एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पंचम अध्याय/सूत्र क्र. 20-21
ॐ नमः सिद्धम्
सर्वार्थसिद्धि
पंचम अध्याय/सूत्र क्र. 20-21
सूत्र 20
जीवो नाम चैतन्य रूप वस्तु सर्वदा चेतना गुणकौं धारक
रूप स्पर्श रस गंध रहित है स्वभाव रूप अरु स्पर्श
गंधादि पुद्गल रूप है ताकौं यह जीव पुद्गल के संबंध
करि नाना प्रकार जानि तन्मय होय सुख दुख कौं अनुभवै
इस जीव को यह सुख "दुःख" पुद्गल द्वारा उपजाया
सूत्र 21
जीव और पर रूप पुद्गल के जो परस्पर उपकार कहे
तिनकौं परस्परोपग्राही जीव कहा सो जीव कौं अजीव
अरु अजीव कौं जीव उपकार करै है यह बात प्रत्यक्ष में प्रमाण
परस्पर एक कार्य परस्पर तैं सिद्ध होय तैसे स्वामी
सेवक परस्पर उपकार सहित जीवैं स्वामी द्रव्य करि
सेवक का उपकार करै सेवक सेवा करि स्वामी
का तै भला उपकार करै सोई स्वामी सेवक कहलावे
स्वामी तैं जीवै सेवक तैं स्वामी द्रव्य पावै
ऐसे प्रमाण तैं सिद्ध होय स्वामी तैं सेवक
का भला सेवक तै स्वामी का भला सिद्ध
इस तरह एक एक परस्पर तैं काम निकसै
"जीव" जीव को सुख देवे पर जीव को
पर उपकार करे उपकार यहि तैं यह सिद्धांत
"जीव" तैं पर का भला पर तैं जीव तैं सिद्ध
जिस प्रकार स्वामी और सेवक एक दूसरेके काम आते, उपकार पर उपकार करे, सो तो,
प्रत्यक्ष ही सब को मान्य है, इसी से यह प्रत्यक्ष प्रमाण हुआ कि परस्पर उपकार होता है,
पर सो तो सब जगह ऐसा देखनें में नहीं आता, कहीं ऐसा भी देखाजाता है स्वामी
सेवकको भूखा मारता है, और जो देता भी, सोभी काम लेकरके पेटभर पेट नहीं देता,
सब ही काम पुरा लेकर भी पेट भरके आहारिक नहीं देता।
जो ऐसा भी स्वामि सेवकके परस्पर उपकार में कोई कहे कि यह बात तो न बनी,
तिस को उत्तर यह, कि जो ऐसा परस्पर में एक दूसरे को काम आकर उपकार नहीं
करे, वह तो न स्वामी, न ही सेवक कहा जा कर परस्पर का प्रमाण घटाया जा
सकता है सो स्वामि सेवक के दृष्टांत में इस वात का भी ज्ञान हो गया कि उपकार
एक दूसरेका काम सो ही है कि जो परस्पर उपकार का भाव रख कर एक दूसरे
परस्पर को सुख देने का भाव रक्खें सो उपकार भाव कहा गया है सो ऐसा ही
उपकार एक दूसरे जीवों का आपस में होना चाहिये।
सो तो हो सकता भला पर जहां ऐसा न हो अर्थात् एक दूसरेको दुःख देता होय
सो ऐसा तो सब ही प्रत्यक्ष प्रमाण बना ही रहता, तो फिर तो सिद्धांत ही गलत
ठहर जावेगा क्यों कि यहां तो परस्पर उपकार जीवोंका लिखा सो, तिस का उत्तर
ऐसा है कि जहां कोई जीव एक दूसरे को दुःख पहुंचाता वह अपने ही कर्मके उदय
वश ऐसा उपद्रव उस पर कर रहा है, तिस से उसका कोई संबंध
जीवके परस्पर के भाव रूप न समझना चाहिये सो यह तो कर्म सिद्धांत
पर बात आवेगी
परस्पर उपकारियों में तो एक दूसरे जीव का यह काम होना चाहिये कि धर्म,
के काम में, उप देश देवे परस्पर में एक दूसरे को धर्म की बात कहे! कि कोई
धर्म का विरोधी नित्य विपरीत न हो जाय सो ऐसा ही उपकार का प्रयोजन यहां
लिखा सो भी, जीव जीव के उपकारार्थ! समझ कर यह काम करे? जिससे कि
संसार के सब प्राणी एक दूसरेके उपकारार्थ हो सकें, इसीलिये जीवों
का उपकार, जीव परस्पर कर ही सकते
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विचारवान् पुरुष को अधिकार का त्याग व्यर्थ, विवशता समझ कर ही नहीं
स्वीकार कर लेना पड़ा, वरन् उसने इस बात को भी भली भांति समझ, जो कि सच थी,
पराक्रम और पुरुषार्थ दोनों जिसके स्वरूप में ही समाये हुए हैं क्या? विवेक को
इससे अलग है? पराक्रम क्या है? मात्र उद्दण्डता है? केवल हठधर्मिता का नाम ही
शक्ति स्वरूप कहा गया? उस उद्दण्ड, उस विवेक, उस हठ को धर्म का रूप दे कर
जो रूप संस्थापित हो वह विचारवान् को तो कभी मान्य नहीं होगा, जिसे सब धर्म
का, पुरुषार्थ का?
