निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १७३ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं० '
ओं सहित 'सजोषः' प्रसन्न होता हुआ 'तौर्याणः' अपने यान
(विमान) को दौड़ाता हुआ 'यज्ञम्' हमारे यज्ञ को 'उप-
याहि' आ ॥ यह भी निगम है ॥
'अह्रयाण' ( ५५ ) क्या ? अह्रीतयान वह क्या ? अल-
ज्जितयान=दूसरे यान से न लज्जित होने वाला यान ।
“ हे अग्ने ! 'अनुष्ठुया' (अनुष्ठानेन) कर्मसे वह ‘कृणुहि'
कर, जो हम चाहते हैं। हे 'अह्रयाण' ! अलज्जित-यान (नहीं
लज्जित होने वाले यान वाले ! ) ” यह भी निगम है ॥
'हरयाण' (५६) क्या ? हरमाण-यान वह क्या ? जिस
का यान सदा चलता ही रहे ।
“ ऋज्र मुक्षण्यायने रजतं हरूयाणे ।
रथं युक्त मसनाम सुषामणि” (ऋ०सं० ६,२,२५,२)
विश्वमना वैयश्वः ऋषि की यह ऋचा है। उष्णिक् छन्द है। इससे
यान की स्तुति की जाती है। वह कहता है—
“ हमने 'हरयाणे' नित्य चलू यान वाले 'सुषामणि'
सुन्दर सामवेद वाले 'उक्षण्यायने' 'उक्षणयायन' नाम वाले
यजमान में (से) 'ऋज्रम्' सीधा चलने वाला 'रजतम्' चांदी
का 'रथम्' रथ 'युक्तम्' घोड़ोंसे जुड़ाहुआ (असनाम) पाया । ”
यह भी निगम है।
यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से
"हरयाण" शब्द "हरमाणयान" से प्रतीत होता है।
भगवद् दुर्गाचार्य ने 'उक्षणयायन' नाम किसी यजमान
विशेष का बताया है। किन्तु 'उक्षन्' नाम बैल का है, और
यान नाम सवारी का है, इन दोनों के योग से 'उक्षणयान
हिन्दी निरुक्त ( १७५ ) ५ अ० ३ पा० ४ खं०
“मानो मघेव निष्पणी परादाः ।” ( ऋ० सं०
१, ७, १८, ५)
स यथा धनानि विनाशयति मानस्त्वं तथा
परादाः ॥
‘तूर्णाशम्’ उदकं भवति । तूर्णमश्नुते ।
“तूर्णाशं न गिरेरधि” [ ऋ० सं० ६,३,१,४ ]
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘क्षुम्पम्’ अहिच्छत्रकं भवति । यत् क्षुभ्यते—
४ [ १६ ] ॥
‘नियद्वृषासि’ यह सव्य आंगिरस ऋषि की ऋचा है। जगती छन्द और
इन्द्र देवता है। वह इन्द्र ही अंगिरस् का पुत्र होगया है।
अर्थ—हे भगवन् ! इन्द्र ! ‘यत्’ जो (तू) ‘श्वसनस्य’
(शब्दकारिणः) शब्द करने वाले वायु के ‘च और ‘व्रन्दिनः’
अपने तेज से फल आदि को कोमल बनाने वाले ‘शुष्णस्य’
(शोषयितुः) (आदित्यस्य) सूर्य के ‘मूर्द्धनि’ ऊपर ‘रोरुवत्’
(रोरूयमाणः) गर्जता हुआ ‘वना’ (वनानि) जलों को
‘निवृक्षासि’ (विक्षसि) फेंकता है। अर्थात् ऊपर और नीचे
जलों को फेंकते हुए तेरी शक्ति कभी घटती नहीं। यहां जिस
पक्ष में “वना” पद का ‘मेघवधेन’ (मेघ के वध से) ऐसा
निर्वचन करते हैं, उस पक्ष में ‘निवृक्षासि’ क्रिया में जोड़ने के
लिये ‘उदकानि’ (जलों को) यह पद ऊपर से ले लिया
जाता है। इस प्रकार ‘व्रन्दी’ शब्द आदित्य का विशेषण हो
कर मृदु (कोमल) भाव अर्थ के वाचक ‘व्रन्द’ (भ्वा० प०)
धातु का ही ठीक होना है।
हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ५ अ० ३ पा० ४खंड
“अवन्दन्त वीलिता” अर्थात्-'वीलिता' (वीलितानि
गर्वितानि) गर्ववाले असुर-कुल 'अवन्दन्त' मृदु या ढीले हो
गए । यह भी निगम है।
यहां 'वीलयति' धातु और 'व्रीलयति' धातु संस्तम्भ
या गर्व (कठोर-भाव) के वाचक होते हुए पूर्व पठित 'व्रन्द'
धातु से सम्बन्ध युक्त पढे गए हैं, इस से 'व्रन्द' धातु कोमल
भाव अर्थ का वाचक ठहरता है। क्योंकि-कठोर असुर-कुलों
का कोमल होने के अतिरिक्त क्या होता ? ।
