माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचारो अगर अपने भीतर करो, तो पाप सब मिट जायं गे, जो समझ लो प्रभु नाम को, तो मुक्ति पद
मिल जाय गा। सब जीवों को सुख-दुख अपने कर्मों से मिलता है। कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता और
न बना सकता।
फिर भी संसार के लोग, जो कर्मों के प्रभाव--का रहस्य नहीं जानते हैं वे? अमुक
मेरा शत्रु है और अमुक मित्र है?
जो हो गया उसको, भूतकाल को, वर्तमान काल विचार से देखना चाहिये।
भूतकाल में, वर्तमान काल में अनेक बार दुख-सुख मिले हैं और मिलते रहेंगे। यह
कर्मों का फल है। पाप-पुण्य का फल मिला।
इस अवसर को पाकर जो कोई शुभ और अशुभ के स्वरूप को समझ लेता है; वह हमेशा
के लिये मुक्त हो जाता है। जो कर्मों के कारण सुख दुख को जान कर सन्तोष धारण करता है? अपने
को कर्त्ता मानकर न राग और द्वेष को बढ़ाता है। पाप-पुण्य सब कर्मों के फल हैं? पाप-पुण्य आत्मा
के नहीं हैं।
आत्मा तो ज्ञाता और दृष्टा है, दृष्टापन से, ज्ञातापन से, आत्मा अपने
को ही देखता हुआ सब जीवों को, आत्मिक सुख का दान दे सकता है।
इसलिये हे भव्यजीवों! इस अवसर को व्यर्थ मत जाने दो। मनुष्य जन्म,
उत्तम कुल, जैनधर्म का संयोग पा कर अगर हम आत्म-कल्याण नहीं
कर सके तो कब करेंगे, जिससे फिर यह नर जन्म, यह सब उत्तम सामग्री फिर मिल सके;
यह अवसर मिला है। इसलिये इस दुर्लभ अवसर को पाकर, आत्महित में लगो,
स्वाध्याय में लगो, तत्वज्ञान में लगो, संयम में लगो, तपस्या में
लगो, सामायिक, ध्यान में लगकर इस नर जन्म को सफल करो। इस दुर्लभ अवसर को पा
कर अगर प्रमाद में ही काल गंवा दोगे तो फिर पछताओगे और रोओगे। नर पर्याय
पाकर भी जो धर्म साधन नहीं कर सकता वह नरक और निगोद में भटकता रहेगा,
तिर्यंचों से भी गया बीता, जो अपने आत्म कल्याण में नहीं लग
सकता। मनुष्य होकर भी जो पाप करता रहेगा नरक में ही जायेगा इसलिये नर जन्म
का सदुपयोग करो और धर्म में लगो!
इस प्रकार से श्री जिन मंदिर में धर्मोपदेश सुनकर सब लोग अपने अपने
घरों को चले गये। सेठ जी वहीं सामायिक, आत्म-ध्यानावस्थित, विचार में
लीन, ध्यान-मग्न, विचार में लीन हो गये, ऐसा ध्यान लगा कि
सब कुछ भूल गये। घर का मोह ममता सब छूट गया, मन में विचार ही रहा
कि संसार स्वार्थमय है। कोई किसी का नहीं, सब अपने स्वार्थ
के साथी हैं। इसलिये इस संसार को छोड़ कर जाना चाहिये, इस संसार से मुक्ति
का उपाय करना चाहिये।
मैं कब मुक्ति लाभ करूं?
मैं कब मुनि बनकर वन में जा कर तपस्या करके...
संसार के व्यवहार, प्रपंचों से अलग रहूं। संसार की तृष्णा मिटाने
का उपाय करूं। संसार में जितने सम्बन्ध हैं उनसे सर्व प्रकार विरक्त होकर अपने
स्वरूप में लीन होऊं। मैं कब ऐसा विचार करता हुआ, अपने को सब बंधनों से छुड़ा सकूंगा।
मैं कब संयमी होकर संयम का पालन कर सकूंगा? कब दिगम्बर दीक्षा लेकर, वन में
रह कर अपने को शुद्ध करूंगा। हे भगवन्, मुझ पर दया करो।
कब ऐसा दिन आयेगा कि जब, मैं गृहस्थी के बन्धनों से मुक्त
होऊं? संसार के विषय भोगों को त्याग कर अपने आत्म स्वरूप का लाभ
प्राप्त कर सकूं, यह विचार करते-करते सेठ जी सो गये?
दूसरे दिन प्रातःकाल उठ कर सेठ जी ने नित्यकर्म से निवृत्त होकर
सामायिक में समय व्यतीत किया, सेठ जी वैराग्य-भावित, अपने को
संसार से सर्वथा विरक्त अनुभव कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि घर,
परिवार, धन-सम्पत्ति सब कुछ जलता हुआ दिखाई दे रहा था। उनका
मन उद्विग्न हो उठा और वे कहने लगे, हे भगवान्! मुझ पर दया करो!
इस बन्धन से कब मुक्त हो सकूंगा?
इस प्रकार विचार करते हुए सेठ जी का चित्त घर से उचट गया।
वह हर समय वैराग्य-भावनाओं में लीन रहने लगे।
आत्मा के विचार में अपना समय व्यतीत करने लगे। संसार के काम-काज में
उनकी वृत्ति नहीं रही। सेठ जी का ऐसा परिवर्तन देख कर सेठानी चिन्तित हुई, और वे
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