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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

इस प्रकार वह कहने लगा, 'हे! ईश्वर यह तूने क्या किया-कि तीन चार माह की अवधि को तूने कुछ
किया, उसने सोचा कि जिस प्रकार रात बीतने वाली है उसी प्रकार यह भी कुछ समय निकले गा, पर दिनपर
दिन चिन्ता उत्पन्न हो अधिक रोग होने लगा जिससे निराशा छाने लगी जिससे वह और भी रोने और
लगा, उसने समझ लिया कि अब जीवन समाप्तप्राय हो गया जो वह चाहता था उसका उल्टा ही
इस संसार का नियम है, समय समय पर जो रोग उत्पन्न अथवा समाप्त होता है, उसका
निश्चित न हो तब तो वैराग्य अथवा विवेक होना अति कठिन बात है जिससे न शोक हो और न
जिससे आनन्द प्राप्त हो सके और न ही शान्ति प्राप्त करने का कोई उपाय ही सूझता
वह किसी अनुभवी वैराग्यवान् की शरण जाकर अपनी सब व्यथा को सुनाने लगा जिससे कि शांति प्राप्त हो
सके उसका यह विचार था, कि वह मेरी व्यथा को सुन, कुछ तो दया करेगा ही जिससे मैं इस रोग से बच सकूँ,
अथवा जो कुछ भी उचित हो सकेगा वह कर सकेगा। उस वैरागी ने अपने विचारानुसार कहा, 'हे भाई
अपने चित्त को शान्ति प्रदान कर जो कुछ भी संसार में हो रहा है, परमात्मा के ही अधीन है इसलिये
कुछ सोच विचार, शोक, सन्देह अथवा चिन्ता को हृदयङ्गम मत कर केवल प्रभु का ही भजन व स्मरण कर,
हे नर, सब कुछ त्याग कर उस, एक ओंकार पर ही मन को लगा जिससे मुक्ति प्राप्त हो सके वैराग्य
निश्चय ही मुक्ति, का साधन अथवा उपाय है! जिससे तू अपने लक्ष्य को प्राप्त करेगा, यह उपदेश तो
वैरागी ने किया, परन्तु वह व्याकुल हृदय, इन उपदेशों को हृदयङ्गम करके अपने हृदय शान्ति
सुख प्राप्त करने में असमर्थ ही रहा।
वह तो किसी ऐसे अनुभवी अथवा आत्मज्ञानी सिद्ध को, जो अज्ञानता को दूर करने में
समर्थ, आत्मस्वरूप की उपासना का ऐसा सहज मार्ग ला देवे तथा उपदेश प्रदान करे, जिससे
उस का व्याकुल चित्त अनायास पूर्ण शान्त तथा तृप्त हो सके, पर ऐसा ज्ञान प्राप्त करके, उस को अपने
ही स्वरूप तथा स्वरूप विचार होने लगा, जिससे उसका चित्त स्थिर तथा एकाग्र न हो सका
इस लिए वह क्या करता? मन ही मन में कहने लगा, कि जब तक पूर्ण शान्ति प्राप्त नहीं,
तब तक तो उसका कल्याण समझना केवल भ्रम मात्र ही होगा।
जब कोई उपाय नहीं सूझा, तब न चाहते हुए भी विवश हो कर उसने कई प्रकारों तथा
अनेक प्रकारों द्वारा, मन को सब ओर लगा कर देखा परन्तु शान्त न हो सका, तब उसने सोचा कि मैं
अपने जीवन को व्यर्थ ही नष्ट कर रहा हूँ, इस से अच्छा यही होगा कि इस शरीर को
नष्ट कर दूँ, परन्तु हाय, जीवन धारण करना भी कठिन है, न तो शान्ति प्राप्त ही हुई और
ऊपर यह रोग लग गया जिससे न इधर का न उधर का रहा। इस पर भी दयावान् प्रभु की कृपा से कई
वर्ष और व्यतीत हो गये पर चित्त की व्यथा, जो कि मानसिक थी शान्त न हुई। आधिभौतिक
या भौतिक या प्राकृतिक ही वह व्याधि नहीं थी जिससे शान्ति हो सकती, तब किसी ने
ऐसा विचार कर फल-फूल का आहार ही दो सप्ताह तक करने को कहा कि यह सब कुछ नष्ट
हो कर रोग से सर्वथा मुक्ति प्राप्त हो सकेगी।
जब ऐसा उपाय करने का निश्चय कर लिया गया तो उस ने दो सप्ताह केवल फला-
हार करना आरम्भ किया, न तो इस से कोई लाभ ही हुआ अपितु भूख की ज्वाला शान्त न होने
कारण चित्त पहले से भी, अधिक अशान्त हो गया जिससे उसका शरीर भी दिन प्रति दिन क्षीण होने
लगा।
निराश हो कर वह फिर अपने घर की ओर मुँह करके चलने के पश्चात मन में विचार करने
लगा, कि क्या परमात्मा मुझ पर दया नहीं करेगा ? क्या इस प्रकार ही मेरा सर्वनाश
होगा, परमात्मा सब कुछ करने में क्या समर्थ नहीं? क्या उसका ही यह रूप है? जो कुछ
भी, वह सब कुछ करने समर्थ है तो हेसर्वसमर्थ, मुझे तो बचा, इस से अधिक मुझे क्या
चाहिये?
ऐसा कहकर आर्तभाव से ईश्वर को पुकार कर रोने लगा, उसका रोना व्यर्थ
न समझा गया, ईश्वर अथवा परमात्मा ने जो दयालु तथा कृपालु है सब
पर, उस पर भी असीम कृपा करके उस के सब क्लेश मिटाकर उसे मुक्ति का
अधिकारी बना दिया।
आज वह ऐसा दृश्य देखता है जिसे देख कर स्वयं चकित रह गया
कि उसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया, वह केवल ही केवल आनन्द का
स्वरूप बन गया, वह सब कुछ शांत हो चुका था। वह पूर्ण रूप से शून्य हो चुका
जिस कारण वह केवल, आत्-मरूप आनन्दमय होने के कारण अब कुछ
शेष न बचा! सब ही आश्चर्य! सब ही आश्चर्य के सिवाय कुछ न रहा जिस कारण,
केवल आनन्द ही उस का अपना ही स्वरूप बन चुका था जिस में वह लीन
होकर स्वयं आनन्दमय हो गया।
18

प्रार्थना पत्र लिखनें वाले जितने समझदार या योग्य या बड़े थे, वह समझ सकते
थेकि श्री स्वामी जी महाराज वैदिक धर्म प्रचारार्थ समस्त भारत वर्ष का भ्रमणकर रहे थेऔर
जहांभी, जबभी, उनको इस कार्यके विस्तार निमित्त या प्रचारार्थ या धर्मार्थ जहाँपर जाना
पड़ जाय वहाँही आवश्यक समझकर अवश्य जाते थे।
इसलिए यह उचित थाकि, वह स्वामी जी की हर बातको वा धर्म प्रचार के कार्य को
समझबूझ कर काम लें, उचित समय देखकर ही श्री स्वामीजी को आमंत्रण के पत्र भेजें
जिससे श्री स्वामीजी के प्रचार कार्य में रूकावट न पड़कर विशेष लाभ पहुंचे। यह स्वामी जी
स्वयं ही तय कर लेते थेकि किस कार्य को प्रथम करें; अथवा किस बात को किस समय करें,
जिस समय जिसे जैसा समझा उन्होंने वैसा ही कार्य को किया या किया था, इसलिए यह तो उचित
बात थी परंतु इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिये थाकि स्वामीजी अहंकारी थे।
उस समय भी प्रत्येक स्थान पर दो प्रकारके विचारके लोग विद्यमान थे। कुछ स्वामी
जी, उनके मत विचार, वैदिक धर्म मत, स्वामी जी विचार और आदेश! को सर्वथा श्रेष्ठ
मानकर उनके आदेश अनुसार अपने कार्यों को करते थेतथा वैदिक प्रचार कार्य में हर प्रकार
से तन मनधन द्वारा सहायता कर स्वामीजी के कार्यको आगे बढाने का यत्न करते थे। परंतु,
इसके विपरीत जो स्वामी जी, उनके मत तथा वैदिक विचार प्रचार के पक्ष में नहीं थेवे
प्रत्येक बात में उनका विरोध ही करते!
उस समय में कुछ ऐसे आर्यसमाजी विद्वान भी थेजो स्वयं को बहुत बडा विद्वान
मानते, दूसरों को मूर्ख, स्वयं को धनी, श्री स्वामी जी तथा अन्य लोगों को निर्धन
तथा हीन समझ कर बात करते, या व्यवहार करते तथा यह यत्न करते कि किसी प्रकार,
स्वामीजी के प्रचार कार्य को हानि पहुंचे, ताकि, उस स्थान पर उन लोगों का! दबदबा या
प्रभाव बना रहे। इस कारण ऐसे लोग प्रचार कार्य में बहुत बाधाएं उत्पन्न करते तथा
स्वामी जी केविरुद्ध षड्यंत्र भीरचते, यह बात सर्वथा सत्य थी!
इन कारणों केहोते, स्वामी जी महाराज को उस समय हर स्थान पर बाधाएं
तथा कठिनाइयां झेलनी पड़तीं व कार्य में तरह तरह की बाधा उत्पन्न की जातीं।
परंतु, वे अपने निश्चय पर अडिग रहे, वे अपने धर्मप्रचार कार्य को कभी न रोकते
या बदलते थे। इस प्रकार दोनों दलों के होने से, यह स्पष्ट होता गयाकि उस समय
भी, समाज में परस्पर विरोधी मत फैल रहे थे। इससे स्पष्ट होता थाकि स्वामी
महाराज किस प्रकार निर्भय होकर धर्म का प्रचार कररहे थे।
स्वामी जी प्रचार का कार्य कर रहेथेऔर वह प्रचारक रूप मेंआदर पा रहेथे।
परंतु समाज में अन्य व्यक्ति ऐसे भी थेजो केवल स्वामीजी का सत्कार करके ही रुक
जाते, कार्यकर्ताओं के समान वह देश भर में प्रचार कार्य को आगे बढाने में रुचि
न लेतेथे। इस प्रकार स्वामी जी को ही अधिक कष्ट उठाने पड़ रहेथे।
श्रीस्वामीजी के मन में यह अभिलाषा थी किउनका प्रचार स्थायी होवे, जिससे कि
देश का उद्धार हो। वे यह चाहते थेकि लोग केवल उन तक ही सीमित न रहें, अपितु स्वयं
भी हर कार्य को करने में समर्थ हों, वे इस बातके विरोधी थे, कि कोई मनुष्य
केवल अपने कोही ईश्वर का दूत समझे अथवा उन पर विश्वास न करे। वे तो यह
भी कह चुके थेकि वे भी, स्वयं को ईश्वर--दूत न मानकर केवल एक साधारण मनुष्य
ही मानते--उन का उद्देश्य समाज को वैदिक धर्म की ओर ले जाने का था।
स्वामी जी, इस बातके समर्थक कभी नहीं हो सकते थेकि
जो स्वामी जी कहें! केवल उसी बात को धर्म का अंग माना जाय और अन्य
प्रत्येक मनुष्य को इस बात की छूट नहोकि वह स्वयं धर्म की व्याख्या कर सके
सके; इसलिए जब भी कोई बात या विषय ऐसा आता जिससे यह शंका उत्पन्न होती--
स्वामी जी अपने विचार को सब पर थोप रहेहैं तो स्वामी जी इसका विरोध करते थे
तथापि स्वामी जी का, प्रत्येक स्थान पर यही यत्न होता थाकि वैदिक धर्म की सत्य
व्याख्या सबके सम्मुख हो, जिससे प्रत्येक व्यक्ति धर्म के सत्य स्वरूप को समझ
सकेऔर पाखण्ड तथा रूढियों का अंत हो सके।
इन घटनाओं का सार यही निकलता हैकि स्वामीजी के व्यक्तित्व को लेकर उस समय
समाज में तरह तरह के विचार काम कररहे थे।
वैदिक प्रचार को उस समय केवल स्वामी जी ही आगे बढा रहेथे। प्रश्न
उठता हैकि यदि स्वामी जी ऐसा न करते तो क्या आज वैदिक धर्म जीवित रहपाता
अथवा स्वामी जी के प्रचार का कोई स्थायी प्रभाव न हुआ होता? इस प्रश्नपर
विचार करने से स्वामी जी के जीवन का महत्त्व स्वतः ही स्पष्ट होजाता है... वे
युग-युग तक याद किये जाते रहेंगेऔर उनका कार्य सदा अमर रहेगा।
19

