निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २७१ ) ६ अ० ४ पा० ३ खं०
( खं० ३ )
निरु०- "आवा मुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु
यज्जि याः । इहाद्य सोमपीतये ॥” ( ऋ०सं० २,
८, १०, ६ ) ॥
आसीदन्तु वाम् 'उपस्थम्' उपस्थानम्, अद्रोग्ध-
व्ये इति वा । यज्जि याः देवा यज्ञसम्पादिनः
इह अद्य सोमपानाय ॥
'द्यावापृथिव्यौ' व्याख्याते ।
तयोः एषा भवति- ॥ ३ ( ३७ ) ॥
अर्थः-“आवाम्०” और “द्यावा नः पृथिवी०”
इस ऋचा का गृत्समद ऋषि है । हविर्धान (शकट) के प्रवर्तन
(चलाने) में विनियोग है ।
हे हविर्धाने ! 'अद्रुहा' (अद्रोग्धव्ये) नहीं द्रोह करने योग्य
तुम दोनों से कहा जाता है-‘इह' यहां 'अद्य' आज 'सोमपानाय'
सोमके पीनेके अर्थ 'यज्जि याः' [ यज्ञसम्पादिनः ) यज्ञके
सम्पादन करने वाले 'देवाः' देवता 'वाम्' तुम दोनों की
उपस्थम्' ( उपस्थानम् ) पीठपर 'आ-सीदन्तु' बैठें (यह हम
चाहते हैं ॥
'द्यावा पृथिव्यौ' (३१) ( द्यौश्च पृथिवी च ) 'द्य' और
'पृथिवी' व्याख्यान किये जाचुके [ ] ॥
“तयोः” उन दोनों (द्यावा पृथिवीयों) की यह ऋचा
है- ॥ ३ ( ३७ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( २७१ ) ६ अ० ४ पा० ४ खं०
(खंड४)
निरु०-“द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्र मद्य दिवि-
स्पृशम्। यज्ञं देवेषु यच्छताम्॥[ऋ०सं०२,८,१०,५]
द्यावापृथिव्यौ नः इमं साधनम् अद्य दिविस्पृशं
यज्ञं देवेषु नियच्छताम् ॥
‘विपाट् शुतुद्रचौ’ व्यारुङ्गाते ।
तयोः एषा भवति ॥४ (३८)॥
अर्थः-“द्यावानः०” ( ये एते ) जो ये ‘द्यावापृथिवी’
द्युलोक पृथिवी लोक देखते हैं, सो ‘नः’ हमारे ‘इमम्’ इस
‘दिविस्पृशम्’ द्यु (आकाश = द्युलोक) को स्पर्श करने वाले
‘सिध्रम्’ (साधन) साधने वाले ‘यज्ञम्’ यज्ञ को ‘अद्य’ आज
‘देवेषु’ देवताओं में ‘यच्छताम्’ (नियच्छताम्( देवे’ ॥
‘विपाट् शुतुद्रयौ’ (३२) (विपाशा और शुतुद्री नदिये’)
उपख्यान की जाचुकी हैं [ ] ॥
“तयोः०” उन दोनों ( विपाशा और शुतुद्री ) की यह
ऋचा है ॥ ४ (३८)॥
व्याख्या ।
विपाशा (व्यास) और शतद्रू ( सतलुज ) :
पंजाब शिक्षा विभाग के “पंजाबभूगोल”नामपुस्तक
में जो इस देशकी चतुर्थ कक्षा की पाठ्य पुस्तक है, इन दोनों
नदियों का वर्णन इस प्रकार है ।
“व्यासा - इसको पंजाबी लोग वियाह कहते हैं,यह नदी
एक झील में से निकलती हैं, जिसको व्यास कुंड कहते हैं,
हिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ९ अ० ४पा० ४ सं०
पहिले कुल्लू के नीचे होकर मंडी में आती है । फिर जिला
कांगड़ा और हुशियार पुर से होती हुई हरि के पत्तन परजो
जिला फीरोज पुर और अम्रत सर की सीमा पर है सतलुज
नदी से मिलजाती है । यहां से इस नदी का नाम धारा हो
जाता है। फिर बहावलपुर की सीमा पर प्रह्लाद पुर के
नीचे रावी चेनाव जेहलम नदियां भी जो ऊपर से मिली
हुई आती हैं इसमें मिल जाती हैं ॥” (पृ० ४)
“सतलुज — जिसका पुराना नाम शतद्रु है । यह नदी
तिब्बत के पहाड़ों में से जो झील मान सरोवर के निकट हैं
निकलती है। और का हलूर पहाड़ के बीच में से होकर कुल्लू
में जाती है । विलासपुर के नीचे जहां पहाड़ में से निकलती
है । वहा उसकी दो धारा होगई है । रोपड़ नगर के नीचे
