अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपनिषदोके स्वाध्यायके सम्बन्धमें यह विचारणीय बात अवश्य प्रतीत होतीहै किन्तु क्या यह सर्व
साधारण अधिकारप्राप्तजनोंके लिये विचार की आवश्यकता का विषय है? कदापि नहीं, सदा यह विषय विचारशील
विद्वानोंका रहा?
विचारशील जनोंने वर्तमान सामयिक विचार कर इसका विचारकिया भी, सामयिकजनोंको अधिकार सम्पादित कराने का
एक मात्र उपाय वर्तमान सामयिक प्रचार विचार कर ही यह निश्चय कर जो दिया सो किया ही समझिये क्योंकि विद्वानोंका
कर्त्तव्य यही होताहै।
इसमें सन्देह, विचारशील जन कभी नहीं कर सकते कि उपनिषदें केवल विचार प्रधान साधन हैं इसलिये, यह
कर्म, भक्ति दोनोंका, केवल विचारपरक साधन ही उपदेश करसकतीहैं कर्मोपासनाका विचारतो, चाहे जिस धर्मका हो
सम्प्रदाय, चाहे जिसका, विचार उपनिषदें ही, साधन का विचार कर ही निर्णय करतीहैं इस प्रकार विचारशील कह
सकतेहैं; इसलिये विचार विचार का विषय केवल विचार रहा न कि कर्म उपासनाका इस लिये प्रचार की इस विषय
विचार-सम्बन्धी साधन प्रक्रिया रूप उपदेश पर प्रचारक जन विशेष ध्यान रक्खें, जिससे यह सिद्ध होगाकि किसीके
सम्प्रदाय उपासनादिमें आक्षेपका भय किसीको नहोसके जिससे, अधिकारिप्रजाका, एक नियम रूप
विचार पद्धति पर प्रचार-प्रसार होकर कल्याण, विशेष कर वर्तमान सामयिक विचार प्रचारकका विचार
निश्चयपूर्वक, अधिकारसम्बन्धी भ्रम को दूरकरके प्रचारित कियाजाय, जिससे जन समाज विशेष कर उपनिषदों की ओर
आकर्षित, होकर कल्याण का पथ ग्रहण करे, विचारका यह मुख्य साधनहै।
प्रत्येक विचार साधन का प्रथम उद्देश्य, भ्रम का नाश कर यथार्थ रूप में प्रकाश डाल उसका यथार्थ रूप
प्रकाशित करना जिस प्रकार का यह मुख्य धर्महै उसी प्रकार जनसाधारण सर्वप्रकार अधिकार प्राप्त उपदेश प्रचारक
जन का मुख्य कर्त्तव्य होना चाहिये जिसको वह सर्वथा सम्पादन करते हुए निष्पक्ष होकर, उस उपनिषद् ज्ञान
विचार को सत्य रूप से; सब प्रकारके जन समाज को--जो विषय जिस समाजके जिस रूपमें सिद्ध होताहो,
न पक्षपात निष्पक्ष रूप से, न आग्रह करके, न सम्प्रदायगत स्वार्थ--सिद्धिपरक विचार कर निष्पक्ष सर्वोपकारी
विचार-प्रणाली पर सब को उपदेश करें, इस प्रकार यत्न करनेपर सर्वजन समाजका उपकार हो सकताहै
जिसके लिये प्रत्येक जन सर्व प्रकार से यत्न साधन कर सकताहै उपनिषदोंके स्वाध्याय विचार प्रचारकी ऐसी रीति
सर्वथा जिस रूपमें सब जन समाजके लिये एक यत्न रूप से सब की सब प्रकार, कल्याण दायिनी होकर
उपकारिका का साधन बनेगी।
उपनिषदें केवल आस्तिकोंका धन हैं? --केवल आस्तिक जनका ही उपनिषदें धन नहीं कही जासकतीं
क्यों! क्योंकि उपनिषदें प्रत्येक प्रकार के उन सब समस्त नास्तिक विचारवालों को भी ऐसा यत्न रूप उपदेश
