न्यायमञ्जरी: प्रथम भाग (आचार्य जयन्त भट्ट - पं. सूर्यनारायण शुक्ल सम्पादित, काशी संस्कृत ग्रन्थमाला)
Nyayamanjari of Jayanta Bhatta Part 1
आचार्य जयन्त भट्ट (सम्पादक: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
पृष्ठ 344, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ेंor ऽ?
It's definitely an avagraha: "प्रत्यवायाऽनपेक्षं"!
Because grammatically:
प्रत्यवाय + अनपेक्षम् = प्रत्यवायाऽनपेक्षम्!
With dirgha sandhi and avagraha to indicate the elided 'अ': प्रत्यवायाऽनपेक्षम्!
That is 100% standard Sanskrit orthography in these editions!
Now let's check the verses at the bottom (lines 27-32):
प्रतिषेधाधिकारे ऽपि प्रत्यवायो न कल्पते ।
निषेध्यविषयादेव लब्धत्वादधिकारिणः ॥
तत्रासौ कल्य्यमानो ऽपि नरकादिफलोदयः । -> wait, is it 'कल्प्यमानो' or 'कल्य्यमानो'?
Look at 'ल्प' in 'कल्पते' (line 27): 'ल्प' has ल joined with प.
In line 29: 'कल्य्यमानो' or 'कल्प्यमानो'?
In line 29: it is 'क', then 'ल्प्य' (ल् + प् + य = ल्प्य):
Wait, look at 'ल्प्य': ल on left, प in middle, य on right: कल्प्यमानो!
Yes: "तत्रासौ कल्प्यमानो ऽपि नरकादिफलोदयः ।"
अवैधत्वं प्रप