आकर दोनों धारा मिल गई हैं। यहां सरकार ने इस नदी में
से एक बहुत बड़ी नहर निकाली है फिर छोटा माछियां
नामी नगर से होकर फिल्लौ के नीचे आती है । यहां इस
नदीपर एक बड़ापुल बांधा हुआ है । बड़ी सड़क और रेलकी
सडक इसी पुलपर से होकर जाती है । फिर यहनदी जालन्धर
के जिले को फिरोजपुर से अलग करती हुई हरिके पत्तन पर
ब्यासा से मिल जाती है ॥” (पृ०३)
ब्यासा। नाम से विपाशा और सतलुज नाम से शतद्रु
मिलता हुआ है । मन्त्रोक्त वर्णन इस पूर्वोक्त भूगोलसे मिलता
हुआ है । पर्वतो से आना और फिर मिलजाना यह दोनों ही
बातें मन्त्र में “पर्वतानाम्-उपस्थात्” और “उशती”
इन पदों से स्पष्ट उक्त होती हैं। दोनों नदियों को जोघोड़ियों
और व्याई हुई गोओं की उपमा मन्त्र में आई है,उससेमन्त्र-
हिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ६ अ० ४ पा० ५ ख०
द्रष्टा ऋषि के पर्वतों से उतरती हुई नदियों पर कई प्रकार के
भाव प्रकट होते हैं। घोड़ियों की उपमा से. ऋषि देखता है
मानों दो घुड़सालों से दो घोड़ियां छूट कर दौड़ रही हैं,
और शीघ्रता पूर्वक एक दूसरी से मिलना चाहती है। एवम्
ब्याई हुई गायों के दृष्टान्त से एक की एकपर वत्सलता प्रतीत
हो रही है। इत्यादि। इस वर्णन को देख कर मन्त्र में यह
वर्णन इन्हीं नदियों का प्रतीत होता है पहिली नदी का नाम
'व्यासा' व्यास कुण्ड से उत्पन्न होने के कारण और दूसरा
'विपाशा' नाम इसमें व्यास जी के पाश कट जाने के कारण
है। पुत्र वियोग के कारण कभी व्यास जी शोकातुर होकर
पाशबन्ध से प्राण त्याग करना चाहते थे, उन का पाश इस
नदी में टूट गया था। यह कथा पुराण की है॥
(खं० ५ )
निरु०- "प्रपर्वताना मुशती उपस्था दश्वे इव
विषिते हासमाने । गावेव शुभ्रे मातरो रिहाणे
विपाट् शुतुद्री पयसा जवेते॥”[ऋ०सं०३,२,१२,१] ॥
पर्वतानाम् 'उपस्थात्' उपस्थानात् उशत्यौकाम
यमाने अश्वे इव । विमुक्ते इति वा । विषणे इति
वा । हासमाने । 'हासतिः' स्पर्धायाम्'। हर्षमाणे
वा । गावौ-इव 'शुभ्रे' शोभने मातरौ संरिहाणे
'विपाट् शुतुद्र्यौ' पयसा प्रजवेते ॥
'आर्ती' अर्त्तन्याँवा । अरण्यौ वा । अरिषण्यौ वा।
तयोः-एषा भवति ॥५[३९] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २७४ ) ६ अ० ४ पा० ६ ख०
अर्थः- “प्रपर्वताना०” विश्वामित्र कहता है- (येचएते)
और ये 'विपाट् शुतुद्र्यौ' विपाशा और शुतुद्री नदिये 'उशती'
(उशत्यौ = कामयमाने) परस्पर के समागम = संगम की इच्छा
करती हुईं 'विषिता' (मन्दुराणतःविमुक्ते ) घुड़साल से छोड़ी हुई
(विषवणे इति वा) एक साथ जूये में जाती हुई 'अश्वे- इव'
घोड़ियोँ के समान ' हासमाने ' परस्पर स्पर्धा करती हुईं -
होड़ करती हुई [क्योंकि- 'हास' (भ्वा० प० ) धातु स्पर्धा
अर्थ में है ।] अथवा (हर्षमाणे) हर्ष करती हुई 'अश्वे इव '
दो घोड़ियोँ के समान, तथा (सं) ' रिहाणे' अपने वत्स को
चाटने की इच्छा करती हुईं ' मातरा ' ( मातरौ ) माताओं
'गावा- इव' (गावो-इव ) गोओँ के समान, ' पर्वतानाम् '
पर्वतों के 'उपस्थात्' (उपस्थानात्) कमर से = मध्य से 'पयसा,
जल से 'प्र-जवेते' वेग से दौड़ती है ॥
आर्त्नी (३३) (धनुष के सिरे) क्यों ? ये अर्तनी = बाणो