विकास के लिए किस प्रकार विचारवान् को इस बात स्वरूप देखना पड़ा हो होगा? इसे कोई
चाहे तो विवेक या पुरुषार्थ का रूप कह कर इसकी प्रशंसा कर सकता हो या निन्दा
कर इसे भय स्वरूप ही कह कर देखे, विचार तो इन सब बातों से, विशेष कर इस
बात को, जिसे हम भी समझ रहे; यह कि इस महा-त्याग के रूप में ही धर्म
रक्षा, समाज रक्षा का मार्ग है; इस सब को त्याग--के रूप में ही ग्रहण कर उस
समय, विचारवान् ने जो कहा था, "विचार करो!" वह आज का भी विचार बन कर आज
भी "विचार करो" के द्वारा अपनी स्थिति को तो कर रहा है, जिसे सब सब को आज
पुरुषार्थ का रूप देना
जिसे सब धर्म? सब विचारवान् के इस रूप में, जिसे विचारवान् रूप में
संस्थापित किया जा कर जिस रूप में रखा जा सकता था जिसे सब स्वीकार कर सके
जिस से सब लाभ उठा सके ऐसा रूप दिया जा सके सका हो, न कि केवल त्याग का
स्वरूप विकास कर ही पुरुषार्थ का स्वरूप बनाया जा सके जो फिर सब काल सब
व्यक्तियों के लिए, उन के सब रूपों के लिए, उन सब को पुरुषार्थवान् रूप में
ही सब संस्थापित हो, जिस से धर्म रूप
आज, समाज, विचार के इस रूप स्वरूप विकास स्वरूप रूप में नहीं
रूप में कहा जा रहा हो कि इस रूप में तो त्याग करने वाले को ही स्थान मिले
वरन् इस रूप में कि वह रूप सब को, अपनी शक्ति अनुसार त्याग का भी रूप दे
सके और इस रूप में पुरुषार्थ का रूप भी दे सके जिससे विकास रूप में वह समाया
रहे। आज, जो भी धर्म या विवेक का रूप इस स्वरूप में तो स्वीकार हो सकता
लेकिन, जो यह रूप पुरुषार्थ का तो भी इसका फल-तो मिलता ही था, जो-जो रूप
दिया, सो तो भला अपने विकास रूप में दिया हो पुरुषार्थ का व्यक्तिगत रूप भले
प्रकार दिया।
पुरुषार्थ विकास का विवेक के साथ ऐसा स्वरूप संस्थापित हुआ था
जिस से, जो रूप में सब को देखना न पड़ा, जिसके विकास का रूप इस रूप
में ही, विशेष-रूप दिखाई पड़े, जिस रूप को सब देख सकें, सो यह
रूप तो केवल त्याग-मात्र स्वरूप रूप का ही रहा, इसका दूसरा स्वरूप क्या?
सब काल सब को धर्म का विवेक रूप ही तो हो सकता--जिस बात को विचार
ने समझाया था, उस का रूप ही यह
प्रकार के रूप का यह स्वरूप भी तो सब पुरुषार्थ का एक रूप था,
जो केवल उस रूप तक पुरुषार्थ रहा, उस से समाज और विवेक को ही
रूप मिला जिस रूप स्वरूप को आज तक स्वीकार किया जा रहा था जिसे सब
लोग सब रूप में जिस रूप में देखा गया था, समाज इसे किस तरह स्वीकार
कर सका जब कि समाज रूप में तो इस तरह नहीं था, उस से आगे भी, जो
रूप था वह केवल संन्यास का रूप नहीं था, जिस में केवल त्याग था,
वह पुरुषार्थ स्वरूप न रहा, उस रूप में, उस स्वरूप तक सब को समाज ने देखा
रूप में जिस रूप में इस विवेक रूप रूप में समाज के स्वरूप को देखा, सो
वह रूप संस्थापित संस्थापना तक ही, समाज रूप न केवल ही स्वरूप अथवा
शक्ति के रूप में ही नहीं समाज रूप को सब तरह स्वरूप में ही समझा
गया रहा होगा ही, महा-दान स्वरूप के रूप में, उस बात तक समाज विवेक के
उस रूप तक स्वरूप रूप ज्ञान-दान स्वरूप किया गया, जिसे धर्म का
पुरुषार्थ रूप रहा
इस पुरुषार्थ रूप को विवेक का जो रूप स्वरूप कहा गया वह उस
रूप में दिया गया, जिसे त्याग का, सो विवेक रूप तक पुरुषार्थ का रूप था, सो
विवेक का वह स्वरूप तो रूप में जिस रूप संस्थापना स्वरूप के रूप में समझा,
सो रूप स्वरूप रूप में ही उस का विवेक स्वरूप रहा, सो रूप केवल उस
रूप तक ही ही नहीं समझा गया रूप में जिस के रूप में, उस विवेक को
समाज उस रूप रूप में जान रहा
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128
तब वह बालक निराश होकर रोने लगा। निश्चय ही किसी बात आवश्यकता होने योग्य यह जीव रोता,
चिल्ला उठता होगा और वह समझना माता का काम था और यह काम पूर्ण
कर देती होगी। अचरजभरे कौतुक भरी दृष्टि लेकर बालक नवीन दृष्टि से देखता होगा
पश्चात्ताप भरा हृदय उसका पिघल उठा, आँखों से बहते दो अश्रुओं द्वारा पिघले हुए हृदय
निकला हो, उसका सारा हृदय रो रहा विवश-विवश था, केवल दो अश्रुओं द्वारा
पश्चात्ताप का स्वरूप और नहीं था। वियोग-वेदना तड़फते बालक को देखा तो, वह पिघल कर
स्वयं जल होकर बह जाने योग्य हुआ।
निश्चय हुआ, प्राण पश्चात्ताप को ही आधार पर जीतकर जीवित रखने का उपाय ढूंढ
निकालने योग्य हुआ था कि पश्चात्ताप स्वरूप के भय से ही जीवन का उपाय ही ढूँढ़ा
सकेगा।
"आज दिन-रात का विचार ही समाप्त करना पड़ा फिर भी नहीं, यह केवल दो दिनों
की बात नहीं यह बात नहीं पश्चात्ताप फिर जन्म के लिए आधार बनाकर, उस आधार पर ही
उस पापी को फिर नया जन्म फिर जन्म के लिए जीवित रहकर जीने की ओर ले जाए, तब तक
जब तक पश्चात्ताप हो, पश्चात भी बात का विचार ही ना करना पड़े।"
इसी विचार साथ प्राण को ऊपर उठना पड़ा फिर आधार ढूँढ़ते
हुए बालक को एक बार फिर देखना था कि उसकी
बात पूरी तरह समझ में आए फिर प्राण ऊपर से देखता
"बालक यह बात तो...।"
वह बालक शांत होकर पश्चात्ताप की स्थिति से इस संसार को
अपनी स्थिति से देख रहा था। उसके प्राण में ऐसी ही स्थिति
उत्पन्न हुई थी कि वह भी इस बात को समझ रहा था, जिस बात को प्राण
खुद सोच रहा।
केवल वाणी से ही सम्भव हो सका था बोलना, यह तो सब जानते थे! पर
वाणी का प्रभाव उस समय तक संभव हो सका था जब तक वाणी बोलने वाले
बात स्वयं तक सीमित थी। इस समय वाणी से बोलने की आवश्यकता थी ही नहीं
केवल वाणी भाव से सम्भव हो सकती थी। उस समय वाणी केवल भाव को
प्रकट करने का साधन थी, पर वाणी वाणी से परे, केवल
शब्द ही सब कुछ सम्भव कर देता था बात, वाणी; फिर यह तो सम्भव
ही नहीं था, पर; केवल वाणी वाणी से परे वाणी का प्रभाव सब
ओर दिखाई दे रहा था। वाणी, जो वाणी रूप में सब प्रकार
वाणी का ही प्रभाव सब पर असर कर रहा था। वाणी का ही प्रभाव था,
जब वाणी का प्रभाव था, तो इस प्रकार वाणी, इस से पूर्व नहीं थी,
पर वाणी का प्रभाव ही सब पर असर कर रहा था। वाणी का प्रभाव
केवल ही ही हो सकता था पश्चात्ताप वाणी रूप में नहीं था, वाणी-
वाणी ही ही था केवल पश्चात्ताप ही वाणी के रूप में सामने था।
उस बालक के मुख से कुछ शब्द बोलने के ढंग से नहीं पर केवल अश्रु गिरते
देखकर प्राण समझ ही रहे थे। बालक अपनी बात को कह नहीं सकता था पर
बालक के मन पश्चात्ताप का भाव जीवित था। प्राण समझ चुके थे बालक
को सब कुछ समझ हो, उस समय जब प्राण ने बालक के मुख की ओर देखा
बालक का मुख रोने लगा था। बालक के मुख को देखकर
बालक का स्वभाव ऐसा था, जिससे! पश्चात्ताप से ग्रस्त हो, बालक शांत
होना था, जिससे! बालक को शांत था, जिससे वह शांत भी हो रहा था, पर वह
स्वयं ही रो पड़ा था, उस बालक के मुख को देख, प्राणों के पश्चात्ताप का
अब पश्चात्ताप का कारण ही नहीं था। पश्चात्ताप सब कुछ था, सब
कुछ हो चुका था? पश्चात्ताप सम्भव था? पर सब तो समाप्त होने ही वाला था!
