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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

उपनिषदोके स्वाध्यायके सम्बन्धमें यह विचारणीय बात अवश्य प्रतीत होतीहै किन्तु क्या यह सर्व
साधारण अधिकारप्राप्तजनोंके लिये विचार की आवश्यकता का विषय है? कदापि नहीं, सदा यह विषय विचारशील
विद्वानोंका रहा?
विचारशील जनोंने वर्तमान सामयिक विचार कर इसका विचारकिया भी, सामयिकजनोंको अधिकार सम्पादित कराने का
एक मात्र उपाय वर्तमान सामयिक प्रचार विचार कर ही यह निश्चय कर जो दिया सो किया ही समझिये क्योंकि विद्वानोंका
कर्त्तव्य यही होताहै।
इसमें सन्देह, विचारशील जन कभी नहीं कर सकते कि उपनिषदें केवल विचार प्रधान साधन हैं इसलिये, यह
कर्म, भक्ति दोनोंका, केवल विचारपरक साधन ही उपदेश करसकतीहैं कर्मोपासनाका विचारतो, चाहे जिस धर्मका हो
सम्प्रदाय, चाहे जिसका, विचार उपनिषदें ही, साधन का विचार कर ही निर्णय करतीहैं इस प्रकार विचारशील कह
सकतेहैं; इसलिये विचार विचार का विषय केवल विचार रहा न कि कर्म उपासनाका इस लिये प्रचार की इस विषय
विचार-सम्बन्धी साधन प्रक्रिया रूप उपदेश पर प्रचारक जन विशेष ध्यान रक्खें, जिससे यह सिद्ध होगाकि किसीके
सम्प्रदाय उपासनादिमें आक्षेपका भय किसीको नहोसके जिससे, अधिकारिप्रजाका, एक नियम रूप
विचार पद्धति पर प्रचार-प्रसार होकर कल्याण, विशेष कर वर्तमान सामयिक विचार प्रचारकका विचार
निश्चयपूर्वक, अधिकारसम्बन्धी भ्रम को दूरकरके प्रचारित कियाजाय, जिससे जन समाज विशेष कर उपनिषदों की ओर
आकर्षित, होकर कल्याण का पथ ग्रहण करे, विचारका यह मुख्य साधनहै।
प्रत्येक विचार साधन का प्रथम उद्देश्य, भ्रम का नाश कर यथार्थ रूप में प्रकाश डाल उसका यथार्थ रूप
प्रकाशित करना जिस प्रकार का यह मुख्य धर्महै उसी प्रकार जनसाधारण सर्वप्रकार अधिकार प्राप्त उपदेश प्रचारक
जन का मुख्य कर्त्तव्य होना चाहिये जिसको वह सर्वथा सम्पादन करते हुए निष्पक्ष होकर, उस उपनिषद् ज्ञान
विचार को सत्य रूप से; सब प्रकारके जन समाज को--जो विषय जिस समाजके जिस रूपमें सिद्ध होताहो,
न पक्षपात निष्पक्ष रूप से, न आग्रह करके, न सम्प्रदायगत स्वार्थ--सिद्धिपरक विचार कर निष्पक्ष सर्वोपकारी
विचार-प्रणाली पर सब को उपदेश करें, इस प्रकार यत्न करनेपर सर्वजन समाजका उपकार हो सकताहै
जिसके लिये प्रत्येक जन सर्व प्रकार से यत्न साधन कर सकताहै उपनिषदोंके स्वाध्याय विचार प्रचारकी ऐसी रीति
सर्वथा जिस रूपमें सब जन समाजके लिये एक यत्न रूप से सब की सब प्रकार, कल्याण दायिनी होकर
उपकारिका का साधन बनेगी।
उपनिषदें केवल आस्तिकोंका धन हैं? --केवल आस्तिक जनका ही उपनिषदें धन नहीं कही जासकतीं
क्यों! क्योंकि उपनिषदें प्रत्येक प्रकार के उन सब समस्त नास्तिक विचारवालों को भी ऐसा यत्न रूप उपदेश
विचार प्रदान करती हैं? जो नास्तिक विचार सम्बन्धी उपदेश विचारहैं सो, सब उपनिषदों का विचार,
विचारके उस साध्यको सब साधन, प्रकारके द्वारा सत्य रूप कर सर्व आस्तिकोंको उपनिषदें साधन रूप होकर देतीहैं
