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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 154 में से

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चोट का नाम सुनते सुनते सब को कादम्बरीके स्मरण का बड़ा भय लगा और महाश्वेता मारे शोकके गिर
पड़ती थी, रोती! बड़े कष्टसेउसने मन को धीर करके रोना छोड़ा
चन्द्रापीड़ कहने लगा, सुनो प्रिये, सुनो सब लोग! महाश्वेता को शाप देकर उसने जब
दूसरा शरीर धरा तो यह चन्द्रापीड़ भी मर गया था पर इसका रूप ऐसा नहीं बदला था, बल्कि
तन पर कान्ति बची, कांति का रूप ऐसा दिव्य था जिसके बलसे इस का शरीर अब तक बना रहा।
सब को भय था कि--इस प्रकार रूप का नाश न, किसी का जीव लौट सकता--इस विचार
सब शोक को छोड़ कर बैठे, आगे को देख कर जो कुछ हुआ सो सब वृत्तान्त ऊपर कह चुका हूँ।
केवल यह, केवल यह, जो कुछ भी इस देह बारे कहूं थोड़ा क्योंकि जब इसके शरीर छूटे तो
सुख का रूप बना व कान्ति का प्रकाश इस प्रकार था, कि उस देहने सब को फिर जीवन
किया था।
इसके पर सब के सब जो इस बात को सुनते विस्मय में आ रहे थे, तारापीड़ बड़े
स्नेह और विस्मयके प्रभाव बड़े ही प्रेम से कादम्बरीको देख कर उस को छाती से लगाया
विलासवती ने प्रेम से पुत्र की माता को गले से लगा कर, प्यार कर के उस को
मुख बार बार चूमा। महाश्वेता ने पूछा कि क्या यह सच है? चन्द्रापीड़ ने कहा,
यह सब सच है। रानी जी, सच तो यही व इससे अधिक आश्चर्य यह बात हुई। पुण्डरीक
भी लौट कर फिर आ गया है, पर उस को कपिंजल अभी रोके, केवल यह दिखलाने
लिये गया हैकि उन के पिता श्वेतकेतु अपनी तपस्याके प्रभाव से दोनों कुमारों सहित यह सब
सुख देखें, जिस से उन का चित्त प्रसन्न हो।इस से चन्द्रमा का रूप पहले चन्द्रापीड़ फिर
उसी प्रकार हुआ।
दोनों ओरके चारों महाजनों सहित सब को बड़ा आनन्द हुआ और उस बात के होते
ही, तारापीड़ ने उस बड़े भारी दलको चलने कीआज्ञा दी।वे लोग सब आदर से चले।
चन्द्रापीड़ ने जब तक वहां का काम देखा तब तक अछोद सरोवरपर ठहरा। वहां
रुकनेपर, तारापीड़ ने तारापीड़ के आज्ञाकारी को आज्ञाकारी दल की बात कही
सब लोग वहां से चल कर, राजा तारापीड़ के पीछे के लोग, सब तारापीड़ के
साथ ही साथ चले। बाकी के लोगों ने जो कुछ कहा था सो सब ठीक हुआ, राजा
तारापीड़ को यह सब सुख उज्जैनी नगरमें, उन दिनों मिला जब कि वे लोग सब--
बात वहां कह कर अपने सुखका दम लेचुके, तारापीड़ के साथ सब लोग उन के--नगर
पहुंच गये। तारापीड़ ने उज्जैनी नगरमें पहुंचकर जो आनन्द देखा
कादम्बरी के मन मेंआया कि, रानी तो यह बात जान-बूझ कर पूछती हैं? शुकनास
मन्त्री हैं? राजा जी देवता? स्वयं राजा विलासी हैं? रानी मनोरमा माता हैं? रानी
की आज्ञा कैसी?
उसने कहा, किससे? सब तारापीड़ के चरणों प्रणाम करतीहूं, जिस तरह
आज्ञाकरेंगे, वैसा सब लोग करेंगे।
चन्द्रापीड़ ने कहा, तू कैसी बात?
उसने कहा तूतो सब जानतीहै किइन सब के आगे लज्जा उत्पन्न होती
है। इसी तरह सब के आगे बात करने को लज्जा आती है, फिर तारापीड़ और उन
की, रानी के आगे यह बात कहना, कि मैं विवाह कराती हूं? सब को मालूम
ही सब को इस बात कीलाज आतीहै, केवल तुझेही, केवल को छोड़ कर।
कादम्बरी कहने लगी बात सुनो, क्यों ना होवे? जब सब लोग ही आ रहे
हैं, तारापीड़ को छोड़ कर कोई न रहा, राजा लोग भी सब हैं, तो विलासवती
का मनसब सब को बुलाने लगा। फिर तारापीड़ ने रानी को कहा कि जब सब लोग
आवेगे तब न? तारापीड़ राजा ने कहा कि, राजा लोग सब आये हैं। क्या कोई
न? तारापीड़ ने सब बात की आज्ञा दी, जिस प्रकार से सब का आदर हुआ,
रानी तारा के मन में बात आईकि तारापीड़ ने सब बात कह दी। अब विवाह
न? तारापीड़ ने सिर झुका कर कहा कि हां क्यों न? तारापीड़ के मन आदर भरा
थाकि यह सब क्यों न? सब लोग अपने अपने काम में लगे थे, राजा लोग
खड़े रहे थे, किसी किसीने काम कर दिया।
इसके पर ही सब लोग आ कर उस सुख--स्थान बैठे! जिस को
देखकर सब प्रसन्न व सुखी, राजा लोग! रानी लोग सब बैठे।
रानी तारापीडने कहा कि, आज सब को इस बात का आनन्द हुआ जिस कावर्णन
लोग कर ही सकते थे, आज हम को इस बात का ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ
जिस का नाम सुनकर स्वर्ग भी हार गया।सब लोग प्रसन्न होकर उस के गुणको गाने लगे।
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