अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
व्यवस्था का भार जिस पुरुष विशेषके अधिकार में हो वह राजा कहावे, प्रजाके सुख दुःख
देखना ही जिनका काम हो, प्रजाके रक्षण का जिम्मा, सो सब राजा का काम
इत्यादि प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि महाराज दशरथ के अधिकार में सब काम
ठीक ही था जो उस पर दोष धरे, राजा सब बात में प्रजाके आधीनार्थ न्याय युक्त
प्रजागण के सुख हित को ही परम न्याय वा कर्त्तव्य-कर्मनिष्ठ
समझ अपनी स्त्री वियोग के दुःखको सहते प्रजाके लिये ऐसा शोक महा-दुःख सह
ऐसा कर्तव्यनिष्ठ हुए?
सो संक्षेप उत्तर सुनो
सो यों है, राजा सब बात में प्रजाके आधीनार्थ न्याय--वा प्रजाका प्रबन्ध
तो अवश्य ही, प्रजा हित सर्व
कार्य्यार्थ प्रबन्धका काम तो था परन्तु ऐसा तो न था कि जो बात, प्रजा
कहे वही सर्वथा स्वीकार्य्य हो, राजा सब बात न्याय, धर्मयुक्त, नीति, कर्म-
वाद, विचार, प्रत्यक्ष, सत्य, शास्त्र, प्रमाण, युक्तियों से विचारता था, ऐसा अन्धा
धुन मन--मुख ना करता, अविचारित, अन्यायी बातको राजा सर्व प्रजाके ही क्या
सब लोक भर के भी मत को मान कर जो काम ना होय वह कदापि नही कर सका
राजा ज्ञान, वैराग्यवान् परम धीर, सो काम प्रजाके ही सुख के लिये सर्वथा
नही करता जिस काम का फल लोक-परलोक दोनों को दुःख रूपी नरक दायक होने
प्रजाका जिस पर केवल भ्रमरूप ही, भय था, जिसका यथार्थ निराकरण
राजा और प्रजागणने सब, राजा और प्रजा--के प्रबन्धार्थ प्रजाके ही मन-
मत पर छोड़ दिया निष्पाप सीताजीको त्यागने से, सर्व प्रजा सम्बन्धी सब प्रजा
मण्डल का काम सब राजा, प्रजा, न्याय, नीतिप्रबन्ध, जो सब था, सब नष्ट
भ्रष्टता, अनर्थक सर्व ही हो सकता सिद्ध
प्रजाके प्रबन्ध के नियमों से तो यह बात थी, राजा सब प्रजाके
आधीनार्थ न्याय का प्रबन्ध तो, उसके प्रत्येक न्याय नीति विषयक कार्य्यों में
अवश्य होता परन्तु प्रजा सर्व विषयके अनधिकारिणों के हाथों सब ना छोड़ा
जाता है, इसका प्रमाण? यथा राजा को प्रजागणके सब काम करने पड़ते हैं; सब
प्रजाके ही तो सब काम हैं, सो भी सब प्रजा कहे, तो भी यह काम नहीं होता
कि प्रजा कहे कि चोरी करने पर न दण्ड दिया जावे वा जो जिस पर डाका मारे सो
ना तो दिया जा वा सर्व काम सर्व प्रजाके लिये छोड़ दिया, फिर तो सब काम प्रजा
ही का बिगड़ कर सब सर्व ही नाश होना सिद्ध होवे सो राजा ऐसा कभी अपने मन
नावे
सो प्रजाके प्रबन्ध का नियम सब शास्त्र सब न्याय, प्रमाण से, यों
रहा सिद्ध हुआ
सो यह दूसरा कारण तिस भ्रम भर से जो हुआ सो सब न्याय वा कर्त्तव्य-धर्मनिष्ठा,
कार्य्याकार्य्यके वा प्रबन्धके नियमों के सर्वथा विरुद्ध सर्व अन्यायी
सिद्ध होता है, जो अज्ञानान्ध सब, भ्रम कार्य्यकारी प्रजा सम्बन्धके
बहकावे मात्र सर्व राज नियम ना हो सका विचारता, फिर कर्त्तव्यता कैसी; सब
भ्रम त्याग कर सब न मान कर, व अपनी परम कर्त्तव्य-कर्मनिष्ठा बात को ही
सर्वथा ही पालन कर सका था।
दूसरा यह भी विचारने का बात सिद्ध प्रजाके प्रबन्ध--नियमों से
सब प्रजा और प्रजाके प्रबन्ध--नियमों के आधीन सर्व प्रजा कार्य्य सम्बन्ध
सम्बन्धी पुरुष, केवल व्यवस्था प्रबन्ध के नियमों से ही आधीन सब प्रबन्ध
सम्बन्धी हो कर, सदा सब व्यवस्था सब काम में, प्रजा परस्पर मिल कर अपने
प्रबन्ध कार्य्य सब वा व्यवस्था-सम्बन्धी सब काम को कराती, प्रजा को ही
आज्ञा सब पर ही सदा प्रबन्ध सम्बन्धी सब, परस्पर सब, प्रबन्ध सम्बन्धी सर्व
पर, ही ही प्रजाका सब पर हाथ रहता वा प्रबन्ध--नियमों की आज्ञा प्रजा ऊपर
सब काम सब प्रजा करती सब थी, उस सब बात को छोड़कर, इस बात सबही
ना बात का सर्व काम प्रजा जन-वर्ग के आधीन तो ना था कि केवल १ प्रजावर्ग
की बात पर ही राजा सब काम करने उद्यत वा प्रबन्ध का कर्त्ता
सो सब बात भी भ्रम भर, वा धोखे का काम रहा, सब न्याय वा नीति से
परे रहा, ना तो सब प्रमाण सिद्ध; ना तो कोई न्याय; सब बात सर्वथा अशुद्ध;
111
इस पर रावण के मामा मारे गये और अनेक राक्षस व्याकुल होकर रण से भागने लगे तब यह
देखकर यह भी रण को चल पड़ा।
उस समय विभीषण राम जी से प्रार्थना कर के कहने लगे कि हे राम जी इस का नाम
वज्रदंष्ट्रक निशा चर है। यह महाबली और यह मायावान् विद्या युक्त है। यह मायावी
लङ्का पति का मन्त्री भी कहला कहाता है; सो हे वीर, राक्षस सब कपट को जान्ने
वाले हैं, इन पर सो; कपट विद्यायुक्त; कपट रस-भरपूरयुक्त; हो शस्त्र बल, सम्बल
युत
निज भुजबन्ध कठोर निज बाण सहाय सहाय। कपि दल मार भार सोइ
गिरा गिराय सो यह ॥ इति राम कथायां लङ्का काण्डे, रावण का सेनापति, वज्रदं
ष्ट्र राक्षस का संग्राम और बाण वर्षा से कपि कटक भंग
सो सुन कपि चंचल, विरचत दल रण रंग।
कपि अङ्गद बलवान्, सम्मुख ह्वै रण रंग॥
सो बाण वर्षा से जब कपि, कटक विकल होकर रण से भाग चला तो अङ्गद जी
कूद कर रणक्षेत्र में आय कर सब को पुकारा
कहां जाते हो तुम सब शूर शूरमा होकर भागते हो अपने कुल को लजाते
और शूरता के बल को कलंक लगाते हो। सब पीछे फिरो हमारी शरण आओ, यह
जो बाण वर्षा कर कपट विद्या से रण कर रहा है इसको अभी मिटाता
इतना कह कर अङ्गद महाबली रण में आया सो हाथ में एक वृक्ष ले बाणों
के जाल को काटता हुआ वज्रदंष्ट्र के रथ पर आ पहुंचा। और रथ को एक वृक्ष से मारा
जिस से वज्रदंष्ट्र रथ छोड़ गदा ले नीचे कूद पड़ा। तब दोनों में बड़ा भारी युद्ध