इस प्रकारसे सब को यह उपदेश देतीहैं कि उपनिषद् एक न केवल आस्तिक जनके उपकारके लिये साधन रूप हैं
उपनिषदें सब की सब प्रकार से यत्न हैं! उपनिषदों का यही मुख्य विचार सब जनके हित साधन सम्बन्धी
सत्यभाव प्रमाणित कर रहाहै यद्यपि? आज कल नास्तिक विचारका प्रचार, सम्प्रदाय विचार-सम्बन्धी
रूप विशेषके रूप विचारका सर्वसाधारणमें प्रचार जन समाजके मन को भ्रम युक्त कररहाहै जिसके द्वारा बहुत कुछ
हानि समाज की हो रहीहै विचारका यह मुख्य विषय है।
उपनिषदें सब प्रकार की सब रीति साधन विषयक हैं; सब प्रकार की उनकी यह रीति सम्पादन कर यत्न
साधन सम्पन्नहैं।
प्रत्येक जनके लिये उनका यह, क्या यत्न रूपहै? सो विचारशीलोंके विचार रूप यत्न द्वारा,
विचारशीलजनोंका यह मुख्य कर्त्तव्य, विचार केवल यह विचार-सम्बन्धी रीतिपर सब को इस रूपमें यत्न
विचारवान् साधन द्वारा सब को प्राप्त कराने का यत्न करना चाहिये जिससे सब का सब प्रकार कल्याण हो
जिसपर सब प्रकार प्रत्येक जन का अधिकार हो सके, यही उपनिषदों द्वारा विशेष विचार सम्बन्धी यत्न
विचार को प्राप्त करानेके निमित्त सब प्रकार साधन रूपमें साधन सम्पन्न विचारकी रीति साधन की जाय
जिससे सब उपनिषदों का प्रचार सर्व प्रकार जन समाज को यथार्थ हितकर सिद्ध, सर्व प्रकारके जन समाज को
सब प्रकार कल्याण रूप साधन का कारण हो सके।
अधिकारप्रजाके लिये यह, विचारशील जन उपनिषदें साधनका रूप साध्यकर विचार सम्बन्धी
विषय प्रदान करें? प्रचार साधन द्वारा नास्तिक विचारका नाश हो सके? क्योंकि, जब नास्तिक विचार
साधन सब का सब नाश हो कर अधिकारि प्रजाका कल्याण होगा जिसका सर्वप्रकार सब अधिकार जन समाज
हितकर होकर यह साधन विशेष सम्बन्धी उपकारक सिद्ध होगा उपनिषदें विचारसम्पादनके लिये
ऐसा अधिकारप्राप्तजनोंके हित साधन द्वारा उपनिषदें सब को ऐसा विचार प्रदानकरके सब प्रकार कल्याण
विधान सम्पादित कर सकतीहैं जिसप्रकार, उस अधिकारप्रजाका इस रीतिद्वारा विचार साधन विशेष रूप
से सब जन समाज को सब रूपसे प्रदान हो, जिससे कि, सर्व प्रकार सब को अधिकारप्राप्तजनोंके
हित भाव का सब ओर लाभ प्राप्त हो सकेगा, जिससे यह उपनिषदों द्वारा विशेष विचार साधन समाज
कल्याणका विशेष होसके।
उपनिषदें विचारका रूप सब को सब प्रकार सब तरह प्रदान करनेका यत्न करती हैं;
इसलिये उपनिषदोंका स्वाध्याय सब जन समाजको सब रूप विचार सम्पन्न कर प्रचार रूपमें सब ओर
174

विचार करेगा, जरा ठहर कर बात करेगा या समय समय पर, इन दोनों बातों का ध्यान रखेगा,
तो कोई अपराध नहीं हो सकता और, इन दोनोंके न रहने-रहने मनुष्य अपने-को
अपने-आपसे लुटवाकर सर्वनाश कर लेगा अथवा ऐसा भटकेगा, कि उसका रास्ता
मिलना कठिन
न्यायाधिकरणमें यह देखा गया कि जो मनुष्य चंचल था, वह व्यर्थका ही मारा गया,
पर शान्तिवाला शान्त ही रहा
अमुकने मुझे यह कह दिया या ऐसे शब्द बोले गये--इस पर विचारवान्को न
रोष; न तो विचारवान्‌को रोष आवेगा क्योंकि वह उस पर विचारविचारकर ही आ
शक्ति का व्यय कर देगा और; न तो विचारवान्‌को किसीकी प्रशंसा या निन्दा की