इस घटना का प्रभाव जो पड़ा स्वभावतः... वह तो इस प्रकार प्रकाश में आ ही गया।परन्तु इस
का एक प्रभाव जो जन मत पर पड़ाथा, वह प्रभाव उस समय तक के किसी घटना द्वारा भी
साधारण जनता पर पड़ा, सर्वथा नवीन, अकल्पित कालीन, समस्त भारत पर प्रभाव था।
यह कहना भूल है, महामना श्री जी राम-दास स्वामी का ही केवल प्रभाव था, जिस
से समूचे भारत में हिन्दू चेतना जाग उठी। केवल एक ही कारण कभी भी ऐसा काम नहीं कर
ले यह बात ठीक है। पर इस घटना विशेश का जो प्रभाव पूरे भारतवर्ष पर हुआ वह कम नथा।
दक्षिण छोर से उत्तर कटक तक इस घटना का समाचार फैल ही रहा था। इस घटना का प्रभाव
क्या
था इसका फल यह देखना होगा कि इस अधिकार चेष्टा से उत्पन्न शक्ति से क्या लाभ
हुआ था? केवल एक घटना मात्र से सम्पूर्ण देश में ही तो स्वराज्य का संचार नहीं हुआ
था, पर इस से इस भावना युक्त सारा भारत हो तो अवश्य ही जासकता था। हाँ, यह बात
तो जरूर हुयी। हिन्दू भावना को इस प्रकार आगे आने का मार्ग मिल ही गया। इस महान
परिणाम का सार तो यही था, कि भारत भर की जनता को विश्वास हो चलाथा कि जिस
बात को, वह असम्भव
समझती थी वह पूरी तरह से एक दम से सत्य सिद्ध हो चली थी। उस घटना ने
प्रत्येक हिन्दू के हृदय में उत्साह भर दिया था, वह यह बात भली ही तरह
सोचने
पर विवश हो गए, कि जब एक हिन्दू राजा ने इन यवनों द्वारा अपमानित हो
अपने स्वाभिमान को न छोड़ा, फिर अन्य क्यों न छोड़ें, विचारें वे?
हिन्दू-धर्म रक्षक तो वह बन कर सब के सम्मुख आया ही था, इसमें सन्देह ही नहीं!
इस प्रभाव से क्या लाभ हुआ यह समझना भी सरल हीथा! केवल एक ही बात नहीं
थी, जिससे कि काम चल ही जाता था? यह बात साधारण बात नहीं, सम्पूर्ण हिन्दु
स्थान जाग उठा। केवल एक ही बात को नहीं, अब तो उसके पूरे रूप को देखा जाने
लगा। इसका फल यह था, कि अपने पूरे देश में इस ही रूप से शिवाजी को देखा जाने
लगा। इस लिये भारत व्यापक रूप से इस बात का प्रभाव पूरे देश भर पर पड़ा हुआ
था?
यह प्रभाव कैसा था, अच्छा था? तो उस समय के सब लोग कह ही सकते
होंगे यह, प्रभाव कैसा था? तो उस समय के लोग अवश्य ही इस का कुछ तो फल ही
पायेंगे!
शिवाजी का विचार तो भारत भर को एक ही रूप में देखना था। क्या प्रभाव पड़ा था?
प्रभाव पड़ा, सो तो बहुत समय पश्चात् देखने को मिला। पर बात हिन्दू चेतना
द्वारा सम्भव थी, इसलिए सभी उस विचार द्वारा बंधे थे, इस बात द्वारा स्पष्ट
देखा
गया था। जो रूप आज हिन्दू धर्म का है, वह केवल इस बात का परिणाम ही था कि
शिवाजी, के नाम से सारा भारत एक बार फिर जागृत हो ही उठा। केवल धर्म की रक्षा
अथवा हिन्दू--धर्म का ही? रक्षा कार्य नहीं, सो इसके द्वारा सब काम हुआ, जो शिवाजी
का नाम ही भारत में सदा अमर रहने वालाथा।
केवल धर्म ही नहीं पर अपने देश की रक्षा का विचार था? हर बात पूर्ण
रूप से हिन्दू धर्म के साथ ही तो जुड़ी हुई थी? केवल यह ही कारण तो नहीं
बन-सका, जिसे जानकर, कार्य द्वारा ही परिणाम प्राप्त हुआ था?
इस परिणाम को ही, सब लोग देख रहे थे। वह बात यह थी कि सब लोग
एक ऐसा समय, पा ही तो गये थे, मुसलमानों के प्रभाव से मुक्त, जो
अत्याचार आज तक फैला हुआथा उस से जन समाज पीड़ित था। उस, से छुटकारा
पाना उन सब भारतीयों अथवा हिन्दू जन को असम्भव लगता था। इस लिये, जनता
सब समय, कष्टों से ही मुक्ति के उपाय सोचती थी।
केवल यह उपाय केवल यही था, जिसका कि नाम हिन्दू धर्म का था। यह सब
लोग जान गये, कि हिन्दू धर्म को नष्ट करने का पूरा प्रयत्न मुगलों द्वारा हो रहा
था, इस लिये धर्म ही; समाज का तो अंग था, जो केवल धर्म ही; रूप
विकृत रूप से हुआ था, सो इस बात को ध्यान में रख कर ही बात की
पूरी योजना बनी थी, सो इसका फल यह था, प्रभाव था? तो अवश्य, ऐसा प्रभाव
ही जन के मन पर पड़ा था, केवल हिन्दू भावना जाग उठी, बल्कि सब ही
प्रकार लोग अपने आप को समर्थ समझने लगे थे। उन को नया रूप प्राप्त हुआ

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भाग 2 (पृष्ठ 21-40)