'निष्षपी' (५६) यह अनवगत है । 'विनिर्गतसप.' यह शब्दसमाधि है ।
स्त्री-काम (पुश्चल) या जार इसका अर्थ है ।
'निष्षपी' (५६) स्त्री की कामना रखने वाला होता है।
क्योंकि-वह विनिर्गत-सप (जिस का सप (पुरुष चिन्ह)
निकला हुआ हो) ही रहता है।
'सप' शब्द स्पर्श अर्थके वाचक 'सप' (भ्वा०प०) धातु
से है। क्योंकि-उससे स्त्री योनि सपी (छूही) जाती है।
“ 'यः' जो 'निष्षपी' जार है, 'सः' वह 'मघा-इव'
(यथा धनानि) जैसे धनों को (विनाशयति) नष्ट करदेता है,
(तथा) उस प्रकार 'मा' मत् 'नः' हमें 'परादाः'बरबाद कर ॥”
'तूर्णाश' (६०) यह अनवगत है । “उदक भवति” यह अर्थ-कथन है ।
'तूर्णाश' (६०) उदक (जल) होता है। क्योंकि-वह
तूर्ण (शीघ्र) ही अशन (व्यापन) करता है।
“मेघार्थी जन 'गिरेः-अधि' मेघके ऊपर वर्त्तमान 'तूर्णा-
शम्' जलको 'इव' जैसे (आह्वयन्ति) बुलाते हैं।” यह भी
निगम है। यहां गिरि (मेघ) के सम्बन्ध से 'तूर्णाश' नाम
जलका ही हो सकता है ।
हिन्दी निरुक्त ( १७७ ) ५ अ० ३ पा० ५ खं०
'क्षुम्पम्' (६१) यह अनवगत है । 'अहिच्छत्र' यह अर्थ है ।
'क्षुम्प' ( ६१ ) अहिच्छत्र ( छत्राक ) या सांपका छाता
होता है । चौमासे में पृथिवी में गली हुई लकड़ी फूलकर छाते
के आकार से बाहर निकल आती है, उसे लोक में सांप का
छाता कहते हैं । ' क्षुम्प ' क्यों ? वह छूने से क्षोभ को प्राप्त
होता है, या बिगड़ जाता है ॥ - ॥ ४ ( १६ ) ॥
( खं० ५ )
(निघ०-) निचुम्पुणः ॥६२॥
[निरु०] "कदा मर्त्तमराधसम्पदाक्षुम्पमिव स्फुरत् ।
कदा नः शुश्रवद्गिरइन्द्रो अङ्ग ।" [ऋ०सं०१,६,६,३]
कदा मर्त्तम्-अनाराधयन्तं पादेन क्षुम्पमिव
अवस्फुरिष्यति कदा नः शृणोति च गिरः इन्द्रो
अङ्ग ।
'अङ्ग' इति क्षिप्रनाम। अञ्चितमेव अङ्कितं भवति
'निचुम्पुणः' सोमः । निचान्तपृणः । निचमनेन
प्रीणाति ॥ ५ [१७] ॥
“कदा मर्त्तम्” यह गोतम ऋषिकी ऋचा है । इन्द्र देवता है। उष्णिक् छन्द
और तृतीयसवन के उक्थपर्यायों में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनियुक्त है ।
'कदा' कब 'इन्द्रः' इन्द्र 'अनाराधसम्' (अनाराधयन्तम्)
न आराधन करते हुये 'मर्त्तम्' मनुष्य को 'पदा' (पादेन) पैर
से 'क्षुम्पम्' ( अहिच्छत्रकम् ) सांप के छाते के 'इव' समान
'स्फुरत्' ( अवस्फुरिष्यति ) कुचलेगा । 'कदा' कब 'नः' हमारी
'गिरः' वाणियों ( स्तुतियों ) को 'इन्द्रः' इन्द्र 'अङ्ग' झट पट
'शुश्रवत्' ( शृणोति = श्रोष्यति ) सुनेगा ।
२३
'अङ्ग' यह क्षिप्र या शीघ्र का नाम है। क्योंकि वह
'अञ्चित' ही अङ्कित होता है। अर्थात् अञ्चित से अङ्कित और
उस से अङ्ग बन जाता है। जो शीघ्र होता है, वह अञ्चित
या गया हुआ ही होता है इसी से 'अङ्ग' है।
निचुम्पुण (६२) यह अनवगत और अनेकार्थ है।
'निचुम्पुण' सोम होता है। क्योंकि वह 'निचान्तपृण'
होता है, अर्थात्-भक्षित (खाया हुआ) ही प्रीति करता
है ॥ ५ (१७) ॥
व्याख्या ।
भगवद्दुर्गाचार्य अपने समय में “कदा मर्त्तम्” इस
मन्त्र के भाष्य को “पादेन क्षुम्पमिव अवस्फुरसि” और
“कदा नः शृणोति गिरः” ऐसा पाते हैं, किन्तु इस
पाठ को 'स्फुरसि' 'शृणोति' इन क्रियाओं के विरुद्ध पुरुषों
के कारण छोड़ देते हैं, और अर्थ के अनुसार भाष्य का पाठ
'स्फुरसि' के स्थान में 'स्फुरिष्यति' ऐसी प्रथम पुरुष की
क्रिया से बदल कर उस की व्याख्या करते हैं। क्योंकि