आवश्यकता ही रह सकती है। वह दोनों बातो से परे; आत्मिक शान्ति पर दृष्टि रखने
वाला स्वयं सब में ही लय कर देगा या लय हो जायगा या परमात्माके रसमें मग्न होगा
सो, आत्मिक आनन्द का विचार करता हुआ चला जाय
जिसने मन और देह दोनों को वशमें कर लिया या जिसमें यह दोनों गुण आवे,
समझना चाहिए कि उसी मन में दया आ सकती दयाविचारपूर्वक ही मन में आ सकती
और दयालु-स्वभाव का तेज कभी नष्ट नहीं हो सकता और दया ही तो धर्म का रूप है,
सो दया ही उस जीव स्वरूप के साथ सदा रहे, दयाका रूप मनमें सदा विचार करे,
दयाविचार मन रूपी सरोवर निर्मल करके शुद्ध रूप में ही रूप स्थिर करे,
निर्मल मन... ! जिसने दया भावयुक्त कर्मों को ही सच्चा माना, दयाके विचारमें मन
लगाया तो उसका कल्याण निश्चय रूप सदा रहेगा जिसका मन दया ही दया का
चिन्तन करे तो वह कभी भी उस प्रभु स्वरूप के आनन्द का रस लेवे बिना नहीं रहेगा
दया स्वरूप का प्रकाश कभी घट नहीं सकता यह सदा ही एकसा ही रहेगा सो जीव
शान्त ही बना रहे; दयाके रूप अन्तर में प्रकाश का प्रकाश ही देखना चाहिए जीव
अथवा अन्तरके आनन्द को दयाके ही रूपमें ले, दयाविचारसे ही प्रभु मिले
सो जो रूप अन्तर में दया का आनन्द देगा सो देगा, पर सब कुछ दया ही; जो जो
रूप भी मन में दयाके आ सकें या दया स्वरूपका जो ध्यान परे व पा सके; जो जो
दयावान् के कर्म हों सो भी दयाके ही स्वरूप व पा सके; सो सो मन को दया ही दया
के रस में लय कर देवे; सो सो दया का रस सब रसो से परे पा सके या दया ही
स्वरूप व पा सके; सो सो रूप में दया के रस में मन जब लय होगा तब ही दया ही
दया सत्य का रूप ले लय हो जायगा जिससे दया अपने व पा सके या दया ही में
आनन्दमय रूप हो आनन्द-मय स्वरूप को देखेगा सो, आनन्द-मय दया का स्वरूप सदा
सत्य स्थिर कर जीवात्मा को प्रभु के रस रूप अमृत का अधिकारी या स्वामी
अब जो पुरुष अपने अन्तर दया के भाव को लेवे, दयाके भाव दो--एक
जीव पर दया करना या तो अपने अन्तरके दयाके भावको मन द्वारा चित्त में बैठाना
सब जीवों को, उस दयास्वरूप प्रभुका ही तो रूप समझना और सब जीव को एक
समान जान कर न अपने को बड़ा व न किसी को नीचा समझना; दूसरों सब को समान
रूप से ही देखना सो तो दया, सब जीवों प्रति, दूसरा दयाका रूप चित्त रूपमें
लय करना? --सो रूप दयाका चित्त रूप में, जब चित्त को प्रभु रूप कर के परमात्मा
स्वरूप का लय किया जाय तब ही मन में; अन्तर रूपमें दया चित्त का रस ले; दयाके
रसमें ही अन्तर मग्न बन जावे? दयाके सिवा और कुछ न! दयाके ही साथ दोनों
बातों का लय किया जाता रहा
पहला चित्त का, तो चित्त रूप में, दयास्वरूप समझ उस स्वरूप चिन्तन किया जा
कर ही परम शान्त चित्त या तो लय चित्त किया, जब सब ही दया स्वरूप देखा गया
एक स्वरूप रहा, परमात्मा स्वरूप सब में ही देखा या परमात्मा ही रूप
ज्ञान समझ चित्त लय किया सो, परमात्मा स्वरूप चित्त ही तो लय होकर ज्ञान
बना
"तो या दया दयाविचारपूर्वक या दया ज्ञानपूर्वक या दया जो, रूप जो परमात्मा
दयावान् स्वरूप है?"
