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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 603

हिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ५ प्र० ४ पा० ३ खं०
आदित्य से ग्रसी हुई उषा ने अश्विनों को आवाहन
किया और अश्विनों ने उसे छुड़ाया यह आख्यान है । क्यों-
कि उषा का लोप आदित्य के ही उदय से होता है, इसी से
'वृक' नाम यहां आदित्य का ही हो सकता है ।
कुत्ता भी 'वृक' कहलाता है । विकर्तन ( काटने ) से ।
कुत्ते के साम्हने जो नया आदमी वा कोई प्राणी आता है,
उसे वह विकर्तन करता (काटता) है, इससे वह 'वृक' है ॥
" 'अस्य' ( इन्द्रस्य ) इस इन्द्र के यहां 'वारणः' शत्रुओं
को हटाने वाला, 'उरामथिः' (उरणमथिः) मीढों (भेड़ों) को
मन्थन करने (मारने) वाला 'वृकः श्वित्' कुत्ता भी है ॥”
'उरण' क्या ? ऊर्णावान् (ऊन वाला) होता है । 'ऊर्णा'
शब्द ढांपने अर्थ वाले 'वृञ्' (स्वा० उ०) धातु से है । क्योंकि-
जिसके वह होती है, उसे वह ढाप लेती है । अथवा आच्छा-
दन अर्थ में 'ऊर्णुञ्' (अदा० उ०) धातु से उसी कारण से ॥
वृद्धवाशिनी (जोर से शब्द करने वाली) गीदड़ी भी
'वृकी' कहलाती है । क्यों कि—वह भी विकर्तन (दंशन)
करती है ।
“शतं मेषान्वृक्ये चक्षदान मृज्राश्वं तं पितान्धं
चकार । तस्मा अक्षीनासत्या विचक्ष आधत्तं दस्रा
भिषजावनर्वन् ॥ ( ऋ० सं० १, ८, ११, १ )
यह ऋचा कक्षीवान ऋषि की है । अश्विनौ देवता और त्रिष्टुप्
छन्द है । प्रातरनुवाक और आश्विन में शस्त्र है ।
कक्षीवान् कहते हैं, कि-ऋज्राश्व नाम राज पुत्र ने प्रसन्न
होकर 'वृक्ये' गीदड़ी को उसके शब्द करने पर 'शतं' सौ
( १०० ) 'मेषान्' भेड़ें 'दानम्' दान की 'चक्षत्' आज्ञा दी