“तू मारेगा” “वह सुनेगा” ऐसे प्रत्यक्ष और परोक्ष दो
वाक्य एक ही देवता के लिये संभव नहीं होते। वे कहते हैं
कि-भाष्यका यह पाठ ठीक है ? या बेठीक ? मुझे इससे कुछ
नही, किन्तु भाष्यका ठीक पाठ ढूंढना चाहिये, और मुझे ऐसा
ही प्रतीत होता है, जैसा कि मैंने व्याख्यान किया ॥ ५ (१७) ॥
( खं० ६ )
(निघ०) पदिम् ॥६३॥
(निरु०) “पत्नीवन्तः सुता इम उशन्तो यन्ति वीतये।
हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ५ अ० ३ पा० ६ खं०
अपां जग्मिं निचम्पुणः" [ ]
प॒त्नीव॑न्तः सु॒तां इ॒मे अ॒द्भिः॒ सोमा॑ः काम॑यमा-
ना य॑न्ति वी॒तये॑ पानाय अपां गन्ता निचम्पुणः ॥
समुद्रोऽपि निचम्पुण उच्यते । निचमनेन पूर्यते ॥
अवभृथोऽपि निचम्पुण उच्यते । नीचैरस्मिन्
क्णन्ति । नीचैर्दधति-इतिवा ॥
“अवभृथ निचम्पुण”—(य० वा० सं० ३, ४८)
इत्यपि निगमो भवति ॥
निचुम्पुण निचेङ्कण इति चे ।
पदि गन्तु र्भवति । यत् पद्यते-॥ ६ [१८] ॥
'पत्नीवन्तः' इसका कक्षी नाम आंगरस ऋषि ह । गायत्री छन्द, इन्द्र
देवता, और रात्रि पर्यायों में मध्यम पर्यायमें होताके शस्त्रमें विनियुक्त है ।
अर्थ:-(अद्भिः) 'पत्नीवन्तः' जलों से पत्नियों वाले
'सुताः' निचोड़े हुए 'इमे' ये (सोमाः) सोम 'उशन्तः'
(कामयमानाः) 'इव' चाहते हुये जैसे, 'वीतये' पान के अर्थ
'यन्ति' देवताओं के प्रति जाते हैं, कि-कैसे हमें ये पान करें ।
क्या यहीं ? न, 'अपांम्' जलों के वीर्य से युक्त फिर फिर
'निचुम्पुणः' सोम 'जग्मिः' (गन्ता) जाने वाला होता है ।
समुद्र भी 'निचुम्पुण' कहलाता है । क्योंकि वह निचमन
(जल) से भरा हुआ रहता है । निचमन (भक्षण) किया
जाता है, इसी से 'निचमन' जल है ।
अवभृथ (यज्ञ के अन्त में स्नान विशेष) भी 'निचुम्पुण'
कहलाता है । क्योंकि इस में धीरे धीरे बीजा जाता है। अथवा
हिन्दी निरुक्त ( १८० ) ५ अ० ३ पा० ७ खं०
इस में यज्ञ-पात्रों को धीरे २ धरते हैं ॥
“अवभृथ निचुम्पुणः” अर्थात्-हे 'अवभृथ' देव ! हे
'निचुम्पुण' धीरे २ शब्द करने वाले ! या नीचे नीचे देश में
चलने वाले ! वरुण ! ।
यहां 'अवभृथ' शब्द के समानाधिकरण में पढ़ा हुआ
'निचुम्पुण' शब्द अवभृथ का ही नाम होता है ।
'निचुङ्कुण शब्द भी 'निचुम्पुण' के समान ही समझना
चाहिए ।
'पदि' (६३) यह अनवगत है । 'गन्तु' यह अर्थ है ।
'पदि' ( ६३ ) गन्तु या चलने वाला होता है । क्योंकि
वह पदन ( गमन ) करता है ॥ ६-( १८ ) ॥
( खं० ७ )
[ निघ०] पादुः ॥ ६४ ॥
( निरु० ) “सुगुरसत् सुहिरण्यः स्वश्वो बृहदस्मै
वयइन्द्रो दधाति । यस्त्वा यन्तं वसुना प्रातरित्वो
मुक्षीजयेव पदिमुत्सिनाति” ( ऋ०सं० २,१,१०,२ )
सुगुर्भवति सुहिरण्यः स्वश्वो महच्चास्मै वयइन्द्रो
दधाति । यस्त्वा यन्त मन्नेन प्रातरागामिन्नातिथे ॥
' मुक्षीजयेव पदिमुत्सिनाति ।' कुमारः ।
मुक्षीजा मोचनाच्च सयनाच्च तननाच्च ॥
'पादुः' पद्यतेः ।
“ आविः स्वःकृणुते गृहते बुसं स पादुरस्य
हिन्दी निरुक्त ( १८१ ) ५ अ० ३ पा० ७ खं०
निर्णिजो न मुच्यते ” ( ऋ०सं० ७, ७, १९,४ )
आविष्कुरुते भासमादित्यो गूहते बुसम् ।
‘बुसम्’-इति उदक-नाम। ब्रवीतेः शब्दकर्मणः
भ्रंशतेर्वा । यद्वर्षन् पातयति उदकम् रश्मिभिः तत्
प्रत्यादत्ते ॥ ७ ( १९ ) ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥५,३॥
“ सुगुरसत् ” इसका कक्षीवान् ऋषि है।
अर्थः-जो ही ‘ सुगुः ’ ( शोभनगुः ) सुन्दर वाणी वाला