के चलाने वाली होती हैं । अथवा अरणी = शरण या गमन
के योग्य होने से वे आर्त्नी है । अथवा अरिषणी = शत्रुओँ
को मारने वाली होने से आर्त्नी हैं ।
“तयोः०” उन दोनों (आर्त्नियों) की यह ऋचा है-॥५(३६)
( खं० ६ )
निरु०- “ ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव
पुत्रं बिभृता मुपस्थे। अप शत्रून् विध्यतां संविदाने
आर्त्नी इमे विस्फुरन्तीअमित्रान् ॥”[ऋ०सं०५,१,
१९,४] (य०वा० सं० २९, ४) ॥
ते आरचन्त्यौ समनसौ इव योषे, माता- इव
हिन्दी-निरुक्त ( २७५ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं०
पुत्रं बिभृता मुपस्थे उपस्थाने अपविध्यतां शत्रून्
संविदाने आर्त्न्यौ इमे विघ्नन्त्यौ अमित्रान् ॥
'शुनासीरौ' 'शुनो'-वायुः। शु एति अन्तरिक्षे।
'सीरः' आदित्यः । सरणात् ।
तयोः एषा भवति ॥६ (४०) ॥
अर्थ:-" ते आचरन्ती ० " इस मन्त्र से अश्वमेध में
आर्तिर्नयों का ही अनुमन्त्रण किया जाता है ।
(ये एते) जो ये 'आर्त्नी' धनुष् की कोटिये' ' समना '
(समनसौ) एक पति वालीं 'योषा' [योषे] इव' दो स्त्रियों के
समान, आचरन्ती' ( आचरन्त्यौ ) आचरण करने वाली हैं-
जिस प्रकार एक पति वालीं दो स्त्रियें एक पति के प्रतिआ-
लिङ्गन करने के अर्थ आचरण करती हैं, वैसे ही ये दोनों
धनुष् की कोटिये' आक्रष्टा = खेंचने वाले के प्रति आचरण
करती हैं । 'ये' 'आर्त्नी' जो आर्तिर्नियें ' 'माता' पुत्रम् -
इव' माता पुत्र को जैसे (आक्रष्टारम्) खेंचने वाले धनुष्मान्
को 'उपस्थे' (उपस्थाने) गोद में 'बिभृताम्' रक्षा के लियेधारण
करती हैं। (ये) जो 'इमे' ये आर्तिर्नियें ' 'अमित्रान् ' शत्रुओं
के 'विस्फुरन्ती' (विस्फुरन्त्यौ) [विघ्नन्त्यौ] विनाश करती हुई
होती हैं, 'ते' वे आर्तिर्नियें 'संविदाने' आपस में संवाद जैसा
करती हुईं 'शत्रून्' शत्रुओं को 'अपविध्यताम्' वेधन करें =
मारें ॥
'शुनासीरौ' (३४) ( वायु और आदित्य ) कैसे ? 'शुन'
वायु होता है । क्यों ? 'शु एति अन्तरिक्षे'—शीघ्र अन्तरिक्ष
में गमन करता है । 'सीर' आदित्य होता है । क्यों सरण =
गमन से ।
हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ४ पा० ७ खं०
उन दोनों की यह ऋचा है ॥ ६ (४०) ॥
( खं० ७ )
निरु०-‘शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद्दिवि
चक्रथुः पयः । तेनेमामुपसिञ्चतम् ॥” [ऋ० सं०
३, ८, ९, ५ । य० वा० सं० १२, ६९] । (अथ०
सं० ३, १७, ७) ॥
इति सा निगदव्याख्याता ॥
‘देवीजोष्ट्री’ देव्यौ जोषयित्र्यौ । द्यावापृथिव्यौ
इति वा । अहोरात्रे इति वा ।
‘शस्यं च समा च’- इति कात्थक्यः ॥
तयोः- एष सम्प्रैषो भवति ॥ ७ (४१) ॥
अर्थः-“शुनासीरा०” इस ऋचा का वामदेव ऋषि
है । शुनासीर्ये में विनियोग है ।
हे ‘शुनासीरौ’ वायु- और आदित्य ! (युवाम्) तुम
दोनो ‘इमाम्’ इस ‘वाचम्’ वाणी को = स्तुति को ‘जुषेथाम्
सेवन करो । ‘यत्’ जो ‘दिवि’ द्युलोकमें ‘पयः’ जल चक्रथुः
तुमने किया है, ‘तेन’ उस जल से ‘इमाम्’ इस पृथ्वी को
‘उपसिञ्चतम्’ सींचो । यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्या-
ख्यान की हुई है ।
‘देवी जोष्ट्री’ ( ३५ ) क्यों ? ‘जोषयित्र्यौ’ सबको तृप्त
करने वाली हैं । वे कौन ? अथवा द्यावापृथिवी = द्युलोक
