माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपाप का परिणाम दुख मिलता ही है। जिसे सुखद जीवन जीना हो, उसे सदा
शुद्ध भावों रूप ही रहना या मन का रूख करना सदा, जो कभी भूल कर पाप कर्म न
करो, तब समझो न कभी, दुख कभी न भोगना पड़ेगा। पाप कर्म के फल से ही संसार
का हर प्राणी संतप्त या परेशान है। अतः प्रत्येक भावुक को पाप से सर्वदा बचते
अहिंसादि, अहिंसक भाव रूप आचरण तथा वचनों रूप नियमों का पालनपूर्वक, सुमार्ग
अपनाना चाहिए। पाप से जो विरक्ति रूप भावों धारण कर लेता वह सुख पाता हुआ
दिखाई देगा, जो पापों रूप कर्म का कर्ता, वह कभी सुखी? रह ही नहीं सकता यह कथन
भी सत्य।
दया का भाव प्रत्येक मानव में ही नहीं बल्कि संसार के हर जीव मात्र प्रति
हो, दया का भाव यदि मन में नहीं बन रहा हो, दया के नाम मात्र से भी नहीं रहा हो, कोई भी
कार्य दया से युक्त नहीं कर रहे हों अनाचार रूप ही आचरण हो, जिसे तन मन धन
द्वारा भी किसी प्राणी को कष्ट पहुंचे या सताया गया उस समय किए जाने वाले कर्म
अवश्य भयानक ही फल के भागीदार होंगे।
दया स्वभाव ही आत्मा स्वरूप, आत्मा को समझना दया का अपनाना ही
आत्मभाव का ही अपना रूप, आत्मा ही, ज्ञान--दर्शन सुख--वीर्य का धारी ही
आत्मभाव का रूप है।
दया स्वभाव धारण अपनाना, त्याग अपनाना, तप का ही अपनाना ही
आत्मा का रूप होगा, पर-भव को सदा भव्य रूप से ही बना लो, भव्य ही वही
जो जीव, भव्य ही भव-भवन्तरों का सुधारने का रूप, मन को अपने वशी भूत
ही रख सदा भव्य रूप बन सकेगा, अनाचार विषय के रूप रस गंध को, त्याग कर
सदा ज्ञान रूप बन कर आत्म रूप को ही पा लो यह मन भी, कभी कषाय
भावों अनाचार का रूप बन ही नहीं रहा हो तो आत्मा भव्य ही होगा, पर भव
सुधर अनाचार के हर रूप का निवारण कर लेगा।
संयम रूपी नौ, जो संसार के भ्रमण से पार कर मोक्ष रूप तट-बंध तक ले
जाने का काम करती संयम को सदा मन वचन काया द्वारा भव्य ही जीव-भव भव्य
बनने का काम करता यह कभी संयम कर्म के कारण ही आत्मा पर से भारी, पाप
रूपी, अशुद्ध भावों का रूप नष्ट हो सकता ही अशुद्ध विचारों का त्याग, जो
मानव संयम धारण कर उस भाव रूप संयम करता रहे, उसी रूप ही कर्मों नाश
संभव बना ही रहे! जो भव्य रूप के साक्षात ज्ञान प्राप्त अध्यात्म का रूप, पाप-
रूप कर्म-पुद्गल को भस्म करने में जो अनाहत आवाज स्वरूप ही ज्ञान
के प्रकाश से प्रकाश के प्रकाश का नाश ही सदा ही होगा, जो उस रूप केवल
स्वरूप ज्ञान है।
आत्मस्वरूप धारण जिसने सदा किया अनाहत ज्ञान प्रगट ही सदा रहा
जान लो, वह जीव सदा केवल ज्ञान ही सदा पाता रहेगा, संसार का नाश रूप
ही, ज्ञान स्वरूपता से ही प्रकाश रूप ज्ञान ज्योति सदा बनी ही रहती।
अतः, विषय वासना विकट भाव रूप जो दुर्धर विपाक रूपी कर्म के कारण विकट
अनाचारों उत्पन्न ही सदा रहा आत्मा को, संसार रूपी सागर कभी शांत नहीं रहा
या शांत हो भी कैसे जब अनाचार का रूप संसार को जब तक मिटाया न गया हो
जन्म मरण का भाव सदा संसार ही सदा संसार का स्वभाव ही विकार रूप रहेगा,
जिसे ही नष्ट ज्ञान रूप ही से किया गया, जो सहज शांत
केवल प्रकाश का रूप सदा आत्मा में ही सदा प्रकाश रूप से बन कर
सदा आत्मभाव सदा ही ही अनाहत ज्ञान प्रगट हो भव-भव दुखों का नाश कर
ही तो रहा रूप है।
या जो? केवल ज्ञान-रूप ज्ञान सदा ही बन रहा हो तो उस जीव का ही
मोक्ष का मार्ग बन रहा, जो भव-भवन्तरों का नाश कर ही डी.एस.जैन का यह
कथन ही ज्ञान रूप बन सदा भव्य जीव को ही व उस ज्ञान भाव रूप बन कर,
संसार के जन्म मरण कष्ट को सदा ही दूर कर देगा।
वो भव्य जीव! संसार के बंधनों से तो दूर रहता ही भव्य स्वरूप सदा
आत्मा के ही ही रूप सदा बना रहेगा प्रत्येक ज्ञानी आत्मा का ही तो ज्ञान
स्वरूप कहा जो हमेशा साक्षात रूप बन ही तो ज्ञान रूप स्वरूप प्रकाश करता
ही अनाहत--प्रकाश का नाम, जिसे रूप ही आत्मा रूप से बन सदा भव्य ही
रूप बनता रहे? आत्मा स्वरूप ही तो सदा भव्य रहेगा? आत्मा स्वरूप ही ही
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