होता है, वह ‘सुहिरण्यः’ सुन्दर सुवर्णवाला होता है, ‘स्वश्व’
सुन्दर अश्व ( घोड़े ) वाला होता है, ‘च’ और ‘इन्द्रः’ इन्द्र
‘अस्मै’ इसके लिये ‘महत्’ बड़ा ‘वयः’ आयु ‘दधाति’ देता है।
‘यः-तु’ किन्तु जो ‘प्रातरित्वः’ हे (प्रातरागामिन् अतिथे ! )
प्रात काल आने वाले ! अतिथि देव ! ‘आयन्तम् ’ आये हुये
( भूख से विचलित हुए प्राण अभ्यागत) को ‘वसुना’ (अन्नेन)
अन्नसे ‘उत्सिनाति’ बांधता है। कैसे ? ( कुमारः ) बालक या
मूढ ‘मुक्षीज्या’ ( पाश्यया ) जाल से ‘पदिम्’-इव. पक्षी को
जैसे ‘ उत्सिनाति ’ बांधता है। अर्थात्- कोई बालक या मूढ
जिस प्रकार उड़ते हुये पक्षी को जालसे बांध लेता है, उसी
प्रकार जो गृहस्थ पुरुष आये हुये भूखे अभ्यागत के उड़ते हुए
प्राणों को अन्न से बांध लेता है ( उनके प्राणों को धारण
करदेता है ) उस सुन्दर वचन वाले को सुवर्ण, हाथी, घोड़े,
और लम्बी आयु इन्द्र देखता देता है, किन्तु सूखी या सार-
रहित सुन्दर वाणी वाले को नही ॥ इस प्रकार यहां ‘पदि’
हिन्दी निरुक्त ( १८२ ) ५ अ० ३ पा० ७ खं०
शब्द से पक्षी लिया जातां हैं, क्योंकि-वही उड़तां हुआ जाल
से पकड़ा जाता है ॥
‘मुक्षीजा’ क्यों ? मोचन से है। बाँधने से है। यां
फैलाने से है ॥
'पादु' [६४] यहँ अनवगत है । 'पद्यते.' यह अर्थ की प्रतीति है ।
'पादु' (६४) यह गत्यर्थक 'पद' (दि०आ०) धातु से है।
“ 'स्वः' (आदित्यः) सूर्य (भांसम्) ज्योति को 'आविः
कृणुते' (आविष्कुरुते) प्रकट करता (फैलाता) है । 'बुसम्'
जलको 'गूहते' खींचता है । 'अस्य' इस 'निर्णिजः' अन्धकार
रूप कीचड़ से सने हुये सब जगत्के स्वरूप को अपने प्रकाश
रूप जलसे धोने वाले सूर्य का 'सः' वह 'पादु'पदन (गमन तथा
ताप, प्रकाश, वर्षा, उदय, अस्त, और रसका खींचना आदि )
कर्म 'न' नहीं 'मुच्यते' छूटता है।”
'बुसं' यहं जल का नाम है । शब्दार्थक 'ब्रू' (अदा०उ०)
धातु से है । क्योंकि वह शब्द वाला होता है । अथवा 'भ्रंश्'
पतनार्थक (दि०प०) धातु से है । क्योंकि वह मेघ से गिरता
है ।
'बरसतां हुआ आदित्य जिस जल को गिरांता है, उसे
फिर अपनी किरणों से ले लेता है' । यह भाष्यकार ने
“गूहते बुसम्” इस वाक्य का फिर स्पष्टीकरण किया है ।
इस प्रकार उक्त मन्त्र में 'पादु' नाम पदन यां गमन का
है ॥ ७ ( १६ ) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य
तृतीयः पादः समाप्तः ॥ ५, ३॥
हिन्दी निरुक्त ( १८३ ) ५ अ० ४पा० २ खं०
चतुर्थः पादः ।
( खं० १ )
[निघ०] वृकः ॥६५॥
(निरु०) 'वृकः' चन्द्रमा भवति । विवृतज्योतिष्को
वा । विकृतज्योतिष्कोवा । विक्रान्तज्योतिष्को-
वा ॥ १ (२०) ॥
'वृक' (६५) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
'वृक' (६५) चन्द्रमा होता है । क्योंकि इस की ज्योति
विवृत या फैली हुई होती है । अथवा वह विकृत या ठंडी
ज्योति वाला होता है, और सब ज्योति उष्ण ( गरम )
होती हैं । अथवा वह विक्रान्त ज्योति वाला होता है,
क्योंकि उसकी ज्योति अन्य ग्रह नक्षत्र और ताराओं से
अधिक चमकीली होती है। (ये सब शब्द-समाधियें हैं) ॥१(२०)॥
( खं० २ )
(निरु०) “अरुणो मासकृद्वृकः पथा यन्तं ददर्श हि।
उज्जिहीते निचाय्या तष्टेव पृष्ट्यामयी वित्तं मे अस्य
रोदसी ॥” ( ऋ० सं० १,७,२३,३ ) ॥
'अरुणः' आरोचनः । 'मासकृत्' मासानां च
अर्द्धमासानांच कर्त्ता भवति । “चन्द्रमाः” 'वृकः'
पथा यन्तं ददर्श नक्षत्रगणम् । अभिजिहीते