होने लगा। अङ्गद जी का हाथ जब खाली था तब वज्रदंष्ट्र ने एक गदा अङ्गद
पर, चलाई सो उस वार को अङ्गद जी ने बचा लिया। जब अङ्गद जी खाली हाथ
देखे, राक्षस ने गदा चलाई तब अङ्गद जी ने भी, उस राक्षस को दोनों हाथ
पकड़ कर उस की गदा छीनी
गदा से उस को मारना चाहा। तब उस ने ढाल से गदा के वार को रोक
लिया सो वार खाली न गया। ढाल के दो टुकड़े हो गये, तलवार से वार भी अङ्गद
जी पर किया सो; तलवार पकड़ अङ्गद हाथ से छीन फेंकने लगे वज्रदंष्ट्र आगे
बढ़ अङ्गद छाती ऊपर मुष्टिका प्रहार किया। तब अङ्गद ने एक मुष्टि से
उस दुष्ट राक्षस कपटी को पृथ्वी पर गिरा दिया सो पृथ्वी पर गिरते ही फिर
उठ खड़ा हुआ सो देख अङ्गद जी ने तलवार से उस का सिर काट दिया; फिर तो राक्षसों
की सेना, जो बची, सो भागी, उन पर कपि दल
सो सब कपि लङ्का सम्मुख भागि परे।
कपि अङ्गद सुजान, सम्मुख ह्वै मारि डरे॥
सो बाण कटक के मारे से, रावण के सेनापति वज्र दंष्ट्र मारे जाने पर
राक्षस सेना लङ्का को भागी, तब, रावण, विभीषण के वचन सुन कर कपि
दल फिर गया और कपि कटक से, बचे जो राक्षस अपने प्राण बचा कर लङ्का
भागे थे, सो रावण के दरबार में कहने लगे कि हे देव सब सेना को कपि दल
मार, बाण वर्षा निष्फल कर गया
सो यह सुन कर रावण, मस्तक हिला कर उस सम्पूर्ण कथा को सुन क्रोध
से कांप उठा सो फिर अपने एक शूर वीर अकम्पन नामक सेना पति को रण को भेजा;
यह बाण चलाने में बड़ा निपुण था इस का सारा बल बाण विद्या पर ही निर्भर था;
सो यह बाण विद्या से जब बाण बरसाने लगा तब कपियों का दल घबराया, सो सब
दल अङ्गद के पास भाग कर आया, सो यह अकम्पन भी बाण वर्षा करता हुआ
आगे को बढ़ा, तब कपि दल भाग कर हनुमान् के पास गया और कहने लगे, हे
वीर रक्षा करो, दल पर!
सो सुन कर पवन--सुत रण में अकम्पन को मारकर कपि दल को शरण
दी फिर रण का रंग देख
सो सुन कपि चंचल, विरचत दल रण रंग।
कपि हनुमान् महान्, सम्मुख ह्वै रण रंग॥
सो जब ऐसा कपि दल को विकल देख कर देखा तो, हनुमान् सब से आगे
बढ़ हाथ एक वृक्ष ले अकम्पन की ओर चले सो अकम्पन ने उस को आते देख बाण
वर्षा से वृक्ष के, टुकड़े टुकड़े कर दिये फिर उस वृक्ष को फेंक दूसरे वृक्ष
को हनुमान् जी अकम्पन पर फेंकने लगे, सो उस बाण विद्या वाले ने उस वृक्ष
को तलवार से काट दिया तब एक भारी वृक्ष, जो बहुत से फल
112
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इस प्रकार सभी आश्चर्यचकित होकर, परस्पर बोले, अवश्य देखकर, यह गणेश, प्रथम
पूजनीय देव ही हो यह प्रकट हुए, जो मनुष्य इन को न प्रथम पूजे, विघ्नेश्वरदेव उसे,
ऐसा स्वरूप कर देते फिर कभी मनुष्य स्वरूप नहीं पाते; ऐसा जान सभी गणेश
जी के पाद पद्म सिर नवाकर और सब जगत्पति जगदाधार ब्रह्मा विष्णु आदि देवता
दोनों कर जोड़े हाथियों सहित उस हाथी स्वरूपधारी को विनय करने लगे, हे देव
जगत् के जो विघ्नकर्ता अथवा जो जो स्वरूप धारण किया सोई तुम्हारा रूप
सर्वविदित सब को भय नाशक हुआ, सो सो स्वरूप तुम्हारा पूजें; तुम्हारी जो
पूजा निष्काम मन करके विघ्न नाश हेतु से करे अथवा सकाम अपने मन की मनोकामना
को शीघ्र पावे; ऐसा कह सब अपने अपने धाम को गये।
द्वितीय अध्याय में यह कथा विस्तार से कही गई कि पार्वती गणेशजी
सहित, स्नान करने को गई गंगाजी के तट बैठकर विचारने लगीं कि गणेशजी जब तक
गृह पर रहे किसी को भय नहीं हुआ जब से यह कैलाश पर्वत पर आये सब को भय व भ्रम
का विस्तार बना सो कुछ न कुछ उपाय ढूंढना योग्य है जो भय निवारण हो, यह
विचार के गंगाजी तट पर महादेवालय से जल ला कर पूजा की, स्नान
उपरान्त उस जल वस्त्र व अंगों का मैल धो डाला, गंगा जी के तट पर जो पुतला
बनाया
सो केवल पुतला रूप ही न देखकर दो नेत्रों से विचारने लगे कि ऐसा रूप
किसी का कभी नहीं देखा जिसने त्रिलोकी को मोहित किया; इसमें प्राणदान
देकर कौन कष्ट को न पावेगा सो तो जल ही में बहाना योग्य विचारकर गंगा में
फैंक दिया, गंगा स्वरूप से उत्पन्न हुआ जल में से न निकला, गंगा पार्वती
का विचार दोनों के मनन करने से दोनों का एक पुत्र उत्पन्न हुआ सो सब जीव
भक्षण
करने लगा सो जो जो उस स्वरूप को जो जो पुकारते, सब को गंगा
पुत्र ही कह कर पुकारते रहे सो यह न कहकर कि गणेशजी का रूप
सब को यह है? सब के स्वरूप से उत्पन्न हुआ दोनों के दो नाम कर सब को
इस सब बात विदित हुई, दो नाम एक व नाम सब
भिन्न-भिन्न स्वरूप नाम भिन्न-भिन्न होने पर गणेशजी कहलाये सो,
भिन्न-भिन्न स्वरूप धारे अनेक प्रकार कथन किया, विनायक स्वरूप सब के
मनोरथों को पूर्ण करने का रूप बताया यह सब स्वरूप दोनों ने देखा
सो सत्य माना; फिर सब विघ्न निवारण करने पर दो ही नाम रहे एक
द्वै-मातु कहलाये जो सब पर कृपा करने, विनायक सो जो विघ्न को
दूर करते हैं, सो विचारकर सब देवता लोग, जो जो नाम जिसे रुचिकर
हुआ पुकारे? सो शिव पार्वती ने सब रूप को देख व दो स्वरूप मान सब
विघ्न नाश कर सब कुछ दिया ऐसा जानकर विचारते, सब उस स्वरूप
को नमस्कार करते हुए सब सुख पाये सो गणेशजी दोनों स्वरूप धारे
सो इस प्रकार सब सब को दो रूप से सब को सहायता करते--तो सब
देवताओं ने एक द्वैमातुर नाम धर उत्सव के साथ शिव गणों सहित
सब रूप पूजा की।
इति द्वितीय अध्याय
114
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115