और पृथिवी लोक । अथवा अहोरात्र = दिन और रात्रि ।
शस्य (ब्रीहि = धान आदि) और समा (संवत्सर)
'देवीजोष्ट्री' हैं, यह कात्थक्य आचार्य मानते हैं।
“तयोः०” उन दोनों का यह सम्प्रैष (यजुः) है-
॥ ७ (४१) ॥
( खं० ८ )
निरु०- “देवीजोष्ट्री वसुधिती ययोरन्याघा
द्वेषांसि यूयव दन्यावक्षद्वसु वार्याणि यजमानाय
वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज ॥” [ य० वा० सं०
२८, १५] ॥
‘देवीजोष्ट्री’ देव्यौ जोषयित्र्यौ ‘वसुधिती’
वसुधान्यौ। ययोः अन्या अघानि द्वेषांसि अवया-
वयति । आवहति अन्या वसूनि वननीयानि
यजमानाय वसुधानाय च ‘वीतां’ पिबेताम्,
कामयेतां वा। ‘यज’ इति सम्प्रैषः ॥
‘देवी ऊर्जाहुती’ देव्यौ ऊर्जाह्वान्यौ। द्यावा-
पृथिव्यौ-इति वा। अहोरात्रे-इति वा।
‘शस्यं च समा च’-इति कात्थक्यः ॥
तयोः-एष संप्रैषो भवति- ॥८ (४२) ॥
अर्थः- “देवीजोष्ट्री०” 'देवीजोष्ट्री' (देव्यौ जोषयित्र्यौ)
सब जगत्को तृप्तकरने वाली देविएं ‘वसुधिती’ (वसुधान्यौ)
धन और धान्य अथवा वसुओं को धारण करने वालीं,
‘ययोः’ जिन दोनों में ‘अन्या’ एक ‘अघानि’ (अघानि)
हिन्दी निरुक्त ( २७८ ) ९ अ० ४पा० ६ सं०
पाप रूप 'द्वेषांसि' शत्रुओं को 'यूयवत्' (अवयावयति)
हमसे अलग करती है- नाश करती है। 'अन्या' (पुनः) और
दूसरी देवी 'यजमानाय' यजमान के अर्थ 'वसुवने' धनके
संभोग के लिये और 'वसुधेयस्य' (वसुधानायच) धनके
संग्रह के लिये (वसुवार्याणि' वाञ्छनीय धनों को 'आवक्षत्'
(आवहति) लाती है। (ते) वे दोनों देविए 'वीताम्'
(पिबेताम्) इस पृषदाज्य (घृत विशेष) को पीवें अथवा
[कामयेताम् ] कामना करें। 'यज' यजनकर-यह सम्प्रैष =
प्रेरणा है ।
'देवीऊर्जाहूती' (३६) (अन्नको उत्पन्न करने वालीं
देविये) अथवा द्यावापृथिवी (द्युलोक और पृथिवी लोक)
है। अथवा अहोरात्र (दिन और रात्रि) है।
शस्य और समा = संवत्सर (देवी ऊर्जाहूती) हैं,-यह
कात्थक्य आचार्य मानते हैं।
“ तयो० ” उन दोनों का यह सम्प्रैष [ मन्त्र ] है-
॥ ८ [ ४२ ] ॥
(खं० ६)
निरु०- “ देवी ऊर्जाहुती इषमूर्जमन्या वक्षत्
सग्धिं सपीतिमन्या नवेन पूर्वंदयमानाः स्याम
पुराणेन नवंतामूर्ज मूर्जाहुती ऊर्जयमाने अघातां
वसुवने वसुधेयस्य वीता॑यज ॥” (य० वा० सं०
२८, १६) ॥
देवी ऊर्जाहुती देव्यौ ऊर्जाहात्यौ अन्नं च
हिन्दी-निरुक्त ( २७९ ) ६ अ० ४पा० ४ खं०
रसं च आवहति-आवहति अन्या सहजग्धिं च
सहपीतिं च अन्या, नवेन पूर्वं दयमानाः स्याम
पुराणेन नवम्, ताम् ऊर्जम् ऊर्जाहुंती ऊर्जयमाने
अधाताम् वसुवनाय च वसुधानाय च । वीतां
पिबेताम् । कामयेतां वा ।
“ यज ”-इति सम्प्रैषः “ यज ”–इति संप्रैषः
॥ ९ [ ४३ ] ॥
इति नवमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ९ (४) ॥
अर्थः-'देवी- ऊर्जाहुती' [ देव्यौ ऊर्जाव्हान्यौ ] ऊर्जा-
हानी इस नाम से अन्न के लाने वाली दो 'देविए' [ अन्न-
पूर्णाएं ] कही जाती हैं । 'अन्या' उन दोनों में से एक 'इषम्'
[ अन्नम् ] [च] ब्रीहि = धान आदि अन्नको 'ऊर्जम्' [रसंच]
और धान आदि अन्न को सींचने वाले रस = दुग्ध आदिको
आवहन्, [ आवहति ] संमुखभाव से लाती है, और 'अन्या'-
दूसरी देवी “ सग्धिं ”)सहजग्धिं ) बन्धुओं के साथ सह-
भोजन को और 'सपीतिं' ( सहपीतिंच ) सहपान को (आव-
