निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 606, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६० ) ५ अ० ४ पा० ४खंड
'कितवः' किंत्तव अस्ति-इति शब्दानुकृतिः।
कृतवान् वा आशीर्नामकः ॥
'समम्' इति परिग्रहार्थीयं सर्वनाम अनुदात्तम्-
॥ ४ ( २२ ) ॥
अर्थः- "यद्वेन्द्राग्नी" यह ऋचा भरद्वाज ऋषि की है। बृहती छन्द है।
हे 'इन्द्राग्नी !' 'यः' जो यजमान 'सुतेषु' ( सोमेषु )
सोमों के निचोड़ जाने पर 'तेषु' ( कर्मसु ) उन कर्मों में 'वाम्'
( युवाम् ) तुम दोनों को 'स्ततत्' ( स्तौति ) स्तुति करता
है। हे 'ऋतावृधा !' सत्य के या जल के या यज्ञ के बढ़ाने
वाले देवो ! (तस्य ) उस के यहां 'अश्नीथः' खाते हो।
( अथ ) और ( योऽयं ) औ यह 'जोषवाकम्' गुपचुप (वदति)
बोलता है, अर्थात् ( विजञ्जपः ) केवल जल के किनारे या
अन्य किसी गुप्त स्थान में बैठा हुआ जप ही करता है, किन्तु
कर्म नहीं करता, 'तस्य जोषवाकं वदतः' उस थोथे बोलने
वाले के यहां 'पज्रहोषिणा !' ( प्रार्जितहोषिणौ ) बहुत
यज्ञों वाले 'देवा' ( देवौ ! ) हे देवताओ ! 'न' नहीं 'भस-
थश्चन' ( अश्नीथः ) खाते हो ॥ इस प्रकार इस मन्त्र में 'जिस
के यहां सोम निचोड़े जाते हैं, उसी के यहां तुम खाते हो,
किन्तु जो जोषवाक बोलता है, उस के यहां नहीं' इस सम्बन्ध
से 'जोषवाक' अविज्ञात या गुप चुप का नाम ही हो सकता
है ॥
व्याख्या ।
"यद्वेन्द्राग्नी" इस मन्त्र में यह बताया गया है कि-
जप यज्ञ से अन्न यज्ञ उत्तम है, तथा अपनी शक्ति के अनु-