जाएगा, चाहे वह किसी तरफ जाए, चाहे वह इस बात समझे बिना मरेगी, चाहे वह समझ पाए,
प्रयोजन यह नहीं
प्रत्येक विचार, चाहे किसी रूप में हो, चाहे वह एक रूप रहा और फिर बदल कर गया
हो, चाहे वह रूप जो सब कुछ देख रहा था और उस रूप का हिस्सा था जिसे उसने देखा
गया हो, कभी नहीं होगा; चेतनागत होना भिन्न है, चेतनागत होना भिन्न है;
चेतनागत होना भिन्न है, चेतनागत बदलना भिन्न चीज
जब तक हम उस हिस्से तक नहीं आ जाते जहां हम यह अनुभव करते हैं कि हम उस
समग्र प्रवाह का भाग, जिसे हम मन कहते हैं बल्कि हम उससे भी आगे चले जाते हैं
सामान्य दिशा, तो जो कुछ होता हुआ हम देखते हैं, चेतनागत उलट-फेर, चेतनागत
उतार-चढ़ाव इत्यादि उस सब पर हम हंस सकते हैं। चेतनागत समस्याओं सुलझाने का यह
एक ढंग मन का हिस्सा हो सकता है लेकिन जब मन शांत होता है तब मन के तल
की समस्याओं को सुलझाने जैसी कोई समस्या ही नहीं बचती
इसी तरह एक ही चेतना के भिन्न स्तरों पर जो कुछ होता है वह चेतना स्वयं है, जो
सब कुछ देख रही होती है। चेतना के इस अवलोकन रूप को जब हम पहचान लेते हैं
विचारों के स्तर पर जो कुछ घटित होता है तब सब कुछ समझ में आता है। लेकिन जब
हम विचारों के स्तर पर, जो सब कुछ घट रहा होता है उस पर ध्यान ही नहीं दे सकते
तब विचारों द्वारा सब कुछ समझने की चेष्टा व्यर्थ, दिशाहीन व भ्रामक
किसी तरह विचारों द्वारा तो हम दो-चार मिनटों तक ध्यान लगा सकते
हैं, फिर हम पहले ही की तरह--या कहें कि मन जिस तरह से चल रहा था उसी में,
विचारों की भिन्न गति पकड़ लेते हैं। ध्यान न तो, जो हो रहा होता है उसे तय कर देने
पर भी आ पाता है। जैसा घट रहा हो, उसे देखिये; जो हो रहा उसे देखिये; जो
हो रहा होता देख रहे मन को देखने लग जाने का कोई सवाल नहीं पैदा होता।
विचार प्रवाह से, जो उस समय चल रहा होता-होता है तब तक अपने आप छूट
जा सकते जब तक हम अपने मन को देखते नहीं? या विचारों द्वारा अपने
विचार प्रवाह को उस स्थिति में ला कर ही समाप्त हो, ताकि जो कुछ घट रहा
होता है उसे देखने समझना बंद हो जाए और इस तरह से ही चेतनागत या विचार
उतार-चढ़ाव को मिटा दिया जा सके। या, चेतना द्वारा उतार-चढ़ाव देखने योग्य बना दिया
जा, सब चेतना को मिटा कर दिया, तो इसके अतिरिक्त तो कुछ नहीं
तो या तो चेतना का रूप इस तरह से स्थिर अवस्था को प्राप्त हो जाए;
स्थिरता की दशा अवस्था के रूप में चेतना एक स्थान पर टिकती रहे, जब
चेतना इस प्रकार मन के तल पर ठहरने लग जाए तो मन स्थिर, विचार विहीनता
स्थिति में आ जाता है। तब सब कुछ शांत, सब कुछ स्थिर; चेतनागत रूप
विचारों में नहीं रहता, चेतना का स्वभाव ही चेतना
यही रूप है जो सब कुछ देख रहा होता
विचार एक प्रवाह बन जाते, ...
शायद, विचार ही चेतना का रूप है, चेतनागत उतार का एक रूप है,
जो कभी इस रूप में और कभी न जाने किस रूप में बदल कर चेतनागत स्तरों
ज्ञान के सब कुछ जानने के नियम के रूप में ही काम करता होगा, केवल उस
चेतना, जिसे हम सब देखना समझना व पाना चाहते हैं, चेतना के उस रूप को देखना
कठिन है, जिस पर इस या उस चेतना द्वारा किसी प्रकार--प्रकार का प्रभाव या
असर पड़ रहा हो, जो चेतना भिन्न रूप चेतनागत से भिन्न स्तरों तक ले जाती
चेतनागत स्तरों पर जो कुछ घट रहा होता है सब मन की दशा कही
जा सकती है। जो कुछ हो रहा होता है वह मन चेतना का ही एक रूप बन
जाता लेकिन कभी चेतना से अलग हो जाता मालूम पड़ता? क्या चेतना से मन अलग?
चेतनागत स्तरों पर जो कुछ भी घटता है, देखना शुरू कर दें तब यह सब
एक ही नजर आता, या विचार केवल देखने का साधन न हो, सब विचारों से अलग
एक विचार शांत स्थिति में बदल चेतनागत ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाता
और चेतना स्वयं अपने आप को ही हर रूप में जान पाती
विचार चेतना द्वारा चेतना को जान पाते हैं या मन की मदद? या जो
कुछ चेतना का हिस्सा है या चेतनागत, जिसे कभी जाना गया है? या
जो सब कुछ उस चेतना का ही या चेतनागत के आधार पर चेतना-सहित चेतना
का ही सब कुछ तो न हो केवल चेतना स्वयं ही अपने-आप ही सब कुछ
116
श्वेताम्बरसम्प्रदाय का समस्त साधु समुदाय इस काल्पनिक परम्परा अनुसार तीर्थंकर का उत्तराधिकारी
बनकर विहार करता रहा और संघ को यह उपदेश भी देता रहा—हे भव्यजीवो, केवल ज्ञानादि तो नष्ट हो
चुका मगर उसका अंश हमारे पास मौजूद है। साधु परम्परा से प्राप्त संघ का यह अंश ही भगवान्
का अंश है। इसके दर्शन ही प्रभु दर्शन हैं। इसके कथन का पालन
यह वह समय था जब संसार भारत का नाम तक नहीं जानता था। केवल इसी देश में संसार का
वह प्रकाश जग रहा था। वह धर्म का प्रकाश जिसके कारण यह देश जगद्गुरु कहलाया था। उस समय
जब भारत केवल अपनी सीमाओं में ही बंधा हुआ नहीं, बल्कि एशिया खण्ड तक फैला
हुआ था तब यह नहीं था कि समस्त संसार में धर्म का नामोनिशान नहीं था। धर्म सदा
समस्त भू मण्डल पर फैला हुआ था; पर भारत में, विशेषकर जैन धर्म की परम्परा में वह
धर्म था जिसे हम, अहिंसात्मक धर्म कह सकते हैं। वह धर्म, जो हर प्राणी को जीने का
समान ही अधिकार प्रदान करता था। संसार के अन्य भागों में फैला हुआ धर्म बलिप्रथा से
युक्त था। भगवान् महावीर, बुद्ध ने इस बात का विरोध किया—‘अहिंसा परमो धर्म!’ धर्म हिंसा
नहीं सिखाता। धर्म दया सिखाता है।
जो धर्म का प्रचार करने निकल पड़े क्या वे? केवल इस देश में? उस
देश में?