निचाय्य, येन येन योक्ष्यमाणो भवति चन्द्रमाः,
तक्षणवद् इव पृष्टरोगी । जानीतं मे अस्य द्यावा-
पृथिव्यौ-इति ॥
आदित्योऽपि 'वृक' उच्यते । यत्-आवृङ्क्ते ॥२॥
अर्थः- “अरुणोमासकृत्” यह कूप में पड़े हुए आप्तचात्रित ऋषि की ऋचा
है । अथवा कुत्स की है । पङ्क्ति छन्द और विश्वेदेव देवता है ॥
'अरुणः' ( आरोचनः ) अपनी चांदनी से सब जगत् को
प्रकाशित करने वाला, 'मासकृत्' ( मासानांच अर्द्धमासानांच
कर्त्ता भवति ) जो मासों और आधे मासों ( पखवारों ) का
करने वाला है, वह 'वृकः' ( चन्द्रमाः ) चन्द्रमा (नक्षत्र-मण्डल
से नीचे स्थित हुआ हुआ ) पथा' अपने मार्ग या परिधि से
'यन्तम्' ( नक्षत्रगणम् ) जाते हुये नक्षत्र समूह को 'ददर्श'
( पश्यति ) देखता है । ( 'हि' पद पूरण है । ) किन्तु मुझे
अन्ध कूप में पड़े हुये को नहीं देखता । यदि कुछ भी देखता
तो अवश्य इस विपद् से मुझे छुड़ाता, यह अभिप्राय है ।
और 'इव' जैसे कोई 'पृष्ट्यामयी' ( पृष्ठ रोगी ) पीठ में राग
वाला बडही ( खाती ) 'तष्टा' ( तक्षण्वन् ) किसी वृक्ष को
काटता हुआ ऊँचा होकर देखता है कि मैं वाञ्छित शाखा
के पास पहुंच सकता हूं या नहीं ? उसी प्रकार चन्द्रमा भी
'निचाय्य' देख कर के 'उज्जहीते' ( अभिजिहीते ) ऊँचा
होता है ( येन येन योक्ष्यमाणो भवति चन्द्रमाः ) अर्थात्
जिस जिस नक्षत्र के साथ उसे योग करना होता है कि-आज
मुझे इस से योग करना है, उस उस नक्षत्र के साथ उदय
होता है । इस प्रकार इसको जिस से प्रयोजन होता है, उसी
को आदर से ऊँचा खड़ा होकर देखता है, किन्तु मुझ से इस
का प्रयोजन नहीं है, इसी से मुझे नीचे पड़े हुये को नहीं
देखता । इस कारण कहता हूं-हे 'रोदसी' (द्यावापृथिव्यौ ! )
हिन्दी निरुक्त ( १८५ ) ५ अ० ४ पा० २ खं०
द्युलोकपृथ्वीलोको ! तुम दोनों ‘अस्य’ इस कूप में पड़े हुये
‘मे’ मुझ त्रित के ‘वित्तम्’ (जानीतम्) आर्त-विलाप के अभि-
प्राय को जानों और जानकर मुझे इस कूप से निकालो। इस
प्रकार यहां पर ‘अरुण’ शब्द से और ‘मासकृत्’ शब्द से ‘वृक’
चन्द्रमा है। यहां पर ‘चन्द्रमा’ के योग से ‘नक्षत्र गण’ ऊपर से
ले लिया जाता है, जिसके द्वारा ‘पथा-यन्तम्’ की आकाङ्क्षा
पूरी होती है।
आदित्य भी वृक कहलाता है। क्योंकि-वह अँधेरे को
वर्जन करता है ॥२॥
व्याख्या ।
आप्त्यत्रित ऋषि की ऐसी ही प्रार्थना पहिले भी
(अ०४पा०१खं०६) “संमातपन्ति” मन्त्र में आई है।
“अरुणो मासकृत्” मन्त्र में “सर्वः स्वार्थवशो
लोकः” ‘सब संसार स्वार्थ के वश चलता है’ इस नीतिका
स्वरूप दिखाया। तथा जैसे कालिदास के “मेघदूत”
काव्य में मेघ को उद्देश्य करके यक्षने दूत योग्य बातों को कहा
है, उसी प्रकार त्रित भी चन्द्रमा की ओर लक्ष्य करके द्यावा-
पृथिवी से उसका उपालम्भ करता है ॥
इस मन्त्र में कोई शाखा वाले “मासकृत्” के ‘मा’
‘सकृत्’ ऐसे दो पद करते हैं। उससे त्रित यह कहता है कि-
चन्द्रमा ने मुझे एक बार ही देखा। यदि बार २ देखता तो
अवश्य मुझे इस विपद् से छुड़ाता ॥२॥
२४
हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ५ अ० ४ पा० ३ खं०
( खं० ३ )
(निघ०-) जोषवाकम् ॥६६॥
[निरु०-] “अजोहवीदश्विना वर्त्तिका वामास्यो
यत्सीममुञ्चतं वृकस्य ॥” [ऋ०सं०१,८,१६,१ ] ॥
आह्वयत्-उषा अश्विनौ आदित्येन अभिग्रस्ता,
ताम्-अश्विनौ प्रमुमुचतुः-इत्याख्यानम् ॥
