अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंविचार करेगा, जरा ठहर कर बात करेगा या समय समय पर, इन दोनों बातों का ध्यान रखेगा,
तो कोई अपराध नहीं हो सकता और, इन दोनोंके न रहने-रहने मनुष्य अपने-को
अपने-आपसे लुटवाकर सर्वनाश कर लेगा अथवा ऐसा भटकेगा, कि उसका रास्ता
मिलना कठिन
न्यायाधिकरणमें यह देखा गया कि जो मनुष्य चंचल था, वह व्यर्थका ही मारा गया,
पर शान्तिवाला शान्त ही रहा
अमुकने मुझे यह कह दिया या ऐसे शब्द बोले गये--इस पर विचारवान्को न
रोष; न तो विचारवान्को रोष आवेगा क्योंकि वह उस पर विचारविचारकर ही आ
शक्ति का व्यय कर देगा और; न तो विचारवान्को किसीकी प्रशंसा या निन्दा की
आवश्यकता ही रह सकती है। वह दोनों बातो से परे; आत्मिक शान्ति पर दृष्टि रखने
वाला स्वयं सब में ही लय कर देगा या लय हो जायगा या परमात्माके रसमें मग्न होगा
सो, आत्मिक आनन्द का विचार करता हुआ चला जाय
जिसने मन और देह दोनों को वशमें कर लिया या जिसमें यह दोनों गुण आवे,
समझना चाहिए कि उसी मन में दया आ सकती दयाविचारपूर्वक ही मन में आ सकती
और दयालु-स्वभाव का तेज कभी नष्ट नहीं हो सकता और दया ही तो धर्म का रूप है,
सो दया ही उस जीव स्वरूप के साथ सदा रहे, दयाका रूप मनमें सदा विचार करे,
दयाविचार मन रूपी सरोवर निर्मल करके शुद्ध रूप में ही रूप स्थिर करे,
निर्मल मन... ! जिसने दया भावयुक्त कर्मों को ही सच्चा माना, दयाके विचारमें मन
लगाया तो उसका कल्याण निश्चय रूप सदा रहेगा जिसका मन दया ही दया का
चिन्तन करे तो वह कभी भी उस प्रभु स्वरूप के आनन्द का रस लेवे बिना नहीं रहेगा
दया स्वरूप का प्रकाश कभी घट नहीं सकता यह सदा ही एकसा ही रहेगा सो जीव
शान्त ही बना रहे; दयाके रूप अन्तर में प्रकाश का प्रकाश ही देखना चाहिए जीव
अथवा अन्तरके आनन्द को दयाके ही रूपमें ले, दयाविचारसे ही प्रभु मिले
सो जो रूप अन्तर में दया का आनन्द देगा सो देगा, पर सब कुछ दया ही; जो जो
रूप भी मन में दयाके आ सकें या दया स्वरूपका जो ध्यान परे व पा सके; जो जो
दयावान् के कर्म हों सो भी दयाके ही स्वरूप व पा सके; सो सो मन को दया ही दया
के रस में लय कर देवे; सो सो दया का रस सब रसो से परे पा सके या दया ही
स्वरूप व पा सके; सो सो रूप में दया के रस में मन जब लय होगा तब ही दया ही
दया सत्य का रूप ले लय हो जायगा जिससे दया अपने व पा सके या दया ही में
आनन्दमय रूप हो आनन्द-मय स्वरूप को देखेगा सो, आनन्द-मय दया का स्वरूप सदा
सत्य स्थिर कर जीवात्मा को प्रभु के रस रूप अमृत का अधिकारी या स्वामी
अब जो पुरुष अपने अन्तर दया के भाव को लेवे, दयाके भाव दो--एक
जीव पर दया करना या तो अपने अन्तरके दयाके भावको मन द्वारा चित्त में बैठाना
सब जीवों को, उस दयास्वरूप प्रभुका ही तो रूप समझना और सब जीव को एक
समान जान कर न अपने को बड़ा व न किसी को नीचा समझना; दूसरों सब को समान
रूप से ही देखना सो तो दया, सब जीवों प्रति, दूसरा दयाका रूप चित्त रूपमें
लय करना? --सो रूप दयाका चित्त रूप में, जब चित्त को प्रभु रूप कर के परमात्मा
स्वरूप का लय किया जाय तब ही मन में; अन्तर रूपमें दया चित्त का रस ले; दयाके
रसमें ही अन्तर मग्न बन जावे? दयाके सिवा और कुछ न! दयाके ही साथ दोनों
बातों का लय किया जाता रहा
पहला चित्त का, तो चित्त रूप में, दयास्वरूप समझ उस स्वरूप चिन्तन किया जा
कर ही परम शान्त चित्त या तो लय चित्त किया, जब सब ही दया स्वरूप देखा गया
एक स्वरूप रहा, परमात्मा स्वरूप सब में ही देखा या परमात्मा ही रूप
ज्ञान समझ चित्त लय किया सो, परमात्मा स्वरूप चित्त ही तो लय होकर ज्ञान
बना
"तो या दया दयाविचारपूर्वक या दया ज्ञानपूर्वक या दया जो, रूप जो परमात्मा
दयावान् स्वरूप है?"
समझना तो यह पड़ा कि जो दया स्वरूप रूप सब जीवों में, सोई स्वरूप
सब जीवों को परमात्मा रूप में, सोई स्वरूप परमात्मा का दयाविचारमें लय हुआ
रूप देखा गया अथवा सब जीवों को अपने, अपने रूप को सब जीवोंमें देखा गया सो
सो ही ज्ञान, दयाके द्वारा पाया गया, सो दया रूप सब ओर दया दृष्टि बनकर सब में
लय कर गई अथवा दयालु-स्वभाव का तेज बढ़ गया, जो दया-स्वभावका तेज बढ़
जीवात्मा को दयामय या दयालु बना गया; दयावान् स्वरूप का प्रकाश या रूप ही तो
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