श्वेताम्बरियों का दावा चाहे जो हो, तथ्य तो सामने है। जब मौर्य काल तक
जैन धर्म का प्रसार देश में ही नहीं बल्कि उस समय ज्ञात अन्य देशों में फैला था।
तब यह क्यों मान लिया जाए कि इसके बाद जब संघ का विघटन हुआ, तब श्वेताम्बर
संघ, जो मध्य देश में ही सीमित होकर रह गया, अपने आपको
ही सब कुछ मान ले और अन्य मुनियों का जो देश व अन्य देशों में धर्म प्रचार कर रहे
थे? उस प्रचार को उन मुनियों को ही भूल जाए।
दिगम्बर यह दावा नहीं करते, ...
नहीं, यह उनका या संघ का दावा नहीं है--यह दावा आज खोज--खोज कर
निकाल कर रखा गया है। भारत के बाहर बौद्ध मत का
प्रचार गया व फैला, ...
पर जो बौद्ध धर्म से भी पुराना है। भारत की सीमा के--इन पार देशों
मिस्र--तक पहुँचा वह श्वेताम्बर नहीं, बल्कि जैन दिगम्बर
मुनि परम्परा थी। इसका अर्थ यह है कि इस देश में बौद्ध धर्म का प्रचार होने
के पहले ही जैन मुनि जो श्वेताम्बर नहीं थे जैन धर्म को दूर देशों तक ले जा
चुके थे। यह भी कहा जा सकता है कि केवल मध्य देश ही नहीं, बल्कि उस समय
सारे भारतवर्ष में जहाँ पर भी जैन थे, वे केवल वे जैन थे, जो दिगम्बर
कहलाए। जब दिगम्बर जैन सारे भारतवर्ष में फैले हुए थे तो श्वेताम्बर ही;
श्वेताम्बर ही सारे भारत के एकमात्र जैन कैसे कहलाए जाते।
इस वास्तविक ऐतिहासिक तथ्य को झुठ--लाया नहीं जा सकता, जिसे आज
दिगम्बरों द्वारा ही केवल प्रचारित नहीं किया जा रहा है। अन्य देशों के इतिहासकार
तथा शोध कर्ता विभिन्न खोजों के माध्यम से इस बात को प्रमाणित कर रहे हैं। युरो--पीय
विद्वानों का योगदान इस दिशा में अधिक है। उन्होंने अपने देश के इतिहास में
कुछ ऐसे प्रमाण-चिह्न पाए जो इस बात को प्रमाणित करते हैं। यहाँ यह कहना
आवश्यक हो जाता है; चाहे दिगम्बर का प्रसार अन्य देशों में कितना भी
हुआ हो उसका इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं है कि भारत में जैन धर्म, जो
कि एक मात्र धर्म था, उस समय जब तक मौर्य काल समाप्त नहीं हुआ तब तक
भारत के बाहर के देशों में तो बढ़ रहा था मगर भारत में ही उसकी जड़ें कट
जाने की शुरुआत हो गई।
श्वेताम्बर जो कुछ प्रचार करते; वह केवल स्वयं को प्रमाणित करने अथवा संतुष्ट
करने हेतु? इसे यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए। इतिहास केवल श्वेताम्बर
परम्परा का प्रचार नहीं करता। इतिहास साक्षी है दिगम्बर मुनि संघ की उस
त्याग और तपस्या का जिसने कभी हार नहीं मानी। अनेक बार देश में धर्म को
बचाने के लिए स्वयं अपने अस्तित्व को दांव पर लगा दिया। इतिहास साक्षी है
उस समय का भी, जब दिगम्बर मुनि, संघ व धर्मरक्षक
आचार्य कुन्द कुन्द हुए। यह वह समय था, जब श्वेताम्बर संघ अपने आप
को आगे ले जाने का दावा कर रहा था मगर उस दावा करने वाले को उस बात
का लेश मात्र ज्ञान न था कि वह दावा कितना खोखला है; जब कि मात्र १ या दो ही
लोग उस सम्प्रदाय के पास ऐसे थे।
117
यथा २६-२७ इन दोनो श्लोक मे यह बात कही गयीकि जो ज्ञान स्वरूप को नही जानता
सो तो अविद्या का कार्य है यह संशय होताहै, सो ऐसा नही हो सकता है क्यो
कि यह संशय ज्ञान ही का प्रकार है सो, सो ज्ञान हुआ सो हुआ, ज्ञान स्वरूप का
नही हुआ इस से यह रूप भी ज्ञान ही का है, जो यह रूप न होवे, तो न कोई भेद ज्ञान
हो और न कोई ज्ञान स्वरूप को जाने इस से संशय भी ज्ञान का स्वरूप है अविद्या
स्वरूप को जो रूप ज्ञान नही कहा सो सत्य ही कहिये
संशय के स्वरूप को ज्ञान ही माना है सो यह तो ठीक ही परंतु इस बात
स्वरूप मे यह भेद ज्ञान प्रकाश रूप अज्ञान ज्ञान का प्रकाश सो भेद प्रकाशक है, इससे
यह बात सिद्ध होती है कि ज्ञान मे भेद का लेश भी नही? तो यह तर्क-वितर्कयुक्त
नही किंतु मिथ्या बात है, दृष्टांत-सिद्धांत मे बहुत भेद होता है जो सब प्रकार
का भेद सर्वत्र मान लिया जावे तो ज्ञान और ज्ञेय का भेद प्रकाश जैसा इस ग्रन्थ
कार ने निश्चय कर के मान लिया है सो इस का सर्वथा नाश हो जावेगा इस
लिये जो सिद्धांत के अनुकूल हो सो ही सत्य मान लिया जाता है परंतु जैसा
सिद्धांत मान लिया गया है इस से तो यह ग्रन्थ कर्ता का कथन सब प्रकार अशुद्ध
ठहरता है॥ २५॥
विज्ञानमय से ले के मनोमय पर्यंत पंच कोषों का स्वरूप कह दिया
अब, प्राण और देह का स्वरूप कहते हैं—
कर्मरूपैस्तु तैः सर्वैः सहितः प्राणमयो भवेत्।
पञ्चीकृतमहाभूतसम्भवो देह उच्यते॥
प्राणमय कोष कर्म और, देह अन्नमय कोष है॥
अब इन दोनों के स्वरूप को विस्तार पूर्वक, आगे के श्लोक मे कहेंगे सो,
विद्याभ्यास करने वाले सब जीवो को उचित है कि प्राण क्रिया रूप को और शरीर
को देह रूप जाने॥ इस से क्या सिद्ध हुवा कि, प्राण रूप जो क्रिया विज्ञानमय से
लेकर देह पर्यंत का रूप है; जीवात्मा नित्य है, क्योंकि क्रिया का कर्ता और देह
स्थिर है॥ २५॥
इस से आगे ज्ञान का जो रूप कहा सो सर्वथा असंभव है सो इस प्रकार
कि ज्ञान रूप तो प्रकाश और निश्चय ज्ञान का नाम है, सो तो सर्वथा जड
नही किंतु चैतन्य का ही रूप सदा बना रहता है, परंतु क्रिया का नाम ज्ञान कदापि
नही कहा जाता और देह का नाम अन्नमय, क्रियावान् से भिन्न ही होता है; सो
सबका रूप इन तीन बात मे सिद्ध होता है; सो आगे कहते हैं—
प्राण से ले कर देह पर्यंत सब का स्वभाव एक जैसा नही किंतु भिन्न
भिन्न माना गया है और अन्न से देह का कारण माना है इससे सिद्ध हुवा कि
देह नित्य नही किंतु अनित्य है॥
इस प्रकार देह, मन और प्राण इन तीनों का पृथक् पृथक् रूप
दिखलाया, सो इन सब से भिन्न ही जीवात्मा का स्वरूप है जो यह रूप न माने
तो संसार मिथ्या ठहरता है इस से जो इन तीनों का ज्ञाता है, वही जीव चेतन कहा
गया है॥ २८॥
अब देह के विषय मे यह कहते हैं—
यद्यपि जीव का स्वरूप और देह का स्वरूप बहुत ही भिन्न है, तथापि
विद्याभ्यास से यह सिद्ध होता है कि देह ही जीव का आश्रय है इसी देह
विषे जीव रह कर कर्म करता है इस हेतु देह को कर्म की भूमि कहा गया है॥२९॥
118
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119
लेकिन जब पहला मर या जला दिया गया अथवा वह भाग गया अथवा, तो उस समय उसकी दूसरी
औरत को दूसरा या उप-पति करना था, तो यह सब केवल घर बसाने या सन्तान उत्पन्न करने के
लिए किया जाता था। इसलिए नियोग कतई न था बल्कि
नियोग केवल २ प्रकार; ...