विचार प्रदान करती हैं? जो नास्तिक विचार सम्बन्धी उपदेश विचारहैं सो, सब उपनिषदों का विचार,
विचारके उस साध्यको सब साधन, प्रकारके द्वारा सत्य रूप कर सर्व आस्तिकोंको उपनिषदें साधन रूप होकर देतीहैं
इस प्रकारसे सब को यह उपदेश देतीहैं कि उपनिषद् एक न केवल आस्तिक जनके उपकारके लिये साधन रूप हैं
उपनिषदें सब की सब प्रकार से यत्न हैं! उपनिषदों का यही मुख्य विचार सब जनके हित साधन सम्बन्धी
सत्यभाव प्रमाणित कर रहाहै यद्यपि? आज कल नास्तिक विचारका प्रचार, सम्प्रदाय विचार-सम्बन्धी
रूप विशेषके रूप विचारका सर्वसाधारणमें प्रचार जन समाजके मन को भ्रम युक्त कररहाहै जिसके द्वारा बहुत कुछ
हानि समाज की हो रहीहै विचारका यह मुख्य विषय है।
उपनिषदें सब प्रकार की सब रीति साधन विषयक हैं; सब प्रकार की उनकी यह रीति सम्पादन कर यत्न
साधन सम्पन्नहैं।
प्रत्येक जनके लिये उनका यह, क्या यत्न रूपहै? सो विचारशीलोंके विचार रूप यत्न द्वारा,
विचारशीलजनोंका यह मुख्य कर्त्तव्य, विचार केवल यह विचार-सम्बन्धी रीतिपर सब को इस रूपमें यत्न
विचारवान् साधन द्वारा सब को प्राप्त कराने का यत्न करना चाहिये जिससे सब का सब प्रकार कल्याण हो
जिसपर सब प्रकार प्रत्येक जन का अधिकार हो सके, यही उपनिषदों द्वारा विशेष विचार सम्बन्धी यत्न
विचार को प्राप्त करानेके निमित्त सब प्रकार साधन रूपमें साधन सम्पन्न विचारकी रीति साधन की जाय
जिससे सब उपनिषदों का प्रचार सर्व प्रकार जन समाज को यथार्थ हितकर सिद्ध, सर्व प्रकारके जन समाज को
सब प्रकार कल्याण रूप साधन का कारण हो सके।
अधिकारप्रजाके लिये यह, विचारशील जन उपनिषदें साधनका रूप साध्यकर विचार सम्बन्धी
विषय प्रदान करें? प्रचार साधन द्वारा नास्तिक विचारका नाश हो सके? क्योंकि, जब नास्तिक विचार
साधन सब का सब नाश हो कर अधिकारि प्रजाका कल्याण होगा जिसका सर्वप्रकार सब अधिकार जन समाज
हितकर होकर यह साधन विशेष सम्बन्धी उपकारक सिद्ध होगा उपनिषदें विचारसम्पादनके लिये
ऐसा अधिकारप्राप्तजनोंके हित साधन द्वारा उपनिषदें सब को ऐसा विचार प्रदानकरके सब प्रकार कल्याण
विधान सम्पादित कर सकतीहैं जिसप्रकार, उस अधिकारप्रजाका इस रीतिद्वारा विचार साधन विशेष रूप
से सब जन समाज को सब रूपसे प्रदान हो, जिससे कि, सर्व प्रकार सब को अधिकारप्राप्तजनोंके
हित भाव का सब ओर लाभ प्राप्त हो सकेगा, जिससे यह उपनिषदों द्वारा विशेष विचार साधन समाज
कल्याणका विशेष होसके।
उपनिषदें विचारका रूप सब को सब प्रकार सब तरह प्रदान करनेका यत्न करती हैं;
इसलिये उपनिषदोंका स्वाध्याय सब जन समाजको सब रूप विचार सम्पन्न कर प्रचार रूपमें सब ओर
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