ताता बिना काम किहे पेट तोर भरत नाहीं; सुकरा आजु सांझ कहत रहेव हम
गँउवां मा सब जन लाठी सोझा किये बा, गँउवां छोड़के तो हम सब जात आहीं यह
सुखरामवा देख का कहत बा, सुखराम जनमभरि मा लाठी तक ना छुये-छाये
हम तौ उन पर हाथ उठाय लिहिन जबैंनि लाठी हमारि छाती पै तरकि जात कहत
रहिन काम ना हो पायेव कहिके का होइ जात रहेव का करौ लरिका लहे बा पाछे
बिटवा तौ कबहूं अघाने ना, या करौ पइसा छिनके मा बहिन बिटिया सब लुटैब
सुखराम सब बतलाय बा, बड़का पर ईतना भरोसा रहा जनु जान
सुखराम सब झूठ बतलावत अहइ मोर बात पर बिसवास ना हो होत ना रहै
तौ बड़का कह पुकारि लैत तब का! देखि लीस ईसकति सब सोझा आइ जात रहै, ना
पतिया होत तौ मुंशी लिखि देत छु--छुटका भइया ई सबलाइव रहा, सुखराम यह मा
कौनो दोखी
हमार सुखराम कह जस मोर जीयरा कह बा सो पर ता मोर बस नाहीं
मोर अउलाद मोर कहियाव मोर अउलाद रहत, का सुकरा बोलि पावै? मोर बिटवा
कै दसा सुखराम देखि के हम छाती पीटि लैत यह पर तौ ता मोर बस नाहीं
सुखराम हमार बिटवा कै छाती पर घाव देखि के जरि-बुरि जात बा तौ हम का
की सुखराम कै बात सुन लीन्हि बा बड़का छु-छुटका कै हाथ मा लाठी देखि
जात बा तौ लाठी सुखरामवा कै हाथ मा देखि लिहित बा, छूट-छोट सब, जान परे
सुखराम कै लरिका तौ बड़का का हाथ मा लाठी देखि के तौ अपने छाती मा घाव
कै तरहि सुखराम कै पीठ पर घाव बा बड़का का सुखराम कह
मोर मन भरत सुखराम कहत जात रहै, हम सुखराम कह बात सुन लीन
लीन्ह यहि अउलाद सुखराम मोर पर ईसन भरोसा बा जइसे बा ईसन कहत रहत
रहिन कहत रहिन ई तौ, का मोर हाथ तौ ईसन ना हो सकत, हमरे जन
अउलाद मोर कह ना मानत तौ का मोर सुखराम सब सोझा कर लेत हमार लइका
बा लरिका कै सुभाव अहइ तौ मोर सब कहत ई तौ, का मोर मन तौ सुख मानत,
का करब, सुखराम लरिका अहइ मोर मन तौ ई कहत
मोर लरिका तौ सुख भरि मा मोर बात सुन--समझत रहै तौ सुखराम कै
बात बिचवा मा लै बैठि कै ईस बोल देत जनु बड़का कै लाठी सुखराम देखि
लीन्ह बा सुखराम कै छाती पीटि लैत बा ईसन ना होत तौ, काहे ना सुखराम कै
सुखराम सब बतलाय देत
हमारे बिटवा सुखराम कै छाती जरि बा तौ का सुखराम कै पीठ पर घाव
सुखराम कै छाती मा बड़का लाठी मारत बा तौ बिटिया कै छाती मा जरत अहइ
मोर मन कहत, बिटवा का मोर अहै? देखि लीस बड़का कै लाठी तरकि-तरकि के
जात बा तौ कौन सुखरामवा, सुखराम कै पीठ पर जरत बा तब तौ, जरै
का मोर कहै? मोर बिटवा कै छाती!
बिटवा तौ मोर कह ना मान बा तौ मोर मन कह जस मोर कह बात
सुख कह देत! या बात कै बात सुन के मोर मन जरि जात, ना तौ मोर कहत
हम तौ उन पर हाथ उठाय लीन कहत, तौ बड़का कै तौ कान बा ना मोर बिटिया
मोर कह ना मान तौ बड़का काहे ईतना लाठी मारि कै घाव कै देत अहै? ना
मानत ना रहै, मोर बिटवा कै छाती!
मोर तौ बात सुखि जात रहत अहइ, का मोर बात सुन लैत तौ मोर लइका
सुखराम बिटिया अहइ सुखराम लइका मोर तौ कहत सुख भरि जात तौ मोर
बिटिया सुख भरि जात तौ मोर सुख जरि ना जात तौ का? ना तौ का कहै,
मोर लइका ना कहै, का मोर बात, ना मोर बिटिया कह जस, कहत जस, ना कहत
अहइ ना कहै? ता ना ता मोर मन तौ ईसन बिसवास मोर बात सुन लैत अहइ
मोर बात सुन लीन्ह मोर मन कहि कहत जनु बिटिया बिटिया कै पीठ देखि अहइ ता
बिटिया कै पीठ देखि
सुखराम कै लइका सब मोर लइका अहइ ता मोर ना सुन मोर बात ता लरिका
ना लरिका सुखराम लइका का बात सुन सुखराम कै, सुखराम कहत रहिन सुखराम
मोर लइका, बिटवा का मोर अहै? देखि ली कान मा बात का हाथ ना गात, कान
मोर ना सुनै! मोर बिटवा कै छाती सुखराम कह लइका का मोर कह बात सुन
बात मोर लइका कै मोर सुखराम मोर बिटिया अहइ मोर कहत सुखराम
सुखराम कह मोर कान मा; मोर सुखराम कह बात मोर बिटिया बिटिया कहै,
सुखराम सब का सब सुखराम कै बात सुन लै ता बात कै, मोर बिटिया कै बात
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करें, वह उनका सब काम ऐसा समझ कर ही करेगा जैसे अपना काम करता अथवा किसी
स्वामी भक्त सेवक या दास अपने मालिक अथवा स्वामी का करता है, सो भला ऐसा कौन
सा धन या लाभ ऐसा होगा, जो ऐसे स्वामी भक्त को वह प्रभु न देवे, सदा निष्काम भाव
रख कर ही--या यों कहिये निष्काम भक्ति का? सो वास्तव विचारने की बात है निष्काम
भक्ति का फल ऐसा नहीं कि कुछ न होवे, किन्तु सकामी भक्ति से, निष्काम भक्ति
अधिक श्रेष्ठ
और उत्तम फल देने वाली होती है। इस वास्ते भक्ति के पक्ष में मन को दृढ़ कर सब
कर्मों को छोड़ कर सर्वदा भगवान् नाम का कीर्त्तन करते ही रहना चाहिये !
संसार के सब काम काज परमार्थ निमित्त नहीं होते किन्तु केवल पेट पालने के
ही यह सब धन्धे हैं। और यह बात तो प्रख्यात ही, कि जिसका पेट संसार भरके जीवों को
अन्न देकर पालता है, भला उस पेट भरने वाले परमात्मा दाता का जो ध्यान जप तथा भक्ति
करेगा उसका परमात्मा क्या, पेट न भरेगा; वरन् जब मनुष्य सब की आशा छोड़
केवल भगवान् का, ही विश्वासी बन जाता है, उसकी चिन्ता प्रभु को
आप होती है। जब वह न किसी से कुछ याचना वा आशा रखता तब जगदीश्वर
आप उस पर कृपा कर सब प्रकार से निर्वाह कर देते हैं। क्या जो माता के गर्भ में? कि जहाँ
नख, केश सब से युक्त, वा हाथ पांव कान से युक्त, उस मांस के लोथ को बना कर सब
का खान पान का प्रबन्ध कराता? जब उस ने बालक का सब प्रकार से निर्वाह कराया?
अब इस समय संसार में आके वह उसका प्रबन्ध नहीं कर सकता क्या? इस वास्ते
सब बातों को छोड़ भगवान् की ओर चित्त देना, व्यर्थ की तृष्णा को? वा आशा को
छोड़, केवल नामस्मरण! ही परम धर्म समझ कर चित्त को दृढ़ करो!
देखो जब कभी कोई जीव विपत्--सागर में पड़ता है, जगदीश्वर की शरण
ही, लेता वा शरण लेने पर कभी कोई ऐसा विपत्‌ग्रस्त नहीं रहा कि जिसका संकट दूर
न किया हो, नाम का जब ऐसा प्रभाव है, भला जब संसार भरके जीवों को उस ही
संकट मोचन के ही, सहारे पर यह सारा संसार चल रहा है। तब यह जीव क्यों
व्यर्थ चिन्ता में पड़ कर, उस को भूल जाता वा उस का ध्यान छोड़ता, क्योंकि जो
दयालुता कृपा वा क्षमा का, समुद्र दाता, जगदीश्वर में सब जीवों पर समता भाव
भरी है, उस को जीव भूल कर विपदा ग्रस्त हो रोता है। क्या उस की शरण में न
जाने का यह फल नहीं मिलता है, जो जीव इस भाँति इस संसार में दुखी रहता है।
इस वास्ते इस संसार रूपी बन्धन को काटने को और सब--प्रकार के कष्ट निवारण,
महाकष्टों निवारण का उपाय नाम का जप तथा नाम का अभ्यास ही एकमात्र साधन है?
फिर क्यों नहीं जपते? जो नर भी इस नाम, रूपी मन्त्र को गुरुमुख अथवा निष्काम हो कर
जप करेगा वा ध्यान धारेगा, निश्चय जान लो संसार बन्धन से छूट, मुक्ति को, वा
परम् धाम को वह प्राप्त होगा।
बहुत मनुष्य यह भी तो कहते, अमुक, अमुक विद्या अभ्यास करके क्या फल
हुआ जब कि अपना निर्वाह ही न कर सके। और बहुत से ऐसा विचार कर चिन्तातुर
रहते हैं। इस वास्ते विद्या का भी यह फल नहीं हुआ जिस से सन्तोष वा आनन्द हो।
सो इसका क्या फल हुआ? इस प्रकार के सन्देह का उत्तर ऐसा समझना कि भाई
जो, विद्या के द्वारा परमार्थ को न समझा वा ईश्वर के गुण को न जाना, सो उस
विद्या अभ्यास का क्या प्रयोजन वा लाभ? विद्या नाम ज्ञान स्वरूप? विद्या से अज्ञान
का नाश होना?
विद्या का परम तात्पर्य यही है, अज्ञानता को दूर करके भ्रम मन के नष्ट
करके जो, मन के सन्देह को निवारण करे और जो अज्ञानता को बढ़ावे सो! तो वह
विद्या अपने को और औरों को बन्धन वा क्लेश ही देगी, सो तो अविद्या का रूप
जानना तथा
सो विचार कर सब भ्रम को निवृत्त ही करना सब का धर्म है। जो विद्या स्वाध्याय
करके, सन्देह ही बना रहा अथवा जो सन्देह को न निवारण कर सकी, सो अविद्या रूप
ही हुई वा सो अज्ञानता ही की जड़ हुई। इस वास्ते भ्रम संशयों को निवारण कर
संशय विहीन, संशय से रहित होकर उस नाम को, ध्यान को, जप को विचारना
ही श्रेष्ठ व कर्त्तव्य; यही विद्या का फल समझना कि जो सत्य विद्या पढ़ी है,
सो सन्देहों के छुड़ाने वाली होती वा अज्ञानता को भगाने वाली होती है।
सो विचार कर, विद्या प्राप्ति कर के यही करें, विद्या द्वारा यही ध्यान ज्ञान
करें कि जिस का स्मरण से ही सब काम सिद्ध हो जाते हैं। उस निष्काम दाता प्रभु
जिसे संसार की सब माया रूप सामग्री समर्पित हो रही है। सर्व शक्तिमान् सर्व
22