हति ) लाती है अर्थात्-इनदोनों देवियों में से एक देवी अन्न
और रस के पहुंचाने का कार्य करती है, औरदूसरी उसकेसह-
भोजनऔरसहपानसे उपयोग करनेका अर्थात्-देविये ऐसाकरें,
जैसेहम पूर्वोक्त सहभोजन और सहपान करें । तथा वहबहुत
अन्नहो, जिससे हम'नवेन'नए धान्य से'पूर्वम्'पुराने धान्यको
'दयमानाः' रक्षा करते हुए 'स्याम' होवें और -'पुराणेन '
पुराने धान्य से 'नवम्' नए धान्य को रक्षा करते हुए होवे।
हिन्दी निरुक्त ( २८० ) ६ अ०४ पा० ६ खं०
'ताम्' 'ऊर्जम्' उस ऊर्ज अन्न आदि को 'ऊर्जाहूती' ऊर्जा-
हानी देविए' 'ऊर्जयमाने' बल करती हुई 'अधाताम्' हमें
देवे' । किस अर्थ ? 'वसुवने' [ वसुखननाय च ] धन के संभोग
के लिये 'वसुधेयस्य' ( वसुधानाय ) [ च ] और धन के संग्रह
के लिये । 'वीताम्' (पिबेताम् ) वे दोनों देविए' पृषदाज्य
(घृत) के अपने अंशको पीवें (कामयेतों वा) अथवा कामना
करें । 'यज' हे होतः ! तू यजन कर । यह संप्रैष = प्रेरणा है
'तू यजन कर'- यह सम्प्रैष है ॥ ( ४३ ) ॥
व्याख्या ।
मूल में “ अन्नं च रसं च आवहति-आवहति
अन्या सह जग्धि च सहपीति च अन्या ” ऐसा
लेखक प्रमादजन्य अपपाठ है, इसके स्थान में ' अन्नं च रसं
च आवहति अन्या, आवहति सहजग्धिं च सहपीतिं च अन्या
ऐसा पाठ पढ़ने से अन्वय सुगम हो जाता है। इस पाठ
में केवल ' अन्या ' पदको स्थानान्तरितमात्र किया जाता है
॥ ६ ( ४३ ) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते नवमाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥६.४॥
निरुक्त के नवम अध्याय का खण्ड सूत्र-
[१ म पा०-] प्रथयांसि (१) अश्वो वोढा ( २ ) मानो
मित्रः (३) कनिक्रदत् (४) भद्रं वद (५) संवत्सरम् (६)उपप्रवद
(७) प्रावेपामा (८) प्रैते वदन्तु (६) श्रमन्दान (१०)[२यपा०]
यज्ञसंयोगात् (११) वनस्पते (१२) उपश्वासय (१३ ) बही-
नाम् (१४) अहिरिव (१५) रथे तिष्ठन् (१६) धन्वनागा(१७)
वक्ष्यन्ती वेदा (१८) सुपर्णम् (१९) आजङ्घन्ती(२०) यत्किद्धि
हिन्दी निरुक्त ( २८१ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं०
(२१) [३य पा०-] वृषभः (२२) कयन्नादयन् ( २३ ) इमन्तम्
(२४) पितुं नु (२५) इमं मे (२६) आपो हि ष्ठा (२७) या ओषधीः
(२८) आ रात्री (२९) अरण्यानि (३०) श्रद्धयाग्निः (३१) स्यो-
ना (३२) अमीषाम् (३३ इहेन्द्राणी ( ३४ ) [ ४र्थ पा०- ]
अणतः (३५) आजयी (३६) आवाम् (३७) द्यावानः (३८)
प्रपर्वतानाम् (३६) ते आचरन्ती ( ४० ) शुनासीरौ ( ४१ )
देवीजोष्ट्री [४२] देवी ऊर्जाहुती (४३)
इति निरुक्ते (उत्तर षट्के) नवमोऽध्यायः ॥६, ४॥
इति हिन्दी निरुक्ते (उत्तर षट्के) नवमोऽध्यायः ॥६,४॥
अथ दशमाध्यायस्य
प्रथमः पादः ।
( अथ मध्यस्थानदेवताः )
- ( अथ द्वात्रिंशत् [३२]पदानि )
निघं०—वायुः ॥१॥ वरुणः ॥२॥रुद्रः
॥३॥इन्द्रः ॥४॥ पर्जन्यः॥५॥ बृहस्पतिः
॥६॥ ब्रह्मणस्पतिः ॥७॥
निरु०- अथातो मध्यस्थाना देवताः , तासां
वायुः प्रथमागामी भवति ।
'वायुः' वाते र्वा । वेते र्वा स्याद् गतिकर्मणः ।
एतेः,- इति स्थौलाष्ठीविः । अनर्थको वकारः ।
तस्य एषा भवति ॥ १ ॥
अर्थः- "अथातो०"यहाँ से पृथिवी स्थान देवताओं के
अनन्तर मध्यस्थान- जिनका मध्य = अन्तरिक्ष स्थान है, वे