समझना तो यह पड़ा कि जो दया स्वरूप रूप सब जीवों में, सोई स्वरूप
सब जीवों को परमात्मा रूप में, सोई स्वरूप परमात्मा का दयाविचारमें लय हुआ
रूप देखा गया अथवा सब जीवों को अपने, अपने रूप को सब जीवोंमें देखा गया सो
सो ही ज्ञान, दयाके द्वारा पाया गया, सो दया रूप सब ओर दया दृष्टि बनकर सब में
लय कर गई अथवा दयालु-स्वभाव का तेज बढ़ गया, जो दया-स्वभावका तेज बढ़
जीवात्मा को दयामय या दयालु बना गया; दयावान् स्वरूप का प्रकाश या रूप ही तो
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176

काम रूप धारण करके वह इन दोनों का रूप बना लेता था, जिससे कि, कभी राम रूप
का धोखा देकर सीता हरण, तो कभी परस्त्री का रूप देकर अन्य मुनि, तपस्वी और राज वर्ग का
सत्व हरण हो; इस रूप और माया शक्ति को कोई भी पहचान नहीं पाता था। इसलिए श्री
रामचन्द्र भगवान उसको पहचान कर सतर्क हो, जान कर, अपने दिव्य बाणों द्वारा नष्ट किए।
आज तक जितना कार्य माया शक्ति का था कार्य पूर्ण हुआ! राम नाम! जय श्रीनाम
नाम रूप, दोनों रूप परस्पर विलग किए भगवान का विरह भाव हो गया ? ज्ञानियों
द्वारा समाधान कर रहे हैं; प्रभु कृपा रूप जान, सब समाधान घट घट ज्ञान जाग
उठा
यह तो स्वभाव हुआ मायावी का; वह तो नित्य ही, काम भाव
प्रत्येक के भिन्न--भिन्न रूप में वास करके प्रत्येक जीवात्मा को गिरा रहा; यह
तो राम ही, नाम रूप ज्ञान शक्ति द्वारा माया शक्ति हरण कर, ज्ञानियों और
संतों को बचाकर प्रकाश फैलाते हैं। इस प्रकार से प्रभु श्री राम चरित में नाम
रूप, गुणमयी जो रूप नाम देखा, उसको ही सब रूप मान कर ही पद प्राप्त
कर-दिया गया, उस समय के विरह भाव से जो लीला हुई वह पूर्ण माया
शक्ति आधार रूप से ही न केवल विश्वामित्र और वसिष्ठादि को, वरन्
समस्त जन साधारण को, कल्याणकारी भाव प्रदान कर ज्ञान के प्रकाश द्वारा
प्रकाशित कर, नाम शक्ति बना दी गई!
ज्ञान स्वरूप प्रकाश से, समस्त जन रूप हो जा, ज्ञान का वास कर! पर
साधारण रूप नाम जान कर ही कोई जन नाम रूप में बंधा न रहेगा, ज्ञान तो
रूप से अधिक नाम का ही रूप जान कर धारण, प्रकाश रूप प्रकाश,
साधारण रूप प्रकाश ज्ञान का रूप धारण कर, प्रत्येक जीवात्मा, सब
जीवात्मा रूप हो कर प्रकाश का प्रकाशवान, दिव्य रूप प्रकाश
रूप में ही ज्ञान प्रकाश का वास हुआ ?
हां, प्रत्येक जीवात्मा स्वरूप, अज्ञानता रूपी अंधेरा, अज्ञानता रूपी
अज्ञान वासना प्रभाव से हटा कर ही यह संभव
प्रभु का साधारण रूप मात्र नाम रूप मान कर ही साधारण समझ कर
भूल न करो। इस रूप से परे ज्ञान का अगाध रूप केवल संतों का सत्संग
द्वारा समझ; ही नाम रूप का वास है! तब ज्ञान प्रकाश से सब भ्रम तथा
अज्ञानता रूपी पर्दा हटे; पर इसके लिए नाम जाप ही हर साधारण
द्वारा ही, यह साधारण ज्ञान जन-जन तक पहुंच सकता
इसलिए अज्ञान रूपी तम, केवल ही केवल ज्ञान रूप, उस परम प्रभु
रूप प्रकाश अगाध ज्ञान शक्ति से हटाना संभव है। यह रूप नाम
प्रकाश सब जगत का ही रूप बना... केवल ही तो नाम रूप--भाव की
साधारणता का त्याग, यह जान कर कर, केवल ही केवल नाम जाप ही सत्य;
केवल ही तो सत्य, नाम महिमा सब सत्य!