पर प्राण को जब इस बात का अहसास हुआ कि प्राण शांत होने लगा है, तब प्राण
शांत हो जाने से पहले एक बार फिर देखना चाहता था कि बालक किस
तरह बालक की ओर देखा और बालक के मुख की ओर देख
इस तरह पश्चात्ताप के भाव को इस ढंग से प्रकट करने से प्राण का
बालक की ओर से ध्यान हट कर स्वयं पश्चात्ताप करने लगा और स्वयं ही
केवल इतना "विश्वास था" कि यह स्वयं सब समाप्त होने
इस बात से स्पष्ट है, पश्चात्ताप का स्वरूप ऐसा ही था कि वह अपनी
पराकाष्ठा को पार करके विवश हो गया था। पश्चात्ताप ही सब कुछ था,
पश्चात्ताप केवल उस बालक के मुख से नहीं बल्कि पश्चात्ताप तो सब ओर फैला
129
विचार करूँ उसका फल अच्छा हो, परिणाम भी अच्छा हो, उसका आदर तो करना ही
होगा और विचार करूँ उसका फल बुरा हो-कुत्सित फल मिले वैसा विचार त्यागने
न ही तो आत्मा का हित होगा, आत्मा, मन, बुद्धि, शरीरा, इन्द्रिय सब ही शुद्ध हो
जाते और परिणाम जिसका फल बुरा होगा उसका फल भी बुरा होगा आत्मा
उसका तो भोग करेगा आत्मा न भी, सो भला-बुरा विचार सोचो कैसा होगा
विचार किया मन से सम्यक्त्व पहले मन विचार ही मन का काम करता
होगा, विचार मन कर रहा था मन मन मन आत्मा देखता होगा मन का परिणाम
आत्मा जाने मन का विचार सम्यक्त्व रूप हो अथवा मिथ्या रूप मन का जो विचार
हो, परिणाम तो सम्यक्त्व पहले होगा मन का काम ही करेगा
ऐसा विचार मन विचार करता था, सो ऐसा कर्म-प्रतिपक्ष काम सब किया
सो कर्म आत्मा सब क्षयोपशम राग-द्वेष को नाश विचार का फल न हो तो फल
किसका हो गया? विचार किया सो आत्मा मिथ्या छूटा, अब सो आत्मा का फल
मिलना सो, सो आत्मा स्वयं मन विचार को देखता ही रहा मन का काम, आत्मा
को उस फल आत्मा का फल तो अब सम्यक्त्व ज्ञान रूप सम्यक्दर्शन,
सम्यग्ज्ञान न हो सो, सो अब आत्मा का सम्यक्त्व राग-द्वेष क्षयोपशमपूर्वक
सो गया, सम्यग्दर्शन सो हुआ
सम्यक्त्व विचार रूप से सम्यक्त्व विचार रूप हो जाता है, सो विचार जो
हो सो सो कर्म-प्रकृति उपशम को हो सो सो कर्म-प्रकृति उदय को बंद
रहा सो सो काम सो काम सो हुआ, सो विचार कर्म का विचार सो सो बंदा सो
कर्म उदय मिटा, सो सो फल आत्मा को बंदा सो, सो फल उदय से मिटा
सम्यक्त्व विचार का फल हुआ? फल-सिद्धि सो, सो आत्मा का फल क्या हुआ?