वायु आदि देवता कहे जावेंगे । उनमें ' वायु ' सब से प्रथम
आने वाला (मुख्य) है ।
'वायु' [१] कैसे ? 'वा' गति गन्धनयोः [ अदा० प० ]
धातु से है । क्यों कि- वह निरन्तर गमन करता है ।
अथवा गति अर्थ में 'वी' (अदा० प०) धातु से है । अथवा
गति अर्थ में 'इ' (ण) (अदा० प०) धातु से है,यह स्थौलाष्ठी-
वि आचार्य मानते हैं । इस पक्ष में 'वायु' शब्द में 'व' कार
अनर्थक है ।
हिन्दी निरुक्त (२८३) १० अ० १ पा० १ खं०
उस 'वायु' की यह ऋचा है -॥१॥
व्याख्या।
"देवताः" यह बहुवचन भेद पक्ष में है- याज्ञिकों के
मत में बहु देवता हैं, उन्हीं के मत से यह बहुवचन है। नैरुक्तों
के मत में मध्य स्थान का एक ही देवता है। क्यों कि वे तीन
लोकों के कुल एक १ करके तीन ही देवता मानते हैं, इस
कारण मध्य लोक का एक ही देवता होसकता है। इन के
मत में मध्य लोक के एक देवता के ही ये सब ३२ + ३६ कुल
६८ वायु आदि नाम हैं। एक ही देवता के गुणों के भेद से
न्यारे २ नाम होते हैं। जैसे- 'वाति' चलता है, इससे मध्य
देव 'वायु' है, फिर मेघजाल से आकाश को आवरण कर
लेता है, इससे 'वरुण' है, फिर रोदन करने से 'रुद्र' है, फिर
इरा (जल) को देने से 'इन्द्र' है, और फिर वह रसों कोमार्जन
इकट्ठो करता है इससे 'पर्जन्य' है। यही गुणों के भेद से नाम
भेद की कल्पना है। इसी रीति के अनुसार वायुः (१) वरुणः
(२) रुद्रः (३) पर्जन्यः (४) इत्यादि समाम्नाय में देवता नामों
की आनुपूर्वी है।
यद्यपि 'इन्द्र' यह मध्य स्थान का मुख्य नाम है, इससे
समाम्नाय में इसी का प्रथम पाठ होना चाहिये था, किन्तु
मध्य स्थान की प्रतीति = कार्यज्ञान वर्षा के द्वारा ही होती
है, और उस कर्म में वायु का ही प्रथम अधिकार है, इससे
'वायु' नामका ही पहिले समाम्नान हुआ है। अर्थात्-कार्तिक
मास से पीछे सब दिशाओं के जलको ओषधि वनस्पति और
जलाशयों से लेता हुआ अन्तरिक्ष में गर्भ को धारण करता है
हिन्दी निरुक्त ( २८४ ) १० अ० १ पा० २ खं०
वह गर्भ आठ मास में पकजाता है और वर्षा काल को
प्राप्त होकर प्रसव = वरसने के अर्थ समर्थ होता है । जैसाकि
कहा है-
“वान्ति पर्णशुषो वाताः ततः पर्णमुचोऽपरे ।
ततः पर्णरुहो वान्ति ततो देवः प्रवर्षति ॥”
अर्थात् पहिले पत्तों के सुखाने वाले वायु चलते हैं, फिर
पत्तों के गिराने वाले, फिर पत्तों को लगाने वाले और फिर
देव वर्षा करता है ।
इस क्रम में पहिले वायु का ही प्रयोजन होता है, इसी
से 'वायु' नाम पहिले समाम्नाय में पढा गया है। और इसीसे
यह ठीक कहा गया है कि- “तासां वायुः प्रथमागामी
भवति” उनमें 'वायु' पहिले आता है ॥१॥
(खं० २)
निरु०-वायवायाहि दर्शतमे सोमा अरङ्कृताः।
तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥” (ऋ०सं०१,१,३,१) ॥
वायो ! आयाहि दर्शनीय ! इमे सोमा 'अरङ्कृताः'
अलङ्कृताः तेषां पिव, शृणु नो ह्वानम्-इतिकम्-
अन्यं मध्यमाद् एवम्- अवक्ष्यत् ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥२॥
अर्थः- “वायवायाहि०” इस ऋचा का मधूच्छन्दस्
ऋषि है । आध्वर्यव ('अध्वर्यु' के ) कर्म में वायव्य के उप-
स्थान में विनियोग है । तथा बाहूच्य (होता) के प्रउग शस्त्रों
इसका शंसन है ।'
हिन्दी निरुक्त ( २८५ ) १० अ० १ पा० ३ खं०
