निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८० ) ५ अ० ३ पा० ७ खं०
इस में यज्ञ-पात्रों को धीरे २ धरते हैं ॥
“अवभृथ निचुम्पुणः” अर्थात्-हे 'अवभृथ' देव ! हे
'निचुम्पुण' धीरे २ शब्द करने वाले ! या नीचे नीचे देश में
चलने वाले ! वरुण ! ।
यहां 'अवभृथ' शब्द के समानाधिकरण में पढ़ा हुआ
'निचुम्पुण' शब्द अवभृथ का ही नाम होता है ।
'निचुङ्कुण शब्द भी 'निचुम्पुण' के समान ही समझना
चाहिए ।
'पदि' (६३) यह अनवगत है । 'गन्तु' यह अर्थ है ।
'पदि' ( ६३ ) गन्तु या चलने वाला होता है । क्योंकि
वह पदन ( गमन ) करता है ॥ ६-( १८ ) ॥
( खं० ७ )
[ निघ०] पादुः ॥ ६४ ॥
( निरु० ) “सुगुरसत् सुहिरण्यः स्वश्वो बृहदस्मै
वयइन्द्रो दधाति । यस्त्वा यन्तं वसुना प्रातरित्वो
मुक्षीजयेव पदिमुत्सिनाति” ( ऋ०सं० २,१,१०,२ )
सुगुर्भवति सुहिरण्यः स्वश्वो महच्चास्मै वयइन्द्रो
दधाति । यस्त्वा यन्त मन्नेन प्रातरागामिन्नातिथे ॥
' मुक्षीजयेव पदिमुत्सिनाति ।' कुमारः ।
मुक्षीजा मोचनाच्च सयनाच्च तननाच्च ॥
'पादुः' पद्यतेः ।
“ आविः स्वःकृणुते गृहते बुसं स पादुरस्य