जैसी औरत सन्तान के लिए करती थी वह केवल नियोग था पर जब तक वह औरत
सन्तानहीन होकर निसन्तान मरती थी, तो नियोग कभी सफल नहीं हो सकता था। लेकिन
अगर एक सन्तान होकर मरती थी—? इसलिए औरत का सन्तान को पालना या न भी
तो सब कुछ औरत पर सब कुछ निर्भर करता था तथा औरत का उस पर पहला हक समझ कर
औरत अपने पास रखती थी या नहीं भी रख सकती थी लेकिन मर्द सन्तान को कभी नहीं रख
सकता था। नियोग केवल दो बार ही होता था, जो केवल सन्तान उत्पत्ति निमित्त होता था,
व्यभिचारार्थ कभी नहीं था, जो कि इस नियोग रूपी विषय को समझने में सब मर्द या
औरत सक्षम नहीं थे। उप-पति केवल उस औरत के लिए या केवल सन्तान के लिए ही
पास आता था, न कि भोग के, न नियोग व्यर्थ माना जाता था बल्कि सफल माना
जाता था। केवल औरत ही उस पर हक रखती थी।
जो शास्त्रानुसार नियोग को जानते हैं, यह केवल मर्द या औरत को पूर्ण ज्ञान
था, दूसरा तो केवल दो नियोग था, तीसरा तो नियोग का नियम ही निरन्तर था, चौथा
उप-पति एक बार का, पांचवां नियोग शास्त्रानुसार मर्द या औरत सब को मर्यादा का ज्ञान
कराता था कि केवल नियोग सन्तान के लिए होता था केवल विषय वासना निमित्त नहीं
समझा गया जिस तरह वेद शास्त्रानुसार औरत का केवल हर तरह से हक था हर नियोग
करवाने में भी, तथा हर तरह मर्द का नियोग सिर्फ मर्द का केवल नियोग मात्र था।
जो नियोग सिर्फ एक ही बार का मर्द या औरत को केवल धर्म के अनुसार अधिकार के
साथ ही प्राप्त कराता था जिस तरह से नियोग नियमानुसार हर किसी सन्तान को
देता था, सब ही नियोग
केवल दो बार सन्तान तक होता था मर्द हक से रह जाता था या नियोग कराने
वाले दोनों मर्द आपस में हक जता कर नियोग सफल करते थे। सन्तान हर दो में सिर्फ
१.५० का हिस्सा या नियोग का सन्तान कह सकते थे, लेकिन औरत मर्द सब उस हक
को भी, शास्त्र में जो नियम या नियोग के बनाए उसी के आधार नियोग ही हर बार
सब नियोग शास्त्र रूप में सब कुछ माना गया; इसीलिए तो कहा गया
शास्त्रानुसार ही, सब शास्त्रोक्त के साथ ही धर्म सन्तान को, मर्यादा
पुरुषोत्तम श्री कृष्ण जी महाराज के सब नियोगों को ज्ञान के द्वारा सब कुछ
समझना ही सब था, जहां मर्यादा थी, उस समय सब नियोग था, उस ही समय
कर्म का भोग या कर्म का भोग सब कुछ माना गया था, कर्म से; सब ही सब कुछ
समझना चाहिए
नियोग केवल २ प्रकार; ...
मर्यादा के साथ ही किया तो सिर्फ सन्तान का उत्पन्न ही माना था सिर्फ?
... जैसा कर्म व भोग
केवल हर जगह नियोग का नहीं, सिर्फ हर उस जगह नियोग का दर्जा या स्थान
उप-पति का हर जगह, न कि हर एक मर्द या औरत, सब का धर्म, सब कुछ
हर तरह से नियोग के स्थान में था, जो कि हर जगह सिर्फ
भोग से कम भोग माना गया था नियोग का दर्जा सब तरह से जो सब कुछ आज
सिर्फ नियोग आज वासना का रूप नियोग कहकर सिर्फ हक का उल्लंघन हो रहा
आज, जो सिर्फ वासना समझ कर हर रूप में नियोग कहा, जो केवल पाप, सिर्फ
पाप का उल्लंघन समझना आज कल रह गया
नियोगार्थ जो धर्म था, आज तक व्यभिचार रूप में बदल कर आज भगवान्
के नाम का सहारा न ले केवल हर काम पाप रूप में रहकर सब तरफ पाप फैला रहा
सिर्फ भोग का भोग ही तो रह गया जो नियोग का शास्त्र रूप हमेशा सच्चा ज्ञान था?
सो इसलिए हर तरह से सब तरह
जब तक हर नियोग का ज्ञान सब तरह से सब समझाकर भगवान्
नारायण के नाम रूप को सब त्याग कर, केवल पाप, अधर्म रूप में हर तरफ
फैलाया था, अलग-अलग था, सब कुछ किया गया नियोग के हक; सब मानव रूप खोते
जा रहे
सो जो भी सब कुछ नियोग कराया जा या करवाया गया था वह केवल एक तरफ,
जो केवल हर तरह से हर सब कुछ त्याग कर, जो सिर्फ आज सब का धर्म बनता है,
120
उस समय अपने आप कई सौ वर्ष पहले गुजरात गये महात्मा श्री हेमचन्द्र की कृति पर दृष्टि
डाल रहे।
वे कहते समय इतना आवेश लाते थे कि उस समय मानों सारा इतिहास सजीव हो उठा हो! 'जय
हो देव! जय-जयकार हो देव! कल्याण हो देव! यह न हो सका कि राजा विचारशील तो
स्वयं ज्ञान ग्रहण करता, केवल दो नमस्कार कर काम चला लेता किन्तु उसने तो उस
को? समस्त जगत् को? हाँ सब को, अपना प्रमाण मानकर सब सम्प्रदाय सम्मत शास्त्र
दिया था? न्यायपूर्ण बात को उस समय की... !