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23

पाप बतलाने लगा, वह पाप अपने ऊपर ले, जान बूझ जान कर विष खाए सो मरे
ही मरे, बाल अवस्था में विद्या न अभ्यास करे, तो परलोक में वह सब जन में
तिरस्कार पाए ऐसा है, सो ईश्वर के हाथ सब कुछ नहीं
जो जीव के भाग्य में है वही जीव को मिलेगा
सो कर्म ही बलवान् है ईश्वर के जानने वालो ऐसा जानो, ज्ञान
विचार बिना जो नर जन्म सो वृथा है, ज्ञान से सर्व उत्तम पदार्थ को पावे
अज्ञान से नर, पशु के सो बराबर, ज्ञानी जन सदा काल सुखी व मानी
पदार्थ पाता है जो, तो विचार कर मन में, विषय के त्यागे से सब सुखकारी
जो मन शुद्ध व निर्मल करेगा सब काम सिद्ध करेगा जो मन मैला, भय
भयावना तो वह नरक वास में गिरेगा जो मन शांत व सब सुख व सब आनन्द
व रूप, जहां न धूप, तृष्णावली व सब आपदा छूटेगी? ज्ञानी सो जन जो अचल सो
मन को जन करे, सो मन को ब्रह्म--सो मिलावे, सो स्वरूप, सो स्वरूप--
आदि अन्त सब एक रस, ईश्वर सो सब रूप जान सर्व रूप घट घट
सब घटों विषे एक काल जाने, सो नर सब काम-क्रोध से छूट के सदा सुखी?
कोई नर अज्ञानी हो सो पछतावे?
सो बात सुनो, अज्ञान का नाश जो विचार से स्वरूप विचार कर सो ज्ञान
पावे तो स्वरूप सदा आनन्द से आनन्द--धाम सदा सो सो सदा सो स्वरूप
पद--को सो पावे जहां अविद्या का नाश सदा काल रहे सो सो सब
विकार घट घट से समाप्त हो स्वरूप में मिल सदा सो परमानन्द स्वरूप--
सो सदा सो वास जो वास सो वास सो वास सो वास सो जन जन सो सब
विकारों से सो ज्ञानवान् सदा सर्व काल से रूप ज्ञान करे
सो जन सब जाने, सब नाम सो, ज्ञान से जाने घट सो जन सो, अज्ञान से
अज्ञान विकार सदा सो सो सो जन से अज्ञान से ज्ञान कल्याण सब जन जाने
ज्ञान से सदा, ज्ञान से मुक्ति सो, जो ज्ञान से स्वरूप का ध्यान सदा कर सो
नर सब फल-रूप को न सो पावे?
ऐसा सब नर जान ध्यान सो कर स्वरूप को पावे! जो ज्ञान से ध्यान न करे
अविद्या के जाल में फंसे, ज्ञान बिना कोई न तर सो नर जो काम क्रोध
सदा काम बाधा से अज्ञान घट सदा काल रहे न सुख सो! जो ज्ञान करे
सो नर सो मुक्ति को पावे, कहो, मुक्ति कौन सी? कौन मुक्ति से? ज्ञान से क्या?
ज्ञान सब को सो मुक्ति विचार से नर को, अज्ञान से अज्ञान से मुक्त सब
नर
सो ज्ञान सब जान, सो ज्ञानी, स्वरूप के सब विकार ज्ञान से समाप्त
ज्ञान सब घट को ज्ञान से समाप्त है, अज्ञान बिना ज्ञान को ज्ञान से मुक्ति
ज्ञान सब, जो ज्ञान सब घट सब जाने सो, स्वरूप के स्वरूप सदा सो स्वरूप
ज्ञान से स्वरूप सो सदा सो सब सो अज्ञान से सो सो सो स्वरूप प्रकाश
प्रकाश प्रकाश प्रकाश सब अज्ञान ज्ञान ज्ञान सदा सब सो सदा सो ज्ञान सो,
स्वरूप ज्ञान सब सब अज्ञान से सो अज्ञान से सो ज्ञान सो सो सो सदा प्रकाश
सो सदा प्रकाश!
ज्ञान का वास सो स्वरूप स्वरूप सब सब अज्ञान ज्ञान सो सो, सब सब
अज्ञान से ज्ञान
सो सदा ज्ञान सब रूप से सब सब अज्ञान से सो सदा ज्ञान सो ज्ञान सो
ज्ञान सब घट सो ज्ञान ज्ञान से सो सदा ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो, सो स्वरूप सो
स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सब घट सो सो अज्ञान सदा सब सो सो अज्ञान सो सब
सो काल-काल, सब सो ज्ञान सो सो सो ज्ञान सो सो सो ज्ञान सब स्वरूप सब
सब, अज्ञान स्वरूप सो सो ज्ञान सो सो स्वरूप से सब ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान
सो सो ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान सब सो, स्वरूप सदा स्वरूप सो ज्ञान सो सो
सब सो सब ज्ञान प्रकाश सो सो सो सो सो ज्ञान व ज्ञान सो स्वरूप स्वरूप
सब सब ज्ञान सब सो ज्ञान सो, अज्ञान सब अज्ञान सब सो ज्ञान सो सो सब
स्वरूप सब स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सो स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान सो
स्वरूप सो स्वरूप सब, सब सो ज्ञान, सो ज्ञान सब सो! सो सब ज्ञान सो
ज्ञान, सब स्वरूप ज्ञान सब सब सब स्वरूप सदा सब ज्ञान सब सो ज्ञान
ज्ञान सो सो ज्ञान सो सब सो सो ज्ञान सदा सो सदा सदा सदा सब सब सो
स्वरूप सब ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान सब ज्ञान

