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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 154 में से

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यद्यपि यह, परमात्मा का यह प्रिय और प्यारा धाम हर एक उच्च विचार वाले मनुष्य का निज सनातन
देश वा धाम अवश्य होगा जिसको कि मुक्ति अथवा मोक्ष कहते हैं। परन्तु जो मनुष्य इन सब बातों को
सुनी-सुनाई समझ, यथार्थ वा सत्य को सत्य समझ, प्रभु का भजन ध्यान कभी नहीं भूल कर
नित्य निरन्तर करते रहते हैं। उनका निज स्थान भी यही धाम है। तो फिर जो सब जीवों का निज
धाम ठहरा सो सबका, तो फिर यह सब का घर हुआ
सबने मिलकर उस परम पिता परमात्मा के धाम रूपी निज घर को छोड़ कर, इस नश्वर संसार में जहां
का तहां आनन्दित हो रहे, अर्थात् उस नित्य आनन्द स्वरूप प्रभु को भूल कर इस अनित्य वा
नाश स्वरूप इस माया जाल में मोह रूपी मद पी कर मस्त हो कर गाफिल हो रहे। आश्चर्य की बात
देखो मनुष्य सब कोई उस परमपिता परमात्मा को, जो सब का है, सो क्यों नहीं मानते?
तो फिर सब भाई परस्पर एक पिता के ही हुए। परन्तु जो, अब एक पिता होकर वा मानते
हुए परस्पर सब मनुष्य एक-दूसरे को देख कर जलते हैं। इसी तरह बहुत से अपने-अपने मत का घमंड कर
रहे हैं। कोई कहता, हमारा मत श्रेष्ठ है। कोई
कह रहा, हां जो हमारा मत है यही सब मतों से उत्तम है, इस प्रकार से हर कोई अपने मत
की बड़ाई निरर्थक कर रहा है। वह नहीं जानता कि जब परमात्मा एक सबको बनाने वाला सब
का एक ही पिता ठहरा
तो फिर परस्पर सब का भाई परस्पर नाता हुआ ना, फिर जो यह परस्पर का विरोध वा
द्वेष भाव सब जगह फैला दिखाई देता है इसका क्या कारण है? तो यह सब क्या
केवल अज्ञान का कारण नहीं? हां केवल अज्ञान ही!
जो मनुष्य यह जाने, समझे, विचार करके निश्चय कर लेवे कि जब परमपिता एक तो फिर सब का भाई
नाता, तो किसी को किसी से द्वेष वा विरोध करने का कोई कारण ही नहीं रह जाता क्योंकि सब भाई
एक ही माता-पिता की सन्तान हैं। जब सब एक पिता के ही हुए तो फिर, जो कोई
सब मनुष्यों को दुःख देगा सो? पिता को दुःख
ही देगा सो क्या प्रभु को यह बात स्वीकार हो सकती कदापि नहीं। यदि ऐसा होता तो वह
सब जीवों को सुख-शान्ति पहुंचाने का प्रबन्ध करता ही नहीं, जिसके लिए
सूर्य को उत्पन्न किया
जिसके प्रकाश से प्रकाश व जीवन शक्ति पाकर सब संसार के प्राणी चल फिर रहे हैं।
जो सब संसार प्रकाश पाकर के आनन्द को भोग कर प्रभु-स्मरण में लीन हो रहा है। यदि
सूर्य परमात्मा केवल अपने ही लिए प्रकाशित करता तब तो सब संसार में हाहाकार मच जाता,
सब संसार का काम, जो चल रहा है सब रुक जाता। सो प्रभु का प्रेम अपने सब जीवों के
ऊपर समान रूप से है। इसलिए सब जीवों को भी परस्पर प्रेम-भाव रखना चाहिये।
जब पिता का स्वभाव सब अपनी सन्तान के ऊपर समदृष्टि का है, तब फिर हम मनुष्यों को
सब जीवों से प्रेम का नाता जोड़ना क्या धर्म नहीं? जो कोई कहे, हमारा मत सब से श्रेष्ठ
तो श्रेष्ठ मनुष्य वह कहलाने योग्य है, जिसके हृदय में--दया हो; सब जीवों, के प्रति
प्रेम; सब जीवों, का हित चाहे; निर्बलों को निर्बल न समझे, वरन् निर्बल जानकर अधिक
प्रेम करे; किसी का दिल न दुखाये।
यह कभी न समझे कि परमात्मा केवल हमारे मत वालों का ही पिता है, औरों
का वह पिता नहीं? जब परमात्मा सबका है, तो सब मत भी तो उसी के हुए? सो कौन सा?
या किसका पृथक् है? जो परमात्मा सबका पिता है। तो यह सब मत किसके? उस एक ही
परमात्मा के ना? सो फिर मतों का झगड़ा कैसा? जो परमात्मा सब जीवों का पिता
हुआ और वह परम दयालु पिता सब का, तो फिर सब का, वह ही पिता हुआ? क्या केवल मतों
का, या सब मत वालों का?
अहो, यदि एक ही, सब मनुष्यों का सब जीवों का पिता है, तो क्या सब एक ही
रूप पिता के ही नहीं ठहरे। फिर जब सब एक पिता के ही हैं तो फिर परस्पर मतों का
झगड़ा? जो एक ही सब मनुष्यों का परमेश्वर है, जिसका नाम सब प्रकार से श्रेष्ठ है
वह एक ही सब का स्वामी है। उस एक के सिवा, न कोई इस संसार में दूसरा कोई
समर्थ? या सब पर दया करने वाला हो सकता है। सो जिस प्रकार सब संसार उस
दयालु पिता का परिवार है उसी तरह यह सब संसार भी, एक ही परमात्मा का परिवार हुआ
ना? तो फिर इस संसार के सब मनुष्यों को, परस्पर मिलकर रहना चाहिये अथवा
नहीं? निश्चय ही सब को परस्पर मिलकर प्रेम से रहना चाहिये।
जिस से इस संसार का उद्धार परमात्मा द्वारा सब का शीघ्र ही हो सके। जब
सब प्रेम भाव से रहेंगे, प्रभु प्रेम-रस का ही स्वाद आनन्द--रस--रस रूप में
सब को मिल सकेगा। प्रभु तो सर्व जीवों को ऐसा चाहता है, सो मनुष्य को ऐसा

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