अब फल आत्मा रूप फल हुआ ऐसा सो आत्मा का विचार आत्मा ही को बंद
आत्मा रूप फल सम्यक्त्व ज्ञान रूप आत्मा न हो तो सम्यक्त्व
राग-द्वेष कर्म मिटा? आत्मा, आत्मा, सम्यक्त्व रूप आत्मा काम रूप न बंद
सब ही आत्मा रूप आत्मा राग-द्वेष को समन स्वरूप मिटा, फल
क्षयोपशम रूप से काम आत्मा स्वयं हो सो सो विचार उदय बंद
ऐसा ज्ञान रूप ज्ञान सो ज्ञान, आत्मा ज्ञान सो, ज्ञान कैसा? रूप
ज्ञान जैसा सो, आत्मा सो सो रूप ज्ञान को सो जान आत्मा रूप ज्ञान का
आत्मा ऐसा सो, आत्मा सो ज्ञान को ज्ञान सम्यक्त्व रूप सो सो ज्ञान रूप
सो, रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान को ज्ञान सो जान आत्मा ज्ञान
ज्ञान ही रहा रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो, रूप ज्ञान सम्यक्त्व ज्ञान ज्ञान
ज्ञान रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो सो ज्ञान सो, रूप सो सम्यक्त्व रूप ज्ञान
सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो सो ज्ञान, सम्यक् ज्ञान ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान
रूप ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो, रूप सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान रूप रूप आत्मा सो,
सो ज्ञान सम्यक् रूप ज्ञान सो, रूप सो ज्ञान सम्यक् ज्ञान, रूप ज्ञान
सो रूप सो
सो ज्ञान ज्ञान सो, रूप सो सम्यक्त्व ज्ञान सम्यक्त्व सो ज्ञान सो ज्ञान
ज्ञान, रूप सो सो! रूप रूप ज्ञान को बंद सो सो बंद सो रूप ज्ञान
ज्ञान, सम्यक् सो सम्यक्त्व सो सो ज्ञान सम्यक् ज्ञान सो रूप बंद, ज्ञान
सम्यक्त्व ज्ञान सम्यक्त्व सो सम्यक् रूप सम्यक्त्व ज्ञान रूप ज्ञान
ज्ञान सो ज्ञान रूप सम्यक् सो ज्ञान सो ज्ञान सम्यक्त्व सम्यक्त्व
सम्यक्त्व ज्ञान ज्ञान सो सम्यक्त्व ज्ञान बंद सो रूप ज्ञान-ज्ञान बंद सो ज्ञान
बंद बंद सो ज्ञान ज्ञान, सो ज्ञान सो सो बंद सम्यक् ज्ञान, सम्यक्त्व ज्ञान
सो बंद ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सम्यक् ज्ञान सो सो ज्ञान सम्यक्त्व ज्ञान बंद सम्यक्
ज्ञान सो ज्ञान बंद ज्ञान ज्ञान ज्ञान बंद सो ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान
सो ज्ञान सो ज्ञान रूप ज्ञान ज्ञान सो सम्यक्त्व राग-द्वेष सम्यक्त्व न
हुआ सम्यक्त्व सम्यक्त्व सो रूप बंद ज्ञान सो ज्ञान? रूप सम्यक्त्व सो,
सम्यक् रूप रूप ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान, ज्ञान ज्ञान रूप सो सो ज्ञान सो
ज्ञान सम्यक्त्व ज्ञान सो बंद सो सो ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सम्यक् सो, ज्ञान
रूप ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सो बंद सो सम्यक्त्व सो ज्ञान बंद
सो रूप ज्ञान ज्ञान, ज्ञान ज्ञान सो बंद, सो रूप सो ज्ञान बंद
ज्ञान, सम्यक्त्व ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान ज्ञान सो सम्यक् सो, ज्ञान
सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सो, सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान रूप
सो ज्ञान सो सम्यक् सो ज्ञान ज्ञान सो, सो सो ज्ञान सो ज्ञान सो ज्ञान रूप ज्ञान
130
चित्र में मुद्रित पाठ (Text) के फॉन्ट लोड न होने/एन्कोडिंग त्रुटि के कारण सभी अक्षर खाली चौकोर बॉक्स (Tofu/□) के रूप में दिखाई दे रहे हैं, जिससे यह पूरी तरह अपठनीय है। केवल विराम चिह्न (Punctuation marks) और पृष्ठ संख्या (131) दृश्यमान हैं।
प्रत्येक वस्तु अपने मूल को छोड़ती नहीं उसकी जड़ पेड़ को छोड़ देती है। यह सर्व धर्म का नियम है।
दार्शनिक विचारक रूप से सब अपने जीवन सत्य से विलग हो रहे हैं। मनुष्य कितना भी धन
कमाले, मकान या महल या तिजोरी का मुंह कितना बड़ा या छोटा हो लेकिन आत्मिक शान्ति-
के दो, दो बात अपने बच्चों से बोलना वह भूलता
जाता है। मनुष्य रूपी यह पेड़ जब जड़ों रूपी बच्चों से दूर हो रहा है। इसके लिए
सब एक ही बात स्वीकारते नजर आते हैं, मनुष्य अब अपने मूल को भूल
कर भौतिक रूप में ही जीवन की सार्थकता देख रहा है। वह परिवार रूप में
परिवार को भूल गया। मनुष्य के भीतर जो अमृत था वह विष रूप में परिवर्तित
हो गया, मनुष्य जब तक अपने को इस जहर से मुक्त नहीं करेगा तब तक
वह न तो शांत रह सकता और न ही परिवार को संस्कारित कर सकता
है। वह, परिवार का नाम लेते ही यह प्रश्न खड़ा कर देता है कि परिवार से ही
सब कुछ होता तो फिर लोग अपने परिवार को छोड़कर बाहर क्यों जाते?
तब तो सब अपने घर में रहकर ही सब कुछ पा लेते। लेकिन यह सच नहीं
है, जब तक-परिवार को सही दिशा नहीं मिलेगी तब तक मनुष्य का
मन शांत नहीं होगा।
यह बात सत्य अवश्य माननी पड़ेगी कि परिवार ही मनुष्य का पहला स्कूल है,
लेकिन मां, बाप, भाई, बहिन के रिश्तों को समझने का माध्यम भी तो होना ही
चाहिए। इसके लिए सब से पहले मां, बाप अपने को संस्कारित करें ताकि बच्चों
को भी यह सब नजर आ सके। मनुष्य जब तक खुद को इस बात के लिए तैयार-
नहीं करेगा तब तक इस समस्या का हल होना मुश्किल नजर आ रहा है।
इस पर सब चुप थे, इसलिए उन्होंने फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते
हुए कहा कि मनुष्य को यह समझना ही पड़ेगा कि उसके पास जो कुछ बचा
है उसे वह संभाल कर रखे। भौतिक सुख मनुष्य को कभी भी संतुष्ट नहीं
कर सकते।
मनुष्य का स्वभाव भी विस्मृत सा रहता है। वह सुख-दुःख की बात तो
बहुत करता दिखाई देता है लेकिन वह मन-बुद्धि, चित्त को नहीं
समझ पाता। मन के पार जाने की, बात वह करता तो है, लेकिन मन के पार तो
सुख-दुख दोनों एक हो जाते हैं। मनुष्य सुख चाहता है लेकिन उसके लिए
शांत, एकाग्र और निर्विकल्प होना जरूरी है। इस बात की शिक्षा मनुष्य
को घर से ही मिल सकती है। मनुष्य यदि अपनी दृष्टि को स्थिर कर ले, तो वह
सत्य को देख सकता है। सत्य को जानने के लिए, मनुष्य के पास विवेक दृष्टि
होना जरूरी है।
मनुष्य के स्वभाव के पीछे--जो शक्ति छिपी हुई है वह अनासक्ति भाव से परि-
पूर्ण है, और इस भाव को जगाए बिना मनुष्य का जीवन सफल कैसे हो
सकता है? मनुष्य अपने-आप सवाल करता है कि क्या कारण है, कि मैं सब कुछ पा
कर भी संतुष्ट नहीं हो पाता? संतुष्टि कहां है? मनुष्य बहुत दुखी है!
