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सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 322 में से

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विचारवान् पुरुष को अधिकार का त्याग व्यर्थ, विवशता समझ कर ही नहीं
स्वीकार कर लेना पड़ा, वरन् उसने इस बात को भी भली भांति समझ, जो कि सच थी,
पराक्रम और पुरुषार्थ दोनों जिसके स्वरूप में ही समाये हुए हैं क्या? विवेक को
इससे अलग है? पराक्रम क्या है? मात्र उद्दण्डता है? केवल हठधर्मिता का नाम ही
शक्ति स्वरूप कहा गया? उस उद्दण्ड, उस विवेक, उस हठ को धर्म का रूप दे कर
जो रूप संस्थापित हो वह विचारवान् को तो कभी मान्य नहीं होगा, जिसे सब धर्म
का, पुरुषार्थ का?
विकास के लिए किस प्रकार विचारवान् को इस बात स्वरूप देखना पड़ा हो होगा? इसे कोई
चाहे तो विवेक या पुरुषार्थ का रूप कह कर इसकी प्रशंसा कर सकता हो या निन्दा
कर इसे भय स्वरूप ही कह कर देखे, विचार तो इन सब बातों से, विशेष कर इस
बात को, जिसे हम भी समझ रहे; यह कि इस महा-त्याग के रूप में ही धर्म
रक्षा, समाज रक्षा का मार्ग है; इस सब को त्याग--के रूप में ही ग्रहण कर उस
समय, विचारवान् ने जो कहा था, "विचार करो!" वह आज का भी विचार बन कर आज
भी "विचार करो" के द्वारा अपनी स्थिति को तो कर रहा है, जिसे सब सब को आज
पुरुषार्थ का रूप देना
जिसे सब धर्म? सब विचारवान् के इस रूप में, जिसे विचारवान् रूप में
संस्थापित किया जा कर जिस रूप में रखा जा सकता था जिसे सब स्वीकार कर सके
जिस से सब लाभ उठा सके ऐसा रूप दिया जा सके सका हो, न कि केवल त्याग का
स्वरूप विकास कर ही पुरुषार्थ का स्वरूप बनाया जा सके जो फिर सब काल सब
व्यक्तियों के लिए, उन के सब रूपों के लिए, उन सब को पुरुषार्थवान् रूप में
ही सब संस्थापित हो, जिस से धर्म रूप
आज, समाज, विचार के इस रूप स्वरूप विकास स्वरूप रूप में नहीं
रूप में कहा जा रहा हो कि इस रूप में तो त्याग करने वाले को ही स्थान मिले
वरन् इस रूप में कि वह रूप सब को, अपनी शक्ति अनुसार त्याग का भी रूप दे
सके और इस रूप में पुरुषार्थ का रूप भी दे सके जिससे विकास रूप में वह समाया
रहे। आज, जो भी धर्म या विवेक का रूप इस स्वरूप में तो स्वीकार हो सकता
लेकिन, जो यह रूप पुरुषार्थ का तो भी इसका फल-तो मिलता ही था, जो-जो रूप
दिया, सो तो भला अपने विकास रूप में दिया हो पुरुषार्थ का व्यक्तिगत रूप भले
प्रकार दिया।
पुरुषार्थ विकास का विवेक के साथ ऐसा स्वरूप संस्थापित हुआ था
जिस से, जो रूप में सब को देखना न पड़ा, जिसके विकास का रूप इस रूप
में ही, विशेष-रूप दिखाई पड़े, जिस रूप को सब देख सकें, सो यह
रूप तो केवल त्याग-मात्र स्वरूप रूप का ही रहा, इसका दूसरा स्वरूप क्या?
सब काल सब को धर्म का विवेक रूप ही तो हो सकता--जिस बात को विचार
ने समझाया था, उस का रूप ही यह
प्रकार के रूप का यह स्वरूप भी तो सब पुरुषार्थ का एक रूप था,
जो केवल उस रूप तक पुरुषार्थ रहा, उस से समाज और विवेक को ही
रूप मिला जिस रूप स्वरूप को आज तक स्वीकार किया जा रहा था जिसे सब
लोग सब रूप में जिस रूप में देखा गया था, समाज इसे किस तरह स्वीकार
कर सका जब कि समाज रूप में तो इस तरह नहीं था, उस से आगे भी, जो
रूप था वह केवल संन्यास का रूप नहीं था, जिस में केवल त्याग था,
वह पुरुषार्थ स्वरूप न रहा, उस रूप में, उस स्वरूप तक सब को समाज ने देखा
रूप में जिस रूप में इस विवेक रूप रूप में समाज के स्वरूप को देखा, सो
वह रूप संस्थापित संस्थापना तक ही, समाज रूप न केवल ही स्वरूप अथवा
शक्ति के रूप में ही नहीं समाज रूप को सब तरह स्वरूप में ही समझा
गया रहा होगा ही, महा-दान स्वरूप के रूप में, उस बात तक समाज विवेक के
उस रूप तक स्वरूप रूप ज्ञान-दान स्वरूप किया गया, जिसे धर्म का
पुरुषार्थ रूप रहा
इस पुरुषार्थ रूप को विवेक का जो रूप स्वरूप कहा गया वह उस
रूप में दिया गया, जिसे त्याग का, सो विवेक रूप तक पुरुषार्थ का रूप था, सो
विवेक का वह स्वरूप तो रूप में जिस रूप संस्थापना स्वरूप के रूप में समझा,
सो रूप स्वरूप रूप में ही उस का विवेक स्वरूप रहा, सो रूप केवल उस
रूप तक ही ही नहीं समझा गया रूप में जिस के रूप में, उस विवेक को
समाज उस रूप रूप में जान रहा
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