वह न्याय की परम्परा तो आज भी चल रही! जिसे केवल वर्तमान की दृष्टि-दोष वाले
पुरुष आज तक ही नहीं समझ सके हैं उस बात को, तो संशय भरा मस्तिष्क ही न्याय
को तो सब लोग न्याय कहें
महाराज की वाणी निःसकोच होकर सब कह रही थी तथापि न्याय प्रिय राजा
सम्प्रदायों को साथ
ले चला था जिस बात को उस समय राजा ने कर दिया, वह शायद आज भी तो नहीं
किया गया
महाराज के मुख से तो सब कुछ उस समय ऐसा लगता मानों यह भी उसी काल के
साथ चल रहे हों प्रकार
हम लोग केवल उन को सुनते चले जा रहे थे। विचार, विमर्श आदि
का तो उस समय प्रश्न कहाँ उठता? महाराज स्वयं ही न बोलते, तो विचार ही
का स्थान कहाँ रह था? संशय के सब जाल छिन्न भिन्न करके उस काल, देश-
गत सीमा को पार करके महाराज क्या आज बोल रहे थे?
कहिये देव, उससमय तो इतना सब कुछ सहज होता था, न्याय तो न्याय ही
रूप लेकर ही तो आ रहा था किन्तु आज धर्म सम्प्रदाय सब एक मत रूप लिए,
एक दूसरे का सम्मान कर तो रहे हैं। किन्तु सम्प्रदाय अपने को तो श्रेष्ठ नहीं
मानते ही अन्य को क्षुद्र? ऐसा कुछ कह रहे थे; बाद में वे सब कह तो रहे थे
पर, न्याय तो सब सम्प्रदाय रूप से तो चला आया था, न्याय तो न्याय रहेगा!
पर वर्तमान समय सब को, एक काल रूप लिए मान कर समस्त रूप में नहीं आ
रहा, न ही आ सकता है। प्रत्येक को अपना समय लग ही रहा था, सम्प्रदाय
वाद से ऊपर हो, एक रूप समन्वय की बात जिस प्रकार राजा कुमार पाल के, श्री हेमचन्द्र जी,
दोनों मिलकर कर रहे उस काल समय में सब के सब एक साथ समन्वित
हो गये ऐसा ही तो नहीं आज समझ में आता था, किन्तु आज तो सब का रूप एक
ही नजर आता था, जो कुछ था, वह न्याय प्रमाण सम्मत होकर प्रकट हुआ था।
इस रूप को, उस काल समाज को आज रूप में देखना एक प्रकार से इतिहास को केवल
वर्तमान रूप में देखना मानकर आनन्द लिया जा सकता, सब कुछ, उस
समय--सा रूप लेकर विचार किया जा?
राजा स्वयं न झुकता, ज्ञान स्वयं न झुकता
परस्पर में दोनों मिल, परस्पर मिलकर एक रूप हो चले थे।
सम्प्रदाय वाद को, स्वयं त्याग दिया
आचार-विचार दोनों रूप, आज भी उस बात को मान रहे समभाव,
ज्ञान का विकास सब को मिला, सब उस पर तो चले।
ऐसा विचार कर सब कुछ समभाव
का ही रूप सब को, मिलता चला जाता, सब उस समय न केवल
समभाव का उदय ही हो रहा था किन्तु सब प्रकार के ज्ञान को सब का सम्मान
मिल रहा
प्रमाण सब सम्प्रदाय को कैसे हो जाता? परस्पर में सब को सम्मान रूप में ही
मिला प्रमाण सब प्रकार का सम्प्रदाय ही उस रूप सब रूप को देता? हाँ, सब को
ज्ञान तो सब सम्प्रदायों से होकर मिला जिससे सब का मत एक ही नजर आया
परस्पर का जो विरोध था न केवल सब का रूप बन गया था कि कोई
सम्प्रदाय हो, सब को एक ही मत का रूप बन गया था न्याय प्रमाण द्वारा
विचार सब काल सब समय इसी प्रकार का रूप लेकर चलेगा।
इन सब बातों को जो उस काल समाज के सामने लाकर रखा जा सकता होगा
शायद आज, सम्प्रदाय वाद को इतना सहज रूप से तो मिटाया न जा सकेगा
जिस प्रकार उस काल में हुआ, इतिहास तो विचार--सम्प्रदाय मात्र था?
क्या रूप ले सकता था, इतिहास को केवल वर्तमान काल का इतिहास समझ
लिया था, समाप्त होगा।
121
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▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯?
▯▯▯▯.▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯
123
अब दोनों सखियाँ परस्पर सलाह करके सोचने लगीं कि महाराज यदु की रानी महापतिव्रता
होगी तब तो महाराज को यदु लड़का ना उत्पन्न हो सकता था सो अब देखना चाहिये कि कैसी है?,
चित्तलेखा बोली कि चलो अब हम दोनों चलें
यह तो सखियों का हाल कह आये अब आगे सुनो कि क्या हुआ, रानी देवकी जी
महाराज यदु समेत अपने महल-कूप में बैठी थीं कि महाराज उनके पास गये
कि आज तो कुछ आनन्द लें
पर क्या हो सखियों को देखकर यदु भय करने लगे मन में डरने लगे, भय इस
लिये हुआ कि हम पापी हैं, इन सखियों का तो दर्शन दुर्लभ था, भाग्य से
प्राप्त हुआ समझ लिया, विचार तो उनका था दर्शन करने का, रानी बोली,
प्राण नाथ यह कौन स्वरूप है जो सब को भय युक्त कर रहा है, महाराज ने कहा
सुनो; यह वह मूर्ति हैं, जिन्हें मैं अपने साथ लाया हूँ; देख लो यह रूप कैसा
है, लज्जावंती हैं, इनका स्वरूप देखने का मन में भय पैदा करता
क्या नाम तुम्हारा है जी? --देवकी, सब सोच-गम को, दूर करके बोली, महारानी
चित्तलेखा से महाराज बोले कि देख लीजै, जिस सुन्दरी का नाम देवकी
रखा गया! सब इन को देख कर चकित होकर कहने लगीं क्या? --हे सब बातों के जान,
हे प्रभु अन्तर्यामी, हम तो समझती थीं महाराज को; सब सोच-गम से रहित
संसार के चक्रवर्ती राजा सब प्रकार के, सुखों से युक्त हैं परन्तु हमारी
समझ में यह सब धोखा व भ्रम--जाल पड़ा हुआ मालूम हो रहा, यदुजी
ने जो कुछ, चित्तलेखा जी से कहा--यह सब न कहिये
हम केवल यह चाहते हैं, विचार ऐसा करो, महाराज को जो भय हो रहा
उसका नाश हो जाय, सखियों ने, देवकी महारानी जी से कुछ भी नहीं कहा;
चित्तलेखा जी बोलीं कि, महाराज सुनो मेरी बात सुनो! महाराज यदु जी
बोले कि मन मेरा भय से भर गया क्योंकि मै पापी व कपटी महारानी देवकी
समेत हूँ! बात सुनकर ही सब रानी सोच विचार करने लगीं, हाथ जोड़ कर
विनती कर यदु जी चरण में चित्तलेखा महारानी के चरणों पर गिर कर रोने
लगे, हाथ भी जोड़ लिये! रानी भी दोनों हाथ जोड़ कर श्री चरण पर गिर
पड़ीं, रो कर कहने लगीं कि मुझको क्षमा कीजिये; महाराज बोले सुनो हमारी
भी, बात मन में डर बैठ गया है भय निवारो; हमारे मन का डर दूर करो,
चित्तलेखा हंसकर बोलीं कि जब तक तुम दोनों का मन तन सब बातों से
साफ नहीं होगा, चित्तलेखा जी के वचनों को सुन--कर यदु जी दोनों कर जोड़
खड़े रहे और उनका मन विचलित हो रहा था मन में, भय समाया हुआ, देवकी
रानी मन में सोच--कर हाथ जोड़ खड़ी थी, देवकी जी चित्तलेखा से प्रार्थना
कर पूछने लगीं? हे सखीश्वरी जी सुनो
देवकी जी हाथ जोड़कर बोलीं कि, हम तो सब प्रकार तुम्हारा यश सुनती
रही सो तो प्रत्यक्ष देख लिया, पर दया--का दान-विद्यादान दीजिये
सब कुछ विचार दूर हो जाय; महाराज भी बोले--कृपा हो तो हम समझें!