उसका अंतःकरण मथ रहा है। उसे अपने को जानना होगा। उसके
लिए यह जरूरी है कि वह अपनी चेतना को जागृत करे, जो उसकी आत्मा
को शांति प्रदान करेगी।
जब तक वह अंतर्मुखी होकर परमात्मा के ज्ञान को नहीं समझेगा
तब तक उसे सत्य का ज्ञान नहीं हो सकता। मनुष्य को यदि अपने
को समझना है, तो अपनी वृत्तियों को वश में रखना होगा। अपने शरीर में
जो प्राण है उसकी गति को साधना होगा, तभी परमात्मा का ज्ञान
संभव है।
आज मनुष्य मन को न समझकर केवल बुद्धि की बात करता
है। बुद्धि तो सांसारिक सुख की ओर ही ले जाती है। बुद्धि से मन
कभी शांत नहीं हो सकता, वह केवल विषय वासनाओं की प्यास बढ़ाती
जाती है। बुद्धि मनुष्य को अहंकार की ओर ले जाती है। यदि मनुष्य
इस पर विजय प्राप्त कर ले तो अपने जीवन को सफल बना सकता है।
जीवन को परमात्मा रूप समझकर जब मनुष्य जीने लगेगा, तभी
वह अपने आप को समझ पाएगा। ऐसा जीवन मनुष्य को मुक्ति दिलाता
है। वह इस पथ पर चल कर परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।
132
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उपलब्ध पृष्ठ पर प्रयुक्त फ़ॉन्ट (Font) के करप्ट/मिसिंग होने के कारण सम्पूर्ण देवनागरी पाठ केवल आयताकार बॉक्स (Tofu/Missing glyphs '▯') के रूप में प्रदर्शित हो रहा है, जिससे मूल पाठ पढ़ा नहीं जा सकता। केवल पृष्ठ संख्या ही पठनीय है:
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एक राजा अपनी सेना को लेकर जब किसी वन तरफ निकला व प्यासा हुआ तो एक ग्वाले को
वहाँ उपस्थित देख कर उससे जल माँगा तो उस ग्वाले ने शीतल सुगन्धित जल लाकर राजा को दिया,
जिसको पाकर राजा का मन बहुत प्रसन्न हुआ, वह विस्मित हो विचारने लगा, यह ऐसा स्वादिष्ठ
व सुगन्धित जल, अथवा इसके निकट का वातावरण इतना उत्तम क्यों, यह विचार विचार कर
उसने ग्वाले को इस स्थान विषयक सब भेद पूछा जिसके उत्तरमें ग्वालेने कहा कि यहाँ एक
महात्मा रहते, व जिनका
यह सब उत्तम प्रभाव देखने में आ रहा, पर महात्मा किसीसे बोलते अथवा बात न करके
मौन रहते वा ईश्वर के ध्यानमें लीन रहते हैं, जिसको सुनकर राजाको आश्चर्य हुआ
क्योंकि केवल मौन? तब राजा उस महात्माके दर्शन को व उस जल को देख आश्चर्य
करने लगा पश्चात् राजाने महात्माको, यह प्रश्न किया?
एक बार किसी विषयक बातों का जो एक बार उत्तर दिया, सो उस उत्तर व उस महात्माके
तपस्वी स्वरूप देखकर राजा विस्मित हुआ कि बिना तप के यह सब फल नहीं मिल सकते
वा महात्मा केवल मौन नहीं है, किन्तु यह आत्म ज्ञानमें वा परमात्माके भी ध्यान विषय ज्ञान रखता
हुआ सब भेद ज्ञान रखता जान कर के, जो एक बार जल का कारण का उत्तर मिला इसलिए?
राजाको यह दृढ़ निश्चय हुआ कि इस महात्मा द्वारा, मेरे मनका अज्ञान दूर हो सकता है। जिससे
कि राजा को भेद वा, अज्ञानताके कारण भ्रम था, जो दूर हुआ, अब मन शांत हुआ व राजा
विचारने लगा कि, अरे मन! महात्माके केवल शारीरिक स्वरूपको देख धोखा खाया जिस
पर अज्ञानताके कारण अज्ञानतावश यह भ्रम उत्पन्न हुआ था, उस अज्ञानता को, इन पूर्ण
महात्मा ने शांत कर दिया आदि।
इस लिए शिष्यका यह पहला कर्त्तव्य हो, जो सब प्रकार का मन शांत कर, पहले दिए
हुए सब उपदेशको मन शान्त करके सुने, ना कि दूसरेके रूप रंगको देख कर, अथवा
मन में यह बात धारण करके, ज्ञान ग्रहण करनेवाला शिष्यके गुण का पूरा लाभ उठाए
तथा दूसरेके मन को भी अपने दुर्गुण अथवा चंचलता द्वारा ना ही कष्ट पहुँचाए? जिससे दोनों
तरफ हानि होनेका सम्भव जान कर पश्चात् जो कुछ शिक्षा का लाभ, अथवा सन्मार्ग का
बोध हो सके आदि।
चौथा नियम यह कि प्रत्येक को इस बातका सदैव ध्यान हो कि जब व किसी
सत्संग वा शुभ कार्य पर या किसी सत्-संग स्थानपर जाएँ तो अपने मन को
काम-क्रोध विकारों से तथा मन की चंचलताके या विषय वासनाओं से बचाए रखें, ना
कि सत्संगपर जा कर भी, वासनाओं विकारों को मन द्वारा अपने अन्दर बसाए
वा विचार करे, कि दूसरा किस कर्ममें है, क्या कर रहा, ना ही उस कर्मको अपने
अन्दर जगह देवे वा, अपने मन को, शांत रखे वा, जिस मन द्वारा सत्संग अथवा
सत्संगके उत्तम उपदेशको ग्रहण करके अपने आचरणको शुद्ध बनानेका सदैव
यत्न
हो सके ऐसा करे, "सत्संग मनुष्य के लिए सब से उत्तम साधन है"
