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सर्वकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 183 में से

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काम रूप धारण करके वह इन दोनों का रूप बना लेता था, जिससे कि, कभी राम रूप
का धोखा देकर सीता हरण, तो कभी परस्त्री का रूप देकर अन्य मुनि, तपस्वी और राज वर्ग का
सत्व हरण हो; इस रूप और माया शक्ति को कोई भी पहचान नहीं पाता था। इसलिए श्री
रामचन्द्र भगवान उसको पहचान कर सतर्क हो, जान कर, अपने दिव्य बाणों द्वारा नष्ट किए।
आज तक जितना कार्य माया शक्ति का था कार्य पूर्ण हुआ! राम नाम! जय श्रीनाम
नाम रूप, दोनों रूप परस्पर विलग किए भगवान का विरह भाव हो गया ? ज्ञानियों
द्वारा समाधान कर रहे हैं; प्रभु कृपा रूप जान, सब समाधान घट घट ज्ञान जाग
उठा
यह तो स्वभाव हुआ मायावी का; वह तो नित्य ही, काम भाव
प्रत्येक के भिन्न--भिन्न रूप में वास करके प्रत्येक जीवात्मा को गिरा रहा; यह
तो राम ही, नाम रूप ज्ञान शक्ति द्वारा माया शक्ति हरण कर, ज्ञानियों और
संतों को बचाकर प्रकाश फैलाते हैं। इस प्रकार से प्रभु श्री राम चरित में नाम
रूप, गुणमयी जो रूप नाम देखा, उसको ही सब रूप मान कर ही पद प्राप्त
कर-दिया गया, उस समय के विरह भाव से जो लीला हुई वह पूर्ण माया
शक्ति आधार रूप से ही न केवल विश्वामित्र और वसिष्ठादि को, वरन्
समस्त जन साधारण को, कल्याणकारी भाव प्रदान कर ज्ञान के प्रकाश द्वारा
प्रकाशित कर, नाम शक्ति बना दी गई!
ज्ञान स्वरूप प्रकाश से, समस्त जन रूप हो जा, ज्ञान का वास कर! पर
साधारण रूप नाम जान कर ही कोई जन नाम रूप में बंधा न रहेगा, ज्ञान तो
रूप से अधिक नाम का ही रूप जान कर धारण, प्रकाश रूप प्रकाश,
साधारण रूप प्रकाश ज्ञान का रूप धारण कर, प्रत्येक जीवात्मा, सब
जीवात्मा रूप हो कर प्रकाश का प्रकाशवान, दिव्य रूप प्रकाश
रूप में ही ज्ञान प्रकाश का वास हुआ ?
हां, प्रत्येक जीवात्मा स्वरूप, अज्ञानता रूपी अंधेरा, अज्ञानता रूपी
अज्ञान वासना प्रभाव से हटा कर ही यह संभव
प्रभु का साधारण रूप मात्र नाम रूप मान कर ही साधारण समझ कर
भूल न करो। इस रूप से परे ज्ञान का अगाध रूप केवल संतों का सत्संग
द्वारा समझ; ही नाम रूप का वास है! तब ज्ञान प्रकाश से सब भ्रम तथा
अज्ञानता रूपी पर्दा हटे; पर इसके लिए नाम जाप ही हर साधारण
द्वारा ही, यह साधारण ज्ञान जन-जन तक पहुंच सकता
इसलिए अज्ञान रूपी तम, केवल ही केवल ज्ञान रूप, उस परम प्रभु
रूप प्रकाश अगाध ज्ञान शक्ति से हटाना संभव है। यह रूप नाम
प्रकाश सब जगत का ही रूप बना... केवल ही तो नाम रूप--भाव की
साधारणता का त्याग, यह जान कर कर, केवल ही केवल नाम जाप ही सत्य;
केवल ही तो सत्य, नाम महिमा सब सत्य!
इस प्रकार परम् पद ज्ञान रूप राम स्वरूप सर्वत्र व्याप्त हो गया
कि नाम रूप प्रकाश स्वरूप जीवात्मा रूप में व्याप्त सब के कल्याण हेतु प्रकाश
का वास रूप में भगवान सब संशय रूपी भ्रम को दूर कर, अज्ञान,
अज्ञानता रूपी तम--अंधेरे रूपी अज्ञानता रूपी तम भाव को हटा कर
उस राम रूप राम-नाम शक्ति का वास रूप दिया गया
ज्ञान का यह मन-मस्तिष्क पर इस प्रकार प्रभाव पड़ा तथा पड़ा; जन
मानस तक यह प्रकाश ज्ञान का विस्तार रूप धारण, केवल, केवल ही राम
स्वरूप प्रकाश जाग उठा; सब भक्त समाज ज्ञान रूप धारण, सब संत,
जन सब ज्ञान नाम का ही ध्यान कर ज्ञान की अगाध ज्योति जग--उठी
प्रभु, सब को यह ज्ञान, ज्ञानमयी! केवल प्रभु नाम से, भगवान रूप से
केवल ही प्राप्त, वह कल्याण रूप ही अज्ञानता को दूर भगवान
मर्यादा का स्वरूप
अब तो ज्ञान प्रकाश व्याप्त हो अज्ञानता रूपी अंधेरा दूर हो कर अज्ञानता
रूपी तम का वास प्रत्येक के मस्तिष्क हृदय रूपी वास से मिटा कर ज्ञान
रूपी पथ पर ले जाने के लिए ही भगवान ने इस प्रकार अपने आप को मोह-
माया स्वरूप कर के ही त्याग कर, इस माया-पर वार कर के ज्ञान रूप ज्ञान
प्रकाश का वास जन रूप जीवात्मा रूप में वास करवा कर सदा सदा के
लिए ज्ञान प्रकाश का वास कर ज्ञान की अगाध ज्योति का प्रकाश सब के हृदय
में जो वास करा कर कल्याण कर के प्रभु राम स्वरूप का परम सत्य रूप
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