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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 322 में से

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ॐ नमः सिद्धम्
सर्वार्थसिद्धि
पंचम अध्याय/सूत्र क्र. 20-21
सूत्र 20
जीवो नाम चैतन्य रूप वस्तु सर्वदा चेतना गुणकौं धारक
रूप स्पर्श रस गंध रहित है स्वभाव रूप अरु स्पर्श
गंधादि पुद्गल रूप है ताकौं यह जीव पुद्गल के संबंध
करि नाना प्रकार जानि तन्मय होय सुख दुख कौं अनुभवै
इस जीव को यह सुख "दुःख" पुद्गल द्वारा उपजाया
सूत्र 21
जीव और पर रूप पुद्गल के जो परस्पर उपकार कहे
तिनकौं परस्परोपग्राही जीव कहा सो जीव कौं अजीव
अरु अजीव कौं जीव उपकार करै है यह बात प्रत्यक्ष में प्रमाण
परस्पर एक कार्य परस्पर तैं सिद्ध होय तैसे स्वामी
सेवक परस्पर उपकार सहित जीवैं स्वामी द्रव्य करि
सेवक का उपकार करै सेवक सेवा करि स्वामी
का तै भला उपकार करै सोई स्वामी सेवक कहलावे
स्वामी तैं जीवै सेवक तैं स्वामी द्रव्य पावै
ऐसे प्रमाण तैं सिद्ध होय स्वामी तैं सेवक
का भला सेवक तै स्वामी का भला सिद्ध
इस तरह एक एक परस्पर तैं काम निकसै
"जीव" जीव को सुख देवे पर जीव को
पर उपकार करे उपकार यहि तैं यह सिद्धांत
"जीव" तैं पर का भला पर तैं जीव तैं सिद्ध
जिस प्रकार स्वामी और सेवक एक दूसरेके काम आते, उपकार पर उपकार करे, सो तो,
प्रत्यक्ष ही सब को मान्य है, इसी से यह प्रत्यक्ष प्रमाण हुआ कि परस्पर उपकार होता है,
पर सो तो सब जगह ऐसा देखनें में नहीं आता, कहीं ऐसा भी देखाजाता है स्वामी
सेवकको भूखा मारता है, और जो देता भी, सोभी काम लेकरके पेटभर पेट नहीं देता,
सब ही काम पुरा लेकर भी पेट भरके आहारिक नहीं देता।
जो ऐसा भी स्वामि सेवकके परस्पर उपकार में कोई कहे कि यह बात तो न बनी,
तिस को उत्तर यह, कि जो ऐसा परस्पर में एक दूसरे को काम आकर उपकार नहीं
करे, वह तो न स्वामी, न ही सेवक कहा जा कर परस्पर का प्रमाण घटाया जा
सकता है सो स्वामि सेवक के दृष्टांत में इस वात का भी ज्ञान हो गया कि उपकार
एक दूसरेका काम सो ही है कि जो परस्पर उपकार का भाव रख कर एक दूसरे
परस्पर को सुख देने का भाव रक्खें सो उपकार भाव कहा गया है सो ऐसा ही
उपकार एक दूसरे जीवों का आपस में होना चाहिये।
सो तो हो सकता भला पर जहां ऐसा न हो अर्थात् एक दूसरेको दुःख देता होय
सो ऐसा तो सब ही प्रत्यक्ष प्रमाण बना ही रहता, तो फिर तो सिद्धांत ही गलत
ठहर जावेगा क्यों कि यहां तो परस्पर उपकार जीवोंका लिखा सो, तिस का उत्तर
ऐसा है कि जहां कोई जीव एक दूसरे को दुःख पहुंचाता वह अपने ही कर्मके उदय
वश ऐसा उपद्रव उस पर कर रहा है, तिस से उसका कोई संबंध
जीवके परस्पर के भाव रूप न समझना चाहिये सो यह तो कर्म सिद्धांत
पर बात आवेगी
परस्पर उपकारियों में तो एक दूसरे जीव का यह काम होना चाहिये कि धर्म,
के काम में, उप देश देवे परस्पर में एक दूसरे को धर्म की बात कहे! कि कोई
धर्म का विरोधी नित्य विपरीत न हो जाय सो ऐसा ही उपकार का प्रयोजन यहां
लिखा सो भी, जीव जीव के उपकारार्थ! समझ कर यह काम करे? जिससे कि
संसार के सब प्राणी एक दूसरेके उपकारार्थ हो सकें, इसीलिये जीवों
का उपकार, जीव परस्पर कर ही सकते
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