24

ब्राह्मण लोग बहुत चंचल स्वभावके तो होते ही हैं। यदि उनपर दया न की जाय तो उनका पेट कैसे भरेगा,
इसी से बड़े बड़े विद्वान राजा युधिष्ठिर सरीखे इनके चरण छूकर पूजा करते हैं। अब तुमको भी तो यह उचित
था, जो तुम इनको एक लाख मोहरें दे देते? इसमें तुम्हारा क्या बिगड़ जाता?
यह सुनकर राजा हँसा, और दो लाख मोहरें उन दोनों को दीं, पश्चात् राजाने पूछा
पहिले तो आवश्यकतानुसार मांगने पर भी तुमने एक दम कुछ नहीं दिया था, पश्चात् दो लाख
दे दिया इसका क्या कारण था? तब उसने उत्तर दिया, हे राजन् पहिले तो आपने अपना
बल विक्रम देख कर मांगा था, सो तो कोई किसीके देने योग्य नहीं था पश्चात् जो मांगा
वह उस विद्या रूप पराक्रम का फल था, सो मैने दे दिया।
सो सुमति सेठ, तू भी तो ऐसा काम कर जिससे कोई विद्या आवे। विद्या रूपी
धन की प्राप्ति बिना उद्योग के नहीं हो सकती। व्यर्थ का हठ छोड़ दे। इस
संसार में विद्या ही सार वस्तु है, जिसके पास विद्या नहीं वह पशु के समान है, सो तू
भी विद्या का उपार्जन कर।
सुमति सेठ के उस मित्रने उसे इस प्रकार बहुत कुछ समझाया। तब सेठ ने अपने मित्र
से, हे मित्र! आपकी कृपा से आज मुझे ज्ञान हुआ, अन्यथा अज्ञान रूपी अन्धकार
सुमति सेठ ने अपने घर पर जाकर बहुत विचार किया और निश्चय किया कि विद्या
प्राप्त करना चाहिये। तब वह उस पंडित के पास गया और प्रार्थना करने लगा कि महाराज
मुझे भी विद्या दीजिये, जिससे मेरा अज्ञान दूर हो। उस पंडित ने कहा, विद्या तो
तुझे दे दूंगा, परन्तु तू दक्षिणा क्या देगा? सुमति ने कहा जैसी आपकी आज्ञा होगी
वैसी दूंगा, सो महाराज, मुझे कोई ऐसा श्लोक सिखा दीजिये जिसका अर्थ अच्छा हो? तब उस पंडित
ने कहा, सहसा विदधीत न क्रियां... इस प्रकार एक श्लोक सिखाया और उसका अर्थ भी बताया।
सुमति उस श्लोक का अर्थ समझकर घर आया, श्लोक का अर्थ यह था कि बिना विचारे
एक दिन राजा, दो-चार आदमियों को साथ लेकर शिकार को गया, दिन-भर शिकार
खेलकर जब लौटा और अपनी रानी के महल में गया, देखा नाई... ने सोचा कि युवराज तो
छोटा है, युवराज को मारकर, महारानी को मारकर मैं राजपाट पर अधिकार कर लूंगा और राजा
बनूंगा, यह विचारकर नाईने जहर मिला दिया और मालिश करने लगा।
नाईने मालिश करना प्रारम्भ कर दिया।
राजाने मालिश कराते कराते दीवार पर देखा।
दीवारमें सोने के दो शब्द लिखे हुए थे—सहसा न क्रियां विदधीत अर्थात्
बिना विचारे कोई काम न करो, इसका भाव नाईने राजा से पूछा तो राजाने कहा बिना विचारे
काम करने से हानि होती है, पश्चात् पछताना पड़ता है। राजा ने नाई से कहा तूने
यह बात क्यों पूछी? नाई डर गया, उसने हाथ जोड़कर कहा क्षमा हो महाराज, मुझसे बड़ा
अपराध हुआ। राजा ने पूछा क्या? नाईने सब बात कह दी और कहा कि यह सब मन्त्री ने
सिखाया था। राजा ने मन्त्री को बुलाया और पूछा तूने ऐसा काम क्यों कराया? मन्त्री डर
गया और उसने सब बात सच-सच कह दी। राजा ने मन्त्री को बहुत डांटा और नाई को छोड़
दिया और मन्त्री को देश निकाला दे दिया। इस प्रकार राजा ने मन्त्र का चमत्कार
इस प्रकार उस, एक श्लोक द्वारा राजा अपनी जान बचा सका। जिस प्रकार राजा
विचारशील था उसी प्रकार उस सुमति सेठ ने भी उस मन्त्र का अर्थ विचार कर बड़ा
लाभ उठाया। सेठ के पास एक सेवक था जो बहुत ईमानदार था, परन्तु उस सेवक की
स्त्री बहुत चंचल थी, उसने सेठानी से कहा तू अपने पति को विष देकर मार डाल
और राजा से विवाह कर ले, राजा तुझको पटरानी बनावेगा। सेठानी मूर्ख थी, उसने इस
बात को स्वीकार कर लिया, और एक दिन भोजन में विष मिला दिया। जब सेठ भोजन
करने बैठा तब उस श्लोक का स्मरण आया कि बिना विचारे कोई काम नहीं करना चाहिये?
तब उसने भोजन की परीक्षा की तो देखा कि भोजन में विष मिला हुआ था। तब सेठ ने
अपनी स्त्री से पूछा, तूने यह क्या किया? तब स्त्री रोने लगी और बोली मुझे क्षमा
कीजिये। सेठ ने उस श्लोक का धन्यवाद किया।
सुमति सेठ उस श्लोक के बल से बच गया, सो हे राजन्! बिना विचारे कोई
काम नहीं करना चाहिये। जो काम बिना विचारे किया जाता है उसका फल बुरा ही
होता है, इसलिये सदा सोच-समझ कर काम करना चाहिये। जो मनुष्य बिना विचारे
काम करते हैं, वे अन्त में पछताते हैं। अतएव हमें भी कोई काम बिना सोचे-समझे
नहीं करना चाहिये।
इस प्रकार विद्याधरने सुमति सेठ की कथा राजा को सुनाई और कहा कि हे राजन्!
तू क्यों व्यर्थ चिन्ता करता है? विद्या से सब कुछ सिद्ध होता है।
25

केवल इतना ही तो चाहा था कि सब के सब प्रेम से साथ रहें तो सारा जग सुखमय,
सब तरफ शान्ति ही शान्ति हो? शान्ति क्यों? जो पिता सब को न तो खिला सके, न
ही अपने साथ रखकर अपना प्यार दे सके तथा जब चाहे लात मारकर, न तो
मकान देवे, न ही कपड़ा ऐसा पिता ही न होवे तो क्या बुरा है, न ऐसा पिता
इस तरह से सब बच्चे प्यार से एक छत नीचे ही तो रह रहे हैं सुख, शान्ति
सब आपस में प्यार, प्रेम, शान्ति ही शान्ति, शान्ति माता तो सदा चाहती?
शान्ति की चाह किसे नहीं? पर पिता तो ऐसा नहीं जिसे सुख चैन, शान्ति
सुख, शान्ति सदा ही सब बच्चे चाहते रहते हैं।
माता के इन सब विचारों तथा इन सब बातों से लगता है, कि सब ही उस पिता
परमात्मा जिसने सब, सब सन्तान माता सब को सब ही कुछ सुखदायक पदार्थ
बनाकर इन सबका अधिकारी कर सब कुछ सब सुख ही तो दिए सुखपूर्वक रहने
अधिकार दे दिया जिसको माता ने सब कुछ सुख सम्पद दिया है, सब ही सुख
से सब को दिया पिता ने सुख, पिता सब पदार्थों तथा सब प्रकार से सुख
ही? शान्ति ही? पर सब सन्तान तो सुख से शान्ति से रह ही रहे, मातापिता सब
को तो सुख शान्ति तथा सब सुख शान्ति देकर सब कुछ, सब तरह सुखपूर्वक सब
सुखों शान्ति पूर्वक ही सुखी चाहते हैं? पर पिता तो सब, सब तरह से सब ही
प्रकार सुख, पर सब सुख सब को सब कुछ देकर सदा एक रूप सदा सदा सुख
शान्ति दे? जिसके यह माता पिता सन्तान ही सन्तान हैं, पिता तो कभी सब सब
समय सदा ही सब सब तरह से सदा सुखी चाहता
माता बच्चों के सुख से तो सब तरह सदा खुश, शान्ति सदा सब तरह से सब
बच्चे माता पिता के सुख से सदा ही सब सुखी क्यों न हों? सब तो सही, मगर
सब सुख तो सब पिता द्वारा माता पिता द्वारा सब को तो माता पिता, पिता
माता को ही सब से अधिक प्यार से सब सुखी? माता सब, सब सन्तान व पिता
ही सब को प्रेम, पर सब सन्तान मातापिता के आज्ञा सदा सब, शान्ति सदा
सन्तान बने
माता तू--तू ही सदा सब बच्चों सदा अपने प्यार तू--तू ही सदा सब
बच्चों सदा खुश, शान्ति सदाचार सब ही सब कर रही पिता
माता पिता से, शान्ति से? पर सब पिता से, जो पिता ही तो सब कुछ सब
दाता है, सदा सब सन्तान का पिता तू--तू ही, सब का, पिता ही, पिता सब कुछ
पिता सदा ही, पर सब पिता सन्तान सब पिता सदा एक ही सन्तान, पिता ही
सन्तान का पिता तू--सन्तान सन्तान ही, मातापिताजी को, भूलना ही? यह
सन्तान सब की, पर सब सन्तान पिता सब माता पिता? सन्तान सब माता सब
सन्तान पिता द्वारा सन्तान सब को सब ही सन्तान बना सब सबने पिता सब सन्तान
को तो माता पिता का ही सब प्यार अधिकार से अधिक प्यार ही, पर ही सब
सब ही सब माता पिता सब सब प्यार सन्तान तू--पिता अधिकार सन्तान सन्तान
सब, सदा, अधिकार सन्तान सब को सब माता पिता सन्तान सन्तान सब।
पिता सब का सदा पिता ही तो पिता ही सन्तान का सब ही पिता परमात्मा ही
सब पिता का परमात्मा जन्म-मरण सन्तान से तो न्यारा, पिता सब सदा ही सब
सब व सब पिता सदा ही सन्तान सब रूप सब, पिता माता सब रूप सब, सब
सन्तान सब परमात्मा व परमात्मा सन्तान सब प्रकार सब सन्तान सब सन्तान ही
सब तरह माता सन्तान रूपी ही सन्तान सन्तान, मातापिता सन्तान सन्तान ही
तो सदा सब तू--तू सन्तान, पर पिता तो सब ही सब का सन्तान ही रूप ही सब
रूप सन्तान सदा ही सब का, पर पिता परमात्मा का तो सब रूप सन्तान सन्तान
सब ही रूप ही, पर पिता सन्तान को सदा सन्तान रूप सन्तान ही सब को, पर सदा
सन्तान सब सदा सन्तान ही सब रूप सब।
पिता तो तू सब का पिता, तू ही माता परमात्मा पिता सदा पिता सब ही
पिता सदा ही पिता सब सन्तान को तो सब पिता पिता सब सन्तान को पिता सब
पिता परमात्मा, सन्तान परमात्मा ही तो ही ही पिता सब पिता सब
परमात्मा पिता।
पिता सन्तान का सब रूप?
सब रूप ही पिता, पिता ही सन्तान सब सन्तान ही सन्तान रूप सब ही,
पिता परमात्मा, पिता परमात्मा--परमात्मा ही सदा सब, शान्ति ही सदा सब,
26

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27

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□□□ □□? □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□
28