यह बात चित्तलेखा जी, अपने मन में विचारने लगीं
कि महाराज देवकी समेत अपने मन को शांत व आनन्दित करना चाहते
हैं सो यह महाराज केवल अपने लिये ही नहीं विचार करते हैं किन्तु सब जीव मात्र के
कल्याण का अभिलाषा उनके मन में भरा हुआ जान पड़ता है मन में ऐसा विचार कर
उसी समय यदु को कुछ उपदेश देने लगीं, उस समय देवकी जी; देवकी
समेत जब राजा ने यह बात सुनी चित्त शांत हुआ, सब दुःख दूर हो गये; आनन्द
छाया तब महाराज यदु हाथ जोड़कर बोले, धन्य हो तुम दोनों जगजननी
यह कह कर शांत हो गये, कुछ काल के उपरान्त जब यदु जी का राज-पाट
माता पिता के हाथ में आया, तो उस वक्त रानी समेत यदु वन को चले गये
और सब बातें जो वन में देखीं सब से बढ़कर चित्त शांत करने की बात सुनी
गई
अब यह हाल चित्तलेखा जी ने कहा सो सुनो; राजा तो चला गया; मन, उस
वन लीला का लगा ही रहा; तब, राजा ने कहा था; वन लीला का सुख सब
सुखों से बढ़ कर मिला जिस दिन से वहां रहा, चित्त शांत
रहा रानी चित्तलेखा समेत प्रसन्न रही; सब लोग सुख पाओगे, सबका कल्याण
होगा
सत्य बात कहो इसमें किसी को कुछ संशय होगा? सब लोग तो जानते होंगे
किस प्रकार से सब को मन का सुख प्राप्त हुआ; केवल सत्य-नाम के नाम से सबने
124
पहला सवाल कि अगर विचार बदल गया तो क्या भाषा बदल कर बोलेंगे? या तो खुद
ही मालूम हो गया होगा क्योंकि हर एक का खुद का अनुभव ही यह रहा होगा अथवा अपने
चारों तरफ देख रहे होंगे कि विचार क्या बदला? हर विचार का प्रभाव तो मन पर
ही मन में रहा या वाणी पर आया अथवा मुख के नयनों के भाव पर भी असर पड़ता
ही पड़ता ही रहेगा।; अब जब तक भाषा नहीं बदलती तो तब तक समझना कि
जब वाणी बदलेगी तो ही वायुमण्डल बदल कर हल्का होगा, तो बोलचाल की
रूप रेखा बदल कर ही हर परिस्थिति बदल कर हल्की होगी, तो बोलचाल की
रूहानी भाषा और बोलचालहीनता, बोलचाल का संयम यह सब वाणी का ही खेल
चलता रहा और चलता रहेगा ही। इस रीति जब बोल, तो बोल निरहंकारी के
बजाए अहंकारीपन भरें हुए बोल मुखड़ा मोड़ कर बोलेंगे तो--तो आपस में
ईर्ष्या, ना प्यार से बोलेंगे, ना प्यार से देखेंगे--तो यह बोलचाल बोलचाल थोड़ी
होगी यह--बोलना नहीं होगा बल्कि यह तो तीर फेंक कर आपस में घाव ही
करेंगे फिर चाहे मन कुछ भी कहे या करे पर मुख के--बोलने भर से ही यह
आपस प्यार घट कर दूरी पैदा कर देगा, तो उस तीर द्वारा घाव--पैदा करने का
भी फलड़ा भोग भोग कर ही हल्का होना पड़ेगा इसलिए हर एक बात मन ही
निकाल कर ही सब बोल मुख से बोले और पहले ही परख लेवे निरहंकारिता का
निरहंकार भर तो नहीं रहा है क्योंकि हर एक बोल! रूप तो बन गया।; इसलिए
अब समय आ रहा है हर बोल बोलने वक्त, बोलने से पहले उस बोल सम्बंधी
सोच विचार
क्या बोलना है और बोलने द्वारा क्या तो फल पाना अथवा देना पड़ेगा?
ऐसा विचार पहले करें; फिर मुख द्वारा निकालें
ऐसा बोल जो, स्वयं के निमित्त भी हल्का कर देवे या दूसरे के निमित्त
सुख और शान्ति दायक रहे या तो फिर ऐसा बोल ही मत बोलो जो वायुमण्डल को
भारी कर देवे जब कि भारी बोल बोल कर भारी किया हुआ है?
