माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि इस पर सब लोग ध्यान देते अथवा नहिन किन्तु यदि कोई इस बात पर चेत करेके देखे,
तोभी बहुत कठिन
कि जब सब के सब मनुष्य दुराचारिता ही के काम को करेंगे व मत के काम कोई
नहिं मानेंगे और किसी प्रकार की हानि वा दुःख किसी को नहिं होगा तब वे कहेंगे
कि मत के काम से वा ईश्वर के भजन से क्या प्रयोजन व्यभिचार आदि काम सब ही के मत
में बडे पाप हैं, जैसे कि चोरी वा हत्या है, सो जब ईश्वर इस पाप का कुछ दण्ड
नहीं देता तो हम भी इस पाप को क्यों छोडे जिस से सब प्रकार का सुख होता है
सो ऐसा न समझना कि ईश्वर कुछ नहीं देखता वह सब कुछ देखता है, क्योंकि वह
सब कुछ जानता है सब के कर्मों को, तो वह नित्य न्याय करने वाला भी है,
दण्ड भी देगा! सो ऐसा न हो जाय कि तुम परमेश्वर के न्याय को भूल जाओ
व्यभिचार रूपी अन्धे-कूप में पडे रहो और उस से फिर कोई रक्षा न कर सके
इस के सिवाय, व्यभिचार का दृष्टान्त रूपी सत्य न्याय अन्धे-कूप जैसा होता
कि जिस में कोई गिर पडे तो वह उस कूप रूपी गढ़े में सुख-रूप अपने को
ही जाने तथा कभी भी उस से निकल न सके और यदि कोई, सत्य ज्ञान-रूपी
पुरुष आवे और उस को उस कूप से निकाले भी, तथापि वह उस की, बात
को न सुने वा न ही उस उत्तम पुरुष को जाने कि जो उस का मित्र है वा
सुख का
दाता पर-मेश्वर सब को उत्तम ज्ञान का देने हारा तथा सब का सब से बडा
सच्चा मित्र वा हित का करने वाला है उस व्यभिचारी को अनेक रीति से ज्ञान भी
देता है तथा उस के पापों की रक्षा का उपाय भी करता है और सब प्रकार से सुख
भी देता है परन्तु वह अन्धा उस ज्ञान को सत्य नहीं मानता जो सत्य मार्ग को बतलावे,
जैसा कि कोई अन्धे को कूप से बाहर ले जाने के लिये उस का हाथ पकड-कर ले चलना
चाहे परन्तु अन्धा उस का साथ न देवे और उस से छूट कर फिर अन्धे-कूप
में गिर पडे वा उस को ही लाठी-डण्डा मार-कर भगा देवे, तब वह अन्धा
कूप ही में रहे! ईश्वर का यह स्वभाव, सत्य दयालुता किसी के मुख को देखि के नहीं,
किन्तु सबों ऊपर एक महा-कृपा रूपी सत्य न्याय से सब का पालन करता है वा
सब का उपदेशक भी है इस लिये वह सब के आचरणों को देखता हुआ सब को
उस के आचरण के अनुकूल फल देता है! निश्चय जानो!
क्या जो कान, को बनाता क्या नहीं सुनता?
क्या वह, जिस ने सब को रचा सब का कर्ता है सो सब के पापों
को नहीं जानता? क्या जो अज्ञान से ज्ञानवान् करे सो अपने को अज्ञान रखेगा
अर्थात् कभी नहीं, कभी ऐसा न समझना कि ईश्वर अन्धा वा बहरा वा मूर्ख
है सो उस परमेश्वर के साथ धूर्तता रूपी व्यभिचार के काम को करके मत छिपो
क्योंकि यह, पर-पुरुषगामी स्त्री तथा पर-स्त्रीगामी पुरुष को नित्य एक
महा भयानक अन्धा कूप जिस का नाम नरक वा नरकाग्नि है उस में
निरन्तर के लिये वास करने को पडेगा तथा इस न्याय से कभी न छूटेगा
क्योंकि, वह ईश्वर का शत्रु है, सो ईश्वर के वचन के अनुकूल नरक में कष्ट
भोगने के लिये जन्म लेता है॥
सो हे, मेरे प्यारे मनुष्यो तुम सब लोग ऐसा मत करो किन्तु परमेश्वर
को जो सब का साक्षी तथा अन्तर्यामी न्याय करने वाला दयालु, सब से बडा राजा
सब का उत्पत्तिकर्ता है अपने मन के अग्रे सदा उपस्थित रखो और उस के भय
को नित्य रखो, सो जो उस की आज्ञा रूपी परम धर्म को तोड कर व्यभिचार रूपी
पर-स्त्रीगामी अथवा पराये धन की अभिलाषा के कुकर्म रूपी अन्धे कूप में
गिरेंगे वे अवश्य नरक, में गिरेंगे, कभी बच नहीं सकते क्योंकि वह सर्व-शक्तिमान्
के आगे कोई बलवान् वा ज्ञानी नहीं ठहर सकता और ज्ञान-रूपी बल से उस के
न्याय को कोई नहीं बदल सकता सो उस के भय में सदा रह कर व्यभिचार रूपी
दुर्गुणों से सदा बचो जिस से परमेश्वर के न्याय से बच कर नित्य आनन्द भोगो॥
ईश्वर के इस न्याय तथा, दयालुता को विचार कर मनुष्य को
सब-प्रकार से, सत्य-ज्ञान का यत्न सदा करना योग्य है जिस से ईश्वर प्रसन्न
हो, सो उस परमेश्वर की कृपा से जो यह पुस्तक व्यभिचार के निषेध के अर्थ बनाई,
सो इस को अवश्य पढ कर, प्रत्येक नर वा नारी को अपने तथा अन्य पुरुषों
को उपदेश करना चाहिये, जिस से इस संसार में सुख तथा सत्य का मार्ग खुले
वा ईश्वर का भजन व उस का भय सब के हृदय में स्थिर हो कर मुक्ति को प्राप्त होवे॥
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