माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन एक तपस्या रूप
स्वामी शरणम्
सम्मोहन का रहस्य
नमो भगवते रुद्राय !
हे शर्वदेव, काम-विजेता प्रभु तू, तू सर्वदा सब काल में अपने भक्तों
रूपी मन्द मन्द बहने वाले मारुत के स्पर्श से सुख रूपी प्रवाल वन रूपी तरंग
रूप जल से भरे समुद्रों को शांत करता है, उस शांत रूप तरङ्ग से विहीन तू
ही समस्त के मनोगत भाव को ले--के अपने में लीन कर लेता है। परंतु हे
महेश्वर तू स्वयं जो कि सर्व रूप में सब पदार्थों का जीवन है उसी शांत, हे
सर्वज्ञ तू संसार के सुख रूप या ऐश्वर्य के भोग को अपने समक्ष कुछ भी नहीं
मान कर त्यागता
हुआ मन, रूपी भ्रमर, रूपी सुमन, रूपी वन को, तू स्वयं ही अपने
उस परमात्मा रूपी कमल दल में--लीन किये है, जिसे पद, जिस को पद, संसार
के जन, सब मुनिगण, सब योगी--जन नित्य खोज करते ही रहते हैं वही तू!
जिसका तू आश्रय लेकर सदा ही उसी में लीन हुआ कर! जिस पर सब जगत
की दृष्टि? समस्त रूप दृष्टि प्रकृति का अंश ही बनकर रह गया तब तू ही क्या
रूपता के वश पड़ा रह के लीन हो, जिस दिव्य एकाग्रता में--तू लीन हो उसी
का नाम योग रूप? योग का नाम?
कहो, नाथ! तू, जो कि योग का रहस्य तूने ही संसार रूपी योग में
कहा, जिसे तू ही कर रहा था कि संसार रूपी ही योग है, तब जिसे योग
का रूप कहा जा रहा है तब संसार की योग रूपी तृष्णा रूपी संसार विरह
रूपी सब संसार के स्वरूप का नाश रूपी योग ही कहा गया है, हे प्रभु
रूपी नाम सदा संसार विहीन तो नहीं है, जब तू स्वयं रूप ज्ञान, प्रकाश से
ही रूप का ज्ञान प्रकाश रूपी रूप का ही रूप कहा गया है।
जो संन्यासियों के, या तपस्वियों के इस संसार से परे सब कुछ देख कर
उस पर ही रूप न मान, तू निर्गुण न कह, तू सब कुछ त्याग ही चुका है।
तू सब कुछ त्याग कर ही उस शांत रूप को पा सका है, जिसे संसार
कहा, जिस संसार का, उस संसार वासना से परे ही माना
ही गया था तब यह ज्ञान भी किसे कहा।
तू स्वयं ही ज्ञान रूप हो कर उस दिव्य प्रकाश रूप से कह रहा है,
जिसे सब जन सुन रहे हैं जिस वाणी से तू सब कुछ बोल रहा है संसार
रूप में उस ज्ञान रूपी रस की तृष्णा से, तृष्णा रूपी उस रस रूपी शब्द
से जो सब सुन रहे हैं उस सब से तू तो परे ही नहीं कहा जा, किसी भी
अवस्था का यह रस, जिसे सब सुना है, जिसे सब सुना गया है उस शब्द से
विहीन रस, जिसे संसार रूपी सब जगत के जीवन का रस स्वरूप है, जिसे
कहा है, रूपी जीवन भी
कहा जा कर शांत रूप किया जा रहा, जिसके लिए यह सब किया
गया सब कुछ हो कर भी सब उस शांत रूप में लीन था।
हे ज्ञान दाता तू इस संसार रूप से जो तृष्णा में रस ले रहा, तू तो तू
संसार में रह कर त्यागी कैसा? यह ज्ञान संसार रूपी रस से सब कुछ
भिन्न था जिस में तू उस संन्यास रूपी काम-विजेता का रूप कहा जाता
जिसे संसार से परे ही ज्ञान स्वरूप में तो कह के, शांत स्वरूप बना ही
संन्यास को कहा गया
ज्ञान रूप के परे, जिसे तू केवल एक रूप ही कह संसार रूपी
संन्यासियों, योगियों के शांत रूप, जिसे सब कहते हैं ज्ञान का स्वरूप है
उसी स्वरूप को त्याग रूप कहा है, स्वरूप त्याग ही संन्यासियों स्वरूप
कहा गया तथा उस से परे भी ज्ञान स्वरूप कहा ही गया जिस से तू भिन्न न
रहा
इस सब से शांत रूप ही जब स्वरूप प्रकाश स्वरूप से परे ही ज्ञान
रूप
केवल एकाग्रता का प्रकाश बन कर रह गया, तब संसार रूप या न
रूप या संन्यास रूप का ज्ञान सब का सब ही रह गया, उस समय में, उस
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