अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस पर रावण के मामा मारे गये और अनेक राक्षस व्याकुल होकर रण से भागने लगे तब यह
देखकर यह भी रण को चल पड़ा।
उस समय विभीषण राम जी से प्रार्थना कर के कहने लगे कि हे राम जी इस का नाम
वज्रदंष्ट्रक निशा चर है। यह महाबली और यह मायावान् विद्या युक्त है। यह मायावी
लङ्का पति का मन्त्री भी कहला कहाता है; सो हे वीर, राक्षस सब कपट को जान्ने
वाले हैं, इन पर सो; कपट विद्यायुक्त; कपट रस-भरपूरयुक्त; हो शस्त्र बल, सम्बल
युत
निज भुजबन्ध कठोर निज बाण सहाय सहाय। कपि दल मार भार सोइ
गिरा गिराय सो यह ॥ इति राम कथायां लङ्का काण्डे, रावण का सेनापति, वज्रदं
ष्ट्र राक्षस का संग्राम और बाण वर्षा से कपि कटक भंग
सो सुन कपि चंचल, विरचत दल रण रंग।
कपि अङ्गद बलवान्, सम्मुख ह्वै रण रंग॥
सो बाण वर्षा से जब कपि, कटक विकल होकर रण से भाग चला तो अङ्गद जी
कूद कर रणक्षेत्र में आय कर सब को पुकारा
कहां जाते हो तुम सब शूर शूरमा होकर भागते हो अपने कुल को लजाते
और शूरता के बल को कलंक लगाते हो। सब पीछे फिरो हमारी शरण आओ, यह
जो बाण वर्षा कर कपट विद्या से रण कर रहा है इसको अभी मिटाता
इतना कह कर अङ्गद महाबली रण में आया सो हाथ में एक वृक्ष ले बाणों
के जाल को काटता हुआ वज्रदंष्ट्र के रथ पर आ पहुंचा। और रथ को एक वृक्ष से मारा
जिस से वज्रदंष्ट्र रथ छोड़ गदा ले नीचे कूद पड़ा। तब दोनों में बड़ा भारी युद्ध
होने लगा। अङ्गद जी का हाथ जब खाली था तब वज्रदंष्ट्र ने एक गदा अङ्गद
पर, चलाई सो उस वार को अङ्गद जी ने बचा लिया। जब अङ्गद जी खाली हाथ
देखे, राक्षस ने गदा चलाई तब अङ्गद जी ने भी, उस राक्षस को दोनों हाथ
पकड़ कर उस की गदा छीनी
गदा से उस को मारना चाहा। तब उस ने ढाल से गदा के वार को रोक
लिया सो वार खाली न गया। ढाल के दो टुकड़े हो गये, तलवार से वार भी अङ्गद
जी पर किया सो; तलवार पकड़ अङ्गद हाथ से छीन फेंकने लगे वज्रदंष्ट्र आगे
बढ़ अङ्गद छाती ऊपर मुष्टिका प्रहार किया। तब अङ्गद ने एक मुष्टि से
उस दुष्ट राक्षस कपटी को पृथ्वी पर गिरा दिया सो पृथ्वी पर गिरते ही फिर
उठ खड़ा हुआ सो देख अङ्गद जी ने तलवार से उस का सिर काट दिया; फिर तो राक्षसों
की सेना, जो बची, सो भागी, उन पर कपि दल
सो सब कपि लङ्का सम्मुख भागि परे।
कपि अङ्गद सुजान, सम्मुख ह्वै मारि डरे॥
सो बाण कटक के मारे से, रावण के सेनापति वज्र दंष्ट्र मारे जाने पर
राक्षस सेना लङ्का को भागी, तब, रावण, विभीषण के वचन सुन कर कपि
दल फिर गया और कपि कटक से, बचे जो राक्षस अपने प्राण बचा कर लङ्का
भागे थे, सो रावण के दरबार में कहने लगे कि हे देव सब सेना को कपि दल
मार, बाण वर्षा निष्फल कर गया
सो यह सुन कर रावण, मस्तक हिला कर उस सम्पूर्ण कथा को सुन क्रोध
से कांप उठा सो फिर अपने एक शूर वीर अकम्पन नामक सेना पति को रण को भेजा;
यह बाण चलाने में बड़ा निपुण था इस का सारा बल बाण विद्या पर ही निर्भर था;
सो यह बाण विद्या से जब बाण बरसाने लगा तब कपियों का दल घबराया, सो सब
दल अङ्गद के पास भाग कर आया, सो यह अकम्पन भी बाण वर्षा करता हुआ
आगे को बढ़ा, तब कपि दल भाग कर हनुमान् के पास गया और कहने लगे, हे
वीर रक्षा करो, दल पर!
सो सुन कर पवन--सुत रण में अकम्पन को मारकर कपि दल को शरण
दी फिर रण का रंग देख
सो सुन कपि चंचल, विरचत दल रण रंग।
कपि हनुमान् महान्, सम्मुख ह्वै रण रंग॥
सो जब ऐसा कपि दल को विकल देख कर देखा तो, हनुमान् सब से आगे
बढ़ हाथ एक वृक्ष ले अकम्पन की ओर चले सो अकम्पन ने उस को आते देख बाण
वर्षा से वृक्ष के, टुकड़े टुकड़े कर दिये फिर उस वृक्ष को फेंक दूसरे वृक्ष
को हनुमान् जी अकम्पन पर फेंकने लगे, सो उस बाण विद्या वाले ने उस वृक्ष
को तलवार से काट दिया तब एक भारी वृक्ष, जो बहुत से फल
112