हे 'वायो ' वायु देव ! 'दर्शंत !' ( दर्शनीय !) दर्शन
करने योग्य ! 'आयाहि' आ । 'इमे' ये 'सोमाः' सोम 'अर-
ङ्कृताः' [अलङ्कृताः] तेरे अर्थ सजाए हुए हैं । 'तेषाम्' उन
सोमों के अपने भाग को 'पाहि' (पिव) पी । 'श्रुधि' (शृणु )
सुन-'हवम्' [ नः ह्वानम् ] हमारे आवाहन को । इस प्रकार
मध्यम से किस अन्य देवको ऋषि कहता ? अतः 'वायु '
मध्यम लोक का इन्द्र देव ही है-'वायु' शब्द से इन्द्र का
ही ग्रहण होसकता है । क्योंकि सोमके साथ विशेष सम्बन्ध
इन्द्रका ही है। इससे 'वायु' शब्द से अन्य लोक के देवता
की आपत्ति यहां नहीं होसकती ।
“तस्य०” उस इन्द्रवायु की यह दूसरी ऋचा है,
जिसमें 'वायु' शब्द 'इन्द्र' पद के साथ विशेषण रूप में पढ़ा
हुआ है— ॥ २ ॥
( खं० ३ )
निरु०- “आसस्राणासः शवसान मच्छेन्द्रं
सुचक्रे रथ्यासो अश्वाः। अभिश्रव ऋज्यन्तो वहेयु
र्नूचिन्त्नु वायोरमृतं विदस्येत् ॥” [ ऋ० सं० ४,
७, ९, १ ] ॥
आससृवांसः अभिवलायमानम्-इन्द्रं कल्याण-
चक्रेरथे योगाय रथ्याः अश्वाः रथस्य वोढारः
ऋज्यन्तः ऋजुगामिनः अन्नम्-अभिवहेयुः नवं च
पुराणं च ॥
'श्रवः' इति अन्ननाम श्रूयते इति सतः ।
वायोश्च अस्य भक्षो यथा न विदस्येत्-इति ॥
इन्द्रप्रधाना-इत्येके । नैघण्टुकं वायुकर्म ।
उभयप्रधाना-इत्यपरम् ॥
'वरुणः' वृणोति -इति सतः ।
तस्य-एषा भवति- ॥ ३ ॥
अर्थः- “आसस्त्राणासः०” इस ऋचा का भरद्वाज
ऋषि है । महाव्रत महदुक्थ में शस्त्र है, उत्तर पक्ष में ।
‘रथ्योः’ ( रथ्याः ) रथ में जुड़ने वाले, 'सुचक्रे' सुन्दर
पहियों वाले रथपे ‘आसस्राणासः’ ( आससृवांसः ) नित्य
ही हमारे यज्ञ में आने के अर्थ आसर्पण करने वाले तेज
चलने वाले'ऋज्यन्तः (ऋजुगामिनः) सीधे चलने वाले ‘अश्वा
( रथस्य वोढारः ) रथके खेंचने वाले घोड़े ‘शवसानम्’ [अभि-
बलायमानम् ] अपने को अधिक बलवाला मानते हुये
'इन्द्रम्' इन्द्र को ‘अभि—वहेयुः' हमारे यज्ञके प्रति लावें
जिस प्रकार कि—'नूचित्’(नवं च पुराणं च) नया और पुराना
‘वायोः’ वायु = इन्द्रका ‘अमृतम्’ सोमरूप ‘श्रवः’ अन्न ‘नू’
‘विदस्येत्’ न सूखै-न बिगड़े--ऐसे गुणवाले घोड़े रथमें बैठे
हुये इन्द्र को बहुत शीघ्र लावें जिससे कि- नया पुराना
सोम बिगड़े नहीं (यह हम आशा करते हैं) । इस प्रकार
इस मन्त्र में इन्द्र के विशेषण के रूप में आया हुआ 'वायु'
शब्द इन्द्रका ही वाचक हो सकता है ।
‘श्रवः’ यह अन्न का नाम है । क्योंकि-वह सब स्थान
में श्रवण किया जाता है ।
कोई आचार्य मानते हैं कि - 'यह ऋचा इन्द्रप्रधाना
[Header] हिन्दी निरुक्त ( २८७ ) १० अ० १ पा० ४ खं०
है-इन्द्र ही इस ऋचा में प्रधान है और 'वायु' शब्द उसी
का विशेषण है ।
दूसरा मत यह है-,कि-दोनों ( इन्द्र और वायु ) ही इस
ऋचा में प्रधान देवता हैं । इन्द्र स्वतन्त्र है और वायु स्वतन्त्र
है। 'वायु' शब्द इन्द्र का विशेषण नहीं। यह मत देवता
भेदवादियों का है जो लोग ( याज्ञिक ) एक २ लोक में
भी अनेक देवता मानते हैं वे ऐसा कहते हैं । किंतु नैरुक्त
इसको ठीक नहीं समझते, कारण इस ऋचा का निष्केवल्य में
विनियोग है, वहाँ वायु का सम्बन्ध नहीं (भग०दु०) ॥
'वरुण' ( २ ) यह किस धातु का है ? वृणोति' (ढांप-
लेता है ) इस कर्तृ वाच्य ( स्वा० उ० ) धातु का है । क्योंकि