श्वा अपि वृक उच्यते । विकर्त्तनात् ।
: ‘वृकश्चिदस्य वारण उरामथिः ।” उरणमथिः॥
‘उरणः' ऊर्णावान् भवति । ‘ऊर्णा' पुनः
वृणोतेः । ऊर्णोतेर्वा ॥
‘वृद्धवाशिनी' अपि 'वृकी '-उच्यते ।
“शतं मेषान्वृक्ये चक्षदानमृज्राश्वं तं पितान्र्धं
चकार” [ ऋ० सं०८,१८,११, १ ] इत्यपि निगमो
भवति ।
‘जोषवाकम् '-इति-अविज्ञातनामधेयम् ।
जोषयितव्यं भवति ॥ ३ [ २१ ] ॥
अर्थः- 'वर्त्तिका' वर्त्तने वाली (आदित्येन अभिग्रस्ता)
आदित्य (सूर्य) से ग्रसी हुई हुई (उषाः) उषा ने 'यत्' जब
‘अश्विना’ (अश्विनौ) हे अश्विन देवो ! ‘वाम्' तुम दोनों
को 'अजोहवीत्' (आह्वयत् ) बुलाया । तब (‘सीम्' निपात
पद पूरण) तुम ने 'वृकस्य' आदित्य के ‘आस्यः' (मुखात् )
मुख से (ताम्) उसे 'अमुञ्चतम्' (प्रमुञ्चथुः) छुड़ाया ।
हिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ५ प्र० ४ पा० ३ खं०
आदित्य से ग्रसी हुई उषा ने अश्विनों को आवाहन
किया और अश्विनों ने उसे छुड़ाया यह आख्यान है । क्यों-
कि उषा का लोप आदित्य के ही उदय से होता है, इसी से
'वृक' नाम यहां आदित्य का ही हो सकता है ।
कुत्ता भी 'वृक' कहलाता है । विकर्तन ( काटने ) से ।
कुत्ते के साम्हने जो नया आदमी वा कोई प्राणी आता है,
उसे वह विकर्तन करता (काटता) है, इससे वह 'वृक' है ॥
" 'अस्य' ( इन्द्रस्य ) इस इन्द्र के यहां 'वारणः' शत्रुओं
को हटाने वाला, 'उरामथिः' (उरणमथिः) मीढों (भेड़ों) को
मन्थन करने (मारने) वाला 'वृकः श्वित्' कुत्ता भी है ॥”
'उरण' क्या ? ऊर्णावान् (ऊन वाला) होता है । 'ऊर्णा'
शब्द ढांपने अर्थ वाले 'वृञ्' (स्वा० उ०) धातु से है । क्योंकि-
जिसके वह होती है, उसे वह ढाप लेती है । अथवा आच्छा-
दन अर्थ में 'ऊर्णुञ्' (अदा० उ०) धातु से उसी कारण से ॥
वृद्धवाशिनी (जोर से शब्द करने वाली) गीदड़ी भी
'वृकी' कहलाती है । क्यों कि—वह भी विकर्तन (दंशन)
करती है ।
“शतं मेषान्वृक्ये चक्षदान मृज्राश्वं तं पितान्धं
चकार । तस्मा अक्षीनासत्या विचक्ष आधत्तं दस्रा
भिषजावनर्वन् ॥ ( ऋ० सं० १, ८, ११, १ )
यह ऋचा कक्षीवान ऋषि की है । अश्विनौ देवता और त्रिष्टुप्
छन्द है । प्रातरनुवाक और आश्विन में शस्त्र है ।
कक्षीवान् कहते हैं, कि-ऋज्राश्व नाम राज पुत्र ने प्रसन्न
होकर 'वृक्ये' गीदड़ी को उसके शब्द करने पर 'शतं' सौ
( १०० ) 'मेषान्' भेड़ें 'दानम्' दान की 'चक्षत्' आज्ञा दी
हिन्दी निरुक्त (१८६) ५ अ० ४ पा० ४ खं०
कि-इसने हमारी यात्रा में शुभ शब्द किया है। 'तम्' ऐसी
आवाज़ देनेवाले उस 'ऋज्राश्वम्' ऋज्राश्व को 'पिता' पिता
ने शापसे 'अन्धम्' अन्ध 'चकार' कर दिया कि-यह बड़ा
साहसी है। 'तस्मै' उस 'विचक्षे' चक्षुरहित (अन्धे) को 'ना-
सत्या' (नासत्यौ) अश्विनं 'भिषजौ' देवताओं के वैद्यों 'ने वे
'अक्षी' नेत्र 'आधत्तम्' दिये जो 'अनर्वन्' (अन्यत्र अनाश्रिते)
दूसरी जगह नहीं थे। इस प्रकार यहो मेष (मीढे) के सम्बन्ध
से और व्याख्यान में अर्थ के घट जाने से 'वृकी' से गीदड़ी
कही गई निश्चित होती है।
इस मन्त्र में यात्रा के समय गीदड़ी के शब्द को शुभ
शकुन बताकर शकुन शास्त्र को प्रमाणित कर दिया है। और
अनुचित उदारता की निन्दा की गई है। एवम् पुत्र पर पिता
के शासन के अधिकार की सूचना भी मिलती है॥
'जोषवाकम्' (६६) यह अनवगत है। 'अविज्ञातनामधेय' (नहीं जाने
हुए का नाम) यह अर्थ-कथन है।—