जगत की समस्त वासनाएं छूट जायँ, उसका नाम क्या है? कषायों उपशान्त हो जायँ,
उनकी मन्द स्थिति हो, उसका नाम क्या है?
फिर देश-सर्व विरत सम्यक्त्व को प्रमाण किया गया, तो जो लोग ऐसा कहेंगे,
मिथ्यादृष्टि का त्याग सम्यक् मिथ्यात्व में सम्यक्त्व प्रगट होने पर होगा इसलिए
उसे ही या सम्यक्त्व से पहले जो कुछ दान या पूजा रूप या तपश्चरण रूप किया था
या त्याग किया, वह सम्यक् त्याग नहीं, या सम्यक्त्व पहले नहीं, तो उसका जो होगा, वह
व्यर्थ गया, या सम्यक् सम्यक्त्व हो देश-सर्व विरत रूप सम्यक्त्व को प्रमाण किया गया,
प्रथम सम्यक् का ऐसा स्वरूप या त्याग या सम्यक् के उपशम या सम्यक् रूप जानना चाहिए,
अनन्ता-नुबन्धी का अभाव पश्चात प्रत्याख्यान का देशप्रत्याख्यान, तो देश-सर्व रूप
किया तो मिथ्यात्व सम्यक्त्व रूप हो सम्यक्त्व नाम हो ही गया!
तो विरत सम्यक् नाम उस ही का तो नाम है तो इस प्रकार सम्यक् हुआ, सम्यक्त्व
हुआ, पश्चात सम्यक्त्व रूप से देश सम्यक्त्व सम्यक् होगा?
सम्यक्त्व रूप तो हुआ, पर उस से सम्यक्त्व सम्यक्
रूप विरत सम्यक्त्व को प्रमाण किया या तो विरत सम्यक् नाम सम्यक्त्व रूप को
ही सम्यक्त्व का विरत का होगा, सम्यक् ही?
तो फिर विरत सम्यक् तो विरत रूप ही हुआ और
सम्यक् सम्यक्त्व रूप नाम सम्यक्त्व रूप हुआ विरत रूप तो उस सम्यक्त्व रूप
नाम हुआ या सम्यक्त्व विरत का सम्यक् विरत रूप प्रमाण ही?
तो जो विरत विरत सम्यक् ही रहा फिर वह तो सम्यक्
ही ना हुआ सम्यक्त्व नाम रूप हुआ तो सम्यक्त्व के पश्चात विरत हुआ होगा
उस को विरत सम्यक् नाम ही कहा जाय सम्यक्--सम्यक् होगा, विरत विरत, विरत,
विरत! विरत का विरत ही हो जाय विरत नाम उस सम्यक् विरत का? तो सम्यक्त्व
विरत नाम नाम सम्यक्--सम्यक्
विरत का विरत ही प्रमाण तो विरत का विरत विरत ही?
विरत हुआ, तो जो विरत सम्यक् विरत हुआ, तो विरत विरत नाम को विरत विरत
नाम रहा
उस विरत का सम रूप सम्यक् रूप प्रमाण हो गया प्रमाण रहा, विरत विरत ही?
सो ऐसा जानना, सम्यक् सम्यक्त्व से सब विरत रूप हो, जो उस सम्यक्त्व रूप से,
सो विरत सब विरत रूप विरत विरत हो सम्यक्त्व का ही विरत विरत ही?
भला, सम्यक्त्व सम्यक्त्व से सम्यक्, विरत का सम्यक्त्व सम्यक्त्व का विरत ही
सम्यक् हो न जाय, सम्यक्त्व से ही रहा, उस विरत रूप का उस विरत का सम्यक्त्व ही
रूप रहा, सम्यक् का उस रूप का विरत विरत का सम्यक्त्व विरत रूप न होकर ही
सम्यक् विरत विरत का सम रूप?
पश्चात विरत विरत का विरत रूप हो, उस विरत विरत का न उस रूप का ही
सम्यक् विरत सम्यक्त्व प्रमाण विरत का विरत रूप सम्यक्त्व प्रमाण न होकर सम्यक्त्व
सम्यक्त्व सम्यक्त्व नाम तो ही विरत सम्यक्--सम्यक् ही? तो जो विरत रूप विरत ही
रहा तो सो विरत का सम सम्यक्त्व ही ना हुआ, या सम्यक्--सम्यक् ही का सम्यक्
सम्यक्--सम्यक्? तो सो ही तो सम रूप उस विरत सम्यक्--सम्यक् ही का सम रूप
विरत रहा, या सम्यक्त्व रूप विरत का ही विरत तो उस विरत का विरत ही,
सम्यक्त्व का सम्यक् रूप उस विरत का विरत रूप ही या विरत रूप का ही विरत विरत
रूप सम्यक्त्व हो, या विरत ही विरत, उस ही का विरत रूप ही उस विरत विरत,
विरत विरत सम्यक्त्व तो ही सो उस सम्यक्--सम्यक् ही? या सम्यक्--सम रूप का उस
विरत प्रमाण, विरत ही रहा सो, उस विरत प्रमाण रहा, उस विरत रूप सम्यक्त्व का
सम रूप या विरत सम्यक्त्व सम्यक्त्व रूप ही सम्यक्त्व नाम सम का सम्यक् सम्यक्?
उस का सम्यक् का नाम ही विरत का, तो सो ही उस सम्यक् विरत? सम्यक्त्व ही
रूप ही विरत, सम्यक्त्व विरत नाम उस ही का
सम्यक्त्व नाम विरत का सम रूप रूप हो, सम्यक्त्व सम्यक्त्व सम्यक्त्व ही
सम्यक्त्व का विरत सम्यक्त्व का ही स्व--रूप सम्यक्--का सम रूप ही उस ही विरत
का, पश्चात उस रूप का ही रूप उस विरत सम्यक्त्व प्रमाण ही उस सम्यक्--सम्यक् का ही
रूप सम्यक्--का सम्यक्त्व सम्यक्त्व प्रमाण का ही विरत ही रहा, विरत ही तो विरत का
विरत का विरत ही, विरत रूप रूप का विरत रूप विरत सम्यक् विरत विरत का सम्यक्त्व,
सो सम्यक् विरत विरत विरत विरत का सम्यक्त्व, सो विरत विरत
29

विचार करके देख लो संसार का इतिहास उठाकर, जिसने माता--पिता का तिरस्कार
या अनादर अथवा उनकी बात नहीं मानी और उनका दिल दुखाया हो, तो कभी शान्ति पूर्वक रह नहीं
सकेगा या उसका वंश अथवा वह कभी भी सुखी रह सके यह नहीं कह सके, लेकिन जो कोई
हृदय रूपी गुरु आज्ञा धारण करके माता पिता की सेवा और आज्ञा का पालन करते हैं वह सुख
का आनन्द हमेशा पाते रहते हैं और सदा उन पर भगवान की कृपा भी बनी ही रहती व यश
पाते, और अन्त में उस परम आनन्द धाम को पाते, राम का उदाहरण प्रत्यक्ष
पर आज तो संसार स्वार्थी, कपटी व पाखण्डी बनता, विचार ही
बिल्कुल विपरीतार्थ दिशा में बदल व विपरीत दिशा में सोचने लग पड़े जिसका
नतीजा है, कि वह कभी सुखपूर्वक शान्ति से रह तो ही नहीं सकता है, बल्कि
अशान्ति से भरा रहता व दुःख भोग रहा क्योंकि सच्चाई के पथ से भटक ही गया, हर एक
इन्सान पर आज माया ऐसी सवार हो रही व ऐसा प्रभाव डाल रखा कि कोई भी सच, शान्ति
का दम नहीं भर रहा बल्कि स्वार्थ के वशीभूत होकर, चाहे सन्तान, चाहे कोई
अपना सम्बन्धी अपने स्वार्थ के वश होकर ही आज माता पिता को अपने घर अपने
पास रख या सेवा कर या फिर अपने से पृथक करके दुःखी कर रहे
कई सन्तान तो केवल व सोचे कि माता पिता अपनी सारी जिन्दगी की कमाई
मुझे, या जो कुछ भी उनके पास जायदाद पैसा रुपया हो वह सब ही मुझे दे दिया जाये
चाहे, मेरे ही भाई और बहन को न मिले और उनका कोई भी हिस्सा न रहे जो केवल मैं
अपने पास रखूँ जिससे मैं अपना गुजारा चलाता रहूँ व, तो सन्तान केवल अपने
स्वार्थ खातिर बाप से प्यार तो जताती या कहती कि पिताजी आप हमारे साथ रहिये
ताकि जायदाद अपने ही हाथ में आ सके; जब देखा
या बाप, तो फिर उनका आदर भाव खत्म हो गया या छोड़ दी उनकी सेवा या दूर
भगा दिया जायदाद ले, फिर क्या रहा
आज तो सारा संसार ही ऐसा स्वार्थी बन, फिर शान्ति का पाठ कहाँ
मिलेगा माता पिता को देखना भी कई सन्तान नहीं पसन्द करती व जब माँ बाप
वृद्ध होकर किसी सहारे या भोजन के मोहताज हो जाते तब--तो उन्हें या छोड़
दिया जाता बाहर या फिर, वृद्धा आश्रम भेज कर छुटकारा पा लिया लो!
लेकिन यदि वे खुद भी विचार करके देखें कि कल हम भी तो माता
पिता की श्रेणी में ही आ गये हैं सन्तान के, कल को जब हम बूढ़े होंगे? तो
क्या वह भी ऐसा बर्ताव हमारे साथ करेगी तब क्या शान्ति मिलेगी? विचार करो
इन्सानों विचार
जो भी संसार में आया है उसको यह शरीर छोड़ कर एक दिन जाना अवश्य ही
पड़ेगा! तो फिर यह दुनिया दो--दिनों, थोड़ी देरकी खातिर क्यों
पाप के भारी कर्म कर अपना ही बुरा कर रहे इस सच को समझो जी,
इन्सानों, सच्चाई के पथ पर चल कर सच्चाई--धर्म, दया, नम्रतापूर्वक
व्यवहार करो हर इन्सान से तभी सुख, ही सुख सब जगह ही पाओगे
आज हर घर परिवार में एक दूसरे पर ईर्ष्या क्रोध जलने की अग्नि
सुलगाये, एक दूसरे को न देख कर खुश बल्कि ईर्ष्या जलते ही हैं, हर एक घर
आज नरक बना हुआ है भाई, नरक कहाँ मिलेगा!
स्वर्ग तो शान्ति में, तो शान्ति का मूल क्या है? आज भाई--भाई की
जान का बैरी बना हुआ या भाई भाई को आपस में दो--फाड़ कर रहे, एक ही
माँ का सन्तान भाई ही भाई--परिवार को उजाड़ने, मारने में, अपना बड़प्पन
रूप पाखण्ड को ही अपना मान--शान समझ मनुष्य ही तो इन्सान का ही गला
घोंट
या तो इन्सान उस रब को केवल मात्र परमात्मा जानकर ही सब कुछ
समझ कर निर्वाह करता या तो यह सोच समझ कर त्याग करता, दयावान् बनता,
परोपकारी बन, अपना जीवन, तो सब सम्भव निर्वाह हो ही जाता जिस पर सदा उस
दाता की कृपा बनी रहती
पर आज उल्टा पाठ ही, इन्सान पढ़ रहा जिससे इन्सानियत इन्सान रूप में
है? आज इन्सान पाश्विक, रूप धारण करता जा रहा, जिस सच इन्सान
को पहचानना है, उस सच्चाई को भूल बैठा मनुष्य, जिस के लिए बार बार
यह दुनिया में ही इन्सान का जन्म दिया है परमात्मा ने जिस से हर एक मुक्ति पा,
उस का ध्यान लगा मुक्ति रूप जन्म--मरण बन्धन से ही सदा--सदा छूट--कर छुटकारा
30