इस प्रकार परम् पद ज्ञान रूप राम स्वरूप सर्वत्र व्याप्त हो गया
कि नाम रूप प्रकाश स्वरूप जीवात्मा रूप में व्याप्त सब के कल्याण हेतु प्रकाश
का वास रूप में भगवान सब संशय रूपी भ्रम को दूर कर, अज्ञान,
अज्ञानता रूपी तम--अंधेरे रूपी अज्ञानता रूपी तम भाव को हटा कर
उस राम रूप राम-नाम शक्ति का वास रूप दिया गया
ज्ञान का यह मन-मस्तिष्क पर इस प्रकार प्रभाव पड़ा तथा पड़ा; जन
मानस तक यह प्रकाश ज्ञान का विस्तार रूप धारण, केवल, केवल ही राम
स्वरूप प्रकाश जाग उठा; सब भक्त समाज ज्ञान रूप धारण, सब संत,
जन सब ज्ञान नाम का ही ध्यान कर ज्ञान की अगाध ज्योति जग--उठी
प्रभु, सब को यह ज्ञान, ज्ञानमयी! केवल प्रभु नाम से, भगवान रूप से
केवल ही प्राप्त, वह कल्याण रूप ही अज्ञानता को दूर भगवान
मर्यादा का स्वरूप
अब तो ज्ञान प्रकाश व्याप्त हो अज्ञानता रूपी अंधेरा दूर हो कर अज्ञानता
रूपी तम का वास प्रत्येक के मस्तिष्क हृदय रूपी वास से मिटा कर ज्ञान
रूपी पथ पर ले जाने के लिए ही भगवान ने इस प्रकार अपने आप को मोह-
माया स्वरूप कर के ही त्याग कर, इस माया-पर वार कर के ज्ञान रूप ज्ञान
प्रकाश का वास जन रूप जीवात्मा रूप में वास करवा कर सदा सदा के
लिए ज्ञान प्रकाश का वास कर ज्ञान की अगाध ज्योति का प्रकाश सब के हृदय
में जो वास करा कर कल्याण कर के प्रभु राम स्वरूप का परम सत्य रूप
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179

पाप को छोड, परमात्मा संग प्यार कर, परमात्मा ही सच जान सब से बढ़ कर।
विचार ऐसा कर के अन्तर मेल नाश हो कर परमात्मा के दर्शन रूपी फल पावे
गा, जिस फल प्रभाव पापों का क्षय लग कर परमात्मा का प्रेम उपज कर अन्तर का
सब विकार भाव नाश रूप भानवे।
अब तो तू समझ कर विचार ऐसा हृदय धार जो संसार रूपी भ्रम से सच
कर, आप अपना काज खो कर जो तूने कर्म से परमात्मा रूपी अमृत
रूपी खजाने को बन्द कर के छोड़े? अज्ञाना प्रगट रूपी अज्ञान
रूपी पाषाण पर, जो प्रकटाया गया
जब तक मन का फेर, ना तो अन्तर ज्ञान हो सका; संसार का काम कर,
सब जगत भर का भार सिर पर लेकर तो क्या फल पा सका मन के फेर,
प्रगट कर, जो अज्ञानता संशय रूपी है? क्या तो मिला? क्या हाथ लगा?
सब-तो खाली चला गया जो तू कुछ काम न कर सका जो अन्तर का फेर
था सो तो न मिटाया पर और ही विचार किया, जिस कर के सब मन के
भ्रम का फेर मन विकार संशय रूप में लग कर जो जीव के विचार न लग
कर सब का सब, ना कुछ हाथ लग सका, अज्ञानता ही तो हाथ रही?
जिस को ज्ञान रूपी फल अन्तर का दर्शन पा कर सब काम से खाली
हो--ना अज्ञाना फल जान कर विचार से काम करे; जिस के घट का भ्रम
ज्ञान रूपी काम से नाश हो कर अन्तर रूपी ज्ञान का दर्शन हो, सो
सब से बड़ा है, जिस के अन्तर दया भाव का ज्ञान हो कर दया, उपकार
रूपी नाम को जान कर सब दया रूप में सब को एक भाव से सब का काम
करने से जाने सो।
ना कुछ कर, ना मन के फेर से अज्ञानता कर, देख तो, सब को जान, ना
भरम हो--जिस मन के अज्ञान रूपी संशय अज्ञानता विकार को त्याग कर
विचार तो कर जो अन्तर दया रूपी रूप का ज्ञान दाता अन्तर रूप दया
कर, ना तो अन्तर दया रूप का ज्ञान; अन्तर ही तो दया रूपी ज्ञान का फल
दया रूप, दया ही तो दया रूपी? सब का भला जो सब रूप सब
रूप का दाता--ना संशय कर न मन फेर; अन्तर ही जो दया रूप सब
का भला? संशय त्याग के सब में घट दया रूप संशय भ्रम अज्ञान
को दूर कर सब दया रूप जान के, अन्तर दया से सब पहचान?