'जोषवाक' (६६) यह अविज्ञात का नाम है। क्योंकि
वह सेवन योग्य या प्रकाशनयोग्य होता है। जो किसी से
न जाने जावें, ऐसे विषय-सेवन में प्रिय होते हैं। अथवा जो
अज्ञात (नहीं जाना हुआ) है, उसी का प्रकाश भी किया
जाता है॥ ३ (२६) ॥
(खं० ४)
[निघ०] कृत्तिः ॥६७॥ श्वघ्नी ॥६८॥
समस्य ॥६६॥
(निरु०) "य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृधता वृधा ।
हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ५ अ० ४ पा० ४ खं०
जोषवाकं वदतः पञ्चहोषिणा न देवा भसथश्चन ॥”
[ऋ० सं० ४, ८, २५, ४ ]
य इन्द्राग्नी सुतेषु वां सोमेषु स्तौति तस्य
अश्नीथः । अथ यः अयं जोषवाकं वदति विजल्पः
प्रार्जितहोषिणौ न देवौ तस्य अश्नीथः ॥
‘कृत्तिः’ कृन्ततेः । यशोवा । अन्नंवा ॥
“महीव कृत्तिः शरणात इन्द्र” (ऋ० सं० ६,६,
१३, ६ ) ।
सुमहत्त इन्द्र शरणम् अन्तरिक्षे कृत्तिरिव-इति ॥
इयमपि इतरा कृत्तिः, एतस्मादेव सूत्रमयी ।
उपमार्थे वा ।
❊ “कृत्तिवासाः पिनाकहस्तोऽवततधन्वा”
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘श्वघ्नी’ कितवोभवति । स्वं हन्ति, स्वं पुनः
आश्रितं भवति ॥
“कृतं न श्वघ्नी विचिनोति देवने ॥” ( ऋ०
सं० ७, ८, २४, ५ )
कृतमिव श्वघ्नी विचिनोति देवने ॥
❊ “अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः” इति पा-
ठान्तरं तच्च संहितापाठसंमतम् ।
हिन्दी निरुक्त ( १६० ) ५ अ० ४ पा० ४खंड
'कितवः' किंत्तव अस्ति-इति शब्दानुकृतिः।
कृतवान् वा आशीर्नामकः ॥
'समम्' इति परिग्रहार्थीयं सर्वनाम अनुदात्तम्-
॥ ४ ( २२ ) ॥
अर्थः- "यद्वेन्द्राग्नी" यह ऋचा भरद्वाज ऋषि की है। बृहती छन्द है।
हे 'इन्द्राग्नी !' 'यः' जो यजमान 'सुतेषु' ( सोमेषु )
सोमों के निचोड़ जाने पर 'तेषु' ( कर्मसु ) उन कर्मों में 'वाम्'
( युवाम् ) तुम दोनों को 'स्ततत्' ( स्तौति ) स्तुति करता
है। हे 'ऋतावृधा !' सत्य के या जल के या यज्ञ के बढ़ाने
वाले देवो ! (तस्य ) उस के यहां 'अश्नीथः' खाते हो।
( अथ ) और ( योऽयं ) औ यह 'जोषवाकम्' गुपचुप (वदति)
बोलता है, अर्थात् ( विजञ्जपः ) केवल जल के किनारे या
अन्य किसी गुप्त स्थान में बैठा हुआ जप ही करता है, किन्तु
कर्म नहीं करता, 'तस्य जोषवाकं वदतः' उस थोथे बोलने
वाले के यहां 'पज्रहोषिणा !' ( प्रार्जितहोषिणौ ) बहुत
यज्ञों वाले 'देवा' ( देवौ ! ) हे देवताओ ! 'न' नहीं 'भस-
थश्चन' ( अश्नीथः ) खाते हो ॥ इस प्रकार इस मन्त्र में 'जिस
के यहां सोम निचोड़े जाते हैं, उसी के यहां तुम खाते हो,
किन्तु जो जोषवाक बोलता है, उस के यहां नहीं' इस सम्बन्ध
से 'जोषवाक' अविज्ञात या गुप चुप का नाम ही हो सकता
है ॥
व्याख्या ।
"यद्वेन्द्राग्नी" इस मन्त्र में यह बताया गया है कि-
जप यज्ञ से अन्न यज्ञ उत्तम है, तथा अपनी शक्ति के अनु-
हिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ५ अ० ४ पा० ४ खं०
सार अन्न से इन्द्र की पूजा करने में कोई शठता नहीं करना
चाहिए ॥
'कृत्ति' (६७) यह अनवगत और अनेकार्थ है । "कृन्तते." यह धातु का
निर्देश है । "यशः अन्नवा" यह अर्थ का कथन है । 'कर्त्तत'-इह उचित है ।
अर्थः- 'कृत्ति' (६७) छेदन (काटना) अर्थ में 'कृत' (तु०
प०) धातु से है । 'कृत्ति' नाम अथवा यश का अथवा अन्न
का है। क्योंकि यश शत्रुओं के मर्मों को काटता है। और अन्न
भी अधिक खाया हुआ आयु को नष्ट करता है ॥