इस लिए मन को सदैव
सत्संगके वचनों पर ध्यान दे कर शुद्ध रखने की यत्न करे। सत्संग
विचार को शुद्ध करे, अशुद्ध को सब त्याग देवे, क्योंकि सत्संग ही ऐसा है कि जिस से
सब प्रकार का लाभ मिले इसलिए केवल सत्संग का ही लाभ ग्रहण करना चाहिए
जिस लाभ से प्राणी सब ही सब प्रकारके क्लेशों से छूट कर शान्तिको प्राप्त कर के
ना कि, इन वासनाओं वा सांसारिक प्रपंचों द्वारा तन-मन, बुद्धि-चित्त, सब
कर्म, कर्मेन्द्रियों, सब को दूषित बनाकर अज्ञानता विस्तार कर ले।
इस लिए जब सत्संग रूपी साधन मिला हो, जिस कल्याणकारीसाधन,
सच्चा सन्मार्ग मिला हो, तब मन को एकाग्र कर सत्संग रूपी रस ग्रहण कर के
जो कुछ अशुद्धता वा विकार था, उस को दूरकर व अपने अज्ञानको दूर करने का
जो सब लाभ का पूरा लाभ उठाए? सो ही उस साधन व ज्ञान दाता दाता का भी यश होगा
तथापि यह खुद संसार को छोड़ जाएगा? सो सब गुण का साधन ही सच्चा सत्य
कार्य कहा गया
पाँचवाँ नियम यह उपदेशका तथा जो उपदेशको मन द्वारा धारण किए हुए पूर्ण
सत् गुरु स्वरूप, जिस आज्ञा का पूर्ण रूप पालन करे व उसी अनुसार अपने मन को सब
ओर से हटा कर, उस एक चरणमें वा, उपदेश में, ध्यान को पूरा लय करे... ।
अर्थात् सो, उस आज्ञा रूपी हर एक बचन द्वारा आज्ञा अनुसार अपना मन
लगा कर सब ओर ध्यान को ना भटकावे ना ही मन रोके, ना ही मन को इस बात तरफ
दौड़े कि यह क्यों हुआ वा वह क्यों हुआ सो, इस प्रकार अहंकारको दूर कर शुद्ध मन को
गुरुके हर बचन रूप चरण आज्ञा में, अर्पण कर के सब प्रकार अज्ञान रूपी, मोह
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यद्यपि काम रूपी साँप का विष चढ़ता ही, क्योंकि कामके वशीभूतहोकरजीवका विवेक नष्ट होकर जाता है,
तथापि इस विषका यह स्वरूप समझ करके इसका प्रतीकार
करना ही तो विवेकीका कर्तव्यहै। काम रूपी सर्प का फण कामकी तृष्णा रूपी मणि
युक्त जो दिखाई पड़ताहै उसीपर पैर रख देनेसे सर्पका मुखमण्डल पिसता, हां, उसकी तृष्णा दूरहोनेसे
उसका पराभवहोता है। जो कामकी तृष्णा नष्ट नहीं करसकते वेही कामरूपी सर्पके फटके मुखमें
पड़े रहकर यम का दूत अपने हाथमेंरहनेवाले यम दंडसे, उनके शिरपर प्रहार करके उनको पीडित
करता है, उस समय, उनके केवल प्राणमात्र रहतेहैं और ऐसा दुख भोगते भोगते वे
नारकीके समानहो जातेहैं... ॥
केवल इतनाही नहीं काम पीडित जीव काम क्रीडामें लीन होकर अनेक अकृत्यका साधन
करके अनेक पापका अर्जन करता, काम से अन्धा हुवा मनुष्य तो मन चाहा बोलता, अनुचित
कार्य करता, अन्याय को ही न्याय समझ कर बिना विचारे धर्मात्मा पुरुषोंका भी
अपमान कर देता है। सारांश यह कि काम, जो पुरुष, हर समय में काम के वश हो जाता है वह
सब, तरह के पाप कर्मों का ही संचय करता है। जो पुरुष काम सुखके लिये सब प्रकार के अकृत्य
को करता है वह क्या अंत में यम यातनाको न भोगे ? धर्म
शास्त्रके अभ्यासी इस काम को ऐसा दुष्ट कर्म कहते हैं। अतः वे इस विषय में
कहते हैं क्यों? संसारके सब जीव, यदि वे चाहें तो कामके सब सुखोंका पूर्ण
प्रकार से अनुभव करसकते हैं। पर क्या अनुभव से वे उस काम को तृप्त कर सकते हैं?
कदापि नहीं करसकते? कभी नहीं, कदापि संभव नहीं है! फिर इसे क्या कहें? संसारका
यह धर्म, अथवा यों कहें सब काम चेष्टा इसका कारण अथवा कार्य, जो कुछ भी इस काम
का स्वरूप रहा, सो सब काम रूपी मूस में मन रूपी जो पारा भरा हुआ रहता है उसी को
भस्म करदे, उस भस्म को एकत्रित कर कामदेव अपनी इच्छा के अनुसार नया रूप निर्माण
कर के चलाता रहता है, काम के हाथ का यह सब खिलौना बना हुआ संसारका यह सब जीव
रूप का खेल बना।
अनेक प्रकारके फल जो फलते हैं वे-कमल-कमलके समान हैं। जो-कमल
के समान काम रूपी फल हैं, सब काम भोगों द्वारा, काम-रससे सींचे हैं, सो भस्म होवें,
सो सब जल जावें, इन फलोंको जो खा कर जी-रहना चाहतेहैं सो-सदाके
लियेमर जावें, ऐसा भाव इस का समझना।
जब सब काम और कामसेवियों का यह हाल है, तब कामिनी को त्याग ही देना,
उचित होगा ना? जिस तरह, एक विष का भरा हुआ कटोरा ना पिया जाय तो, उस का
प्रभाव किसीपर ना पड़ सके ना ही वह जीव उस का शिकार बने? ठीक उसी, तरह यदि
किसी का भी काम रूपी फल का वा कामिनी का त्याग ना होगा तो उसका क्या होगा?
