अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय अपने आप कई सौ वर्ष पहले गुजरात गये महात्मा श्री हेमचन्द्र की कृति पर दृष्टि
डाल रहे।
वे कहते समय इतना आवेश लाते थे कि उस समय मानों सारा इतिहास सजीव हो उठा हो! 'जय
हो देव! जय-जयकार हो देव! कल्याण हो देव! यह न हो सका कि राजा विचारशील तो
स्वयं ज्ञान ग्रहण करता, केवल दो नमस्कार कर काम चला लेता किन्तु उसने तो उस
को? समस्त जगत् को? हाँ सब को, अपना प्रमाण मानकर सब सम्प्रदाय सम्मत शास्त्र
दिया था? न्यायपूर्ण बात को उस समय की... !
वह न्याय की परम्परा तो आज भी चल रही! जिसे केवल वर्तमान की दृष्टि-दोष वाले
पुरुष आज तक ही नहीं समझ सके हैं उस बात को, तो संशय भरा मस्तिष्क ही न्याय
को तो सब लोग न्याय कहें
महाराज की वाणी निःसकोच होकर सब कह रही थी तथापि न्याय प्रिय राजा
सम्प्रदायों को साथ
ले चला था जिस बात को उस समय राजा ने कर दिया, वह शायद आज भी तो नहीं
किया गया
महाराज के मुख से तो सब कुछ उस समय ऐसा लगता मानों यह भी उसी काल के
साथ चल रहे हों प्रकार
हम लोग केवल उन को सुनते चले जा रहे थे। विचार, विमर्श आदि
का तो उस समय प्रश्न कहाँ उठता? महाराज स्वयं ही न बोलते, तो विचार ही
का स्थान कहाँ रह था? संशय के सब जाल छिन्न भिन्न करके उस काल, देश-
गत सीमा को पार करके महाराज क्या आज बोल रहे थे?
कहिये देव, उससमय तो इतना सब कुछ सहज होता था, न्याय तो न्याय ही
रूप लेकर ही तो आ रहा था किन्तु आज धर्म सम्प्रदाय सब एक मत रूप लिए,
एक दूसरे का सम्मान कर तो रहे हैं। किन्तु सम्प्रदाय अपने को तो श्रेष्ठ नहीं
मानते ही अन्य को क्षुद्र? ऐसा कुछ कह रहे थे; बाद में वे सब कह तो रहे थे
पर, न्याय तो सब सम्प्रदाय रूप से तो चला आया था, न्याय तो न्याय रहेगा!
पर वर्तमान समय सब को, एक काल रूप लिए मान कर समस्त रूप में नहीं आ
रहा, न ही आ सकता है। प्रत्येक को अपना समय लग ही रहा था, सम्प्रदाय
वाद से ऊपर हो, एक रूप समन्वय की बात जिस प्रकार राजा कुमार पाल के, श्री हेमचन्द्र जी,
दोनों मिलकर कर रहे उस काल समय में सब के सब एक साथ समन्वित
हो गये ऐसा ही तो नहीं आज समझ में आता था, किन्तु आज तो सब का रूप एक
ही नजर आता था, जो कुछ था, वह न्याय प्रमाण सम्मत होकर प्रकट हुआ था।
इस रूप को, उस काल समाज को आज रूप में देखना एक प्रकार से इतिहास को केवल
वर्तमान रूप में देखना मानकर आनन्द लिया जा सकता, सब कुछ, उस
समय--सा रूप लेकर विचार किया जा?
राजा स्वयं न झुकता, ज्ञान स्वयं न झुकता
परस्पर में दोनों मिल, परस्पर मिलकर एक रूप हो चले थे।
सम्प्रदाय वाद को, स्वयं त्याग दिया
आचार-विचार दोनों रूप, आज भी उस बात को मान रहे समभाव,
ज्ञान का विकास सब को मिला, सब उस पर तो चले।
ऐसा विचार कर सब कुछ समभाव
का ही रूप सब को, मिलता चला जाता, सब उस समय न केवल
समभाव का उदय ही हो रहा था किन्तु सब प्रकार के ज्ञान को सब का सम्मान
मिल रहा
प्रमाण सब सम्प्रदाय को कैसे हो जाता? परस्पर में सब को सम्मान रूप में ही
मिला प्रमाण सब प्रकार का सम्प्रदाय ही उस रूप सब रूप को देता? हाँ, सब को
ज्ञान तो सब सम्प्रदायों से होकर मिला जिससे सब का मत एक ही नजर आया
परस्पर का जो विरोध था न केवल सब का रूप बन गया था कि कोई
सम्प्रदाय हो, सब को एक ही मत का रूप बन गया था न्याय प्रमाण द्वारा
विचार सब काल सब समय इसी प्रकार का रूप लेकर चलेगा।
इन सब बातों को जो उस काल समाज के सामने लाकर रखा जा सकता होगा
शायद आज, सम्प्रदाय वाद को इतना सहज रूप से तो मिटाया न जा सकेगा
जिस प्रकार उस काल में हुआ, इतिहास तो विचार--सम्प्रदाय मात्र था?
क्या रूप ले सकता था, इतिहास को केवल वर्तमान काल का इतिहास समझ
लिया था, समाप्त होगा।
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