ना भ्रम अज्ञानता में घट को जान ना दया से रहित घट को जान जो
बिना दया रूप सब घट व्यर्थ, शून्य जान!
घट का सब ज्ञान दया रूपी--भाव, काम-क्रोध का त्याग जो सब
घट रूपी दया रूप जान कर न विकार रूप दया को, अन्तर दयावान
जान ले! ऐसा ज्ञान पा कर, ऐसा विचारवान हो कर सब दया रूप
जान कर के सब घट का एक नाम जान कर त्याग, दया रूपी
घट का ज्ञान पा कर ऐसा जान दयावान रूप से जान, दया
रूप का सब रूप जान, ना सब घट ज्ञान रूप संसार के अज्ञान
का रूप जान कर अज्ञान रूप भ्रम को दूर कर सब में सब जान
जो सब घट दया रूप है, दया ही दया भान; दया ही दया से घट,
घट का ज्ञान जान
सब दयावान दयावान का प्रकाश सब पर दया कर दया रूप
दया रूप जान, दया अज्ञान, दया भ्रम, अज्ञानता नाश हो कर सब
का एक रूप जान कर अन्तर रूप को दयावान कर, सब दया जान।
दयावान के प्रकाश रूप, दयावान के प्रकाश दयावान सब घट,
घट रूप दया रूप में भान, ना तो कोई घट दया बिना दूजा सब घट
दया रूप दयावान के प्रकाश प्रकाश में; सब रूप में दया रूप, ना कि
दया बिन घट रूप दयावान के अन्तर प्रकाश में घट--ना घट, ना घट,
अज्ञान ना, ना घट, अज्ञानता ना, दया ना, दया ना, दया हो--ना दया
सब घट सब दयावान के, सब घट रूप में दया रूप, घट दया रूप
न हो तो दयावान रूप न जान, जो दया रूप में जान; दयावान का रूप
दया रूप जान, दयावान के रूप दया को, दया दयावान से घट घट
दया रूप घट घट के सब प्रकाश, सो सब दया रूप सब दया,
घट घट में दया का सब घट, सो दया ही दया रूप दया के घट जान
180

घट--घट सब जग व्यापि रहा सब विधि सम सबमें, रमती सो लीला न्यारी, सब
सबमें व्यापक लखकर जो सब विषय तजे, निष्काम भजे सो नर प्रभु
उस सच्चिदानन्द का जो अंश चेतन जीव कहलाया वह माया रचित जड़ देहके
मोह पाशमें बंध कर प्रभु अंश को भूल गया, मायाग्रस्त होकर घट--घट वासी प्रभु लीला
को भूल गया।
विचार करके देखो, जो सब विधि सब देहधारियों में सम, सब विधि व्यापक सो लीला
तो केवल उस सच्चिदानन्द प्रभु की अर्थात माया रचित संसार की तो केवल रचना है,
केवल मात्र जीव का आधार है, जो कि अनादिकाल से चली; इसका विस्तार तो केवल रचना
की लीला, सो लीला, जो केवल माया रूप का रूप मात्र है, इसलिए न्यारी कहलायी?