अब सब हल्का, स्वच्छ और शक्तिशाली
रूप में तब ही आ सकता जब स्वयं अपनी भाषा को संयमी करें, मुखड़ा रूप
बदलें, हँस-मुखड़ा रूप बनाएं ना, कि गुस्से का--रूप बना कर मुख का रूप
सब बिगाड़ दें; क्योंकि आत्मज्ञानी रूप और आत्मा के स्वरूप आत्मा को
सब तरफ प्रेम ही दिखता है, प्रेम-स्वरूप आत्मा स्वयं स्वरूप द्वारा ही बोलती है
या बोलती है, इसलिए आत्मज्ञानी; अभिमानी स्वरूप कभी ना लेंवे भले कोई
कितना भी उल्टा बोले पहले खुद तो उस उल्टेपन स्थिति द्वारा खुद संभल कर,
हर एक आत्मा प्रति शुभ भावना रखें या ना रखें लेकिन कभी उल्टा रूप धारण ना
लें उलटा-सुलटा रूप तब तक धारण होता जब तक देह-अहंकार रूप स्थिति धारण होती है
इसलिए हर एक बोल वाणी का या दृष्टि का रूप स्वयं निरहंकारी का रूप लेवे; ना
उल्टा रूप धारण करें; ना उल्टे को देख कर खुद उल्टा बोल बोलें,
इसलिए यह, देह-अहंकार की बोलचाल ही बन गई, जिसे सब विरोधी बोलचाल
ही कहेंगे और यह वाणी-रूप तीर घाव पैदा करते हुए सब कुछ बिखेर देगा
इसलिए इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी अब आगे जीवन बदलाव में इस
रूप से; वाणी सम्बंधी सब
विचार-व्यवहार का प्रभाव जब वाणी पर आ जाता तो वाणी द्वारा खुद अपना
प्रभाव पड़ता है? जो कि उल्टे बोल मन को लग कर, सब कुछ तहस नहस कर
भारी बना देगा
जो अपनी वाणी से ऐसा तीर ना लगे! यह सोच कर ही बोलें? ताकि स्थिति भी
एक रस रहे! अपनी वाणी वाणी का प्रभाव पड़ कर मन भी शांत हो सकेगी यह
अभ्यास वाणी का ही वाणी द्वारा जब वाणी पर संयम आवेगा तब ही वाणी द्वारा मुख
मण्डल पर उसका असर पड़ कर वाणी एक रसता लाती हुई वाणी का प्रभाव वाणी
द्वारा ऐसा हो जावेगा कि वाणी सुनने वाला भी हल्का रहे, ना कि भारी होकर वाणी
सुनकर ही दूर भागने लगे इसलिए वाणी का संयम अब रखो! जो कि सब की
स्थिति एक जैसी बनी रहे और शांत भी रहे; शांत मन से बोलें; शांत मन रखें;
ताकि हर स्थिति का असर, बोलचाल द्वारा बदल कर सबके लिए सहज होवे।
इसलिए शांत मन द्वारा ही हर स्थिति रूप पर जीत प्राप्त करने द्वारा सब रूप व
रंग बदलेगा
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यद्यपि इस कारण कोई किसी प्रकार का उपद्रव अथवा उत्पात भी नहीं कर सका तथापि, अनेक प्रकार
विचारते हुये तथा प्रत्येक बात को बहुत सूक्ष्म दृष्टि से देखते हुये
प्रत्येक व्यक्ति का यह धर्म होना चाहिये; सब को सावधान हो जाना चाहिये; प्रत्येक व्यक्ति
विचार कर रहा था कि ऐसा होगा तो, इन बातों के अतिरिक्त इस अवसर सम्बन्धी एक बात सर्वथा नवीन
भी प्रकट की जा रही थी।
अनेक बातों तथा अवस्थाओं द्वारा यह भी सिद्ध हो गया था कि इस समय तक तो इस
विषय सम्बन्धी एक साधारण बात अथवा विषय पर ही सब को इस प्रकार का भय बना हुआ था--
यद्यपि वह एक ऐसा भय था जिस कारण प्रत्येक समय पर सब को किसी न किसी प्रकार सचेत रहना ही
चाहिये था या नहीं था सो भी।
विचार करनेवाले सोचते थे, वास्तव में, विषय और समय तथा देश के सब विचारकों
का ध्यान पूर्ण रूप से इस ओर गया था और सब लोग केवल उस विषय या व्यवस्था की ओर ही
इस व्यवस्था को एक बार तो अवश्य देखें; सब इस बात में, वास्तव में एक मत थे।
सब यह देख रहे थे, कि समय आने पर प्रत्येक अवस्था का यह भी एक रूप हो गया था कि
किसी को न तो पूर्ण रूप समझा जा सकता था, वास्तव में केवल एक
विषय सम्बन्धी ही तो ऐसा व्यवस्था रूप बन गया था कि उस दशा को देखकर
प्रत्येक का मन ऐसा
विषय सम्बन्धी बातों, वाद-विवाद अथवा किसी
अन्य सामयिक व्यवस्था, साधारण अवस्था द्वारा
बना था इस बात पर भी सब लोग विचार कर रहे थे इसलिए उस अवस्था और समय को
ही सब लोग इस बात अथवा उस विषय सम्बन्धी रूप अथवा व्यवस्था को देख रहे थे। वास्तव में,
इस प्रकार उस बात पर विचार करते हुये यह विचार भी सब, वास्तव में कर रहे थे, कि
सब लोग केवल ऐसा समझ रहे थे जैसे कि सब--प्रकार से केवल यह एक बात उत्पन्न हो रही
वास्तव में संसार के सब लोग केवल ऐसा समझते थे जिससे यह सब कुछ हो सकता
था, इसलिए सब लोग इस ओर ही लगे हुये थे। कोई इस विचार का भी था कि केवल
अवस्था के अनुसार सब कुछ हो सकता था इसलिए यह सब ही इस बात का परिणाम था।
इस सब बात भिन्न-भिन्न रूप में, सब ओर भिन्न-भिन्न; परन्तु सब लोग भी,
भिन्न-भिन्न दशा देखकर ही व्यवस्था पर विचार कर रहे थे। संसार में केवल न जाने
क्या परिणाम
सब कुछ ऐसा समय उपस्थित कर रहा था जिससे इस व्यवस्था का, सब लोग
ऐसा रूप वाद-विवाद रहित
संसार में केवल सब कुछ यह सब विचार कर रहा था जिससे केवल एक ही बात
थी, जो ऐसा था, सो तो ऐसा समझ कर सब ही देश-काल रूपी महासागर में डूब रहा
था। इस समय सब केवल ऐसा विचार कर रहे थे। प्रत्येक व्यक्ति केवल न जाने ही केवल
सब कुछ वाद-विवाद का कारण ही, बनकर सब केवल एक ही रूप बना रहा था। ऐसा
रूप देखकर कौन ऐसा होगा! जो इस बात को न सोच सकता होगा कि? तो
फिर, केवल यह बात! सब को इस प्रकार का ही विचार उत्पन्न होना उचित
न? केवल इतना विचार करके, कोई ऐसा ही समझ न रहा था। क्या कोई ऐसा
केवल अपने मन में सम्भव समझ सकता था जैसा कि?
इस प्रकार सब अवस्था सब को ऐसी जान पड़ती थी जिससे प्रत्येक विचार करते,
केवल समय का रूप धीरे--धीरे इस ओर विशेष प्रभाव डाल रहा अथवा यह सब कुछ
रूप बना
संसार में तो केवल यह धीरे--धीरे इस बात को--ऐसी दशा में केवल सब लोग
केवल समय का प्रभाव ही समझ रहे, केवल यह समय ही, देश-काल का प्रभाव था; सो
ऐसा केवल सम्भव ही सब अवस्थाओं का रूप
केवल यह बात विचार करने योग्य ही थी कि प्रत्येक व्यक्ति केवल एक बात की
ओर, केवल सब का ध्यान जा रहा था सो यह सब रूप भी सब ही बात के अन्तर्गत होता
चला जाता था। जब सब को इस अवस्था का ज्ञान हो गया था तो प्रत्येक ऐसा कह रहा
था कि इस बात अथवा रूप अथवा वाद-विवाद द्वारा संसार में सब, केवल अपनी ही
बात कहो, केवल यह विचार ही सब के मन में आ रहा था, जिसे केवल यह
सब ही न समझ कर केवल ऐसा ही विचार कर रहे थे। इस दशा में, केवल सब
यह सोच रहे, सब का विचार ऐसा समझ, केवल यह बात सोचना ही तो ठीक है? तो-
फिर सब लोग इस बात अथवा विचार द्वारा यह स्पष्ट ही देख रहे थे। इसलिए सब ही?
केवल ऐसा ही? केवल विचार कर सब व्यवस्था केवल न जाने क्या प्रभाव डाल न
सकती, सो भी विचार कर
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