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□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□□? □□
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□□□□ □□□□? □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□□ □ □□, □□ □□□□ □ □□, □□ □□ □□□□□ □□□
□□□ □□ □□□□ □□□□? □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□

31

□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□, □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□
□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□, □□□□□□ □□□, □□ □□□□□ □□□ □□□
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□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□
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□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□
□□ □□□□□□□□ □□□, □□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □ □□□□□ □□□□□□
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□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□! □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□, □□ □□□□ □□ □□□□□?
□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□□
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32

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34

लेकिन विस्मय केवल इसी पर निर्भर न था कि संन्यासी सब का सब भोजन कर गया
जिस भोजन करने वाले में साधारण व्यक्ति पचास मिनट लगाता उसे संन्यासी ने दस मिनट में, उस
सब भोजन को इस प्रकार समाप्त कर दिया था कि जैसे भोजन था, ही नहीं या फिर न जाने
सब का सब भोजन कहाँ समा गया, पर सब लोग इस देखकर यह निश्चय करने लगे थे, यह
भी, न तो संन्यासी का यह पहला काम पहले कभी का किया हुआ संन्यासी का खेल था। वह
खेल केवल था, जिसे दिखलाकर सब संन्यासी का विश्वास कर रहे थे, सब का ध्यान अपनी
तरफ कर लिया।
वह संन्यासी यह विश्वास सब लोगों अथवा एकत्र जन पर इस प्रकार जम, जमने जा रहा
था! केवल इतना नहीं, जो कुछ भी वह संन्यासी अपने मुख से कह रहा था, एकत्र जन
पर उस एकत्र जन समुदाय पर उसका ही प्रभाव पड़ना! जमना! सब लोग जो संन्यासी के पास
एकत्र थे, वह सब इस प्रकार उस ओर जा रहे थे मानों उनका, जो कुछ सोच विचार उस
बात अथवा इस ओर उस समय हो रहा था, केवल वह समाप्त हो रहा था और जो कुछ
वह सब संन्यासी कह रहा था, सब एकत्र जन उस पर ही विश्वास न केवल, बल्कि सब
उस प्रकार केवल उस पर विश्वास करने अथवा करने के ही योग्य थे, जो वह संन्यासी कह
दिया करता था। इस ओर सब एकत्र न केवल थे, पर उन एकत्र अथवा संन्यासी के बीच में
यह अंतर पड़ता जा रहा था कि वह सब संन्यासी को देख-देखकर प्रसन्न केवल
होते ही न रह जाते थे बल्कि संन्यासी के उस खेल-तमाशे अथवा खेल पर विश्वास करके
संन्यासी पर अपना विश्वास इस प्रकार से कर रहे थे कि वह संन्यासी को केवल एक
ऐसा व्यक्ति ही मानकर न रह रहे थे, जो केवल पेट भरने के ही लिए संन्यासी बनकर
घूमता फिर रहा हो अथवा जिसे केवल भोजन से, या सब प्रकार की सांसारिक सुख-भोग से
मोह
वह केवल यह देख प्रसन्न थे, जो वह संन्यासी भोजन कर रहा था, जिसे वह न केवल
एक साधारण जन से अधिक खा रहा था बल्कि साधारण व्यक्ति से अधिक? उस सब पर
अविश्वास तो, था ही नहीं सब लोगों को उस समय जो एकत्र थे, पर वे सब जो कुछ
भी अविश्वास इस बात पर कर रहे थे अथवा कर रहे थे कि क्या वह संन्यासी
सच, में भोजन था, या भोजन से, या केवल पेट, में भोजन न--था सब का सब ही!
जिसे सब एकत्र लोग समाप्त हुआ देख रहे थे, केवल विस्मय ही सब को हो रहा
था।
संन्यासी के मुख पर वह तेज चमक रहा था, जिस मुख-तेज पर
एकत्र जन सब प्रकार मुग्ध होकर उस ओर देख रहे थे और संन्यासी
की बात शांत होकर सुन रहे थे। जिसे संन्यासी केवल एक खेल समझ रहा था! संन्यासी
जिसे सब कुछ न समझकर केवल एक खेल समझ रहा था! पर जो सब एकत्र
लोग वहां संन्यासी को, उस संन्यासी को सब कुछ जानकर मान रहे थे।
केवल इतना ही नहीं संन्यासी सब लोगों को वह सब सुना रहा था जिसे वह
उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर न केवल न केवल कह रहा था, बल्कि जो कुछ
सब उस उत्तर-पश्चिम की ओर देख रहे थे अथवा संन्यासी को उस दिशा की ओर
मुंह किए हुए सब लोग एकत्रित थे, जिसे संन्यासी सब प्रकार से कह
रहा।
संन्यासी को भोजन सब लोग अब तक साधारण भोजन मात्र कहते आ रहे थे।
केवल यह ही, साधारण भोजन संन्यासी को केवल पेट भरने वाला कहा गया था,
अथवा लोग, जिसे भोजन कह रहे थे वह केवल पेट भरने वाला भोजन था उत्तर-
पश्चिम दिशा की ओर संन्यासी उस उत्तर-दिशा की ओर देख रहा था। संन्यासी
का भोजन सब ने न केवल देखा, न सब लोगों को उस प्रकार का भोजन ही
समझा जा रहा था अथवा, भोजन सब ने देखा, पर संन्यासी केवल पेट का
भोजन ही न समझा जा रहा था।
पर आश्चर्य, इस बात का था कि वह सब भोजन पेट का ही भोजन था!
वह भोजन सब लोग जिसे, पेट का भोजन ? कह रहे थे कि वह संन्यासी केवल, पेट
भरने भर को भोजन कर ही रहा था? क्या वास्तव में, वह भोजन था? क्या संन्यासी
का, वह भोजन था? इस ओर का भोजन सब को समझ में आ रहा था कि भोजन
था, भोजन सब को पेट भरने का भोजन लग रहा था, पर वह भोजन संन्यासी का
था, संन्यासी के ही उस भोजन को स्वीकार कर रहा, पर वह स्वयं पेट से भोजन कर
रहा था या पेट को भोजन दिया जा रहा था! सब लोग देख रहे थे, केवल
35