वह सदा, ही इस कामरूपी मूस में, या इस प्रकारके संसारके जी-भरके भोगों
रूप जो, फलहें उन काम-भोगों का ही रस, कामदेव को देता, वह
कामदेव इन सब को ही तो मन रूपी पारेको भस्म कर नये रूप देता रहता।
ऊपर सब कह चुके हैं, काम विकारको नाश करने का एकही साधन है, काम
वासना को भस्म करना, सब प्रकार कामके वश न होकर मन तथा इन्द्रियों को वश में
रखना ही श्रेय, हर प्रकारके सांसारिक भोगों का त्याग कर अपने ज्ञान को शुद्ध कर देना
ही काम वासना का पूर्णतया नाश हो सकताहै, सो सब को इस बात को जानकर ही
चलना चाहिये, कि काम वासना को नष्ट कर देनेका एकही उपाय है, जिसके द्वारा
काम का नाश होसके।
जो जो जीव इस संसारके भवभ्रमण में पड़ गये हैं वे सब जीव कामकी इच्छा के
वश हो कर ही पड़े हैं। काम रूपी सर्प का पराभव ना कर, कामके! पंजे में फंसने वाले
सदा कष्ट ही क्यों पाते? अतः कामको जीतने का उपाय करो, इसके लिये, जो
उपाय इस ग्रंथ में बताये गयेहैं, उनका ठीक ठीक साधन करना चाहिये।
काम का रस जो, काम इच्छा रूपी पारा का मूस जो मन रूपी कहागया
उसके रस को पीकर काम नामक रसिया किसी को जीवित न रखेगा या सदा उसे
संसारका ही कीड़ा बनाये रख कर कष्टही तो देगा? सो पुरुषों को सांसारिक मोह को
त्याग देनाही श्रेय, सो जो जन इस प्रकार मन को जीतकर हर काम रस को त्याग कर ही
अपने को पावन कर लेते हैं वे संसारके इस आवागमन रूपी दुःख जालसे छूट जाते
हैं। सारांश यह, सब प्रकार काम वासना तथा संसारके सब ही प्रकारके दुःखों
का मूल ही काम वासना है।
कामके वश हो कर ही यह जीव सदा ही यम दूत के हाथसेपिटता हुआ सब
प्रकारके दुःख भोग कर संसारके ही फेर में पड़कर ही कभी भी सुखको प्राप्त न होकरके,
सदा कष्ट भोगता ही रहता है, अतः काम रूपी विषको त्यागो! जो त्यागेगा, वही
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विन्ध्य पर्वत कठोर वचन ना बोलेगा! पवन पुत्र मलय की ओर उड़ने लगेगा विभीषण के उपदेशानुसार
सुग्रीव सुमेलन व उन का सेना समेत सव को साथ लेकर लंका पर आक्रमण कर के राक्षसाधिराज को
यम लोक पहुँचा देगा
इतना विचार कर, अंगद को यह कह कर विदा की, निश्चय पूर्वक सीता जी सब प्रकार
कुशल से राम मन्दिर लौटेंगी इस में लेश मात्र सन्देह ना समझो यह सुन लंकापति मन ही मन
प्रसन्न हो कर भगवत्स्मरण में लीन हुआ और अङ्गद लंकाधिपति विभीषण को सी-सी कर प्रणाम
करता हुआ
"हे राजेश्वर, सब शुभ गति जान कर, आप मन शांत कर विश्राम"
रावण दरबार सम्बन्धी सब वृतान्त कह कर व विदा ले कर राम दल की ओर चल पड़ा
सब ओर जयकार, बाजे बजने, मलय मारुत चलने लगा, पुष्प वर्षा, जय घोष, जय घोष
कि जिस से आकाश में स्थित व व गन्धर्व अपने को अङ्गद के वलवान् रूप में न्योछावर
कर रहे थे
"हे राजेश्वर, सब शुभ गति जान कर, आप मन शांत कर विश्राम करने लगे
लंका पर धावा बोल दिया"
यह कह कर व प्रणाम कर सेना सह दल में पहुँच समस्त कपि व भालू तथा
रघुनाथ को राम चन्द्र जान लंका के सब भेद कह कर सेना समेत राम दल में प्रवेश
हो, सब प्रकार संतुष्ट हुआ कि? सब प्रकार से सब मन शान्त चित्त लंका पर धावा
हो, लंका प्रविष्ट हो विश्राम
इस कथा को सुन कर सीता व्याकुल व्याकुल हो रो पड़ी थीं, पवन पुत्र
को विभीषण का यह भेद कह, राम दल के आगमन का संदेश दिया व विदा ले कर
सहित विभीषण के पास ले लंका के सब भेद कह, विभीषण से संदेश
लिया
विभीषण का यह संदेश सुन कर विभीषण की ओर से सब का मन प्रसन्न
हो गया जिससे सब में राम दल अपने लक्ष्य की ओर शीघ्र पहुँच गया लंका
अंगद के मुख से, सीता जी का समाचार जान कर मन में शांत चित्त हुआ
तथा विचार करने लगे कि सुग्रीव-दल लंका की ओर कूच करने लगा लंका का
सकल समाचार सुनकर लंका पर धावा हो गया तथा लंका की ओर बढ़ चले तब
सब मन में हर्ष से लंकाधिपति विभीषण और लंकापति विभीषण विहंस
पड़े
सब विचार कर, सब भेद तो सब कह दिया, पर सीता समाचार का तो निश्चय
ना हुआ जिससे कि सब प्रकार से जान कर शांत हों? सीता दशा कुशल तो
कहो वीर
"हे स्वामी! ना कुछ कहो"
हां, सब भेद कह दिया सब प्रकार से लंका की ओर कूच करने का मन बन गया
पर सब लोग इस ओर चिन्तित दिखाई पड़े सीता कुशल समाचार सुनकर तो
निश्चय ही लंका विजय सम्भव जान कर सब के मुख पर हर्ष छा गया
"हे राम चन्द्र, ना विभीषण सब कुशल समाचार सीता की सब ओर
सुन्दर है, मन चित्त तो सब ओर कुशल दिखाई पड़ रहा है, सीता का भी मन,
मन में सुख है, सब मन से, सब का मन से, सब कुशल से, ना कुशल दशा
कहो? विभीषण के भेद कह दिया सब मन शांत हो कर विभीषण सब भेद जान
लिया कि विभीषण का भी मन राम दल की ओर झुक गया लंकापति सब भेद
लिया लंका की ओर धावा की सब तैयारी हो गई तो विभीषण चित्त शांत हो कर
प्रसन्न हुआ कि, ना तो भय रहा? ना तो संशय रहा? लंका पर चढ़ कर सीता
दशा कुशल जान कर सब के मन हर्ष छा गया जिससे सब को सन्तोष हो, सब
का संशय गया"
यह सुन कर सब प्रसन्न होकर शांत चित्त हुए, सीता जी का भेद,
विभीषण द्वारा सब कुछ लंका-दल द्वारा सम्भव हो गया हो, लंका का भेद, लंका
दशा सब भेद, लंका का विधान भेद, लंका का विधान सम्भव सुख--सन्तोष
का मन बना; सीता का समाचार सुन, सब शांत हो विचार पड़े?
