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सर्वकोश
अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 183 में से

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यथा २६-२७ इन दोनो श्लोक मे यह बात कही गयीकि जो ज्ञान स्वरूप को नही जानता
सो तो अविद्या का कार्य है यह संशय होताहै, सो ऐसा नही हो सकता है क्यो
कि यह संशय ज्ञान ही का प्रकार है सो, सो ज्ञान हुआ सो हुआ, ज्ञान स्वरूप का
नही हुआ इस से यह रूप भी ज्ञान ही का है, जो यह रूप न होवे, तो न कोई भेद ज्ञान
हो और न कोई ज्ञान स्वरूप को जाने इस से संशय भी ज्ञान का स्वरूप है अविद्या
स्वरूप को जो रूप ज्ञान नही कहा सो सत्य ही कहिये
संशय के स्वरूप को ज्ञान ही माना है सो यह तो ठीक ही परंतु इस बात
स्वरूप मे यह भेद ज्ञान प्रकाश रूप अज्ञान ज्ञान का प्रकाश सो भेद प्रकाशक है, इससे
यह बात सिद्ध होती है कि ज्ञान मे भेद का लेश भी नही? तो यह तर्क-वितर्कयुक्त
नही किंतु मिथ्या बात है, दृष्टांत-सिद्धांत मे बहुत भेद होता है जो सब प्रकार
का भेद सर्वत्र मान लिया जावे तो ज्ञान और ज्ञेय का भेद प्रकाश जैसा इस ग्रन्थ
कार ने निश्चय कर के मान लिया है सो इस का सर्वथा नाश हो जावेगा इस
लिये जो सिद्धांत के अनुकूल हो सो ही सत्य मान लिया जाता है परंतु जैसा
सिद्धांत मान लिया गया है इस से तो यह ग्रन्थ कर्ता का कथन सब प्रकार अशुद्ध
ठहरता है॥ २५॥
विज्ञानमय से ले के मनोमय पर्यंत पंच कोषों का स्वरूप कह दिया
अब, प्राण और देह का स्वरूप कहते हैं—
कर्मरूपैस्तु तैः सर्वैः सहितः प्राणमयो भवेत्।
पञ्चीकृतमहाभूतसम्भवो देह उच्यते॥
प्राणमय कोष कर्म और, देह अन्नमय कोष है॥
अब इन दोनों के स्वरूप को विस्तार पूर्वक, आगे के श्लोक मे कहेंगे सो,
विद्याभ्यास करने वाले सब जीवो को उचित है कि प्राण क्रिया रूप को और शरीर
को देह रूप जाने॥ इस से क्या सिद्ध हुवा कि, प्राण रूप जो क्रिया विज्ञानमय से
लेकर देह पर्यंत का रूप है; जीवात्मा नित्य है, क्योंकि क्रिया का कर्ता और देह
स्थिर है॥ २५॥
इस से आगे ज्ञान का जो रूप कहा सो सर्वथा असंभव है सो इस प्रकार
कि ज्ञान रूप तो प्रकाश और निश्चय ज्ञान का नाम है, सो तो सर्वथा जड
नही किंतु चैतन्य का ही रूप सदा बना रहता है, परंतु क्रिया का नाम ज्ञान कदापि
नही कहा जाता और देह का नाम अन्नमय, क्रियावान् से भिन्न ही होता है; सो
सबका रूप इन तीन बात मे सिद्ध होता है; सो आगे कहते हैं—
प्राण से ले कर देह पर्यंत सब का स्वभाव एक जैसा नही किंतु भिन्न
भिन्न माना गया है और अन्न से देह का कारण माना है इससे सिद्ध हुवा कि
देह नित्य नही किंतु अनित्य है॥
इस प्रकार देह, मन और प्राण इन तीनों का पृथक् पृथक् रूप
दिखलाया, सो इन सब से भिन्न ही जीवात्मा का स्वरूप है जो यह रूप न माने
तो संसार मिथ्या ठहरता है इस से जो इन तीनों का ज्ञाता है, वही जीव चेतन कहा
गया है॥ २८॥
अब देह के विषय मे यह कहते हैं—
यद्यपि जीव का स्वरूप और देह का स्वरूप बहुत ही भिन्न है, तथापि
विद्याभ्यास से यह सिद्ध होता है कि देह ही जीव का आश्रय है इसी देह
विषे जीव रह कर कर्म करता है इस हेतु देह को कर्म की भूमि कहा गया है॥२९॥
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