पापो मरणतोऽपि! मी काय करू? या पातकातून मी निसटणार कसा ना, कारण मला
सर्व
माहिती पण मी फार पूर्वी एका ग्रंथकाराकडून एका साधू व संतांची
जी माहिती वाचली ती फार विचित्र होती! साधूचा हा धर्म असतो की तो माणसाला
पाप व संकट या दोहोंतून ही तारील व संकटा या जगातील नसून त्या परलोकीच्या
जरी
तो संकटात पडून ही पाप तर करतोच करतो ना, कारण तो तसे करीत असता जर तो
त्यात पडला तर तो पापाच्या या पापातून मुक्त कसा होऊ शकतो असा विचार करून
जेव्हा एखादा साधू या जगात येतो, तेव्हा तो स्वतः या संकटात पडून त्या पाप्यास
त्या पापातून सोडवितो. आणि म्हणूनच साधूविषयी जे काही म्हटले जाते ते सर्व
काही खोटे
नाहीं! या विचाराने मला त्या साधूचा विचार आला की तो मला पापमुक्त
करू शकत नाही म्हणून मी त्याच्या जवळ गेलो नाही. मी त्या साधूला पूर्वी पाहिले
होते पण मी त्याच्याकडे गेलो नाही. कारण एका साध्या पापी माणसाला साधू
सोडवू शकतो, पण माझ्यासारख्या पापी माणसाला सोडवू शकत नाही! कारण
हा विचार असा आहे की, एका पापी माणसाला सोडविण्याकरिता त्या साधूला स्वतः
पापी व्हावे लागते! जर पापी व्हावे लागले तर तो साधू कसा? जर साधू झाला नाही,
तर तो मला सोडवू शकत नाही.
या अशा विचाराने मी स्वतःच पापी होण्याचे पत्करले व त्याचा परिणाम असा झाला की,
त्या पापातून मुक्त होण्याचा मार्ग मी शोधू लागलो! या विचाराने मला असे वाटले की
या पापाचे प्रायश्चित्त तरी काय असावे? जर मी स्वतः मेलों--तर मला या जगातील
सर्व दुःखापासून सुटका होईल! पण जर मी आत्महत्या केली--तर माझे नाव मला कधी
पुसून टाकता येणार नाही आणि तो पापाचा डाग तसाच राहील! त्यापेक्षा असे केले तर बरे
होईल की मी स्वतःच एका न्यायाधीशापुढे जाऊन उभे राहावे आणि सर्व हकीकत त्याला
सांगावी आणि त्याला सांगावे की तू मला फाशीची शिक्षा दे. यामुळे माझे नाव तरी पुसले
जाईल आणि मला शांती मिळेल! असा विचार करून मी स्वतः न्यायालयात जाण्याचे
ठरविले! पण मी न्यायालयात गेलो नाही कारण जर मी न्यायालयात गेलो तर लोक
मला हसतील आणि म्हणतील की हा मेला--हा खुनी आहे आणि तो लोकांचे तोंड पाहाण्यास
समर्थ नसल्यामुळे न्यायालयात आला आहे. शेवटी मी शांत बसून विचार केला की
आपण स्वतः न्यायालयात न जाता, आपण असे काही करावे, ज्यामुळे पोलिसांना माझी खरी
हकीकत कळेल आणि ते मला पकडतील!
या एका उपायाने मला बरे वाटले आणि मी या उपायाचा अवलंब केला. असा विचार
करून मी शांत बसलो. तोच मला समोरून एक लहान मुलगा येताना दिसला. त्याला
पाहून माझ्या मनातील पापी विचार जागा झाला. मी त्याला पकडून विचारले की, तू कोठे
चालला आहेस? त्याने सांगितले की, मी घरी चाललो आहे. मी म्हटले, "तू घरी का जातोस?"
त्याने सांगितले, "माझी आई वाट पाहात आहे म्हणून मी घरी चाललो आहे."
यावर मी त्याला म्हटले, "तू घरी जाऊ नकोस--माझ्याबरोबर चल." त्या मुलाने नकार
दिला, पण मी त्याला सोडले नाही. शेवटी त्या मुलाने मला शिवी दिली आणि जोराने
ओरडू लागला. त्याबरोबर मी त्याचा गळा आवळला आणि तो जागीच ठार झाला!
नंतर मी त्या मुलाच्या प्रेताची विल्हेवाट लावली.
याप्रमाणे मी दुसरा खून केला आणि नंतर मला पश्चात्ताप झाला. आता मला
वाटू लागले की, आपण या जगात राहण्यास योग्य नाही. मी आता मरणारच! मला
आता कोणीही सोडवू शकत नाही. मी स्वतःच स्वतःला मारून घेतो आणि या जगातील
सर्व पापातून मुक्त होतो! शेवटी मी असा निश्चय केला की, आपण विष खाऊन मरून
जावे! याप्रमाणे मी विष खाल्ले पण त्या विषाचा माझ्या शरीरावर काहीच परिणाम झाला
नाही! आता मला काय करावे ते सुचेना! मी घरात गेलो, दार लावून घेतले आणि विचार
करू लागलो की, आपण आता काय करावे? विचार करता करता मला झोप लागली.
सकाळी उठून पाहतो तो दारावर कोणीतरी थाप मारीत असल्याचे ऐकू आले.
मी दार उघडले आणि पाहतो तो पोलिस दारात उभे होते! पोलिसांनी मला
अटक केली आणि मी सुटकेचा निःश्वास सोडला. मला फाशीची शिक्षा झाली आणि मी
आता मरणार!
मला फाशीची शिक्षा झाल्याचे ऐकून, ती तरुणी ओरडली आणि म्हणाली, देवा, हे
काय झाले? तो तरुण पुढे म्हणाला, "बाई, शांत राहा, घाबरू नका. तुम्ही आता
सुखरूप आहात. त्या दुष्टाला योग्य ती शिक्षा झाली आहे. चला, आपण आपल्या घरी
जाऊ."

सुनो ! हम विश्वास पूर्वक कहते कहते थक गये कि भगवान सदा प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ रहते तथा हमारी
सहायता तो करो, पर सम्भवतः विश्वास नहीं होता।
जरा सोचो हमारे जीवन निर्वाह की चिन्ता स्वयं भगवान को ही करनी पड़ती है।
अन्यथा हम असहाय होकर क्या कर सकते हैं। हमारा जन्म, पालन-पोषण भी एक ऐसा कार्य है,
जिससे यह स्पष्ट पता लग जाता है कि ईश्वर ही प्रत्यक्ष होकर यह सब कार्य करते हैं। अतः
अविश्वास का प्रश्न
केवल एक बात बता दीजिये कि जब आपका जन्म हुआ तो क्या आप स्वयं ही
उपस्थित हो गये, या आपके लिए भोजन पानी हवा आदि की सब प्रकार पहले प्रबंध था। अथवा किसी
बात की कमी थी। यदि यह सब कुछ सत्य है, और निश्चित सत्य है। भगवान का यह सब प्रत्यक्ष
रूप से आपके जीवन निर्वाह में सहयोग था तो क्या अब उन्होंने अपना सहयोग देना बन्द कर
दिया, जो इस तरह भयभीत रहते हो? वास्तव में यह केवल आपकी अज्ञानता का ही प्रमाण
है, जो अपने भगवान सम्बन्धी विचार, ज्ञान को विकसित करने की चेष्टा नहीं करते।
जीवन व्यतीत करते-करते भी, यदि हम प्रभु की ओर अपनी दृष्टि रखें,
भगवान्‌ सदा ही हमारे साथ हैं। वे हमारे लिए सब कुछ करते हुए भी कभी अहङ्कार नहीं
करते। बस, यह देखना है कि प्रभु का ही आधार है। यह भाव मन में बैठाने का प्रयत्न करना
ही जीवन का ध्येय है। भगवान पर विश्वास न रहने का फल ही यह है कि मनुष्य अपनी
भलाई !
अपने विचार भगवान्‌ ओर ही समर्पित कर नियमित रूप से ध्यान करें। तब उस
समय का वातावरण स्वयं ही पवित्र हो जायेगा, सो भी ऐसा जिसका प्रभाव कभी नष्ट
होनेवाला नहीं होता।
इस प्रकार जब हम प्रभु के प्रति अपनी लगन को बढ़ाते रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे प्रति
अपनी कृपा को बढ़ाते रहेंगे। अतः प्रभु का स्मरण सदा करना चाहिये। जिस प्रकार एक पतङ्गा
अग्नि को देखकर, उसमें कूद पड़ता है। इस प्रकार की लगन यदि ईश्वर के साथ रखी जाये तो अवश्य
ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। संसार के माया-जाल में फंसकर मनुष्य प्रभु से विमुख हो जाता है।
जो कि ईश्वर के प्रति किये गये उपकार का फल उलटा देना है। ईश्वर ने यदि संसार बनाया तो हमें
सहयोग देने के लिए, न कि अपने स्वरूप को भूल जाने के लिए। अतएव, भगवान्‌ सदा
हमारे साथ रहते हैं, इस पर विश्वास न होना ही मनुष्य की भारी भूल है।
जब कभी भी संकट आये, तब यही समझें, 'भगवान्‌ ही परीक्षा ले रहे हैं।' प्रभु की लगन
ही ईश्वर से मिला सकती है।
इस प्रकार प्रभु से सम्बन्धित हो कर विचार करने पर मालूम होगा कि भगवान्‌
से तो हमारा नित्य का नाता है, जिस का कभी वियोग नहीं हो सकता। इस प्रकार यदि प्रभु
का चिन्तन किया जाये तो हम निश्चय ही पाप-कर्मों से छूट सकते हैं। जब प्रभु
हमारे साथ हर समय है तो परमात्मा का ध्यान सदा बना रहना चाहिये। ईश्वर सर्वव्यापी
है। यह जानकर जब इस बात का निश्चय हो जाता है तो प्रभु के प्रति लगन बढ़ती है।
जो कुछ इस संसार में दिखाई देता है, वस्तुतः वह सब उस शक्ति-सम्पन्न का चमत्कार
मात्र ही तो है। प्रभु की कृपा से ही ज्ञान का प्रकाश होता है। यदि प्रभु की कृपा न होती, तो
हम अज्ञान के अन्धकार में भटकते रहते। अतः प्रभु के प्रति लगन ही हमारा जीवन ध्येय होना
चाहिये। हमें सदा इस बात का विचार रखना चाहिये, कि यह संसार नाशवान्‌ है। प्रभु ही नित्य-
स्वरूप है। जो सदा हमारे कल्याण के लिए तत्पर रहता है।
ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के पश्चात् मनुष्य के मन में शंकायें उत्पन्न नहीं
होतीं। ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान्‌ है। ईश्वर सब जगह व्याप्त है, उसका न आदि है
न अन्त, परमात्मा सदैव ही विद्यमान रहता है। प्रभु के दर्शन करने का साधन केवल प्रेम है।
ईश्वर के प्रति प्रेम की भावना होना ही प्रभु-दर्शन का कारण बनता है। मनुष्य
केवल प्रभु की शरण में जाने पर, प्रभु के प्रति समर्पित होकर ही प्रभु को पा सकता
है। इस प्रकार जब भगवान्‌ की कृपा से मनुष्य का संशय दूर हो जाता है, तो फिर
शंका कैसी? वह तो प्रेम में डूब जाता है। प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम का फल यह होता
है कि प्रभु को कभी भी नहीं भूला जा सकता। प्रभु-दर्शन से बढ़कर संसार में और कोई
आनन्द नहीं हो सकता। प्रभु-दर्शन पाकर मनुष्य कृत-कृत्य हो जाता है। ईश्वर के प्रति
इस प्रकार की निष्ठा रखने वाले भक्त का जीवन ही सफल है। भक्त, भगवान्‌ का
दास बन जाता है।

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