रकार ही मेरा सर्वनाश
होगा, परमात्मा सब कुछ करने में क्या समर्थ नहीं? क्या उसका ही यह रूप है? जो कुछ
भी, वह सब कुछ करने समर्थ है तो हेसर्वसमर्थ, मुझे तो बचा, इस से अधिक मुझे क्या
चाहिये?
ऐसा कहकर आर्तभाव से ईश्वर को पुकार कर रोने लगा, उसका रोना व्यर्थ
न समझा गया, ईश्वर अथवा परमात्मा ने जो दयालु तथा कृपालु है सब
पर, उस पर भी असीम कृपा करके उस के सब क्लेश मिटाकर उसे मुक्ति का
अधिकारी बना दिया।
आज वह ऐसा दृश्य देखता है जिसे देख कर स्वयं चकित रह गया
कि उसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया, वह केवल ही केवल आनन्द का
स्वरूप बन गया, वह सब कुछ शांत हो चुका था। वह पूर्ण रूप से शून्य हो चुका
जिस कारण वह केवल, आत्-मरूप आनन्दमय होने के कारण अब कुछ
शेष न बचा! सब ही आश्चर्य! सब ही आश्चर्य के सिवाय कुछ न रहा जिस कारण,
केवल आनन्द ही उस का अपना ही स्वरूप बन चुका था जिस में वह लीन
होकर स्वयं आनन्दमय हो गया।
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