सो केवल मात्र उस प्रभु की, जो सब रचना न्यारी करके जो लीला का कर्ता, सो केवल
जो सर्व जगत व्यापकता का काम मात्र करके जगदीश्वर जीव का मन रूप हुआ
रचना रची, सो तो केवल जीव का मन ही विकार रूप माया को स्वीकारता सो वह जीव
केवल स्वरूप में भ्रम में पड़ कर माया भ्रम में प्रभुत्व लीला भुला गया।
सो इसका सार तो उस चेतन सच्चिदानन्द, जो केवल एक ही व्यापक सो सम सो सब
जीवधारियों का मोह विकल करके ही यह मन को जीव केवल विकार रूपी माया सम्मुख हो, सो
निराकार का रूप
सो केवल मात्र निराकार रूपी केवल ज्ञान के बिना सम्भव? सो जो अज्ञानता से उस
घट घट व्यापक सो सम लखकर सब मोह विषय जो माया के त्यागे; सो जो प्रभु
लीला मात्र साक्षात्कार करे, सो नर प्रभु पदवी पावे? सो वह जो सब विधि सम सो
लखे, सो केवल पद पावे सो, त्याग भाव रूपी होकर
उस पर कृपा प्रभु की पावे जो केवल सो समता पावे जिसको कि घट-घट
सब सम लखे, निष्काम भज केवल समता को प्राप्त हो सके, इसके बिना जीव
मोह काम क्रोध के विकार से ग्रसित होकर प्रभु अंश लखने को तैयार नहीं
उस का कारण प्रभु स्वरूप से विमुख हो जाता सो वह, जीव ही विषय वासना रूपी
सब विकार जगत विस्तार रूप में देखता हुआ प्रभु के सम्मुख होने में असमर्थ हो
के; जो निष्काम पद केवल प्रभु कृपा, प्राप्त करने स्वरूप को समझे, निष्काम न हो;
निष्काम केवल प्रभु कृपा ही? सो केवल निष्काम सो ही होता है, जिसके मन में
वासना विकार रूप का कोई लेश
मात्र, नहीं होता केवल एक ओ सच्चिदानन्द रूप लखा सो, न वासनायुक्त मन का कोई
विकार लखा, केवल प्रभु नाम आधार जो निष्काम हो प्रभु पद में मन लीन
केवल सो सम भाव केवल रूप में ही उस सम सच्चिदानन्द को लख ले, स्वयं
निष्काम सच्चिदानन्द के घट--घट सच्चिदानन्दमय रूप बने! सो सच्चिदानन्द कृपा
रूप सदा
स्वरूप के रूप में स्थिर हो वह प्रभु कृपा सच्चिदानन्दरूप में प्रभु रूप होकर
उस प्रभु सम ही स्वयं को लखने की शक्ति प्रभु कृपा द्वारा ही प्राप्त, इसके बिना
वासना विकार का लेश, केवल लेश ही विकल कर दे जो कि जीव को घट--घट
स्वरूप में लखने विकल घट--घट की माया में बांध देता रूप
केवल जीव स्वरूप प्रभु अंश विकार रूप लख कर प्रभु समता को त्याग
रूप लखे? अतः, केवल सो सम भाव केवल प्रभु समता को लख कर वासना
विकार से परे होना मात्र प्रभु; सो सच्चिदानन्द की कृपा-दृष्टि मात्र प्राप्त होकर लख
सकेगा जो कि प्रभु सब घट सम रस को सच्चिदानन्द निष्काम स्वरूप वासना रूप
के परे लखेगा, उस प्रभु स्वरूप
रूप होकर सच्चिदानन्द स्वरूप में ही लीन होगा
केवल प्रभु सब घट रस सम लखे जो प्रभु सो ही सच्चिदानन्द रूप प्रकाश को
लख कर सो निष्काम स्वरूप को लख कर ज्ञान रूप चेतन रूप प्रभु समता को लखेगा,
केवल यह जीव, सो प्रभु पद को प्राप्त कर सके, प्रभु पद को पावे रूप मात्र प्रभु को
सो लख सके प्रभु समता को जो प्रभु के ज्ञान रूप सब घट में रमण करने वाले प्रभु
प्रकाश को घट घट--घट में लखे, घट--घट में समता को लखने वाला ही
सहज मुक्ति को प्राप्त हो कर उस प्रभु ज्ञान घट में घट--घट व्याप्त घट लखे
रूप को प्रकाश रूप में प्रभु समता रूप लखने लगे! जहां सब में समता का ही
प्रकाश सब सम्मुख लख कर सब विकार का नाश हो वासना रूप भव भय दूर भागे
जिससे केवल सम्मुख प्रभु ही प्रकाश रूप दिखे सो सर्व घट में स्थित उस प्रभु
सच्चिदानन्द का ज्ञान ही सब को प्रभु ज्ञान रूप लखे, जहां सम्पूर्ण विकार नष्ट
हो, सच्चिदानन्दमय हो, घट घट, सच्चिदानन्द सो, सो घट--घट में ही प्रभु ज्ञान लखे
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