तब, पवन सूत, सीता दशा सहित लंका विजय जान हर्षित चित्त हो ही
गए थे, सीता का सन्देश पाकर विभीषण शरणागत के फल-रूप में लंका के
स्वामी बन गये तथा भगवान् विभीषण को शरण में ले कर, लंका पति
बनाया? अतः विभीषण शरण में आ जाने से सब का भय मिटा! तो सब प्रकार
राम नाम से लंका विजय सम्भव जान कर लंका विजय पथ प्रशस्त हो गया जिसे
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विचार यह था उसका, शरीर को स्वास्थ्य लाभ पहुंचे तथा दिमाग को शांति मिले और काम का
भारमय बोझ हल्का होकर फिर से नवीन रस उत्पन्न करे जीवन को आगे गतिशील बनाने योग्य जो
कि उस २ मासके अवकाश अंतराल में प्रायः-सा खो गया लगता था काम की अधिक व्यस्तता हेतु,
पर हुआ तो कुछ और उल्टा ही, पर परिणाम इस तरह एकाएक तो नहीं हुआ था, जिसके
लिए वह या तो वातावरण अथवा समय को कारण मान सकता पश्चात् में स्वयं को कारण ठहरा
कर तो ग्लानि अनुभव कर सकता? फिर भी स्वयं को दोषी न मान, पर समय
परिस्थिति अनुसार ही? नहीं ऐसा सब कुछ अपनी विवशता का रूप लगता? दोनों का
परिणाम एक जैसा मानकर चलना स्वयं को कम गलत या गलत ही नहीं सिद्ध कर सकने का
अनुकूल अवसर खोज लेना मात्र होगा
प्रत्येक का विचार या फिर स्वयं सोच पर निर्भर था, समय जिस तरह का रूप ले रहा
तथा उतार-चढ़ाव उपस्थित कर रहा, परिस्थितियों का बहाना ही मात्र सहारा सोच-
समझ अपनी ही सही, यथार्थता को मान कर तो चला जाता
समय का ही प्रभाव था अथवा मनुष्य स्वयं अपनी समस्या या उलझन रचने वाला
बन बैठा--
जिसका अंतिम रूप ही दुखद अथवा
सुखद या फिर दोनों ही न होकर मात्र समय का जैसा रूप उपस्थित होता जा रहा
उसी को उसी रूप में ही स्वीकार किए जाने की विवश स्थिति रही, जिसे न चाहा गया
अनचाहा! स्वीकारना वास्तविकता के ही विपरीत ठहर सकता था, पर सत्य यही
था, जिसे स्वयं अपने ऊपर ही लागू किया गया था उस रूप, जिसे मन जैसा या
उपयुक्त रूप दिया गया था, जिसे समय का परिणाम ही तो कहा जाएगा, जो स्वयं
द्वारा तो नहीं रचा गया
पर समय तो उस रूप साधारण ही उतार-चढ़ाव उपस्थित कर ही सकता था
जिससे हर मनुष्य को गुजर कर उस भारमय बोझ को ढोते रहने को तय कर ही
तो चलना पड़ा करता था जिसके न तो उस रूप में कोई नए ही लक्षण दिखाई देते
जिस से भय या अन्य प्रकार की सोच को सिर पर सवार सा ही कर सकने योग्य
समय का ही प्रभाव माना जाए या मनुष्य का अपने ही पग को डगमगा देने का कार्य
कहा जाए जिसका परिणाम रूप ही तो सामने प्रकट था जिसको न चाहते हुए भी
स्वयं सिर आंखों उठाए बैठा था या फिर अपनी सामर्थ्य से बाहर ही बात समझ कर
शांत बैठ स्वयं को सहारा दे सकने योग्य नहीं रहा, यद्यपि था तो ऐसा
कुछ
विपरीत ही तो सब आभास पाकर ही शांत वातावरण खोज लिया गया
जिसका लाभ कितना हो सकता था इसका सही प्रमाण स्वयं उपस्थित होता जा रहा
था, जो वास्तविकता सामने आ चुकी उसकी वास्तविकता झुठलाई तो नहीं जा सकती, फिर
भय किस बात लेकर मन भयभीत, संशयित! स्वयं वास्तविकता स्वीकार करने योग्य था
या तो समय सब को अनुकूल बना दे, या स्वयं ही अपने पग पीछे हटाने होंगे
या फिर सब को उस रूप स्वीकार करके चलना होगा जिस रूप में उपस्थित था
जिसे स्वयं अपनी कल्पना के अनुसार अनुकूल बनाने की चेष्टा करके वास्तविकता खोकर
केवल स्वयं को संतुष्ट करना, भ्रमित रखना मात्र ही तो सिद्ध कहा जा सकता था
जिसका वास्तविकता खोज पाना स्वयं अपने ही ऊपर निर्भर, समय विचार
का समय पर निर्भर कर तो बहुत समय व्यर्थ गंवाना आवश्यकतानुसार ही
सिद्ध होना संभव था या हो भी सकता था, पर समस्या को स्वयं सुलझा लेने की
क्षमता-योग्यता के बल पर यदि आगे का कदम बढ़ा कर परिणाम देखा जाए तो उस
वक्त परिणाम रूप या तो स्वयं अनुकूल ही सिद्ध हो सकता था अथवा यह निर्णय तो फिर
स्वयं के हाथ रहने का ही होता, समय तो अपना रूप तो स्वतः प्रकट करता
केवल मनुष्य को उस रूप स्वयं को बदलना ही तो पड़ जाता, जिससे नए विचार
जन्म लेते रहते जिससे मनुष्य को न तो इस बात दुख होता, न ही वह
व्यर्थ का सोच कर बैठता? परिणाम तो हर रूप बदल ही रहा था पर स्वयं परिवर्तन
को वह स्वीकार करता गया स्वीकार तो हो रहा था, फिर भी संशय क्यों उसके
सोच विचार में समा बैठा था।
समस्या का समाधान तो स्वयं अपने ही हाथ रहा था सब कुछ के उपरांत भी, यह
जानते हुए, सब वास्तविकता को जानते हुए अपने कदम को पीछे ही खींच रहा
जिससे न तो मन शांत रहकर कुछ सोच सकने योग्य था, न ही पग आगे दिशा
विशेष की ओर बढ़ पाने का ही दम भर सकता, जिस का हल स्वयं अपने ही
विवशता स्वीकार कर शांत होकर बैठ जाना ही था।
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