वह मेघजाल से सब आकाश को ढांपलेता है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥३॥
( खं० ४ )
निरु०— “ नीचीनवारं वरुणः कवन्धं प्रससर्ज
रोदसी अन्तरिक्षम् । तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा
यवन्न वृष्टिव्युंनत्ति भूम ॥” [ऋ० सं० ४,४,३,३]॥
नीचीनद्वारं वरुणः कवन्धं मेघम् । ' कवनम् '
उदकं भवति, तद् अस्मिन् धीयते ।
उदकमपि 'कवन्धम्' उच्यते । 'वन्धिः' अनिभृ-
तत्वे । ' कम्- अनिभृतं च ' । प्रसृजति द्यावा-
पृथिव्यौ च अन्तरिक्षं च महत्त्वेन । तेन सर्वस्य
भुवनस्य राजा । यवमिव वृष्टिव्युंनत्ति भूमिम् ।
हिन्दी निरुक्त ( २८८ ) १० अ० १ पा० ५ खं०
तस्य एषा अपरा भवति ॥४॥
अर्थ:-“नीचीनबारम्०” इसका अत्रि ऋषि है ।
‘वरुणः’ वरुण(मेघपू)मेघकी‘नीचीनबारम्’(नीचीनद्वारम्)
(व्यक् अञ्चयते द्वार यस्य सः नीचीनद्वारः) अधोमुख (करके)—
मेघका मुख नीचे को करके ‘कवन्धम्’ (उदकम्) जल को
‘प्रससर्ज’ (प्रसृजति) रचता है = बरसाता है। ‘रोदसी’ (द्यावा-
पृथिव्यौ) ‘अन्तरिक्षं’ (च) द्युलोक—पृथिवी लोकों को और
अन्तरिक्ष को (महत्वेन) अपने बड़े पने से (प्रसृजति) विशेष
रूप से रचता है । ‘तेन’ तिस कारण से ‘विश्वस्य’ (सर्वस्य)
सारे (भुवनस्य) भुवन(लोक) का ‘राजा’ है । उसीके अनुग्रह के
अर्थ ‘वृष्टिः’ वर्षा ‘भूम’ (भूमिम्) सारी पृथिवी को ‘यवम् न’
किंचित् वस्तु के समान ‘व्युनत्ति’ (क्लेदयति) गीला करती है
भिगोदेती है । (‘वह वरुण देव हमारे लिये ऐसा वाञ्छित करें’)
यह आशीः जोड़ लेना चाहिये ।) ॥
‘कवन्ध’ क्या ? मेघ । क्यों ‘कवन’ उदक = जल होताहै;
वह उसमें धारण कियाजाता है !
जल भी ‘कबन्ध’ कहा जाता है । क्यों ? ‘वन्ध’ धातु
(स्वा०प०) अनिभृतत्व = चञ्चल = पने में है । ‘कं’ सुखरूप !
और ‘वन्ध’ चञ्चल = चपल होने से यह ‘कबन्ध’ है
“तस्य०” उस वरुण की यह दूसरी ऋचा है। यद्यपि
उक्त ऋचामें जो वरुण का वर्ष कर्म दिखाया है, वह सूर्य में
भी संभव है, इस से यह लक्षण मध्यम वरुण का असंदिग्ध
नहीं होता, अतः अगली ऋचा दी जाती है, जिसमें ‘मध्यम’
शब्द से ही उसे मध्यम कहा गया है- ॥ ४ ॥
हिन्दी निरुक्त ( २८६ ) १० अ० १पा० ५खंड
( खं० ५ )
निरु०-“तमूषुसमना गिरा पितॄणाञ्च मन्मभिः ।
नांभा कस्य प्रशस्तिभिर्यः सिन्धूनामुपोदये सप्त-
स्वसास मध्यमो नभन्तामन्यकेसमे ॥ ” (ऋ०सं०
६, ३, २६, १) ॥
तं स्वभिष्टौमि समानया गिरा = गीत्या =
स्तुत्या, पितॄणां च मननीयैः स्तोमैः, नाभाकस्य
प्रशस्तिभिः ।
ऋषि 'र्नाभाको' बभूव, यः स्यन्दमानानाम्-
आसाम्-अपाम्-उपोदये सप्तस्वसारम्-एनम्-आह
वाग्भिः- 'सः मध्यमः'- इति निरुच्यते। अथ एष
एव भवति ।
“ नभन्तामन्यके समे ” मा भूवन्नन्यके सर्वे-
येनो द्विषन्ति दुर्धियः = पापाधियः = पापसंकल्पाः॥
‘रुद्रः’ रौति- इति सतः । रोरूयमाणो द्रवति-
इति वा । रोदयते र्वा । “ यदरुदत्तद् रुद्रस्य
रुद्रत्वम्” इति काठकम् । “यदरोदीत् तद् रुद्रस्य
रुद्रत्वम्”-इति हारिद्रविकम् ॥
तस्य एषा भवति ॥५॥
अर्थः- (अहम्) मैं ‘तम्’ उस वरुण को ‘समना’(समानया)
उसके योग्य ‘गिरा’ ( गीत्या = स्तुत्या )स्तुति से ‘पितॄणां ’
च’ और पितरों के ‘मन्मभिः’ (मननीयैः स्तोमैः) मनन करने