हे 'इन्द्र !' मैंने 'महि' (सुमहत्) बड़े 'कृत्तिः-इव'
यश या अन्न के समान 'ते' तेरा 'शरणा' (शरणम्) घर
(अन्तरिक्षे) आकाश में (अश्रवम्) सुना है। यहां इन्द्र के
घर को कृत्ति (यश या अन्न) से उपमा दी है। क्योंकि यश
भी विस्तीर्ण (फैला हुआ) होता है और अन्न खाए हुये
को भूख नहीं सताती, उसी प्रकार इन्द्रका घर बड़ा और उस
में घुसने के पश्चात् भूख प्यास नहीं सताती इस प्रकार उपमा
की उपपत्ति होने से कृत्ति के यश और अन्न दोनों अर्थ
ठीक हैं।
यह दूसरी सूत्र (सूत) की बनी हुई 'कृत्ति' (कन्था)
भी इसी कारण से है। क्योंकि-वह सूत के टुकड़ों से गूंथी
(सीं ई) जाती है अथवा उपमा अर्थ में चर्म (चमड़ा) भी
'कृत्ति' है ।
"कृत्तिं वसान आचर पिनाकं बिभ्रदागहि"
[ य० सं० १६, ५१ ]
हे रुद्र ! 'कृत्तिम्' कन्था को 'वसानः' ओढ़ेहुए 'आचर'
आ । 'पिनाकं' अपने पिनाक नाम धनुष को 'बिभ्रत्' धारण
किये हुये 'आगहि' आ ।
हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ५ अ० ४पा० ४ खं०
"अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः"
( ऋ० सं० ६, ३, ४५, ५ य० वा० सं० ३, ६१ )
"धनुष् को फैलाए हुए या उसकी कमान को झुकाए
हुये पिनाक धनुष् को हाथमें लिये हुये चर्म का वस्त्र पहिने
हुये" ये दो निगम हैं ।
व्याख्या ।
इन मन्त्रोंमें देवता अपने भक्तोंके यहां वस्त्र और शस्त्र
धारण करके उनकी रक्षाके निमित्त आते हुए दिखाई देते -
हैं । नये वैदिकों को भी सगुण देवताओंकी उपासना से लाभ
उठाना चाहिए ॥
'श्वघ्नी' (६८) यह अनवगत है । "कितवाभवति"यह अर्थका कथन
है । "श्व हन्ति" यह शब्द की व्युत्पत्ति है, किन्तु स्वहा (धन या अपने
का नाश करने वाला) यह युक्त है ।-
'श्वघ्नी' (६८) कितव (ज्वारिया) होता है । क्योंकि-
यह स्व (अपने का या धन) को हनन करता है । 'स्व' फिर
क्या ? 'आश्रित' क्यों ? स्वामी को अभिमुखता से श्रयण
(धारण) किये हुये होता है ।
"श्वघ्नी" (कितवः) ज्वारिया 'न' (इव) जैसे 'देवने' जूवे
के अड्डे में 'कृतम्' कृत को 'विचिनोति' ढूंढता है कि कैसे
किया हुआ हो, जिससे मैं जीतूँ ।
'कितव' क्यों ? 'किंतवास्ति' (क्या तेरा है ?) इस शब्द
का अनुकरण है । क्योंकि-वह नित्यकाल ही खेलने की इच्छा
करता हुआ अपने सामने खेलने वाले ज्वारियों से पूछता है
कि "किंतवास्ति" इस शब्द के आधार पर यह 'कितव'
शब्द होगया। अथवा ज्वारिए के मित्रगण यह आशिष् मांगते
रहते हैं कि- “किसी प्रकार यह “कृतवान्” (कृतकार्य) सफल
हो” इस आशिष् के निमित्त ( कारण ) से 'कृतवान्' शब्द से
'कितव' नाम होगया ॥
'समम्' ( ६६ ) यह परिग्रह ( सम्पूर्ण ) अर्थ में सर्वनाम
और अनुदात्त है।
( खं० ५ )
(निरु०) “मानः समस्य दूर्ह्यः१ परिद्वेषसो अंहतिः।
ऊर्मिर्न नावमावधीत् ॥” (ऋ० सं० ६, ५, २५, ४ )
मानः सर्वस्य दुर्धियः पापधियः सर्वतोद्वेषसः
अंहतिः ऊर्मिः इव नावम्-आवधीत ।
'ऊर्मिः' ऊर्णोतेः । 'नौः' प्रणोत्तव्या भवति ।
नमतेर्वा ।
तत् कथम्-अनुदात्तप्रकृति नाम स्यात् ? दृष्ट-
व्ययंतु भवति ।
“उतोसमस्मिन्नाशिशीहि नो वसो” ( ऋ० सं०
६, २, २, ३) इति सप्तम्याम् । शिशीतिर्दानकर्मा ।
“उरुष्याणो अघायतः समस्मात्” ( य० वा० सं०
३, २६) । इति पञ्चम्याम् । उरुष्यतिः-अकर्मकः ।
अथापि प्रथमा बहुवचने- “नभन्तामन्यके समे”
( ऋ० सं० ६, ३, २६, १ ) ॥ ५ ( २३ ) ॥